अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
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Read in contextअकबर बीरबल विनोद १०७.
रहता था। एक दिन बादशाह गुस्से में था। बीरबल उसके
मनोगत भावों को ताड़ न सका और बातों २ में उसकी हँसी
उड़ाने लगा। बादशाह को उसकी हँसी से मार्मिक वेदना
हो रही थी। वह बोला-“बीरबल तुम्हारा मिजाज बहुत
बढ़ गया है इसलिये बराबर बेअदबी किया करते हो, अब
तुम्हें ऐसा मौका नहीं दिया जायगा। भविष्यमें यदि फिर कोई
ऐसा कामकरोगे तो स्मरण रहे कठिन दण्ड के भागी होगे।”
बीरबल ने अपनी बात रखने के लिये फिर कोई हँसी की
बात निकाली; परन्तु बादशाह ने उसे बीच में ही क्रुद्ध
होकर दबा दिया। अब बीरबल को बादशाह का क्रुद्ध होना
प्रगट हो गया और वह चुप्पी साध गया । बादशाह बीरबल
की बेअदबी से चिढ़ गया था जिसकारण आँखें लाल २
कर बोला-“अब तुम फिर मेरे दरबार में कभी न आना;
अभी दरबार से बाहर निकल जाओ।”
बीरबल उत्तर देना उचित न समझकर चुपके से वहाँ से
‘सटक सीताराम’ हो गया। यह सोचकर मनमें ढाढ़स किया
कि यह तो बादशाहों की गति ही है, जब काल आयेगा तो झख
मारेंगे और बुलावेंगे। ऐसी २ बहुतेरी कल्पनाएँ करता हुआ
घर पहुँचा और अपने घर वालों को सावधान कर
महीनों गुम रहा। न उसकी बुलाहट हुई न फिर गया ही।
इधर बादशाह ने एक दूसरा नया दीवान नियुक्त कर लिया।
जब बीरबल को बादशाह का रुख बदलते न दिखलाई पड़ा
तो वह चुपचाप वायु परिवर्तन करने के लिये नगर से बाहर
किसी दूसरे शहर को चला गया। उसका जाना किसी को