१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
४० एकाक्षरोपनिषद्
वही (विराट्-ब्रह्म) सब कुछ जानने वाला, समस्त भुवनों का रक्षक एवं समस्त प्राणि-समुदाय
का आधार स्वरूप नाभि (केन्द्र) है। अन्तर्यामी रूप में आप ही सर्वत्र ओत-प्रोत हैं। आप ही विविध प्रकार
की गतियों के विश्रान्ति रूप हैं। आप की विष्णु के गर्भ (कमलनाल) में प्रजापति के रूप में स्थित हैं एवं
वेद (छन्द) भी आप ही हैं॥ ९॥
सामैश्चिदन्तो विरजश्च बाहुं हिरण्मयं वेदविदां वरिष्ठम्।
यमध्वरे ब्रह्मविदः स्तुवन्ति सामैर्यजुर्भिः ऋतुभिस्त्वमेव ॥ १०॥
वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ ज्ञानीजन रजोगुण से परे, स्वर्ण कान्ति वाले (विराट् पुरुष) के अन्त को साम
आदि वेदों से भी नहीं जान पाते। ब्रह्मवेत्ताजन यज्ञों में यजुर्वेद के मन्त्रों से तथा सामवेदी जन साम मन्त्रों
से जिसकी स्तुति करते हैं, वे आप ही हैं॥ १०॥
त्वं स्त्री पुमांस्त्वं च कुमार एकस्त्वं वै कुमारी ह्यथ भूस्त्वमेव।
त्वमेव धाता वरुणश्च राजा त्वं वत्सरोऽग्न्यर्यम एव सर्वम् ॥ ११॥
(हे परमात्मन्!) आप अकेले ही स्त्री, पुरुष, कुमार एवं कुमारी हैं। आप ही पृथिवी हैं। आप ही
धाता, वरुण, सम्राट्, संवत्सर, अग्नि और अर्यमा (सूर्य) हैं। आप ही सब कुछ हैं॥ ११॥
मित्रः सुपर्णश्चन्द्र इन्द्रो वरुणो रुद्रस्त्वष्टा विष्णुः सविता गोपतिस्त्वम्।
त्वं विष्णुर्भूतानि तु त्रासि दैत्यांस्त्वयावृतं जगदुद्भवगर्भः ॥ १२॥
(हे परम पुरुष!) सूर्य, गरुड़, चन्द्र, वरुण, रुद्र, प्रजापति, विष्णु, सविता, गोपति (इन्द्रियों या
गौओं के स्वामी) जो कि वागादि इन्द्रियों के स्वामी कहे जाते हैं, वे आप ही हैं। आप ही विष्णु बन कर
समस्त मानव जाति को दैत्यों के भय से त्राण दिलाने वाले हैं। आप ही जगत् के जनक भूगर्भरूप हैं।
आपके द्वारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आवृत है॥ १२॥
त्वं भूर्भुवः स्वस्त्वं हि स्वयंभूरथ विश्वतोमुखः।
य एवं नित्यं वेदयते गुहाशयं प्रभुं पुराणं सर्वभूतं हिरण्मयम्।
हिरण्मयं बुद्धिमतां परां गतिं स बुद्धिमान्बुद्धिमतीत्य तिष्ठतीत्युपनिषत् ॥ १३॥
आप ही स्वयम्भू (स्वयं प्रकट होने वाले) एवं विश्वतोमुख (सर्वत्र मुख वाले) हैं। आप ही
भूः, भुवः, स्वः आदि (लोकों) में प्रतिष्ठित हैं। जो भी मनुष्य अपने गुहारूप हृदय क्षेत्र में स्थित
पुराण पुरुषोत्तम आदिपुरुष को 'प्राणस्वरूप' एवं 'प्रकाश स्वरूप' जानता है। वह (पुरुष) ब्रह्मज्ञानियों
की परमगति को, अज्ञानग्रस्त भ्रम बुद्धि का अतिक्रमण करके प्राप्त कर लेता है। यही उपनिषद्
(रहस्यात्मक ज्ञान) है॥ १३॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु ........इति शान्तिः ॥
॥ इति एकाक्षरोपनिषत्समाप्ता ॥
अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं।
॥ ऐतरेयोपनिषद्✪ ॥
ऋग्वेदीय ऐतरेय आरण्यक के दूसरे आरण्यक के चौथे, पाँचवें एवं छठवें अध्याय ब्रह्मविद्या प्रधान हैं,
अस्तु, इन्हें ऐतरेयोपनिषद् की मान्यता दी गयी है। प्रथम अध्याय में तीन खण्ड हैं तथा शेष (दूसरे, तीसरे)
अध्यायों में एक-एक खण्ड ही हैं।
प्रथम अध्याय के प्रथम खण्ड में परमात्मा द्वारा सृष्टि रचना का संकल्प तथा लोकों-लोकपालों की रचना
का प्रसंग है। हिरण्यगर्भ से विराट् पुरुष एवं उसकी इन्द्रियों से देवताओं की उत्पत्ति दर्शायी गयी है। दूसरे खण्ड
