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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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चंद्रमा के समान प्रसन्नता देने वाले दहेज की ओर जो साधन आते हैं, यज्ञीय देवता उन्हें
वहीं पहुंचा दें, जहां से वे आते हैं. (१०)
मा विदन् परिपन्थिनो य आसीदन्ति दम्पती.
सुगेन दुर्गमतीतामप द्रान्तवरातयः.. (११)
जो दस्यु दंपती के समीप आना चाहते हैं, वे इन्हें प्राप्त न कर सकें. हम इस दुर्गम मार्ग
को सुगमता से पार करें तथा हमारे शत्रु दुर्गति में पड़ें. (११)
सं काशयामि वहतुं ब्रह्मणा गृहैरघोरेण चक्षुषा मित्रियेण.
पर्याणद्धं विश्वरूपं यदस्ति स्योनं पतिभ्यः सविता तत् कृणोतु.. (१२)
मैं मंत्रों और नक्षत्रों के द्वारा दहेज को दीप्त करता हूं. इस में जो विभिन्न प्रकार के
पदार्थ हैं, सविता देव उन पदार्थों को प्राप्त करने वालों को सुख देने वाला बनाएं. (१२)
शिवा नारीयमस्तमागन्निमं धाता लोकमस्यै दिदेश.
तामर्यमा भगो अश्विनोभा प्रजापतिः प्रजया वर्धयन्तु.. (१३)
इस स्त्री के लिए धाता ने घर के रूप में लोक का निर्माण किया है. यह कल्याणी इसे
प्राप्त हो गई है. इस वधू को अश्विनीकुमार, अर्यमा, भग और प्रजापति संतान के द्वारा बढ़ाएं.
(१३)
आत्मन्वत्युर्वरा नारीयमागन् तस्यां नरो वपत बीजमस्याम्.
सा वः प्रजां जनयद् वक्षणाभ्यो बिभ्रती दुग्धमृषभस्य रेतः.. (१४)
हे पुरुष! तू इस उर्वरा नारी में बीजों का वपन कर. वृषभ के समान तेरे वीर्य को और
अपने दूध को धारण करने वाले यह तेरे निमित्त संतान उत्पन्न करे. (१४)
प्रति तिष्ठ विराट्सि विष्णुरिवेह सरस्वति.
सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्.. (१५)
हे सरस्वती! तू विष्णु के समान विराट् है. इसलिए तू प्रतिष्ठित हो. हे सिनीवाली! तू भग
देवता की सुंदर बुद्धि में रहती हुई संतान उत्पन्न कर. (१५)
उद् व ऊर्मिः शम्या हन्त्वापो योक्त्राणि मुञ्चत.
मादुष्कृतौ व्ये नसावघ्न्यावशुनमारताम्.. (१६)
हे जलो! अपने कर्म की तरंगों को शांत करो तथा लगामों को ढीला करो. श्रेष्ठ कर्म
करने वाले तथा न मारने योग्य वाहन अशुभ न करने लगें. (१६)
अघोरचक्षुरपतिघ्नी स्योना शग्मा सुशेवा सुयमा गृहेभ्यः.
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