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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

६५ अकबर बीरबल विनोद

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६५ अकबर बीरबल विनोद
आदमी की भला मैं क्या सहायता कर सकता हूँ, बेहतर होगा
कि कल प्रातःकाल इसे अपने मकान पर बुलाऊँ । उसने प्रकट
रूपमें कहा— "चाचा जी ! यह रात्रिका समय है, थोड़ी देर और
अपनी झोपड़ी में जाकर आराम कीजिए। तड़के उठकर दीवान-
खाने में आना, मेरा नाम बीरबल है।" इतना कहकर बीरबल
चला गया और बुड्ढा भी झोपड़ी में पड़ा हुआ सबेरा होने की
प्रतीक्षा करने लगा, सारी रात उसको निद्रा न आई । सूर्यो-
दय होते ही ठेगता हुआ दीवान के घर पहुँचा । बीरबल ने
ने बुड्ढे की बड़ी आवभगत की और अच्छा अच्छा पदार्थ
भोजन कराया । जब वह खा पीकर सन्तुष्ट हुआ तो बीरबल
कहा-"चाचा जी ! इस समय मैं आपको केवल पन्द्रह दिन का
खर्च देकर विदा करता हूँ । इसके बीच मिश्री की एक डेली
लेकर उसे हीरे की शक्ल का बनाकर मेरे पास लाना, तब मैं
आपको आगे की तरकीब बतलाऊँगा ।" बुड्ढा बीरबल को
आशीर्वाद देता हुआ घर लौट गया । आठ दस दिनों के अन्त-
र्गत वह एक मिश्री के टुकड़े को खूब घिस छोलकर हीरे के
आकार का बनाकर बीरबलके पास ले आया । बीरबल ने उस
नकली हीरे को हाथ में लेकर देखा, निसन्देह वह बनावटी
हीरा असली हीरेको मात कर रहा था। बीरबलने बूढ़ेसे कहा-
"चाचाजी इसको लेकर कल फिर आइयेगा, आपको बादशाह
के पास चलना होगा। मैं इसे बादशाह के हाथ बेचकर
आपको एक अच्छी रकम दिलाऊँगा ।
दूसरे दिन बीरबल बुड्ढे चाचा को साथलेकर रोज से पहले
ही राज महल में जा पहुँचा । उसे देखकर बादशाह को कुछ

[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]

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[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]

कारण विशेष जान पड़ा इसलिये उससे पूछा-“क्यों बीरबल
आज इतनी जल्दी क्योंकर आना हुआ ?” बीरबल ने विनम्रता
से उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! यह कारीगर एक उत्तम
हीरा लेकर मेरे साथ आया है, यह उस हीरे को बेचना चाहता
है। मुझे विश्वास है कि यह चीज आपके पसन्द की होगी ।”
इतना कहकर उसने हीरे को बादशाह के हाथ में दे दिया ।
बादशाह ने हीरे को भली-भाँति देखकर कहा-“बीरबल !
हीरा तो लाजवाब है; परन्तु बूढ़े जौहरी से कहो कि इसे लेकर
दो घण्टे पश्चात हाजिर होवे ।” बुड्ढा वहाँ से हट गया ।
तब बादशाह ने बीरबल को उसकी भलीभाँति जाँच कराने
की आज्ञा दी । बीरबल इधर उधर घूम फिर कर आ गया
और बोला-“पृथ्वीनाथ ! इसके अच्छा होनेमें कोई सन्देह नहीं
है। हीरे को आप अपने पास रक्खें ।” बीरबल के इस उत्तर
से बादशाह को सन्तोष हुआ और फिर बोला-“हीरे को खरी-
दने से पहले और जाँच करा लो ।” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ !
इस समय हीरे को अपने मुख में रख लीजिये, फिर जाँच
होती रहेगी ।” बादशाह ने हीरे को मुख में छिपा लिया ।
बादशाह की आज्ञानुसार बूढ़े चाचा के आने का समय हुआ
और वे ठेंगते २ दरबार में पुनः हाजिर हुए । उसे देख बीरबल
ने बादशाह से कहा-“गरीबपरवर ! देखिये वह हीरे वाला
वृद्ध भी आन पहुँचा, उसे अब क्या कहकर उत्तर देना होगा ।”
बादशाहने बीरबल की तरफ देखकर पूछा-“क्यों बीरबल !
वह हीरा तो मैं ने तुम्हीं को दिया था न ।” बीरबल ने साफ
इन्कार कर दिया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे तो आपने

