अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)
Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)
by पारम्परिक लोक संग्रह
Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)
Page 110 of 292
Read in context[header: अकबर बीरबल विनोद ६६]
कारण विशेष जान पड़ा इसलिये उससे पूछा-“क्यों बीरबल
आज इतनी जल्दी क्योंकर आना हुआ ?” बीरबल ने विनम्रता
से उत्तर दिया-“गरीबपरवर ! यह कारीगर एक उत्तम
हीरा लेकर मेरे साथ आया है, यह उस हीरे को बेचना चाहता
है। मुझे विश्वास है कि यह चीज आपके पसन्द की होगी ।”
इतना कहकर उसने हीरे को बादशाह के हाथ में दे दिया ।
बादशाह ने हीरे को भली-भाँति देखकर कहा-“बीरबल !
हीरा तो लाजवाब है; परन्तु बूढ़े जौहरी से कहो कि इसे लेकर
दो घण्टे पश्चात हाजिर होवे ।” बुड्ढा वहाँ से हट गया ।
तब बादशाह ने बीरबल को उसकी भलीभाँति जाँच कराने
की आज्ञा दी । बीरबल इधर उधर घूम फिर कर आ गया
और बोला-“पृथ्वीनाथ ! इसके अच्छा होनेमें कोई सन्देह नहीं
है। हीरे को आप अपने पास रक्खें ।” बीरबल के इस उत्तर
से बादशाह को सन्तोष हुआ और फिर बोला-“हीरे को खरी-
दने से पहले और जाँच करा लो ।” बीरबल बोला-“पृथ्वीनाथ !
इस समय हीरे को अपने मुख में रख लीजिये, फिर जाँच
होती रहेगी ।” बादशाह ने हीरे को मुख में छिपा लिया ।
बादशाह की आज्ञानुसार बूढ़े चाचा के आने का समय हुआ
और वे ठेंगते २ दरबार में पुनः हाजिर हुए । उसे देख बीरबल
ने बादशाह से कहा-“गरीबपरवर ! देखिये वह हीरे वाला
वृद्ध भी आन पहुँचा, उसे अब क्या कहकर उत्तर देना होगा ।”
बादशाहने बीरबल की तरफ देखकर पूछा-“क्यों बीरबल !
वह हीरा तो मैं ने तुम्हीं को दिया था न ।” बीरबल ने साफ
इन्कार कर दिया और बोला-“पृथ्वीनाथ ! उसे तो आपने