अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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तो वही शीशा उसके सामने रख देना, शीशा में वह अपना
स्वरूप बदल न सकेगा और इस भाँति आसानी से तुम्हारे
काबू में आजायगा। कारण कि दर्पण में उसका तात्कालिक
स्वरूप भाषित होगा।"
कई दिनों का अन्तर देकर चित्रकार बाजारसे एक हलब्बा
शीशा खरीद लाया फिर गुप्तचरों के साथ रईस केघर गया और
उससे मिलकर बोला- "महाशयजी ! इस बार मैं बहुत होशि-
यारी से आपका चित्र बना लाया हूँ, आशा है कि मेरे इस
कठिन परिश्रम से आप खुश होंगे।" ऐसी चोखाई की बातें
दर्पण रईस के सामने रख दिया।" धनाड्य बोला-"वाह
क्या खूब ! यह मुझे आइना क्यों दिखला रहा है, वह चित्र
दिखला जिसकी तू ने अभी इतनी प्रशंसा की है।" चित्रकार
ने उत्तर दिया- "महाशय जी ! यही आपका तद्रू प चित्र है।"
तब तो रईस के कान खड़े हो गये और वह अपनी ठगी
छिपाने के लिये उससे बोला- "तुझे मैंने अपना चित्र बनाने
को भला कब कहा था?" चित्रकार ने कहा- "आप बात क्यों
पलटते हैं; आपके आर्डर से मैंने बारी बारी पाँच चित्र
बना कर दिखलाया; परन्तु हर बार आपने नापसन्द
कर मुझे कोरा लौटा दिया। अब इस बार इतनी
कतरव्योत कर बना लाया तो नकारने पर कटिवद्ध हुए हो।
यह नहीं होने का; मेरे आपके बीच जो शर्ते पहले
निश्चित हो चुकीं हैं उसे पूरी कीजिये।"
रईस ने देखा कि यह तो अच्छी बला लेकर आया है,
इसे मूर्ख बनाकर ठगना चाहिये। वह एकदम नकर गया।