अकबर बीरबल विनोद ६७

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अकबर बीरबल विनोद ६७

अपने पास ही रखलिया था।” बादशाह को भी बीरबल की
बात सच्ची जान पड़ी, खबर नहीं कि आखिरस उसे रक्खा
किस जगह । उसने हीरे का बहुतेरा खोज किया, परन्तु जब
कहीं हो तब तो मिले वह तो मुख में गलकर पानी होगया था ।
लाचार होकर बादशाह बोला-“अच्छा बीरबल ! बुड्ढे व्यो-
पारी से उसका मूल्य निश्चित कर लो, परन्तु उससे कोई झकझक
न करना।” हुक्म मिलते ही बीरबल ने बूढ़े चाचां से हीरे का
मूल्य पूछा। वह बोला-“दीवान जी! हीरे का असली मूल्य
दो हजार मुहरें हैं और दो सौ मुहरें मैं नफे में लूँगा।” बीरबल
ने कहा-“नहीं तुम्हें नफे में पचास मुहरें ही दी जायँगी।
बूढ़ा दुखित मन से बोला-“सरकार ! यदि आपको मुनाफे की
दो सौ मोहरें देनीं स्वीकार हों तब तो लेवें, नहीं तो कृपाकर
मेरा माल मेरे हवाले करें।”
बीरबल मूल्य में कमी कराने के लिये उससे बारबार बना-
वटी माथापच्ची करता रहा, अन्त में झुरुलाकर बोला-“बुड्ढे !
इतनी टिरटिर क्यों करता है, अच्छा पचास मोहरें और
ले लेना।” परन्तु बूढ़े चाचा तो पक्के गुरु के चेला थे
भला वे कब मानने लगे। मुँह बनाकर बोले-“दीवान जी!
इस प्रकार मुझ गरीब को क्यों दबाते हैं, मैं दो सौ
मुँहरों से एक कौड़ी भी कम न लूँगा।” बादशाह
इन दोनों की बड़ी देर की झक झक सुन क्रोधित होकर
पूछा-“क्यों बीरबल ! व्योपारी क्या कहता है?” बीरबल ने
उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ ! वह हीरे की लागत दो हजार मुहरें
बतलाता है और मुनाफे की दो सौ मुँहरें अलग से माँगता

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६८ अकबर बीरबल विनोद

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६८ अकबर बीरबल विनोद
है। मैं इसके नफे में कमी करवाता हूँ और केवल एक सौ
मुँहरें ही देना चाहता हूँ।” बादशाह ने बीरबल को इशारे से
मना किया और उदारतापूर्वक बूढ़े जौहरी को हीरे का
मूल्य और दो सौ मुनाफे की मुहरें खजाँची से दिलवा कर
विदा किया।
वृद्ध की प्रसन्नता बाँसों उछल पड़ी और मनोमन बीरबल
को कोटिशः धन्यवाद देता हुआ अपने घर चला गया। शाम
को दरबार से अवकाश पाकर जब बीरबल घर पहुँचा तो
जौहरी बूढ़े चाचा को प्रस्तुत पाया। बूढ़ा बीरबल को
देखकर प्रसन्नता से रोमांचित हो गया और बोला—
“आपको और आपकी बुद्धि को धन्य है, दीवान साहब !
आपजो मुझ सरीखे दीनों पर उपकार कर रहे हैं उसका फल
ईश्वर आपको हाथों हाथ देगा। मुझे विश्वास हो गया है कि
इस पृथ्वी मंडल पर आप ऐसा प्रजापालक दूसरा दीवान नहीं
है। उसकी ऐसी अनेकों प्रशंसा की बातें सुनकर उसके सन्तो-
षार्थ बीरबल ने कहा-“चाचाजी ! इसमें मेरा क्या उपकार
है। यह सब आपको आपकी बुद्धिमानी का प्रतिफल मिला है”
बुड्ढा इस पर आवाक हो गया और कोटि कोटि आशीर्बाद
देता हुआ अपने घर चला गया।
नकली बीरबल
जब से बादशाह को बीरबल के मृत्यु का समाचार मिला था
तबसे उसके विछोह के कारण बड़ा दलगीर रहता और बराबर

अकबर बीरबल विनोद ६६

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अकबर बीरबल विनोद ६६
उसका शोक मनाया करता था। बादशाह की उदासी मिटाने के
लिये लोगों ने बड़ी बड़ी तरकीबें निकालीं, पर दिल की
लगन बुरी होती है। जब उपायों से कार्य्य-सिद्धि न हुई तो
दरबारियों ने अष्टकौशल कर एक नई युक्ति सोच निकाली
और कितने नागरिकों से कानों कान कहलाया कि अभी
बीरबल जीवित है। जब इस हौवा से भी बादशाह को
सन्तोष नहीं हुआ तो दूर दूर के शहरों तथा दिहातों से
बीरबल के जीवित रहने का समाचार आने लगा। लोग कहते
थे कि वह लड़ाई से बचकर एक दूसरे शहर में छिप कर
बैठा है।
एक बार ऐसी घटना घटी कि किसी मनुष्य ने अपने
को बीरबल कहकर घोषित किया, परन्तु उसका बादशाह
से साक्षात न हो सका, वह आते २ बीच मार्ग में स्वर्गवासी हो
गया। बादशाह का मन्तव्य पूरा नहीं हुआ। जीवनपर्यन्त
उसे अपने प्रिय मंत्री बीरबल से फिर साक्षात न हो सका।
एक गाँव सीड़ी था उसमें इस घटना के दो तीन वर्ष
बाद एक द्विजाति कुलोद्भव ने अपने को बीरबल कहकर
घोषित किया और लोगों में इस बात का खूब प्रचार किया कि
मैं ही बीरबल हूँ। जब पठानों का युद्ध छिड़ा था तो मैं लड़ाई
में आहत होकर एक महात्मा की कृपा से जीता-जागता निकल
आया। महात्मा ने मेरी बड़ी शुश्रूषा की। जब मैं एक दम
चंगा हो गया तो उस साधु से आज्ञा लेकर इस गाँव
में आ बसा। उस आदमी की सूरत भी बीरबल से बहुत
कुछ मिलती जुलती थी। वह बीरबल के जीवनकाल की सारी

