अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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१०६ अकबर बीरबल विनोद
तब बीरबल के गुप्तचर बोले-“आपको बादशाह के पास
चलना पड़ेगा। आपने इससे छः बार चित्र बनवाया और
रुपया एक भी नहीं दिया 'अब तुम्हारी ठगी नहीं चलने की।”
रईस आँख दिखलाता हुआ उत्तर दिया-“वाह, अच्छे आये?
तुम मुझे दरबार में ले जाने वाले कौन होते हो ? तब गुप्तचरों
ने अपना असली लिवास खोलकर दिखलाया। रईस का होश
ठिकाने आ गया और विवश होकर चित्रकार को रुपये देने पर
उतारू हुआ। मामला बढ़ चुका था इसलिये सिपाहियों ने उसे
ऐसा न करने दिया और पकड़ कर बीरबल के पास ले गये।
बीरबल तो उसके ठगी का हाल पहले ही सुन चुका था,
जब वह आया तो उससे बहुतेरा प्रश्न उसी सम्बन्ध का
किया; परन्तु वह उन प्रश्नों का एक भी उचित उत्तर न दे
सका। बीरबल ने उसे दस मिनट में सोचकर उत्तर देने की
आज्ञा दी। फिर भी कुछ न बोला, बोलता कहाँ से कहीं बालू
पर भीत उठाई जा सकती है? बीरबल ने सिपाहियों
को कोड़े लगाने की आज्ञा दी, वे पास ही में उपस्थित
थे। हुक्म पाते ही कोड़ा लेकर आगे आये। कोड़ा देखते ही
रईस का होश ठिकाने आ गया और उसने तुरंत अपना दोष
स्वीकार कर लिया। बीरबल उसे कठिन दण्ड देकर जेल
भेज दिया।
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नया दीवान
यह तो किसी से छिपा नहीं है कि बीरबल अकबर का
मुँहलगा दीवान था। वह उसको हर प्रकार से मात किये