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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

सूक्त-७२ देवता—इंद्र

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सूक्त-७२ देवता—इंद्र
विश्वेषु हि त्वा सवनेषु तुञ्जते समानमेकं वृषमण्यवः पृथक् स्वः
सनिष्यवः पृथक्.
तं त्वा नावं न पर्षणिं शूषस्य धुरि धीमहि.
इन्द्रं न यज्ञैश्चितयन्त आयव स्तोमेभिरिन्द्रमायवः.. (१)
हे इंद्र! फलों की वर्षा की याचना करने वाले, भांतिभांति के स्वर्गों की कामना करने
वाले तथा प्रातः, मध्याह्न और सायं सवनों में तुम्हारी ही प्रार्थना करते हैं. जिस प्रकार नौका
अन्न के पूलों से भरी होती है, उसी प्रकार हम बल धारण के लिए नियुक्त करते हैं. हम इंद्र को
प्रसन्न करने की इच्छा से अपने स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं. (१)
वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्वो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त इन्द्र
निःसृजः.
यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि.
आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (२)
हे इंद्र! अन्न की कामना करने वाले दंपती गोदान के अवसर पर तुम्हारा ध्यान करते हैं
तथा तुम से फल देने की प्रार्थना करते हैं. तुम स्वर्ग में जाने वाले व्यक्तियों को जानते हो.
तुम्हारा वर्षा करने में सहायक वज्र तुम्हारे हाथ में प्रकट होता है. (२)
उतो नो अस्या उषसो जुषेत ह्य १ र्कस्य बोधि हविषो हवीमभिः स्वर्षाता
हवीमभिः.
यदिन्द्र हन्तवे मृधो वृषा वज्रिचिकेतसि.
आ मे अस्य वेधसो नवीयसो मन्म श्रुधि नवीयसः.. (३)
हम स्वर्ग प्राप्ति की कामना से सूर्य को प्रकट करने वाली उषा को हवि प्रदान करते हैं.
हे वर्षणशील इंद्र! तुम युद्ध के इच्छुक शत्रुओं का संहार करने के लिए अपना वज्र हाथ में
लेते हो. मैं ने जिन नवीन स्तोत्रों की रचना की है, तुम उन्हें सुनो. (३)
सूक्त-७३ देवता—इंद्र
तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि.
त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधा ऽ सि.. (१)
हे वीर इंद्र! यज्ञ के सभी सवन तुम्हारे निमित्त हों. तुम्हारे निमित्त ही मैं उन मंत्रों का पाठ
करता हूं. तुम सब के पोषक एवं आह्वान के योग्य हो. (१)
नू चिन्नु तोन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र.
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न वीर्यमिन्द्र ते न राध:.. (२)
हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम्हारा सुंदर रूप, शक्ति, धन और महिमा को दूसरा कोई भी प्राप्त
नहीं कर सकता. (२)
प्र वो महे महिवृधे भरध्वं प्रचेतसे प्र सुमतिं कृणुध्वम्.
विशः पूर्वीः प्र चरा चर्षणिप्राः.. (३)
हे यजन करने वालो! तुम अपनी हवियों के द्वारा इंद्र को प्रसन्न करो. इंद्र मनुष्यों को
मन चाहे फल प्रदान करते हैं. हे इंद्र! तुम मेरे हवि रूप अन्न का सेवन करो. (३)
यदा वज्रं हिरण्यमिदथा रथं हरी यमस्य वहतो वि सूरिभिः.
आ तिष्ठति मघवा सनश्रुत इन्द्रो वाजस्य दीर्घश्रवसस्पतिः.. (४)
इंद्र के हरे रंग के घोड़े इंद्र के स्वर्णिम वज्र को एवं रथ बंधी रस्सियों के सहारे रथ को
खींचते हैं. उस अवसर पर अत्यधिक तेज वाले इंद्र उस रथ पर बैठते हैं. (४)
सो चिन्नु वृष्टिर्यूथ्या ३ स्वा सचां इन्द्रः श्मश्रूणि हरिताभि प्रष्णुते.