१०० अकबर बीरबल विनोद

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१०० अकबर बीरबल विनोद
वातें भलीभाँति स्मरण कर लिया था जिस कारण बीर-
बल सम्बन्धी प्रश्न उपस्थित होने पर वह उसका उचित
उत्तर देता था ।
कितने ही लोगों को धोखा हो गया । वे उसे असली
बीरबल समझकर बादशाह के पास पहुँचाने आये
परन्तु वह रास्ते में ही स्वर्गवासी हो गया । बादशाह उसकी
प्रतीक्षा करता रहा । ऐसी ही ऐसी और भी कितनी
अफवाहें बादशाहके कान तक पहुँचीं, परन्तु जब उनकी जाँच
कराई गई तो सारी बातें झूठी निकलीं । उसके गुप्तचर सच्ची
खबर नहीं देते थे जिससे कालान्तर में उनका भेद खुल गया ।
बादशाह दूतों के ऐसे विश्वासघात करने पर आग बबूला हो
गया और उनको कठिन दण्ड दिया ।
खुदा को अक्ल से पहचान करो
बादशाहों की सभा में चित्रकारों के रहने की पुरानी
प्रणाली है । अकबर बादशाह के दर्बार में भी नियम-परम्परा
के अनुसार कई चित्रकार विद्यमान थे । उनमें एक सर्व-
प्रधान था । वह प्रति चित्र के बनवाई में पाँच हजार पुरस्कार
लेता था । एक दिन उस चित्रकार के पास एक बड़ा आदमी
आया और बोला- "महाशय जी ! मुझे भी अपनी चित्र
बनवानी है; यदि आप उसे सर्वांगपूर्ण बना सकेंगे तो मैं आप
को पन्द्रह हजार रुपया इनाम दूँगा । चित्रकार सहमत हो
गया और दूसरे ही दिन से चित्र बनाना शुरू किया । इस
काम के सम्पादन में उसे कई मास का अरसा लगा । जब
चित्र उसकी इच्छा नुकूल तय्यार हो गया तो उसे लेकर रईस

अकबर बीरबल विनोद १०१

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अकबर बीरबल विनोद १०१

के पास गया। वह चित्र को लेकर अपने चेहरे से भलीभाँति
मिलान किया। उसमें एक स्थानपर ऐब रह गया था। साहूकार
ने चित्रकार को उसे दिखलाया। वह विवश होकर दूसरा
चित्र बना लाने का बचन देकर खाली हाथ लौट गया और
फिर से चित्र बनाना प्रारम्भ किया। इस बार पहले से भी
अधिक तत्परता से चित्र तय्यार किया। उसका विश्वास था
कि इस मर्तवा साहूकार को चित्र पसंद आजायगा। दूसरे
दिन फिर चित्र को लेकर शाहूकार के पास पहुँचा और
पुरस्कार का दावो हुआ।
भलेमानस ने चित्रका फिर से मिलान किया, फिर भी
उसके गोड़ में ऐब रह गया था। इसी प्रकार सेठ और कई बार
चित्रकार कोमूर्ख बनाकर लौटा चुका था। मनुष्य अपनी काम-
याबी के लिये बार २ परिश्रम करता है, जब करते २ थक
जाता है तो उसकी हिम्मत छूट जाती है और फिर उसके
किये वह काम नहीं होता। इसी प्रकार वह चित्रकार भी
अपनी नाकामयाबी से हताश हो गया और अपनी अपकीर्ति
जन समुदाय में बढ़ने के भय से गंगा में डूब मरने का संकल्प
किया। जिस समय गंगा तट पर पहुँचकर वह आत्मविसर्जन
का उपाय सोच रहा था उसी समय हरेच्छा से बीरबल नामी
एक ब्राह्मण का दीन लड़का भी वहाँ उपस्थित था। लड़का
चित्रकार के मनोगत भावों को ताड़ गया और उसे ढाढ़स
देने के विचारसे पूछा—"महाशय जी ! आप इतना चिन्ताग्रस्त
क्यों दिखाई पड़ते हैं, जान पड़ता है चिन्ता रूपी साँपिन ने
आपको डस लिया है ? कृपाकर मुझसे अपने दुख का कारण

