अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपति के घर पहुंच कर सम्राज्ञी बनती हुई निवास कर. (४३)
सम्राज्ञ्येधि श्वशुरेषु सम्राज्ञ्युत देवृषु.
ननान्दुः सम्राज्ञ्येधि सम्राज्ञ्युत श्वश्र्वाः.. (४४)
तू ससुरों में स्वामिनी के समान, वरों में महारानी के समान आदर पा कर रह. तू ननद के
साथ रानी के समान तथा सास के साथ सम्राज्ञी के समान निवास कर. (४४)
या अकृन्तन्नवयन् याश्च तन्निरे या देवीरन्ताँ अभितो ऽ ददन्त.
तास्त्वा जरसे सं व्ययन्त्वायुष्मतीदं परि धत्स्व वासः.. (४५)
जिन देवियों ने स्वयं सूत काता है, जिन्होंने बुना है, जो ताना तानती हैं तथा चारों ओर
अंतिम भागों को ठीक रखती है, वे तुझे वृद्धावस्था तक रहने के लिए चुनें. तू दीर्घ आयु वाली
हो कर इन सब को धन्य बना. (४५)
जीवं रुदन्ति वि नयन्त्यध्वरं दीर्घामनु प्रसितिं दीध्युर्नरः.
वामं पितृभ्यो य इदं समीरिरे मयः पतिभ्यो जनये परिष्वजे.. (४६)
जीवित मनुष्य की विदाई पर लोग रोते हैं, यज्ञ को साथ ले जाते हैं तथा दीर्घ मार्ग का
विचार करते हैं. वे लोग अपने मातापिता के लिए यह सुंदर कार्य करते हैं. वे पत्नी को सुख
देने वाले हैं, जो स्त्री का आलिंगन करते हैं. (४६)
स्योनं ध्रुवं प्रजायै धारयामि ते ऽ श्मानं देव्याः पृथिव्या उपस्थे.
तमा तिष्ठानुमाद्या युवर्चा दीर्घं त आयुः सविता कृणोतु.. (४७)
मैं पृथ्वी माता के पास संतान के लिए सुख देने वाला तथा स्थिर पत्थर के समान
आधार बनाता हूं. तू उस पर खड़ा तथा आनंद का अनुभव कर. तुम उत्तम तेज वाला बनो.
सविता तुझे लंबी आयु प्रदान करे. (४७)
येनाग्निरस्या भूम्या हस्तं जग्राह दक्षिणम्.
तेन गृह्णामि ते हस्तं मा व्यथिष्ठा मया सह प्रजया च धनेन च.. (४८)
जिस कारण अग्नि ने इस भूमि का दायां हाथ ग्रहण किया है, उसी उद्देश्य से मैं तेरा
हाथ पकड़ता हूं. तू दुःख मत कर. तू मेरे साथ प्रजा अर्थात् संतान और धन के साथ निवास
कर. (४८)
देवस्ते सविता हस्तं गृह्णातु सोमो राजा सुप्रजसं कृणोतु.
अग्निः सुभगां जातवेदाः पत्ये पत्नीं जरदष्टि कृणोतु.. (४९)
सविता देव तेरा पाणिग्रहण करें. राजा लोग तुझे उत्तम संतान वाली बनाएं. जातवेद
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