में देवताओं के लिए आवास रूप मनुष्य शरीर तथा क्षुधा-पिपासा की शान्ति हेतु अन्नादि की रचना का प्रसंग है।
तीसरे खण्ड में प्राणों द्वारा अन्न को ग्रहण करने के उपाख्यान के साथ स्वयं परमात्मा द्वारा मूर्धा मार्ग से
प्रवेश करने का प्रकरण दिया गया है। व्यक्ति रूप में उत्पन्न पुरुष की जिज्ञासा और परमात्म तत्त्व के
साक्षात्कार से उसके कृतकृत्य होने का भी उल्लेख है। दूसरे अध्याय में ऋषि वामदेव द्वारा जीवन चक्र का
अनुभव प्राप्त करने का वर्णन है। माता के गर्भ में जीव प्रवेश उसका प्रथम जन्म, बालक रूप में बाहर
आना द्वितीय जन्म तथा मरणोत्तर योनियों में जाना तीसरा जन्म कहा गया है। तीसरे अध्याय में उपास्य
कौन है, यह प्रश्न खड़ा करके प्रज्ञान रूप परमात्मा को ही उपास्य सिद्ध किया गया है। उसे प्राप्त करके
काया त्याग के बाद परमधाम अमरपद प्राप्ति का निरूपण किया गया है।
॥ शान्तिपाठः ॥
वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः
श्रुतं मे मा प्रहासीरनेनाधीतेनाहोरात्रान्संदधाम्यृतं वदिष्यामि सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु
तद्वक्तारमवतु अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे परमात्मन्! मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में प्रतिष्ठित हो। (हे परमात्मन्!) आप मेरे समक्ष
प्रकट हों। मेरे लिए वेद का ज्ञान लाएँ (प्रकट करें)। मैं पूर्वश्रुत ज्ञान को विस्मृत न करूँ। इस स्वाध्यायशील
प्रवृत्ति से मैं दिन और रात्रियों को एक कर दूँ (मेरा स्वाध्याय सतत चलता रहे)। मैं सदैव ऋत और सत्य
बोलूँगा। ब्रह्म मेरी रक्षा करे। वह (ब्रह्म) वक्ता (आचार्य) की रक्षा करे। त्रिविध ताप शान्त हों।
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
इस उपनिषद् में ब्रह्म से लोकों, लोकपालों सहित मानवी सृष्टि, उसके विकास तथा मोक्ष सहित विराट्
जीवन चक्र का उल्लेख है। ऋषि ने हर चरण को स्पष्ट एवं सरल ढंग से व्यक्त किया है। आवश्यकतानुसार अव्यक्त
भावों को पाद टिप्पणियों द्वारा स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है-
आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीन्नान्यत्किञ्चन मिषत्। स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥
सृष्टि के आरम्भ में एक मात्र आत्मा (परमात्म तत्त्व) ही था, उसके अतिरिक्त और कुछ भी सचेष्ट
न था। (तब) उस (परमात्मा) ने विचार किया कि 'मैं लोकों का सृजन करूँ' ॥ १ ॥
✪ अड़यार लाइब्रेरी से प्रकाशित दशोपनिषद् (१९३५) संग्रह के ऐतरेयोपनिषद् में प्रारम्भिक तीन अध्याय
और प्रकाशित हैं, जिनका समावेश अन्य किसी उपनिषत्संग्रह में न होने से यहाँ भी नहीं ग्रहण किया गया है।
४२ ऐतरेयोपनिषद्
[ मंत्र में 'नान्यत् किंचन मिषत्' वाक्य है, मिषत् शब्द पलक हिलाने के भाव में भी प्रयुक्त होता है, जो
सबसे कम प्रयास में होने वाली दृश्य चेष्टा है। इसलिए पद का भाव यही लेना उचित है कि अन्य कुछ भी नहीं था
तथा जो था वह किंचित् भी सचेष्ट नहीं था। पहली चेष्टा उस ब्रह्म के संकल्प के रूप में ही हुई।]
स इमाँल्लोकानसृजत अम्भो मरीचीर्मरमापोऽदोऽम्भः परेण दिवं द्यौः प्रतिष्ठाऽन्तरिक्षं
मरीचयः। पृथिवी मरो या अधस्तात्ता आपः ॥ २ ॥
उस (परमात्मा) ने अम्भ, मरीचि, मर और आपः लोकों की रचना की। द्युलोक से परे और स्वर्ग की