१०२ \hfill अकबर बीरबल विनोद

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१०२ \hfill अकबर बीरबल विनोद

साफ २ बतलाइये, मैं यथासक्य उसके निवारण का प्रयत्न
करूंगा। बालक के ऐसे विनम्र वचनों से चित्रकार की जीवन
आशा पुनः जागृत हुई और अपना दुःखद समाचार कहकर
सुनाया। लड़का बोला- "आप इस थोड़ी सी बात के लिये
इतना अधीर क्यों हो रहे हैं ? धैर्य्य धारण कीजिये, मैं उसका
तद्रूप चित्र बना दूँगा और फिर उसे ऐब दिखलाने का अवसर
न मिलेगा, केवल थोड़ा और परिश्रम कर मुझसे उसका
साक्षात्कार करा दें।
चित्रकार लड़के को साथ लेकर उस रईस के पास गया,
बीरबल उस रईसको फाँसने के लिये रास्ते में ही एक तरकीब
सोच चुका था वह बाजार से एक शीशा खरीदकर अपने साथ लेता
गया, चित्रकार को देखकर उक्त रईस ने पूछा- "क्या दूसरा चित्र
तय्यार होगया ?" बीरबलने उत्तर दिया- "हाँ तैयार करके लाया
है।" चित्रकार आगे बढ़कर रईस को अपना दर्पण दिखलाया।
दर्पण में रईस को अपना स्वरूप ठीक ठीक दीख पड़ा, फिर
उसे आना कानी करने की कोई दूसरी तरकीब नहीं सूझी;
लाचार होकर कौल के अनुसार पन्द्रह हजार रुपये देने पड़े।
चित्रकार बीरबल की ऐसी युक्ति से बड़ा सन्तुष्ट हुआ।
वह रुपया लेकर घर लौट गया, परन्तु बीरबल रईस
का चरण पकड़ कर बोला- "भगवन् ! मैं आपको अब नहीं
छोड़ूँगा क्योंकि आप मुझे मनुष्य के रूप में देवता जान पड़ते
हैं।" बीरबल की हठधर्मी से विवश होकर देवता ने प्रत्यक्ष होकर
दर्शन दिया और उसको बुद्धि बढ़ने का आशीर्वाद दिया। फिर
बीरबल को सन्तुष्ट कर देवता अन्तर्ध्यान हो गये। चित्र में

अकबर बीरबल विनोद १०३

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अकबर बीरबल विनोद १०३
बारंबार दोष निकालते देखकर बीरबल ने देवता को पहचान
लिया था। उसी समय से लोगों की आँखें खुल गईं
और ऐसी जनश्रुति चल पड़ी-“खुदा को अक्ल से
पहचान करो।”
शीशे में छाया चित्र
दिल्ली शहर में एक सनातनी धनवान रहा करता था,
उसके कुकृत्यों से अक्सर लोगों को बड़ी तकलीफ होती
थी, परन्तु वह धनाढ्य किसी की एक न सुनता। वह हमेशा
गुप्त रूप से मनमानी किया करता था, परन्तु ऊपर से बाद-
शाह के भयसे भलामानस बना रहता। एक दिन उसे एक
नई शरारत सूझी। एक चित्रकार को बुलवाकर उसे अपना
चित्र बनाने की आज्ञा दी। उस से पहले ही ऐसी शर्त तय
करा ली कि अगर चित्र बनाने में बाल भर भी अन्तर पड़ेगा तो
पुरस्कार नहीं दिया जाय। दोनों की आपस में लिखा पढ़ी
हो गई। वह घर जाकर बड़ी सावधानी से चित्र बनाने
लगा। चित्र बनकर तयार होगया तो उसे लेकर धनवानके
पास पहुँचा। जब उसके आने का समाचार नौकरोंने दिया तो
वह अपनी सूरत बदल कर उसके सामने आया। उसे देख
बिचारा चितेरा दंग हो गया उसके मुख से कोई स्पष्ट उत्तर
नहीं निकलत था, लाचार दूसरा चित्र फिर से बना लाने की
प्रतिज्ञा कर घर लौट गया।
नये स्वरूप का जब दूसरा चित्र बनाकर ले गया तो फिर

१०४. अकबर बीरबल विनोद

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१०४. अकबर बीरबल विनोद
उस रईस ने अपना आकार बदल कर उसमें अन्तर दिखलाया।
इसी प्रकार चित्रकार ने क्रमशः पाँच चित्र बनाकर तय्यार
किया, परन्तु उसकी धूर्तता के कारण कोई चित्र भी उसके
चेहरे से न मिल सका । अन्तमें चित्रकार को उसकी ठगी पर
सन्देह हो गया और वह उससे अपना पुरस्कार मांगा । रईस
उसे फटकारता हुआ बोला-"तू इतना भी समझदारी नहीं
रखता, जब मेरे अनुकूल चित्र ही नहीं बना सकता तो फिर
पुरस्कार किस बात का लेगा। नाहक इसी विरते पर अपने
को चित्रकार बतलाकर लोगों को ठगता है । सीधे यहाँ से
चला जा नहीं तो मैं तेरी धूर्तता का भलीभाँति बदला चुका-
ऊँगा । गरजे इसी प्रकार दोनों के दर्मियान देर तक तू
तू मैं मैं हुई, फल कुछ न निकला । लाचार होकर बिचारा
चित्रकार बीरबल की शरण में गया ।
अपना सारा समाचार कहकर बीरबल को पाँचों
चित्रों को दिखलाया । सब बातों को देख सुनकर बीरबल
ताड़ गया कि उस रईस ने इस बिचारे को ठगा है । उसको
स्वरूप बदलने की विद्या हासिल है, जिस कारण इसे सहल
में ही ठग लेता है।" वह बोला-"यदि तुम मेरे कहे अनुसार
चलोगे तो तुम्हें अवश्य लाभ होगा । चित्रकार सहमत हो
गया। बीरबल ने कहा- "बाजार से एक अच्छा शीशा खरीद
लावो फिर दो तीन दिनों के पश्चात उसे लेकर उस रईस के
पास जाना । साक्षी के लिये गुप्त रूप से मेरे दो कर्मचारी
तुम्हारे साथ रहेंगे । उससे जाकर कहना कि इस बार मैं
आपका उत्कृष्ट चित्र खींच लाया हूँ, जब देखने को माँगे

