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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

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Page 719

अग्नि पति के लिए सौभाग्य वाली स्त्री को वृद्धावस्था तक जीवित रहने वाली बनाएं. (४९)
गृह्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः.
भगो अर्यमा सविता पुरन्धिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः.. (५०)
मैं सौभाग्य के लिए तेरा हाथ पकड़ता हूं. तू मुझ पति के साथ वृद्धावस्था तक जीवित
रह. भग, अर्यमा, सविता तथा सभी देवों ने तुझ को मेरे हाथ में गृहस्थाश्रम चलने के लिए
दिया है. (५०)
भगस्ते हस्तमग्रहीत् सविता हस्तमग्रहीत्.
पत्नी त्वमसि धर्मणाहं गृहपतिस्तव.. (५१)
भग तथा सूर्य देव ने तेरा हाथ पकड़ा है, इसलिए तू धर्मपूर्वक मेरी पत्नी है और मैं तेरा
पति हूं. (५१)
ममेयमस्तु पोष्या मह्यं त्वादद् बृहस्पतिः.
मया पत्या प्रजावति सं जीव शरदः शतम्.. (५२)
बृहस्पति ने तुझे मेरे लिए दिया है. तू मुझ पति के साथ रहती हुई संतान वाली बन तथा
सौ वर्ष की आयु भोगती हुई मेरी पोष्या अर्थात् पुष्ट होने वाली और पोषण प्राप्त करने वाली
बन. (५२)
त्वष्टा वासो व्यदधाच्छुभे कं बृहस्पतेः प्रशिषा कवीनाम्.
तेनेमां नारीं सविता भगश्च सूर्यामिव परि धत्तां प्रजया.. (५३)
हे शुभे! इस कल्याणकारी वस्त्र को बृहस्पति की आज्ञा से त्वष्टा ने बनाया है. सविता
तथा भग देवता सूर्या के समान ही इस स्त्री को इस वस्त्र के द्वारा संतान आदि से संपन्न
बनाएं. (५३)
इन्द्राग्नी द्यावापृथिवी मातरिश्वा मित्रावरुणा भगो अश्विनोभा.
बृहस्पतिर्मरुतो ब्रह्म सोम इमां नारीं प्रजया वर्धयन्तु.. (५४)
दोनों अश्विनीकुमार, इंद्र और अग्नि, मित्र और वरुण, आकाश और पृथ्वी, बृहस्पति,
वायु, मरुद्गण, ब्रह्म तथा सोम देवता इस स्त्री को संतान से बढ़ाएं. (५४)
बृहस्पतिः प्रथमः सूर्यायाः शीर्षे केशाँ अकल्पयत्.
तेनेमामश्विना नारीं पत्ये सं शोभयामसि.. (५५)
हे अश्विनीकुमारो! बृहस्पति ने सूर्या के केशों का विन्यास किया था. उसी के अनुसार
हम वरभाव आदि के द्वारा इस स्त्री को पति के निमित्त सजाते हैं. (५५)