अव वेति सुक्ष्यं सुते मधूदिद्धूनोति वातो यथा वनम्.. (५)
सोमरस के निचोड़े जाने पर इंद्र हमारे यज्ञ मंडप में आते हैं. वायु जिस प्रकार वन को
कंपित करता है, इंद्र उसी प्रकार मेघ को कंपित कर देते हैं. (५)
यो वाचा विवाचो मृध्रवाचः पुरू सहस्राशिवा जघान.
तत्तदिदस्य पौंस्यं गृणीमसि पितेव यस्तविषीं वावृधे शवः.. (६)
इंद्र दुष्कर्म करने वालों का वध करते हैं एवं विकृत वाणी वालों की वाणी को मधुरता
प्रदान करते हैं. पिता जिस प्रकार बल की वृद्धि करता है, इंद्र उसी प्रकार अपने भक्तों का
बल बढ़ाते हैं. ऐसे पराक्रमी इंद्र की हम स्तुति करते हैं. (६)
सूक्त-७४ देवता—इंद्र
यच्चिद्धि सत्य सोमपा अनाशस्ता इव स्मसि.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (१)
हे सोमरस का पान करने वाले इंद्र! हमारे हजारों की संख्या वाले घोड़े, गायों और
शुभ्रियों के अमृत होने की बात कहो; क्योंकि तुम अमृतत्व को प्राप्त कर चुके हो. (१)
शिप्रिन् वाजानां पते शचीवस्तव दंसना.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (२)
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हे धन के स्वामी इंद्र! तुम शत्रुओं को दंड देने में समर्थ हो. तुम अपनी उसी सामर्थ्य को
हमारे सहस्रों अश्वों, गायों और शुभ्रियों को प्रदान करो. (२)
नि ष्वापया मिथूदृशा सस्तमबुध्यमाने.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (३)
हे इंद्र! मुझे मेरे दोनों नेत्रों के द्वारा निद्रा प्रदान करो. हमारी हजारों गायों आदि को भी
निद्रा प्रदान करो. (३)
ससन्तु त्या अरातयो बोधन्तु शूर रातयः.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (४)
हे अधिक धन के स्वामी इंद्र! तुम हमारी हजारों गायों, घोड़ों आदि को धन से भरो. हम
जागृत रहें और हमारे शत्रु निद्रा के वश में हो जाएं. (४)
समिन्द्र गर्दभं मृण नुवन्तं पापया ऽ मुया.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (५)
हे इंद्र! तुम पाप वृत्ति वाले राक्षसों का वध कर दो. तुम हमारी गायों आदि को दूसरों का
नाश करने की शक्ति प्रदान करो. (५)
पताति कुण्डृणाच्या दूरं वातो वनादधि.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (६)
वायु बवंडर के द्वारा जंगल से दूर प्रस्थान करती हैं. हे इंद्र! हमारे गौ आदि पशुओं के
श्रेष्ठ होने की बात कहो. (६)
सर्वं परिक्रोशं जहि जम्भया कृकदाश्वम्.
आ तू न इन्द्र शंसय गोष्वश्वेषु शुभ्रिषु सहस्रेषु तुवीमघ.. (७)
हे इंद्र! कृकदाश्व को नष्ट करो तथा परिकोश को हटाओ. हमारे अश्व, गौ आदि प्राणियों
से तुम परिकोश को दूर करो. (७)
सूक्त-७५ देवता—इंद्र
वि त्वा ततस्रे मिथुना अवस्यवो व्रजस्य साता गव्यस्य निःसृजः सक्षन्त
इन्द्र निःसृज.
यद् गव्यन्ता द्वा जना स्व १ र्यन्ता समूहसि.
आविष्करिक्रद् वृषणं सचाभुवं वज्रमिन्द्र सचाभुवम्.. (१)
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हे इंद्र! गोदान के अवसर पर अन्न की कामना करने वाले पतिपत्नी तुम्हारा ध्यान करते
हुए तुम्हें फल देने के लिए आकर्षित करते हैं. तुम स्वर्ग को गमन करने वाले दोनों पति और
पत्नी को जानते हो. उस समय तुम अपने वर्षणशील और सहायक वज्र को प्रकट करते हो.