अकबर बीरबल विनोद १०५

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अकबर बीरबल विनोद १०५

तो वही शीशा उसके सामने रख देना, शीशा में वह अपना
स्वरूप बदल न सकेगा और इस भाँति आसानी से तुम्हारे
काबू में आजायगा। कारण कि दर्पण में उसका तात्कालिक
स्वरूप भाषित होगा।"
कई दिनों का अन्तर देकर चित्रकार बाजारसे एक हलब्बा
शीशा खरीद लाया फिर गुप्तचरों के साथ रईस केघर गया और
उससे मिलकर बोला- "महाशयजी ! इस बार मैं बहुत होशि-
यारी से आपका चित्र बना लाया हूँ, आशा है कि मेरे इस
कठिन परिश्रम से आप खुश होंगे।" ऐसी चोखाई की बातें
दर्पण रईस के सामने रख दिया।" धनाड्य बोला-"वाह
क्या खूब ! यह मुझे आइना क्यों दिखला रहा है, वह चित्र
दिखला जिसकी तू ने अभी इतनी प्रशंसा की है।" चित्रकार
ने उत्तर दिया- "महाशय जी ! यही आपका तद्रू प चित्र है।"
तब तो रईस के कान खड़े हो गये और वह अपनी ठगी
छिपाने के लिये उससे बोला- "तुझे मैंने अपना चित्र बनाने
को भला कब कहा था?" चित्रकार ने कहा- "आप बात क्यों
पलटते हैं; आपके आर्डर से मैंने बारी बारी पाँच चित्र
बना कर दिखलाया; परन्तु हर बार आपने नापसन्द
कर मुझे कोरा लौटा दिया। अब इस बार इतनी
कतरव्योत कर बना लाया तो नकारने पर कटिवद्ध हुए हो।
यह नहीं होने का; मेरे आपके बीच जो शर्ते पहले
निश्चित हो चुकीं हैं उसे पूरी कीजिये।"
रईस ने देखा कि यह तो अच्छी बला लेकर आया है,
इसे मूर्ख बनाकर ठगना चाहिये। वह एकदम नकर गया।

१०६ अकबर बीरबल विनोद

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यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सटीक पाठ्य-रूप (transcription) दिया गया है:

१०६ अकबर बीरबल विनोद
तब बीरबल के गुप्तचर बोले-“आपको बादशाह के पास
चलना पड़ेगा। आपने इससे छः बार चित्र बनवाया और
रुपया एक भी नहीं दिया 'अब तुम्हारी ठगी नहीं चलने की।”
रईस आँख दिखलाता हुआ उत्तर दिया-“वाह, अच्छे आये?
तुम मुझे दरबार में ले जाने वाले कौन होते हो ? तब गुप्तचरों
ने अपना असली लिवास खोलकर दिखलाया। रईस का होश
ठिकाने आ गया और विवश होकर चित्रकार को रुपये देने पर
उतारू हुआ। मामला बढ़ चुका था इसलिये सिपाहियों ने उसे
ऐसा न करने दिया और पकड़ कर बीरबल के पास ले गये।
बीरबल तो उसके ठगी का हाल पहले ही सुन चुका था,
जब वह आया तो उससे बहुतेरा प्रश्न उसी सम्बन्ध का
किया; परन्तु वह उन प्रश्नों का एक भी उचित उत्तर न दे
सका। बीरबल ने उसे दस मिनट में सोचकर उत्तर देने की
आज्ञा दी। फिर भी कुछ न बोला, बोलता कहाँ से कहीं बालू
पर भीत उठाई जा सकती है? बीरबल ने सिपाहियों
को कोड़े लगाने की आज्ञा दी, वे पास ही में उपस्थित
थे। हुक्म पाते ही कोड़ा लेकर आगे आये। कोड़ा देखते ही
रईस का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरंत अपना दोष
स्वीकार कर लिया। बीरबल उसे कठिन दण्ड देकर जेल
भेज दिया।
—:*:—
नया दीवान
यह तो किसी से छिपा नहीं है कि बीरबल अकबर का
मुँहलगा दीवान था। वह उसको हर प्रकार से मात किये

अकबर बीरबल विनोद १०७.