प्रतिष्ठा वाले लोकों को अम्भ अन्तरिक्ष (प्रकाश लोक) को मरीचि, पृथिवीलोक को मर्त्यलोक और
पृथिवी के नीचे (परे) आपः लोक है॥ २॥
[ यहाँ लोकों के नाम और उनकी स्थितियाँ विचारणीय हैं। पृथ्वी को 'मर' मृत्युलोक कहा ही जाता है।
अन्तरिक्ष मरीचि अर्थात् प्रकाश किरणों से युक्त लोक मान्य है। मरीचि का अर्थ शब्द कल्पद्रुम के अनुसार पापों,
क्षुद्र जीवों या तमस् को मारने वाला कहा गया है। अन्तरिक्ष में ऐसे तेजस्वी मारक प्रवाह होने की पुष्टि वर्तमान
विज्ञान भी करता है। अम्भ = अम् (प्राण) तथा भः (भरणकर्ता) से बना है। द्युलोक से परे यह अव्यक्त रूप से
सूक्ष्म प्राण का भरण करने वाला लोक है, जिसकी प्रत्यक्ष प्रतिष्ठा के रूप में द्युलोक है। पृथ्वी के नीचे आपः लोक
का भाव अनेक आचार्यों ने माना है। जो अधिक उचित प्रतीत नहीं होता।
वस्तुतः ऋग्वेद ने आपः को सृष्टि के मूल क्रियाशील प्रवाह के रूप में व्यक्त किया है। आपः सृष्टि का
आधारभूत द्रव्य है, इसलिए ऋषि ने उसे 'या अधस्तात् ता आपः' जो आधाररूप है वह आपः है, ऐसा कहा है। वही
हिरण्यगर्भ रूप है, जिसे वेद ने 'स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां' (पृथ्वी और द्युलोक का आधार वही है) कहा है।
आपः जल को भी कहते हैं; किन्तु वह अर्थ लेने से मंत्र का भाव सिद्ध नहीं होता। अस्तु, आपः को वेद की
अवधारणा के आधार पर ही स्वीकार करना उचित है। इसे 'ताः' स्त्रीलिंग बहुवचन का संबोधन दिया गया है।
इसी आपः तत्त्व के गर्भ में ब्रह्म का संकल्प बीज रूप में पककर विश्वरूप बनता है, यह गुण मातृसत्ता का होने से
आपः को 'देवी आपः' या 'ताः आपः' कहना उचित है। इस उपनिषद् में भी अगले मंत्रों में आपः का उत्पादक
प्रयोग बार-बार परिलक्षित होता है।]
स ईक्षतेमे नु लोका लोकपालान्नु सृजा इति। सोऽद्भ्य एव पुरुषं समुद्धृत्यामूर्च्छयत्॥
(लोकों का निर्माण करने के बाद) उसने विचार किया कि लोकों का निर्माण तो हो गया, अब मुझे
लोकपालों की भी रचना करनी चाहिए। ऐसा चिन्तन करके उसने आपः (तरल प्रवाह) में से ही एक पुरुष
को समुद्धृत करके (निकालकर) उसे मूर्त्तिमान् बनाया ॥ ३ ॥
[ पुरुष संबोधन सृजनात्मक पुरुषार्थ करने में समर्थ के लिए प्रयुक्त होता है। ब्रह्म ने उस मूल प्रवाह
में से विराद् पुरुष को मूर्तरूप दिया अर्थात् विराट् संरचना की सामर्थ्य को जाग्रत् किया। ऋषि ने उसे
'अद्भ्य एव समुद्धृत्य' कहा है। अद्भ्यः का सीधा अर्थ जल होता है; किन्तु यहाँ भी उसका प्रयोग
(आपः) विश्व सृजनशील प्रवाह ही है।]
तमभ्यतपत्तस्याभितप्तस्य मुखं निरभिद्यत यथाण्डं मुखाद्वाग्वाचोऽग्निर्नासिके
निरभिद्येतां नासिकाभ्यां प्राणः। प्राणाद्वायुरक्षिणी निरभिद्येतामक्षिभ्यां चक्षुश्चक्षुष
आदित्यः कर्णौ निरभिद्येतां कर्णाभ्यां श्रोत्रं श्रोत्राद्दिशस्त्वङ् निरभिद्यत त्वचो लोमानि
लोमभ्य ओषधिवनस्पतयो हृदयं निरभिद्यत हृदयान्मनो मनसश्चन्द्रमा नाभिर्निरभिद्यत
नाभ्या अपानोऽपानान्मृत्युः शिश्नं निरभिद्यत शिश्नाद्रेतो रेतस आपः ॥ ४॥
उस विराट् पुरुष को देखकर ईश्वर ने सङ्कल्पपूर्वक तप किया। उस तप के प्रभाव से (उस हिरण्यगर्भ
स्वरूप) पुरुष के शरीर से सर्वप्रथम अण्डे की तरह एक मुख छिद्र प्रकट हुआ। मुख से वाक् इन्द्रिय और
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ४ ४३
अध्याय १ खण्ड २ मन्त्र ४ ४३
वाक् से अग्नि प्रकट हुई। (तदुपरान्त) नाक के छिद्र प्रकट हुए। नाक के छिद्रों से प्राण और प्राण से वायु