(१)
विदुष्टे अस्य वीर्यस्य पूरवः पुरो यदिन्द्र शारदीरवातिरः सासहानो
अवातिरः.
शासस्तमिन्द्र मर्त्यमयज्युं शवसस्पते.
महीममुष्णाः पृथिवीमिमा अपो मन्दसान इमा अपः.. (२)
इंद्र शरद ऋतु की वस्तुओं में प्रकट हो कर शत्रुओं को बारबार व्यथित करते हैं. इंद्र के
बल को मनुष्य जानते हैं. हे इंद्र! जो मृत्युलोक वासी तुम्हारा पूजन नहीं करते, उन पर तुम
शासन करो तथा इन जलों और पृथ्वी की वृद्धि करो. (२)
आदित् ते अस्य वीर्यस्य चकिरनन्मदेषु वृषन्नुशिजो यदाविथ सखीयतो
यदाविथ.
चकर्थ कारमेभ्यः पृतनासु प्रवन्तवे.
ते अन्यामन्यां नद्यं सनिषणत श्रवस्यन्तः सनिषणत... (३)
हे धन समर्थ जलो! हम तुम्हारे वीर्य का वर्णन करते हैं. इंद्र के उन्मत्त होने पर तुम ही
उन की रक्षा करते हो. तुम सेनाओं में सेवा योग्य कर्म के करने वाले हो. तुम नदियों के
आश्रय में रहो तथा अन्न प्रदान करते हुए सब के स्नान के साधन बनो. (३)
सूक्त-७६ देवता—इंद्र
वने न वा यो न्यधायि चाकंछुचिर्वां स्तोमो भुरणावजीगः.
यस्येदिन्द्रः पुरुदिनेषु होता नृणां नर्यो नृतमः क्षपावान्.. (१)
हे अश्विनीकुमारो! तुम देवताओं का भरणपोषण करने वाले हो. यह निर्दोष तथा इंद्र की
कामना करने वाला स्तोत्र हैं. इंद्र इस की कामना बहुत दिनों से करते हैं. वे इंद्र मनुष्यों के श्रेष्ठ
सोमरस को प्राप्त करने वाले हैं. यह स्तोत्र अर्थात् मंत्र समूह उन्हीं की ओर अग्रसर होता है.
(१)
प्र ते अस्या उषसः प्रापरस्या नृतौ स्याम नृतमस्य नृणाम्.
अनु त्रिशोकः शतमवह्नन्नृन् कुत्सेन रथो यो असत् ससवान्.. (२)
हम वीरों में श्रेष्ठ इंद्र के विश्वास पात्र सेवक रहें तथा दूसरी उषा को भी पार करें.
त्रिलोक ऋषि ने हमें सैकड़ों उषाएं प्राप्त कराईं. कुत्स ऋषि ने संसार रूपी रथ को अन्न से
युक्त किया. (२)
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कस्ते मद इन्द्र रन्त्यो भूद् दुरो गिरो अभ्यु१ग्रो वि धाव.
कद् वाहो अवांगुप मा मनीषा आ त्वा शक्यामुपमं राधो अन्नैः.. (३)
हे इंद्र! हमें वह स्तोम अर्थात् मंत्र समूह कौन देगा जो तुम्हें प्रसन्न कर सके? कौन सा
अश्व तुम्हें मेरे पास लाएगा? तुम मेरा स्तोम सुनने के लिए आओ. तुम उपमेय हो, मैं तुम्हें
हवियों द्वारा प्रसन्न करने में सफलता प्राप्त करूंगा. (३)
कदु द्युम्नमिन्द्र त्वावतो नॄन् कया धिया करसे कन्न आगन्.
मित्रो न सत्य उरुगाय भृत्या अन्ने समस्य यदसन्मनीषाः.. (४)
हे इंद्र! तुम किस बुद्धि से अपने आश्रितों को यशस्वी बनाते हो? तुम महान कीर्ति वाले
हो, इसलिए सच्चे साथ के समय इस यज्ञ को अन्न की वृद्धि से संपन्न करो. (४)
प्रेर्य सूरो अर्थं न पारं ये अस्य कामं जनिधा इव ग्मन्.