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अकबर बीरबल विनोद १०७.
रहता था। एक दिन बादशाह गुस्से में था। बीरबल उसके
मनोगत भावों को ताड़ न सका और बातों २ में उसकी हँसी
उड़ाने लगा। बादशाह को उसकी हँसी से मार्मिक वेदना
हो रही थी। वह बोला-“बीरबल तुम्हारा मिजाज बहुत
बढ़ गया है इसलिये बराबर बेअदबी किया करते हो, अब
तुम्हें ऐसा मौका नहीं दिया जायगा। भविष्यमें यदि फिर कोई
ऐसा कामकरोगे तो स्मरण रहे कठिन दण्ड के भागी होगे।”
बीरबल ने अपनी बात रखने के लिये फिर कोई हँसी की
बात निकाली; परन्तु बादशाह ने उसे बीच में ही क्रुद्ध
होकर दबा दिया। अब बीरबल को बादशाह का क्रुद्ध होना
प्रगट हो गया और वह चुप्पी साध गया । बादशाह बीरबल
की बेअदबी से चिढ़ गया था जिसकारण आँखें लाल २
कर बोला-“अब तुम फिर मेरे दरबार में कभी न आना;
अभी दरबार से बाहर निकल जाओ।”
बीरबल उत्तर देना उचित न समझकर चुपके से वहाँ से
‘सटक सीताराम’ हो गया। यह सोचकर मनमें ढाढ़स किया
कि यह तो बादशाहों की गति ही है, जब काल आयेगा तो झख
मारेंगे और बुलावेंगे। ऐसी २ बहुतेरी कल्पनाएँ करता हुआ
घर पहुँचा और अपने घर वालों को सावधान कर
महीनों गुम रहा। न उसकी बुलाहट हुई न फिर गया ही।
इधर बादशाह ने एक दूसरा नया दीवान नियुक्त कर लिया।
जब बीरबल को बादशाह का रुख बदलते न दिखलाई पड़ा
तो वह चुपचाप वायु परिवर्तन करने के लिये नगर से बाहर
किसी दूसरे शहर को चला गया। उसका जाना किसी को

१०८ अकबर बीरबल विनोद

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१०८ अकबर बीरबल विनोद
मालूम नहीं था । अपना समूचा परिवार दिल्ली में ही छोड़
गया । येनकेन प्रकारेण कई महीना बीत गया, पर न बीरबल
को दरबार का समाचार मिला और न बादशाह को बीरबल
का ही ।
नया दीवान बीरबल के टक्कर का नहीं था, इसलिये बाद-
शाह का दिल उसपर भलीभाँति जमता न था। वह गुप्तरूप से
एक दूसरे दीवान की खोज में था। कितनों की गुप्त छिपे रूप से
परीक्षाएँ ली, परन्तु कोई उत्तीर्ण नहीं हुआ। तब लाचार
होकर उसे विज्ञापनबाजी करने की धुन सवार हुई, उसने
शहर शहर और दिहात २ में यह घोषणा करवा दी कि
जो कोई मेरे प्रश्नों का उचित उत्तर देगा वह नया दीवान
बनाया जायगा, उत्तर न दे सकने पर उसपर कुछ विचार न
किया जायगा ।
दरबारी लोग दीवान पद के लिये लालायित हो रहे थे;
परन्तु परीक्षोत्तीर्ण होना कठिन समझ, उपहास के भय
से खामोश रह गये । बादशाह ने अपनी घोषणा में एक मास
की निश्चित तिथि निर्धारित की थी । समय अबकरीब
आपहुँचा और सभा का आयोजन किया गया। यह सभा
दीवान के चुनाव की थी अतएव इसमें आम जनता को जाने
का हुक्म नहीं था, केवल दरबार के लोग और कुछ वे लोग
सम्मिलित किये गये जो दीवान पद के प्रलोभन से उम्मीदवार
बन आये थे । उन उम्मीदवारों में एक आदमी ऐसा आया था
जो देखने में बड़ा प्रतिभाशाली जान पड़ता था, उसकी दोनों
आँखें बड़ी बड़ी और चमकीली थीं, सिर पर सफेद पगड़ी

अकबल बीरबल विनोद १०९

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अकबल बीरबल विनोद १०९
बाँधे हुए था, दाढ़ी छाती तक लटक रही थी। उसके कुछ
केस काले ओर कुछ सफेद थे। जिससे देखने में अधेड़ जान
पड़ता था।
बादशाह की आज्ञा से एक परोक्षक बोला-“आज की
सभा में जो मनुष्य उत्तीर्ण होगा वह दोवान पद पर
नियुक्त किया जायगा। यदि उत्तर देने में भूल होगी तो
दुबारा उसकी सुनवाई न होगी। पहला प्रश्न यों है (१)
इस भौगोलिक सागर में मोती की सीपियों की गणना क्या
है?” मैं ऊपर लिख चुका हूँ कि दीवान पद प्राप्त करने के
लिये पाँच उम्मीदवार आये थे सो उनमें चार तो इस प्रश्न को
सुनते ही विचार सागर में निमग्न हो गये, परन्तु पाँचवाँ
व्यक्ति जो कि साफा बाँधकर आया हुआ था और जिसकी
दाढ़ी छातीतक लटक रही थी, उत्तर देने के लिये बड़ा उत्सुक
जान पड़ा। बारी बारी सब से उत्तर माँगा गया। किसीने
कहा-लाख, किसीने करोड़ और किसीने अरब तक की संख्या
बतलाई, परन्तु साफे वाला मनुष्य सबके अन्त में बोला-
“सम्पूर्ण मनुष्यों की आँखों की जितनी गणना है उतनी ही
सीपियों की भी है।” उसका उत्तर सुनकर चारो तरफ
से वाह वाह की ध्वनि आने लगी। बादशाह भी मन में
प्रसन्न हुआ।
नियमानुसार चारो उम्मीदवार नाकामयाब हो गये एक
साफे वाला ही बच रहा। प्रश्नकर्त्ता ने दूसरा प्रश्न किया-
“इस शरीर का पहला सुख क्या है?” तब साफे वाले ने
कहा-“हेल्थ इज दी रूट आफ हैप्पीनेस” शरीर के लिये स्वस्थ