उत्पन्न हुआ। (फिर) नेत्र उत्पन्न हुए। नेत्रों से चक्षु (अर्थात् देखने की शक्ति) और चक्षु से आदित्य प्रकट
हुआ। (तत्पश्चात्) कान प्रकट हुए, कानों से श्रोत्र (श्रवण की शक्ति) और श्रोत्रों से दिशाओं का प्रादुर्भाव
हुआ। (फिर) त्वचा प्रकट हुई, त्वचा से रोम और रोमों से वनस्पति रूप ओषधियों का प्राकट्य हुआ।
(इसके अनन्तर) हृदय, हृदय से मन, मन से चन्द्रमा उदित हुआ। तदुपरान्त नाभि, नाभि से अपान और
अपान से मृत्यु प्रादुर्भूत हुई। (फिर) जननेन्द्रिय, जननेन्द्रिय से वीर्य और वीर्य से आपः (जल या
सृजनशीलता) की उत्पत्ति हुई॥ ४॥
[ यहाँ वीर्य से पुनः 'आपः' की उत्पत्ति कही गयी है। यह बड़ा वैज्ञानिक-मार्मिक कथन है। आपः
सृष्टि कर्त्ता आधारभूत प्रवाह है। वीर्य में ही पुनः सृष्टि करने में समर्थ 'बीज' तैयार होता है। वीर्य उस सूक्ष्म
आपः प्रवाह के चक्र को पुनः प्रयुक्त करने में सक्षम है-ऐसा ऋषि का अनुभव है। उसी आपः तत्त्व में
चेतना पुनः रूप ग्रहण करने लगती है।]
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन्महत्यर्णवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत्।
ता एनमब्रुवन्नायतनं नः प्रजानीहि यस्मिन्प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १ ॥
परमेश्वर द्वारा रचे गये वे (अग्नि आदि) देवता इस (पूर्व वर्णित विश्व नियामक) महासमर में आ
गिरे। उन्हें उन परमात्मा ने क्षुधा-पिपासा से युक्त कर दिया, तब उन देवों ने परमेश्वर से याचना की कि
हमारे लिए कोई आश्रय स्थल विनिर्मित कीजिए (शरीरों का निर्माण कीजिए), जिससे हम अपना-अपना
आहार ग्रहण कर सकें॥ १॥
ताभ्यो गामानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽयमलमिति ताभ्योऽश्वमानयत्ता अब्रुवन्न वै नोऽ
यमलमिति ॥ २ ॥
(देवताओं द्वारा ऐसा कहने पर) ईश्वर ने उनके लिए गो शरीर का निर्माण किया। उन्होंने कहा- यह
हमारे लिए पर्याप्त (उपयुक्त) नहीं है, तब ईश्वर ने अश्व शरीर बनाया। उसे देखकर वे बोले- यह भी हमारे
लिए पर्याप्त नहीं है॥ २॥
ताभ्यः पुरुषमानयत्ता अब्रुवन् सुकृतं बतेति पुरुषो वाव सुकृतम्। ता
अब्रवीद्यथाऽऽयतनं प्रविशतेति ॥ ३ ॥
तब परमेश्वर ने उनके लिए मनुष्य शरीर की रचना करके उन्हें (देवताओं को) दिखाया, तब वे सभी
देवगण बोले बस यह बहुत सुन्दर रचना है। सचमुच ही मनुष्य सर्वश्रेष्ठ है। परमेश्वर ने उन देवताओं से
कहा-(इस मानव शरीर में) आप लोग अपने-अपने आयतन अर्थात् आश्रय स्थलों में प्रवेश करें॥ ३॥
अग्निर्वाग्भूत्वा मुखं प्राविशद्वायुः प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश्चक्षुर्भूत्वाक्षिणी
प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं
प्राविशंश्चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा
शिश्नं प्राविशन्॥ ४॥
४४ ऐतरेयापानषद
(परमात्मा की आज्ञा पाकर) अग्निदेव वाणी का रूप धारण कर मुख में प्रविष्ट हुए, वायुदेव प्राण
बनकर नासिका के छिद्रों में प्रविष्ट हुए, सूर्यदेव चक्षु बनकर नेत्रों के गोलकों में प्रविष्ट हुए, दिशाएँ
श्रोत्रेन्द्रिय बनकर कर्ण छिद्रों में प्रविष्ट हुईं, वनस्पतियाँ रोम बनकर त्वचा में प्रविष्ट हुईं, चन्द्रदेव मन बनकर
हृदयक्षेत्र में प्रविष्ट हुए, मृत्युदेव अपान बनकर नाभि प्रदेश में प्रविष्ट हुए और आपः देवता वीर्य बनकर
उपस्थ क्षेत्र में प्रविष्ट हुए ॥ ४ ॥
[यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवता विराट् पुरुष के जिन अंगों से जिस माध्यम से प्रकट हुए थे,
उसी क्रम से उन्होंने मनुष्य के उन्हीं अंगों में स्थान बनाया।]
तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां
देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते
भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५॥
(तब) क्षुधा और पिपासा ने परमेश्वर से कहा- (आपने सब देवताओं को तो स्थान दे दिया) हमारे
लिए भी आश्रय स्थल की व्यवस्था करें। परमेश्वर ने कहा- मैं तुम दोनों को इन देवताओं में ही भाग प्रदान
करता हूँ। जिस किसी देवता को कोई आहार (हवि) प्रदान किया जायेगा। उसमें तुम दोनों का भी हिस्सा
होगा, (तभी से इन्द्रियों द्वारा आहार ग्रहण करने पर भूख और प्यास को भी परितृप्ति मिलती है।) ॥ ५ ॥
[ऋषि स्पष्ट करते हैं कि भूख-प्यास का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है, वे विभिन्न अंग-अवयवों में संव्यास
देवशक्तियों के साथ संयुक्त हैं। शरीर विज्ञान के वर्तमान शोध-निष्कर्ष भी यही कहते हैं। भूख-प्यास शरीर के
प्रत्येक कोश में होती है। जब तक पेट में अन्न-जल का भण्डार होता है, तब तक भूख-प्यास की अनुभूति नहीं
होती। रोग की स्थिति में 'ड्रिप' द्वारा जल एवं पोषण पहुँचाने से भूख-प्यास शान्त हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि
भूख-प्यास प्रत्येक जीवित कोश के साथ संयुक्त है।]
॥ तृतीयः खण्डः ॥
स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥
इसके अनन्तर परमात्मा ने विचार किया कि समस्त लोकों और लोकपालों की सृष्टि तो सम्पन्न हो
चुकी, अब इनके लिए अन्न की भी रचना करनी चाहिए ॥ १ ॥
सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥
फिर परमेश्वर ने अप् प्रवाह को अभितप्त किया। उस तपाये हुए (अमूर्त अप्) से जो मूर्त स्वरूप बना,
वह मूर्त रूप ही वस्तुतः अन्न है ॥ २ ॥
[ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस नयी सृष्टि में भी 'अप्' प्रवाह को ही तप्त अथवा परिपक्व किया गया।]
तदेतत्सृष्टं पराङत्यजिघांसत् तद्वाचा जिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम्। स
यद्धैनद्वाचाऽग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥
उस सृष्ट (रचे हुए) अन्न ने उन (लोकपालों) की ओर से परे (पराङ्मुख होकर) भागने की चेष्टा
की, तब उस पुरुष ने उसे (अन्न को) वाणी के द्वारा ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह उसे वाणी द्वारा ग्रहण
करने में असमर्थ रहा। यदि वह. पूर्ण पुरुष अन्न को वाणी से ग्रहण कर लेता, तो अब (इस समय या इस
युग में) भी मनुष्य वाणी से अन्न को बोलकर ही तृप्ति प्राप्त कर लिया करते ॥ ३ ॥
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५
तद्घ्राणेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोद्घ्राणेन ग्रहीतुम्।
स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राय हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् उसने अन्न को घ्राण द्वारा पकड़ने की चेष्टा की, पर वह इसमें भी सफल न हो सका।
यदि वह इसे घ्राण से ग्रहण कर लेता, तो इस युग में भी पुरुष प्राण-प्रक्रिया से ही सूँघकर अन्न ग्रहण करके
परितृप्त हो जाया करते ॥ ४ ॥
तच्चक्षुषाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥
फिर उस पुरुष ने नेत्रों द्वारा अन्न ग्रहण करने अर्थात् देखकर ही अन्न की शक्ति ग्रहण करने की चेष्टा
की; किन्तु ऐसा भी सम्भव न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे नेत्रों से ग्रहण कर सकता, तो अब भी
मनुष्य अन्न को देखने मात्र से ही तृप्त हो जाया करते ॥ ५ ॥
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥
तदुपरान्त उस पुरुष ने उस अन्न को श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु वह उसमें भी
सफल न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे कानों द्वारा ग्रहण कर सका होता, तो अब भी लोग इसे
कानों द्वारा ग्रहण कर सकते (अर्थात् अन्न के विषय में सुनकर ही तृप्त हो जाते ) ॥ ६ ॥
तत्त्वचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७॥
तब उस पुरुष ने इस (अन्न) को त्वचा द्वारा ग्रहण करने की चेष्टा की; किन्तु उसे इसमें भी सफलता
न मिली। यदि वह उस समय त्वचा द्वारा अन्न को पकड़ने अर्थात् ग्रहण करने में सफल हो गया होता,तो
अब भी लोग इसे छू लेने मात्र से ही परितृप्त हो जाते ॥ ७ ॥
तन्मनसाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८॥
तदनन्तर उस पुरुष ने उसको मन द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा की; लेकिन उसे इसमें भी सफलता नहीं मिली।
यदि वह इसको मन द्वारा ग्रहण कर पाता, तो अब भी मनुष्य अन्न के चिन्तन मात्र से तृप्ति अनुभव करते ॥ ८ ॥
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ९॥
इसके बाद उस पुरुष ने अन्न को शिश्न द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु इसके द्वारा भी वह
उसे ग्रहण करने में समर्थ न हो सका। यदि वह उस समय उसे शिश्न द्वारा ग्रहण कर पाया होता, तो आज
भी मनुष्य अन्न का विसर्जन करके ही तृप्त हो जाया करते ॥ ९॥
तदपानेनाजिघृक्षत् तदावयत्। सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
उसके बाद उस (पुरुष) ने अपान वायु के द्वारा (मुँह से होकर) इसे (अन्न को) ग्रहण करने की
चेष्टा की, अपान वायु के द्वारा उसने अन्न को ग्रहण कर लिया। अपान वायु ही अन्न को ग्रहण करने में
समर्थ है। जो अन्न के द्वारा जीवन की रक्षा करने में समर्थ है, वह यही वायु है ॥ १०॥
४६ ऐतरेयोपनिषद
[ शंकराचार्य जी ने अपान का अर्थ मुख छिद्र किया है। वाचस्पत्यम् में अपान को प्राण का धारक कहा गया
है। आयुर्वेद में पाचन, मल उत्सर्जन आदि कर्म अपान द्वारा ही सम्पन्न होना माना गया है। अतः वही अन्न का धारक
है। अन्न के माध्यम से आयुष्य बढ़ाने वाला यही वायु अन्नायु कहा जाता है। ]
स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि
वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा
स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥
उस परमात्मा ने विचार किया कि यदि इस पुरुष ने वाणी से बोलने का प्रयोजन पूरा कर लिया, यदि प्राण
(वायु) से सूँघ लिया, यदि नेत्रों से देख लिया, यदि कानों से सुन लिया, यदि त्वचा से स्पर्श कर लिया, यदि मन
से सोच लिया, यदि अपान से आहार ग्रहण कर लिया और उपस्थ से विसर्जन कृत्य पूर्ण कर लिया, तो मैं (उसके
लिए) कौन रहा ? (मेरे बिना ये कैसे रह पायेगा?) मैं किधर से प्रविष्ट होऊँ ? ॥ ११ ॥
[ समस्त व्यवस्था बन जाने पर भी आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश की स्थापना के बगैर व्यक्ति का
