अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहै, जो जलों में मधुरता और पुरुषों में वीर्य है; इस तेज, ज्ञान, माधुर्य और वीर्य से गृहस्थ युक्त
हों. इंद्र इन्हीं की अधिकता से सब से महान बने हैं. (३७)
इदमहं रुशन्तं ग्राहं तनूदूषिमपोहामि. यो भद्रो रोचनस्तमुदचामि.. (३८)
मैं शरीर में दोष उत्पन्न करने वाले विनाशक रोग को दूर करता हूं. जो कल्याणमय
तेजस्वी है, उसे अपने पास बुलाता हूं. (३८)
आस्यै ब्राह्मणा: स्नपनीर्हरन्त्वीरघ्नीरुदजन्त्वापः
अर्यम्णो अग्निं पर्येतु पूषन् प्रतीक्षन्ते श्वशुरो देवरश्च.. (३९)
ब्राह्मण इस के लिए स्नान का जल ले आएं. वे ऐसा जल लाएं जो वीर का नाश न करे.
वह अर्यमा देव की अग्नि की प्रदक्षिणा करे. हे पूषा देव! ससुर और देवर इस वधू की प्रतीक्षा
करें. (३९)
शं ते हिरण्यं शमु सन्त्वापः शं मेथिर्भवतु शं युगस्य तद्मँ.
शं त आपः शतपवित्रा भवन्तु शमु पत्या तन्वं १ सं स्पृशस्व.. (४०)
तेरे लिए सुवर्ण कल्याणकारी तथा जल सुख देने वाला हो. गाय बांधने का खंभा तुझे
सुख देने वाला हो. जुए का छेद तुझे सुखकर हो. सौ प्रकार से पवित्रता प्रदान करने वाला
जल तेरे लिए सुखकारी हो. तू सुखकारक एक रीति से अपने पति के साथ अपने शरीर का
स्पर्श कर. (४०)
खे रथस्य खे ऽ नसः खे युगस्य शतक्रतो.
अपालामिन्द्र त्रिष्पूत्वाकृणोः सूर्यत्वचम्.. (४१)
हे सौ यज्ञ करने वाले इंद्र देव! रथ के छिद्र में, गाड़ी के छिद्र तथा जुए के छिद्र में
अयोग्य रीति से पाली हुई युवती को तुम ने तीन बार पवित्र कर के सूर्य के समान तेजस्वी
त्वचा वाला बनाया है. (४१)
आशासाना सौमनसं प्रजां सौभाग्यं रयिम्.
पत्युरनुव्रता भूत्वा सं नह्यस्वामृताय कम्.. (४२)
उत्तम मन, संतान, सौभाग्य और धन की आशा करने वाली तू पति के अनुकूल
आचरण करने वाली हो कर सुखपूर्वक अमरत्व के हेतु सिद्ध हो. (४२)
यथा सिन्धुर्नदीनां साम्राज्यं सुषुवे वृषा.
एवा त्वं सम्राज्ञ्येधि पत्युरस्तं परेत्य.. (४३)
जिस प्रकार शक्तिशाली सागर नदियों पर शासन करता है, उसी प्रकार तू भी अपने
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