३१० अकबर बीरबल विनोद

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३१० अकबर बीरबल विनोद
रहना पहला सुख है।" तब दूसरे प्रश्नकर्त्ता बोले-"यद्यपि
संसार में अनेकों प्रकार के शस्त्र विद्यमान हैं, परन्तु उनमें
प्रधान शस्त्र क्या है?" उत्तरदाता ने कहा-"बुद्धि।" तब
डोडरमल नामी तीसरे प्रश्नकर्त्ता का प्रश्न हुआ-"यदि बालू
के कण और चीनी किसी प्रकार एक में मिश्रित हो
जायें तो पानी डालकर अलग करने के अतिरिक्त दूसरा
उपाय क्या है?" उत्तरदाता ने कहा-"दोनों मिश्रित
वस्तुओं को जमीन पर फैला दें कुछ समय में चींटियाँ चीनी
उठा ले जायेंगी और बालू के कण जहाँ के तहाँ पड़े रह
जायेंगे।" पाँचवाँ प्रश्न नवाब खानखाना का हुआ-"क्या
आप समुद्र का जल पान कर सकेंगे?" उसने उत्तर
दिया-"हाँ, मैं भली भाँति पान कर सकता हूँ।" नवाब
ने पूछा-"क्योंकर ?" तब वह बोला-"पान करना तो आसान
बात है, परन्तु पहले आपको उसमें गिरने वाली नदियों को
रोकना पड़ेगा।" नवाब भी मात हो गया। जगन्नाथ
प्रसाद का छठवाँ सवाल इस प्रकार हुआ-"मनुष्य चिता में
जलाये बिना और कैसे भस्म किया जा सकता है?" उसने
उत्तर दिया--"चिन्ता की ज्वाला में।" फिर सातवाँ प्रश्न
टोडरमल का हुआ--"सबसे हेठा व्यवसाय क्या है?" उम्मेद-
वार ने बतलाया--"भिक्षाटन करना।" इसी प्रकार के और और
सवालों का उत्तर देने की प्रतीक्षा में वह मनुष्य निर्द्वन्द बैठा
रहा, परन्तु प्रश्नों का बौछार एक दम बन्द हो गया, उसके
हाजिर जवाबी से सभा के लोग मात हो गये।
सब को चुप देखकर उम्मेदवार बादशाह की सम्मति

अकबर बीरबल विनोद १११

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अकबर बीरबल विनोद १११
लेकर एक प्रश्न अपनी तरफ से किया। बादशाहने दरबारियों
को उत्तर देने के लिये उत्तेजित किया। उसका प्रश्न इस
प्रकार था-“किवाड़ बन्द करते समय उसमें चुरमुर चुरमुर
शब्द किस कारण होता है।" यानी उसका भावार्थ क्या है?
सब लोग अवाक होगये। उसकी शंका का समाधान करने में एक
दरबारी भी समर्थ न हुआ। बादशाह उसकी बुद्धिकी बड़ी प्रशंसा
की और मन ही मन बोला-“बहुत दिनों के बाद आज मुझे
बीरबल सा निपुण दीवान मिला है।" उसके मन से बीरबल
के अभाव की चिन्ता घट गई और दीवान के योग्य पोशाक
पहना कर उसे बीरबल के स्थान पर नियुक्त करने का विचार
प्रकट किया। तब उम्मीदवार बोला-“गरीबपरवर ! मैं दीवान
बनने की योग्यता नहीं रखता; कारणकी जिसकार्यको बीर-
बल सा बुद्धिसम्राट निभाता था वह मैं कैसे निभा सकूँगा ?
बादशाह ने कहा--“मैं बीरबल को निकाल दिया है जिस
कारण वह चिढ़कर यहाँ से कहीं बाहर चला गया है। मैंने
उसको बहुतेरा ढुढ़वाया पर उसका कहीं पता नहीं चलता, तब
लाचार होकर दूसरा दीवान नियुक्त करने पर आमादा हुआ
हूँ। जो मैं जानता कि बीरबल अमुक स्थान में है तो मैं
यत्नपूर्वक उसे बुलवा लेता।
नये दीवान ने उत्तर दिया-“पृथ्वीनाथ आपका प्रताप
पृथ्वी के कोने कोने में फैला हुआ है, यदि आप तनमय होकर
उसका खोज कराते तो वह कभी का प्रगट हो गया होता।"
बादशाह ने कहा-“नहीं ऐसी बात नहीं है, मैंने उसके लिये
बहुतेरा प्रयास किया, परन्तु उसको ढूढ़ नहीं पाया। हाँ

