अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयुवं ब्रह्मणे ऽ नुमन्यमानौ बृहस्पते साकमिन्द्रश्च दत्तम्.. (४२)
हे बृहस्पति देव! तुम इंद्र के साथ मिल कर वधू का विवाह के समय पहना जाने वाला
वस्त्र इस वधू को प्रदान करो. जो ब्राह्मण का भाग है, तुम दोनों वह वस्त्र मुझे प्रदान करते हो.
तुम दोनों ब्राह्मण की अनुमति से यह वस्त्र मुझे देते हो. (४२)
स्योनाद्योनेरधि बुध्यमानौ हसामुदौ महसा मोदमानौ.
सुगू सुपुत्रौ सुगृहौ तराथो जीवावुषसो विभाती:.. (४३)
हम दोनों हंसते हुए प्रसन्नता को तथा सुखपूर्वक ज्ञान को प्राप्त करें. हम सुंदर गति वाले
हों तथा पुत्र आदि से संपन्न रहते हुए उषाओं को पार करें. (४३)
नवं वसानः सुरभिः सुवासा उदागां जीव उषसो विभाती:.
आण्डात् पत्रीवामुक्षि विश्वस्मादेनसस्परि.. (४४)
मैं नवीन वस्त्र धारण करता हूं. सुगंध धारण कर के उत्तम वस्त्र पहनने वाला मैं
जीवधारी मनुष्यों के समान उषा काल में उठता हूं. जिस प्रकार पक्षी अंडे से निकलता है,
उसी प्रकार मैं भी सब पापों से छूट जाऊं. (४४)
शुम्भनी द्यावापृथिवी अन्तिसुम्ने महिव्रते.
आपः सप्त सुस्रुवुर्देवीस्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (४५)
सुशोभित पृथ्वी और आकाश के मध्य चेतन और अचेतन दोनों प्रकार के प्राणी निवास
करते हैं. विशाल कर्म वाले आकाश और पृथ्वी तथा ये प्रवाहित होने वाले सात प्रकार के
जल हमें पापों से मुक्त करें. (४५)
सूर्यायै देवेभ्यो मित्राय वरुणाय च.
ये भूतस्य प्रचेतसस्तेभ्य इदमकरं नम:.. (४६)
जो सूर्या को, देवगण को, मित्र और वरुण को तथा सभी प्राणियों को जानने वाले हैं,
उन्हें मैं नमस्कार करता हूं. (४६)
य ऋते चिदभिश्रिषः पुरा जत्रुभ्य आतृदः.
संधाता संधिं मघवा पुरूवसुर्निष्कर्ता विह्रुतं पुनः.. (४७)
जो चिपके बिना तथा छेद किए बिना इन हड्डियों को जोड़ देता है, जो फटे हुए को
पुनः जोड़ता है तथा उत्तम और पर्याप्त धन प्रदान करता है, वही ईश्वर है. (४७)
अपास्मत् तम उच्छतु नीलं पिशङ्गमनुत लोहितं यत्.
निर्दहनी या पृषातक्य १स्मिन् तां स्थाणावध्या सजामि.. (४८)
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