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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

सूक्त-१०० देवता—गृद्ध

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सूक्त-१०० देवता—गृद्ध
उदस्य श्यावौ विथुरौ गृध्रौ द्यामिव पेततुः.
उच्छोचनप्रशोचनावस्योच्छोचनौ हृदः.. (१)
इस शत्रु के नित्य चलने वाले दोनों काले होंठ विदीर्ण हो जाएं तथा इस प्रकार गिर पड़ें,
जिस प्रकार आकाश में उड़ता हुआ गिद्ध नीचे गिरता है. उच्छोचन और प्रशोचन नामक मृत्यु
देव इस शत्रु के हृदय को अधिक रूप में शोक पहुंचाने वाले हों. (१)
अहमेनावुदतिष्ठिपं गावौ श्रान्तसदाविव. कुर्कुराविव कूजन्तावुदवन्तौ
वृकाविव.. (२)
अनुष्ठान करने वाला मैं इस शत्रु के दोनों काले होंठों को इस प्रकार उखाड़ता हूं, जिस
प्रकार थक कर बैठी हुई गायों को डंडे से कोंच कर उठाया जाता है. भूंकते हुए कुत्तों को
पत्थर आदि फेंक कर भगाया जाता है और गायों के झुंड में से बछड़ों को पकड़ कर ले जाते
हुए भेड़ियों को ग्वाले बलपूर्वक भगाते हैं. (२)
आतोदिनौ नितोदिनावथो संतोदिनावुत.
अपि नह्याम्यस्य मेढ्रं य इतः स्त्री पुमान्जभार.. (३)
सभी प्रकार से व्यथा पहुंचाने वाले शत्रु के अत्यधिक बाधा डालने वाले दोनों होंठों को
मैं उखाड़ता हूं जो मिल कर बोलते हुए मुझे व्यथित करते हैं. हम से द्वेष रखने वाले जिस
पुरुष अथवा स्त्री ने इस स्थान से हमारा धन चुराया है, उस शत्रु के प्रजनन अंग को भी मैं
बांधता हूं. (३)
सूक्त-१०१ देवता—पक्षी
असदन् गावः सदने ऽ पप्तद् वसतिं वयः.
आस्थाने पर्वता अस्थुः स्थाम्नि वृक्कावतिष्ठिपम्.. (१)
गाय जिस प्रकार गोशाला में बैठती है, पक्षी जिस प्रकार अपने घोंसले में जाते हैं और
पर्वत जिस प्रकार अपने स्थान पर स्थित रहते हैं, मैं अपने शत्रु के घर में उसी प्रकार भेड़ियों
को स्थापित करता हूं. (१)
सूक्त-१०२ देवता—इंद्र, अग्नि
यदद्य त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन् होतश्चिकित्वन्नवृणीमहीह.
ध्रुवमयो ध्रुवमुता शविष्ठ प्रविद्वान् यज्ञमुप याहि सोमम्.. (१)
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हे यज्ञ में देवों का आह्वान करने वाले एवं हे ज्ञानवान अग्नि! हम ने तुम्हें आज इस यज्ञ
में होता के रूप में वरण किया है, इसीलिए तुम निश्चय ही यज्ञ करो तथा इस यज्ञ कर्म के
दोषों को शांत करो. तुम इस यज्ञ को विशेष रूप से सोमरस युक्त जानकर आओ. (१)
समिन्द्र नो मनसा नेष गोभिः सं सूरिभिर्हरिवन्त्सं स्वस्त्या.
सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां सुमतौ यज्ञियानाम्.. (२)
हे इंद्र! हमें स्तुति रूपी शब्दों से युक्त कर के बोलने में कुशल बनाओ, जिस से हम
तुम्हारी स्तुति कर सकें. हे अश्वों के स्वामी इंद्र! हमें विद्वानों से युक्त करो, जिस से हमारा
विनाश न हो. हमें ब्रह्म ज्ञान एवं देव हितकारी अग्निहोत्र आदि से युक्त बनाओ. हमें अग्नि
आदि यज्ञ के योग्य देवों की सुमति में स्थापित करो. (२)
यानावह उशतो देव देवांस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे.
