अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextदेवों को उत्तम भाग देते हो तथा सभी को दीर्घ जीवन प्रदान करते हो. (२४)
परा देहि शामुल्यं ब्रह्मभ्यो वि भजा वसु.
कृत्यैषा पद्द्वती भूत्वा जाया विशते पतिम्.. (२५)
हे वर! तुम उत्तम वस्त्रदान करो तथा ब्राह्मणों को धन दो, जब यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बन कर पति के समीप जाती है. (२५)
नीललोहितं भवति कृत्यासक्तिर्व्य ज्यते.
एधन्ते अस्या ज्ञातयः पतिर्बन्धेषु बध्यते.. (२६)
जब नीला और लाल वस्त्र होता है अथवा पुरुष क्रोधित होता है, तभी यह कृत्या अर्थात्
विनाशक स्वभाव वाली स्त्री बढ़ती है तथा इस की जाति के मनुष्यों की वृद्धि होती है. इसी के
कारण इस का पति बंधन में बंध जाता है. (२६)
अश्लीला तनूर्भवति रुशती पापयामुया.
पतिर्यद् वध्वो ३ वासः स्वमङ्गमभ्यूर्णुते.. (२७)
जब पत्नी के वस्त्र से पति अपना शरीर ढकता है, तब सुंदर शरीर वाला पति भी इस
पाप पूर्ण रीति के कारण शोभाहीन हो जाता है. (२७)
आशसनं विशसनमथो अधिविकर्तनम्.
सूर्यायाः पश्य रूपाणि तानि ब्रह्मोत शुम्भति.. (२८)
धारी वाले वस्त्रों में सिर के वस्त्र तथा सभी अंगों पर रहने वाले वस्त्रों में कृत्या अर्थात्
दुष्ट स्वभाव वाली स्त्री के रूपों को देखो. इन रूपों को ब्रह्मा ही तेजस्वी करता है. (२८)
तृष्टमेतत् कटुकमपाष्ठवद् विषवन्नैतदत्तवे.
सूर्या यो ब्रह्मा वेद स इद् वाधूयमर्हति.. (२९)
यह अन्न प्यास उत्पन्न करने वाला तथा कड़वा है. यह अन्न घृणित तथा विषैला है. यह
खाने योग्य नहीं है. जो ब्राह्मण सूर्या को इस प्रकार की शिक्षा देता है, वह निश्चित रूप से वधू
संबंधी वस्त्र लेने योग्य है. (२९)
स इत् तत् स्योनं हरति ब्रह्मा वासः सुमङ्गलम्.
प्रायश्चित्तिं यो अध्येति येन जाया न रिष्यति.. (३०)
जिस वस्त्र से प्रायश्चित्त होता है अर्थात् चित् की शुद्धि होती है तथा जिस के कारण
पत्नी मरण को प्राप्त नहीं होती है, उस कल्याणकारी वस्त्र को ब्रह्मा धारण करता है. (३०)
युवं भगं भरतं समृद्धमृतं वदन्तावृत्तोद्येषु.
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