अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसंतान और पशुओं को दुःखी करने वालों ने तेरे घर में जिस दुःख का विस्तार किया है.
उस पाप से सविता और अग्नि तुझे छुड़ाएं. (६२)
इयं नार्युप ब्रूते पूल्यान्यावपन्तिका.
दीर्घायुरस्तु मे पतिर्जीवाति शरदः शतम्.. (६३)
अग्नि में खीलों की आहुति देती हुई यह वधू कामना करती है कि मेरा पति दीर्घ आयु
वाला हो और सौ वर्ष तक जीवित रहे. (६३)
इहेमाविन्द्र सं नुद चक्रवाकेव दम्पती.
प्रजयैनौ स्वस्तकौ विश्वमायुर्व्य श्रुताम्.. (६४)
हे इंद्र! इन पति और पत्नी को ऐसा प्रेम दो, जैसे चकवी और चकवे में होता है. इन्हें
सुंदर घर और संतानों से युक्त रखो. ये दोनों जीवनभर भांतिभांति के सुख भोगते रहें. (६४)
यदासन्द्यामुपधाने यद् वोपवासने कृतम्.
विवाहे कृत्यां यां चक्रूरास्नाने तां नि दध्मसि.. (६५)
हम ने असंदी अर्थात् कुरसी पर, बिस्तर पर, सिरहाने तथा उपवस्त्र पर जो पाप किया
और अपने विवाह में जो हिंसक प्रयोग किया, उसे हम स्नान के द्वारा धो डालते हैं. (६५)
यद् दुष्कृतं यच्छमलं विवाहे वहतौ च यत्.
तत् संभलस्य कम्बले मृज्महे दुरितं वयम्.. (६६)
हम ने विवाह में तथा बरात के रथ में जो दुष्ट और मलिन कर्म किया, उसे हम मधुर
भाषी पुरुष के कंबलों से युक्त करते हैं. (६६)
संभले मलं सादयित्वा कम्बले दुरितं वयम्.
अभूम यज्ञियाः शुद्धाः प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (६७)
संभल अर्थात् दूत में मन को तथा कंबल में पाप को स्थित कर के हम यज्ञ करने योग्य
शुद्ध हो जाएं. वह शुद्धि हमारी आयु को शुद्ध बनाए. (६७)
कृत्रिमः कण्टकः शतदन् य एषः.
अपास्याः केश्यं मलमप शीर्षण्यां लिखात्.. (६८)
यह सैकड़ों दांतों वाला कंघा कृत्रिम रूप से बनाया गया है. यह हमारे शीश पर पहुंच
कर हमारे शीश के मैल को छुड़ाए. (६८)
अङ्गादङ्गाद् वयमस्या अप यक्ष्मं नि दध्मसि.
तन्मा प्रापत् पृथिवीं मोत देवान् दिवं मा प्रापदुर्व १ न्तरिक्षम्.
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