गिरश्च ये ते तुविजात पूर्वीर्नर इन्द्र प्रतिशिक्षन्त्यन्नैः.. (५)
हे इंद्र! जो रश्मियां इस यजमान की इच्छा पूर्ति के लिए माता के समान मिलती हैं, उन
रश्मियों में हमें अर्थ के समान पार करो. पवन देव इसे अन्न प्रदान करें. हे इंद्र! तुम अपनी
प्राचीन स्तुतियां इस की बुद्धि में लाओ. (५)
मात्रे नु ते सुमिते इन्द्र पूर्वी द्यौर्मज्मना पृथिवी काव्येन.
वराय ते घृतवन्तः सुतासः स्वाद्मन् भवन्तु पीतये मधूनि.. (६)
हे इंद्र! घृत मिला हुआ सोमरस तुम्हारे लिए उत्तम स्वाद वाला प्रतीत हो. पृथ्वी और
आकाश अपने में समर्थ एवं उत्तम काव्य रचना के लिए उत्तम बुद्धि वाला हो. (६)
आ मध्वो अस्मा असिचन्नमत्रमिन्द्राय पूर्णं स हि सत्यराधाः.
स वावृधे वरिमन्ना पृथिव्या अभि क्रत्वा नर्यः पौंस्यैश्च.. (७)
इंद्र के लिए यह पात्र मधुर रस से पूर्ण किया गया है. वे इंद्र अपने बल से ही पृथ्वी पर
प्रबुद्ध होते हैं तथा सत्य के द्वारा उन्हीं की पूजा होती है. (७)
व्यानळिन्द्रः पृतनाः स्वोजा आस्मै यतन्ते सख्याय पूर्वीः.
आ स्मा रथं न पृतनासु तिष्ठ यं भद्रया समुत्या चोदयासे.. (८)
इंद्र का बल श्रेष्ठ है. इंद्र सेनाओं में व्याप्त होते हैं. अनगिनत वीर इन के मैत्रीभाव की
कामना करते हैं. हे इंद्र! तुम जिस सुमति के द्वारा प्रेरणा देते हो, रथ के समान उसी सुमति से
तुम हमारे वीरों में व्याप्त होओ. (८)
सूक्त-७७ देवता—इंद्र
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आ सत्यो यातु मघवां ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः.
तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदक्षमभिपित्वं करते गृणानः.. (१)
इंद्र के घोड़े हमारी ओर आएं. धन के स्वामी, सत्य के प्रति निष्ठा रखने वाले एवं
सोमपायी इंद्र यहां आगमन करें. स्तुति करने वाला विद्वान् इसी कारण स्नान आदि कर्म कर
रहा है तथा हम सोम का संस्कार कर रहे हैं. (१)
अव स्य शूराध्वनो नान्ते ऽ स्मिन् नो अद्य सवने मन्दध्यै.
शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्यार्य मन्म.. (२)
हे वीर इंद्र! हमारे इस यज्ञ को प्राप्त करो तथा अपना मार्ग हमारे समीप बनाओ. ये
विद्वान् उशना अर्थात् शुक्राचार्य के समान इंद्र के हेतु उक्थ अर्थात् मंत्रों के समूह का
उच्चारण करते हैं. (२)
कविर्न निण्यं विदथानि साधन् वृषा यत् सेकं विपिपानो अर्चात्.
दिव इत्था जीजनत् सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः.. (३)
इंद्र फलों के वर्षक अर्थात् सब को यज्ञ का फल देने वाले हैं. ये वर्षा के जल के द्वारा
पृथ्वी को शस्यों अर्थात् फसलों से संपन्न बनाते हुए आगमन करें. ऋत्विज् यज्ञ कार्य कर रहा
है. सात स्तोता शोभन स्तोत्रों द्वारा इंद्र की स्तुति कर रहे हैं. (३)
स्व १ र्यद् वेदि सुदृशीकमकैर्महि ज्योति रुरुचुर्यद्ध वस्तोः.
अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ.. (४)
इन मंत्रों के द्वारा दर्शनीय स्वर्ग का ज्ञान होता है. ये मंत्र सूर्य को प्रकाशित करते हैं तथा
इन मंत्रों के द्वारा सूर्य रूपी इंद्र दूर से भी अंधकार को हटा देते हैं. अतिशय शक्तिशाली इंद्र
कामनाओं की वर्षा करते हैं. (४)
ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्यु १ भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा.
अतश्चिदस्य महिमा वि रेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव.. (५)
सोमरस पीने वाले इंद्र असीमित धन हमारी ओर भेजते हैं. इंद्र सभी लोकों में व्याप्त
होने के कारण महिमा वाले हैं. उन्हीं इंद्र की महिमा पृथ्वी और आकाश को पूर्ण करती है.
(५)
विश्वानि शुक्नो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः.
अश्यानं चिद् ये बिभिदुर्वरोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः.. (६)
स्वेच्छा से चलने वाले मेघों के द्वारा इंद्र देव ने हितकारी जलों की वृद्धि की है. ये जल
अपने शब्द से पाषाणों को भी तोड़ देते हैं तथा इच्छा होने पर गोचर भूमि पर छा जाते हैं.
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(६)
अपो वृत्रं वव्रिवांसं पराहन् प्रावत् ते वज्रं पृथिवी सचेताः.
प्राणसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो.. (७)
हे इंद्र! यह पृथ्वी सावधानी से तुम्हारे वज्र की रक्षा करती है. यही समुद्र की भी रक्षिका
है. रोकने वाले वृत्र को जलों ने छिन्नभिन्न कर दिया है. हे इंद्र! तुम अपने बल के द्वारा ही
पृथ्वी के स्वामी हो. (७)
अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत् सरमा पूर्व्यं ते.
स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः.. (८)
हे इंद्र! तुम अनेक यजमानों के द्वारा बुलाए जा चुके हो. तुम जिस जल को हमें प्रदान
करते हो, वह जल तुरंत प्रकट हो कर बहने लगता है. तुम अंगिरसों द्वारा स्तुति किए गए मेघों
को चीरते हुए हमें अपरिमित अन्न प्रदान करते हो. (८)
सूक्त-७८ देवता—इंद्र
तद् वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने. शं यद् गवे न शाकिने.. (१)
हे स्तोता! सोमरस का संस्कार हो जाने पर इंद्र देव की स्तुति करो, जिस से वे हम
सोमरस देने वालों के लिए गौ के समान कल्याणकारी हों. (१)
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः. यत् सीमुप श्रवद् गिरः.. (२)
ये इंद्र यदि हमारी स्तुतियों को सुन लेते हैं तो गौ से युक्त अन्न देने में विलंब नहीं करते.
(२)
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत. शचीभिरप नो वरत्... (३)
हे इंद्र! तुम वृत्र राक्षस का वध करने वाले हो तथा सभी को अपरिमित अन्न देते हो. तुम
गौ से सुशोभित स्थान पर आ कर हम को बल से पूर्ण बनाओ. (३)
सूक्त-७९ देवता—इंद्र
इन्द्र क्रतुं न आ भर पिता पुत्रेभ्यो यथा.
शिक्षा णो अस्मिन् पुरुहूत यामनि जीवा ज्योतिरशीमहि.. (१)
हे इंद्र! जिस प्रकार पिता अपने पुत्र को इच्छित वस्तु प्रदान करता है, उसी प्रकार तुम
भी हमें हमारी मनचाही वस्तुएं प्रदान करो. हे पुरुहूत! इस संसार यात्रा में तुम हमें इच्छित
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पदार्थ प्रदान करो, जिस से हम दीर्घजीवी हो कर इस लोक में सुखों का अनुभव करें. (१)
मा नो अज्ञाता वृजना दुराध्यो ३ मा ऽ शिवासो अव क्रमुः.
