अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextआरोहत् सूर्या सावित्री बृहते सौभाग्य कम्.. (३०)
सूर्या सुख देने के लिए इस पलंग पर चढ़ी थी जिस पर मन को अच्छा लगने वाला
बिछौना बिछा था. (३०)
आ रोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनय पत्ये अस्मै.
इन्द्राणीव सुबुधा बुध्यमाना ज्योतिरग्रा उषसः प्रति जागरासि.. (३१)
हे स्त्री! तू प्रसन्न होती हुई इस पलंग पर चढ़ तथा पति हेतु संतान उत्पन्न कर. तू अपने
पति के समान बुद्धि से संपन्न बन तथा नित्य उषाकाल में जागने वाली बन. (३१)
देवा अग्रे न्य पद्यन्त पत्नीः समस्पृशन्त तन्व स्तनूभिः.
सूर्येव नारि विश्वरूपा महित्वा प्रजावती पत्या सं भवेह.. (३२)
प्राचीन काल में देवताओं ने भी पलंग पर चढ़ कर अपने अंगों से अपनी पत्नियों के
अंगों का स्पर्श किया था. हे स्त्री! तू सूर्या के समान ही पति के साथ निवास करती हुई
संतानवती बन. (३२)
उत्तिष्ठेतो विश्वावसो नमसेडामहे त्वा.
जामिमिच्छ पितृषदं न्यक्तां स ते भागो जनुषा तस्य विद्धि.. (३३)
हे विश्वावसु! यहां से उठो. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं. तू पिता के घर रहने वाली
सुशोभित वधू को प्राप्त करने की इच्छा कर. यह तेरा भाग है. जन्म से उस का ज्ञान प्राप्त
कर. (३३)
अप्सरसः सधमादं मदन्ति हविर्धानमन्तरा सूर्यं च.
तास्ते जनित्रमभि ताः परेहि नमस्ते गन्धर्वर्तुना कृणोमि.. (३४)
हविर्धान और सूर्य के मध्य में अप्सराएं साथसाथ मिल कर आनंदित होने वाले कर्म में
हर्षित होती हैं. वह तेरा जन्म स्थान है. तू उन के समीप जा. गंधर्व तथा ऋतुओं के साथ मैं
तुझे नमन करता हूं. (३४)
नमो गन्धर्वस्य नमसे नमो भामाय चक्षुषे च कृण्मः.
विश्वावसो ब्रह्मणा ते नमोऽभि जाया अप्सरसः परेहि.. (३५)
गंधर्व के नमस्कार को हमारा नमस्कार है. उस की तेजस्वी आंखों के लिए हम नमस्कार
करते हैं. हे सभी प्रकार के धनों के स्वामी! तुझे हम ज्ञानपूर्वक नमन करते हैं. तुम अप्सराओं
के समान हमारी पत्नियों से दूर रहो. (३५)
राया वयं सुमनसः स्यामोदितो गन्धर्वमावीवृताम.
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