जक्षिवांसः पपिवांसो मधून्यस्मै धत्त वसवो वसूनि.. (३)
हे दीप्तिशाली अग्नि! तुम ने हवि की कामना करने वाले देवों का आह्वान किया है. तुम
उन्हें अपने निवास स्थान में रहने के लिए प्रेरित करो. हे पुरोडाश का भक्षण करने वाले, मधु
रस से युक्त आज्य को पीने वाले एवं लोकों के रक्षक देवो! तुम इस यजमान के लिए धन दो.
(३)
सुगा वो देवाः सदना अकर्म य आजग्म सवने मा जुषाणाः.
वहमाना भरमाणाः स्वा वसूनि वसुं घर्मं दिवमा रोहतानु.. (४)
हे देवो! तुम्हारे घर सुख से पहुंचने योग्य बनाए गए हैं. हवि का सेवन करने वाले तुम
सब घरों में आए थे. तुम अपने धनों को प्राप्त कर के हमारा पोषण करते हुए समस्त लोक में
निवास करने वाले आदित्य में स्थित बनो और हमें धन देने के पश्चात अपने स्थान को जाओ.
(४)
यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ. स्वां योनिं गच्छ स्वाहा.. (५)
हे यज्ञ! तू यज्ञ कर ने योग्य परमात्मा विष्णु के समीप जा, जिस से तू प्रतिष्ठित हो सके.
इस के पश्चात तू यज्ञ का पालन करने वाले यजमान को फल देने के हेतु प्राप्त हो. इस के
पश्चात तू सारे संसार के कारण बने हुए परमेश्वर की शक्ति को प्राप्त कर. यह आज्य शोभन
आहुति वाला हो. (५)
एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः. सुवीर्यः स्वाहा.. (६)
हे यजमान! यह यज्ञ विविध स्तोत्रों वाला, शोभन पुत्र, पौत्र आदि से युक्त हो एवं तुम्हें
मिले. यह आज्य शोभन आहुति वाला हो. (६)
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वषड्हुतेभ्यो वषड्हुतेभ्यः. देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित.. (७)
इष्ट देवों और अग्नि देवों के लिए यह आज्य अग्नि में दिया जाए. हे मार्ग को जानने
वाले देवो! तुम मार्ग पा कर हमारे यज्ञ में जिस मार्ग से आए हो, उसी मार्ग से लौट जाओ.
(७)
मनसस्पत इमं नो दिवि देवेषु यज्ञम्.
स्वाहा दिवि स्वाहा पृथिव्यां स्वाहा ऽ न्तरिक्षे स्वाहा वाते धां स्वाहा.. (८)
हे समस्त प्राणियों के स्वामी देव! हमारे इस यज्ञ को स्वर्ग में वर्तमान देवों तक
पहुंचाओ. तुम हमारे यज्ञ को आकाश में, पृथ्वी पर, अंतरिक्ष में एवं सभी कर्मों के आधार
वायु में स्थापित करो. (८)
सूक्त-१०३ देवता—इंद्र
सं बर्हिरक्तं हविषा घृतेन समिन्द्रेण वसुना सं मरुद्भिः.
सं देवैर्विश्वेदेवैभिरक्तमिन्द्रं गच्छतु हविः स्वाहा.. (१)
स्रुक आदि पात्र पुरोडाश और आज्य से पूर्ण हो कर इंद्र के साथ, वसुओं के साथ
मरुद्गण के साथ तथा विश्वे देवों के साथ संपन्न हुए. इस प्रकार का पात्र इंद्र को प्राप्त हो
तथा यह हवि शोभन आहुति वाला हो. (१)
सूक्त-१०४ देवता—वेदी
परि स्तृणीहि परि धेहि वेदिं मा जामिं मोषीरमुया शयानाम्.