त्वया वयं प्रवतः शश्वतीरपो ऽ ति शूर तरामसि.. (२)
हे वीर इंद्र! हम पर आधियों और व्याधियों का आक्रमण न हो. अमंगलमय वाणियां
तथा पाप हम पर आक्रमण न करें. हम तुम्हारी कृपा प्राप्त कर के सेवकों वाले बनें तथा सदा
सफलतापूर्वक यज्ञ करते रहें. (२)
सूक्त-८० देवता—इंद्र
इन्द्रं ज्येष्ठं न आ भरं ओजिष्ठं पपुरि श्रवः.
येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओभे सुशिप्र प्राः.. (१)
हे इंद्र! तुम अपने महान और ओजस्वी धन से हमें संपन्न बनाओ. हे वज्रधारी इंद्र! तुम
ने अपने जिस धन से आकाश तथा पृथ्वी को पूर्ण किया है, वही धन हमें प्रदान करो. (१)
त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन् देवेषु हूमहे.
विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान् सुषहान् कृधि.. (२)
हे इंद्र! तुम उग्र हो. तुम हमारे भय के सभी कारणों को दूर करो तथा हमें शत्रुओं को
वश में करने वाले बल से संपन्न बनाओ. हम अपनी रक्षा के हेतु तुम्हारा आह्वान करते हैं. (२)
सूक्त-८१ देवता—इंद्र
यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः.
न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (१)
हे इंद्र! हे प्रभु! सैकड़ों आकाश और पृथ्वी भी यदि तुम्हारी समानता करना चाहें, तब
भी तुम्हारे समान महान नहीं हो सकते. (१)
आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा.
अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिंचिंत्राभिरूतिभिः.. (२)
हे वज्रधारी इंद्र! हमारे गोचर स्थान में अपने रक्षा साधनों के द्वारा हमारी रक्षा करो तथा
अपनी महिमा से हमारी वृद्धि करो. (२)
सूक्त-८२ देवता—इंद्र
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय.
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स्तोतारमिद् दिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय.. (१)
हे इंद्र! मैं तुम्हारे समान प्रभुत्व प्राप्त करूं तथा स्तुति करने वालों को धन देने वाला
बनूं, पाप कर्म करने वाले धनी मुझे व्यथित न करें. (१)
शिक्षेयमिन्महयते दिवेदिवे राय आ कुहचिद्विदे.
नहि त्वदन्यन्मघवन् न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन.. (२)
हे इंद्र! मैं जहां से चाहूं, वहीं से धन प्राप्त कर सकूं. जो मुझ से उत्कृष्ट होना चाहे, उसे
मैं स्वर्ण का दंड दूं. हे इंद्र! मुझे इस प्रकार की शक्ति देने वाला तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन
रक्षक हो सकता है? (२)
सूक्त-८३ देवता—इंद्र
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्.
छर्दैर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः.. (१)
हे इंद्र! मुझे मंगलकारी घर दो तथा हिंसा करने वाली शक्तियों को यहां से दूर भगाओ.
(१)
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया.
अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव.. (२)
हे इंद्र! तुम्हारे जो बल शत्रुओं को संतप्त करते और मारते हैं, तुम अपने उन्हीं बलों से
हमारे शरीरों की रक्षा करो. (२)
सूक्त-८४ देवता—इंद्र
इन्द्रा याहि चित्रभानो सुता इमे त्वायवः. अण्वीभिस्तना पूतासः.. (१)
हे इंद्र! यहां आओ. यह तैयार किया गया सोमरस तुम्हारे लिए ही है. (१)
इन्द्रा याहि धियेषितो विप्रजूतः सुतावतः. उप ब्रह्माणि वाघतः.. (२)
हे इंद्र! ये विद्वान् ब्राह्मण तुम्हें अपने से श्रेष्ठ स्वीकार करते हैं. इन मंत्रों से संपन्न ब्राह्मणों
और सोमरस वाले ऋत्विजों के समीप आओ. (२)
इन्द्रा याहि तूतुजान उप ब्रह्माणि हरिवः. सुते दधिष्व नश्चनः.. (३)
हे इंद्र! तुम अश्वों के स्वामी हो, इसलिए हमारे स्तोत्रों को सुनने के लिए हमारे समीप
शीघ्र आओ तथा हमारे तैयार सोमरस के पास अपने अश्वों को रोको. (३)
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