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अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ)

Akbar Birbal Vinod (Stories of Justice, Wit and Humour)

by पारम्परिक लोक संग्रह

Source: अकबर-बीरबल विनोद (न्याय, चातुर्य एवं हास्य कथाएँ) · खेमराज श्रीकृष्णदास / नवल किशोर प्रेस · 1935 (origin)

DevanagariHindipublished292 pages

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६५ अकबर बीरबल विनोद
आदमी की भला मैं क्या सहायता कर सकता हूँ, बेहतर होगा
कि कल प्रातःकाल इसे अपने मकान पर बुलाऊँ । उसने प्रकट
रूपमें कहा— "चाचा जी ! यह रात्रिका समय है, थोड़ी देर और
अपनी झोपड़ी में जाकर आराम कीजिए। तड़के उठकर दीवान-
खाने में आना, मेरा नाम बीरबल है।" इतना कहकर बीरबल
चला गया और बुड्ढा भी झोपड़ी में पड़ा हुआ सबेरा होने की
प्रतीक्षा करने लगा, सारी रात उसको निद्रा न आई । सूर्यो-
दय होते ही ठेगता हुआ दीवान के घर पहुँचा । बीरबल ने
ने बुड्ढे की बड़ी आवभगत की और अच्छा अच्छा पदार्थ
भोजन कराया । जब वह खा पीकर सन्तुष्ट हुआ तो बीरबल
कहा-"चाचा जी ! इस समय मैं आपको केवल पन्द्रह दिन का
खर्च देकर विदा करता हूँ । इसके बीच मिश्री की एक डेली
लेकर उसे हीरे की शक्ल का बनाकर मेरे पास लाना, तब मैं
आपको आगे की तरकीब बतलाऊँगा ।" बुड्ढा बीरबल को
आशीर्वाद देता हुआ घर लौट गया । आठ दस दिनों के अन्त-
र्गत वह एक मिश्री के टुकड़े को खूब घिस छोलकर हीरे के
आकार का बनाकर बीरबलके पास ले आया । बीरबल ने उस
नकली हीरे को हाथ में लेकर देखा, निसन्देह वह बनावटी
हीरा असली हीरेको मात कर रहा था। बीरबलने बूढ़ेसे कहा-
"चाचाजी इसको लेकर कल फिर आइयेगा, आपको बादशाह
के पास चलना होगा। मैं इसे बादशाह के हाथ बेचकर
आपको एक अच्छी रकम दिलाऊँगा ।
दूसरे दिन बीरबल बुड्ढे चाचा को साथलेकर रोज से पहले
ही राज महल में जा पहुँचा । उसे देखकर बादशाह को कुछ