११२ अकबर बीरबल विनोद

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११२ अकबर बीरबल विनोद
अब एक युक्ति और बाकी है, यदि काम में लाई जाय
तो सम्भव है कि उसका पता चल जाय ।” उम्मीदवार
ने कहा-“पृथ्वीनाथ ! यदि वह किसी समय स्वयं आपसे आ
मिले तो फिर क्या करेंगे, उसे रक्खेंगे वा कोरा
लौटा देंगे ?”
बादशाह बोला-“हाँ, मैं उसके लिये बड़ा उत्सुक हो रहा
हूँ। तब नये दीवान ने कहा-“गरीबपरवर मैं उसका पता
जानता हूँ। बादशाह बोला-“यदि तुम उसको मिला दोगे
तो मैं तुमसे बहुत प्रसन्न होऊँगा ।” नये दीवान को जब भली-
भाँति विदित हो गया कि बादशाह को बीरबल-प्राप्ति की
बड़ी उत्सुकता है तो अपना साफा ऊपर को खिसकाते हुए
अपनी ढकी आँखों को बाहर निकाला ! और पाजामा और
जामा दोनों उतार कर अलग रख दिया। नकली दाढ़ी
उतार फेंकी। तब वह खासा बीरबल हो गया। बहुत
दिनों के बिछुड़े बीरबल को प्राप्त कर दरबारी गदगद हो गये
बादशाह का तो क्या कहना, वह मारे आनन्द के विह्वल हो
गया। सब तरफ से वाह वाही के शब्द आने लगे।
बादशाह के पूछने पर बीरबल ने अपने गुप्त बास का
इतिहास इस प्रकार वर्णन शुरू किया-“पृथिवीनाथ ! आपके
पास से जाने के पश्चात् मैं एक मास तक घर पर बालबच्चों
के साथ बिताया और सब से बराबर मिलता जुलता रहा,
बाद को शहर छोड़कर बाहर चला गया और गुप्त रूपसे
रहने लगा। मैं रात्रि में नगर रक्षा के निमित्त भेष बदलकर
गस्त लगाया करता था, इतने दिनों के अन्तर्गत मैंने कितने

११३ अकबर बीरबल विनोद

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११३ अकबर बीरबल विनोद
चोरों को पकड़ पकड़ कर उनका चोरी छुड़ाई है। जब मैंने
जान लिया कि अब मुझे कोई दरबारी नहीं पहचान सकेगा
तो गुप्त रीति से दरबार में आता और परोक्ष में यहाँ की
निगरानी कर घर लौट जाता। इस प्रकार गुप्तवास का दिन
काटता हुआ आपके सामने प्रगट रूपसे उपस्थित हुआ हूँ।
बादशाह बीरबल की इस तत्परता से बड़ा प्रसन्न हुआ
और उसको नवीन वस्त्र प्रदान कर फिर से दीवान पद पर
नियुक्त किया। यह समाचार नगर में चारों तरफ बिजली के
समान फैल गया। प्रजा के लोग बीरबल के पुनः मिलने से
बड़े प्रसन्न हुए और सब तरफ से बादशाह को बधाई के
समाचार आने लगे।
ताक वाला देव और पाखाने का सेव
बीरबल अपनी चालाकी से बादशाह को बारम्बार नीचा
दिखाया करता जिससे वह बीरबल से हमेशा शरमिन्दा
रहता था। एक दिन बादशाह ने बीरबल से बदला लेने का
विचार किया। अच्छे-अच्छे वैज्ञानिकों और कारीगरों से
सम्मति लेकर अपने रहने के कमरे में एक ताख इस ढब का
बनवाया कि जिसके जरिये बीरबल को धोखा दिया
जा सके। उसमें कोई ऐसी वैज्ञानिक वस्तु लगा दी गई थी
कि जिसपर हाथ रखते ही उससे चिपक जाता था। एक दिन
बादशाह अपने कमरे में बैठा हुआ पुस्तकावलोकन कर रहा
था, इसी समय बीरबल भी आ पहुँचा। बादशाह बीरबल
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[Header] अकबर बीरबल विनोद ११४

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[Header] अकबर बीरबल विनोद ११४

को देखकर मन में बड़ा प्रसन्न हुआ, प्रगट में बोला- "बीरबल !
ज़रा उस ताख पर का सेब तो लेते आना उसके लिये मैं बड़ी देर से
इन्तजार कर रहा हूँ।" सेब पहले से इसी अभिप्राय से रक्खा
गया था; जिससे बीरबल का हाथ आसानी से उस वैज्ञानिक
ताख में फँसाया जा सके। सन्देह हो जाने पर बीरबल
हाथ में आने वाला असामी नहीं था।
आज्ञा पालन कर बीरबल सेब लेने के अभिप्राय से
ताख पर अपना हाथ बढ़ाया। सेब पर पहुँचने से पहले
ही उसका दाहिना हाथ उस ताख से चिपक गया।
तब बीरबल ने अपना दूसरा हाथ पहले हाथ को छुड़ाने
के अभिप्राय से लगाया। वह भी उसी में फँस गया,
बीरबल बहुत घबड़ाया और मारे लज्जा के उसका सिर नीचा
हो गया। बादशाह ने विचार किया कि बीरबल अभी तक
नहीं आया, ताख में फँस कर घबड़ाता होगा इसलिये उसे
छुड़ाना चाहिये। वह टहलता हुआ उसके पास गया और
बीरबल को ताख में फँसा हुआ देखकर बोला-"क्या खूब !
मेरी चीजें बराबर चोरी जाया करती थीं परन्तु मुझे
चोर का पता नहीं चलता था, आज सौभाग्यवश चोर की
गिरफ्तारी हो गई है। जावो बीरबल ! तुम्हारा यह पहला
कसूर समझकर माफी देता हूँ, लेकिन फिर कभी ऐसा काम
न करना।"
बीरबल इस घटना से बड़ा लज्जित हुआ और उसके
मुखसे कोई जवाब न निकला-तब बादशाह ने अपने राजगीरों
को आज्ञा देकर उसका हाथ छुड़वा दिया। अब बीरबल को