अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजो नीला, पीला तथा लाल रंग का अंधकार है, वह हम से दूर रहे. जो जलाने वाली दोष
की स्थिति इस में है, मैं उसे इस स्तंभ में लगा देता हूं. (४८)
यावतीः कृत्या उपवासने यावन्तो राज्ञो वरुणस्य पाशाः.
व्यृद्धयो या असमृद्धयो या अस्मिन् ता स्थाणावधि सादयामि.. (४९)
उपवस्त्रों में हिंसा करने वाली जो कृत्याएं हैं, राजा वरुण के जितने पाश हैं तथा जो
दरिद्रताएं और बुरी अवस्थाएं हैं, उन सब को मैं इस खंभे में स्थापित करता हूं. (४९)
या मे प्रियतमा तनूः सा मे बिभाय वाससः.
तस्याग्रे त्वं वनस्पते नीविं कृणुष्व मा वयं रिषाम.. (५०)
मेरा प्रिय शरीर मेरे वस्त्र में भयभीत होता है, इसलिए हे वनस्पति! पहले तुम इस की
गांठ बांध दो जिस से हम दुखी न हों. (५०)
ये अन्ता यावतीः सिचो य ओतवो ये च तन्तवः.
वासो यत् पत्नीभिरुतं तन्नः स्योनमुप स्पृशात्.. (५१)
इस वस्त्र में जो झालरें और किनारियां हैं, जो ताने और बाने हैं तथा जो वस्त्र स्त्रियों ने
बुना है, वह हमारे शरीर का सुखपूर्वक स्पर्श करने वाला हो. (५१)
उशतीः कन्यला इमाः पितृलोकात् पतिं यतीः.
अव दीक्षामसृक्षत स्वाहा.. (५२)
पति की इच्छा करने वाली ये कन्याएं पिता के घर से पति के घर जाती हुई दीक्षा का
व्रत धारण करें. यही उत्तम उपदेश है. (५२)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
वर्चो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५३)
बृहस्पति की यह ओषधि विश्वे देवों के द्वारा पुष्ट की गई है. हम इसे गायों के तेज से
मिलाते हैं. (५३)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
तेजो गोषु प्रविष्टं यत् तेनेमां सं सृजामसि.. (५४)
बृहस्पति की रची हुई इस ओषधि को विश्वे देवों ने पुष्ट किया है. हम इसे उस तेज से
संयुक्त करते हैं जो गायों में प्रवेश कर गया है. (५४)
बृहस्पतिनावसृष्टां विश्वे देवा अधारयन्.
भगो गोषु प्रविष्टो यस्तेनेमां सं सृजामसि.. (५५)