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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

Page 724 of 1063

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Page 724

वीरसूर्देवृकामा स त्वयैधिषीमहि सुमनस्यमाना.. (१७)
हे वधू! तू स्निग्ध दृष्टि रखती हुई तथा पति को क्षीण न करने वाली हो. तू वीर पुत्रों को
प्रसन्न करती हुई तथा अपने मन में प्रसन्न होती हुई सब को सुखी करने वाली हो. तू इस घर
को प्राप्त हो तथा हम भी तेरे द्वारा वृद्धि प्राप्त करें. (१७)
अदेवृघ्न्यपतिघ्नीहैधि शिवा पशुभ्यः सुयमा सुवर्चाः.
प्रजावती वीरसूर्देवृकामा स्योनेममग्निं गार्हपत्यं सपर्ये.. (१८)
हे वधू! तू अपने पति और देवर को हानि न पहुंचाने वाली, पशुओं का हित करने वाली,
प्रजावती, शोभन कांति से युक्त तथा सुख देने वाली होती हुई पति और देवर को कष्ट मत
पहुंचाए. तू अग्नि का पूजन कर. (१८)
उत्तिष्ठेतः किमिच्छन्तीदमागा अहं त्वेडे अभिभूः स्वाद् गृहात्.
शून्यैषी निर्ऋते याजगन्धोत्तिष्ठाराते प्र पत मेह संस्थाः.. (१९)
हे निर्ऋति! तू यहां से उठ कर भाग. तू किसी वस्तु की इच्छा से यहां उपस्थित हुई है. मैं
तुझे अपने घर से भगाता हुआ तेरा सत्कार करता हूं. तू शुभ रूपिणी है तथा शून्य बनाने की
इच्छा से यहां आई है, परंतु तू यहां विहार मत कर. (१९)
यदा गार्हपत्यमसपर्यैत् पूर्वमग्निं वधूरियम्.
अधा सरस्वत्यै नारि पितृभ्यश्च नमस्कुरु.. (२०)
गृहस्थ रूप आश्रम में प्रवेश करने से पहले यह वधू अग्नि का पूजन कर रही है. हे स्त्री!
अब तू सरस्वती को तथा पितरों को नमस्कार कर. (२०)
शर्म वर्मैतदा हरास्यै नार्या उपस्तिरे.
सिनीवालि प्र जायतां भगस्य सुमतावसत्.. (२१)
इस स्त्री के लिए मृगचर्म रूप आसन मंगल और रक्षा को प्राप्त कराए. ये भग देवता
प्रसन्न रहें. हे सिनीवाली! यह स्त्री संतानोत्पत्ति करती रहे. (२१)
यं बल्बजं न्यस्यथ चर्म चोपस्तृणीथन.
तदा रोहतु सुप्रजा या कन्या विन्दते पतिम्.. (२२)
यह प्रजावती और पति की कामना करने वाली कन्या तुम्हारे द्वारा रखे गए तृण और
मृगचर्म पर आसीन हो. (२२)
उप स्तृणीहि बल्बजमधि चर्मणि रोहिते.
तत्रोपविश्य सुप्रजा इममग्निं सपर्येतु.. (२३)
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