होतृषदनं हरितं हिरण्ययं निष्का एते यजमानस्य लोके.. (१)
हे दर्भ घास के फूल! तुम यज्ञ वेदी के चारों ओर विस्तीर्ण हो कर उसे ढक लो. तुम इस
वेदी पर सोते हुए यजमान के सहयोगियों का एवं संतान का विनाश मत करो. हे होताओं के
बैठने के स्थान हरित वर्ण वाले एवं स्वर्ग के समान रमणीय दर्भ! तुम यज्ञ वेदी पर फैल
जाओ. ये फैले हुए दर्भ यजमान के लोकों में सोने के अलंकार हों. (१)
सूक्त-१०५ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश
पर्यावर्ते दुष्षप्न्यात् पापात् स्वप्न्यादभूत्याः.
ब्रह्माहमन्तरं कृण्वे परा स्वप्नमुखाः शुचः.. (१)
मैं बुरे स्वप्न से उत्पन्न पाप से छूट जाऊं तथा स्वप्न के दोष से भी अलग रहूं. मैं बुरे स्वप्न
का निवारण करने वाले मंत्र को बोलता हूं. बुरे स्वप्न से संबंध रखने वाले शोक मुझ से दूर हों.
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(१)
सूक्त-१०६ देवता—बुरे स्वप्न का विनाश
यत् स्वप्ने अन्नमश्नामि न प्रातरधिगम्यते.
सर्वं तदस्तु मे शिवं नहि तद् दृश्यते दिवा.. (१)
स्वप्न देखते समय मैं जो अन्न खाता हूं, वह अन्न प्रातःकाल दिखाई नहीं देता. वह अन्न
दिन में भी नहीं दिखाई देता. स्वप्न में खाया गया समस्त भोजन मेरे लिए कल्याण करने वाला
हो. (१)
सूक्त-१०७ देवता—द्यावा, पृथिवी आदि
नमस्कृत्य द्यावापृथिवीभ्यामन्तरिक्षाय मृत्यवे.
मेक्षाम्यूर्ध्वस्तिष्ठन् मा मा हिंसिषुरीश्वरा:.. (१)
मैं धरती, आकाश, अंतरिक्ष और मृत्यु को नमस्कार कर के बैठा हूं. मैं ऊर्ध्व लोक को न
जाऊं अर्थात् मृत्यु को प्राप्त न करूं. द्यावा, पृथ्वी आदि के अधिष्ठाता देव मेरी हिंसा न करें.
(१)
सूक्त-१०८ देवता—आत्मा
को अस्या नो द्रुहो ऽ वद्यवत्या उन्नेष्यति क्षत्रियो वस्य इच्छन्.
को यज्ञकाम: क उ पूर्तिकाम: को देवेषु वनुते दीर्घमायु:.. (१)
हमें निवास स्थान देने का इच्छुक कौन क्षत्रिय राजा इस समय बाधा पहुंचाने वाली एवं
अहितकारिणी पिशाची से हमारा उद्धार करेगा? हमारे द्वारा किए जाते हुए यज्ञ की कामना
करता हुआ एवं हमें धन की आपूर्ति की इच्छा करता हुआ कौन सा देव देवों के मध्य
चिरकाल तक होने वाले जीवन को प्राप्त करता है. (१)
सूक्त-१०९ देवता—आत्मा
क: पृश्निं धेनुं वरुणेन दत्त मथर्वणे सुदुघां नित्यवत्साम्.
बृहस्पतिना सख्यं जुषाणो यथावशं तन्व: कल्पयाति.. (१)
लाल आदि रंगों वाली, सरलता से दुही जाने वाली, सर्वदा बछड़े देने वाली एवं अथर्वा
ऋषि के लिए वरुण द्वारा दी गई गाय को बृहस्पति देव के साथ मित्रता का भाव रखता हुआ
कौन सा देव इच्छानुसार कल्पित कर सकता है. आशय यह है कि केवल बृहस्पति देव ही
ऐसा कर सकते हैं. (१)
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