अस्तित्व नहीं बनता। 'कोऽहम्' (फिर मैं कौन हूँ?) का उत्तर 'सोऽहम् इति' (मैं वही आत्म तत्त्व हूँ) यह तथ्य
इस प्रकरण से सिद्ध होता है।]
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्रुतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्।
तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥
वह परमात्मा मानव शरीर की सीमा मूर्धा (ब्रह्मरन्ध्र) को विदीर्ण करके (चीरकर) उसमें प्रविष्ट हो
गया। विदीर्ण करके जाने के कारण इस द्वार को 'विद्रुति' नाम से जाना जाता है। यह विद्रुति नामक द्वार
आनन्दप्रद अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला है। उस परमेश्वर के तीन आश्रयस्थल और
तीन स्वप्न हैं। उसका यही आवास स्थल है। यही आवासस्थल है, यही आवासस्थल है ॥ १२ ॥
['यही वह स्थल है', यह बात तीन बार कही गयी है। बात पर बल देने के लिए 'त्रिवाचा' कहने की परम्परा
है, अर्थात् यह देह निश्चित रूप से उस परमात्मा का आवास है। अन्य भाव यह है कि शरीर में तीन स्वचालित तंत्र,
तीन ग्रंथियों में आत्मा का सीधा नियंत्रण कहा जा सकता है, वे हैं-मस्तिष्क में सहस्रार (रैटिकुलर एक्टिवेटिंग
सिस्टम), हृदय (पेस मेकर) तथा नाभि ग्रंथि (पाचन-प्रजनन चक्र) अथवा शरीर, ब्रह्माण्ड और परम व्योम इन
तीन स्थानों को उसके स्थान तथा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण स्वरूपों को अथवा सृजन, पालन, परिवर्तन को उसके
तीन स्वप्न कहा जा सकता है।]
स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति ।
स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यदिदमदर्शमिती३ ॥ १३ ॥
मानव शरीर में प्रकट उस पुरुष ने भूतों (सृष्टि) को चारों ओर से देखा और यह कहा कि मेरे अतिरिक्त यहाँ
दूसरा कौन है ? मैंने इसे भली-भाँति देखकर यह बोध प्राप्त कर लिया है कि यह परम पुरुष परब्रह्म ही है ॥ १३ ॥
तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र ।
इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥
मानुष-देह में उत्पन्न हुए उस पुरुष ने परब्रह्म परमेश्वर का पूर्व वर्णित रीति से साक्षात्कार कर लिया;
इसलिए उसका मैंने दर्शन कर लिया, इस व्युत्पत्ति के आधार पर ही उस का नाम इदन्द्र है। परन्तु लोग उसे
'इन्द्र' कहकर ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं, देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं ॥ १४ ॥
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७
अध्याय २ खण्ड १ मन्त्र ५ ४७
॥ अथ द्वितीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
पुरुषे ह वा अयमादितो गर्भो भवति। यदेतद्रेतस्तदेतत्सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस्तेजः
संभूतमात्मन्येवात्मानं बिभर्ति तद्यदा स्त्रियां सिञ्चत्यथैनज्जनयति तदस्य प्रथमं जन्म ॥ १ ॥
सर्वप्रथम यह जीव पुरुष के शरीर में गर्भरूप से विराजमान रहता है। पुरुष के शरीर में स्थित जो वीर्य
है, वह पुरुष के समस्त अङ्गों से समुत्पन्न तेज है। पहले पुरुष आत्मस्थ तेज को अपने ही अन्दर पोषित
करता है, तदुपरान्त जब वह इस वीर्यरूप तेज का स्त्री में सिञ्चन करके गर्भरूप में स्थित रहता है, यह
इसका (जीव का) प्रथम जन्म है॥ १ ॥
[ वर्तमान प्रजनन विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) भी वीर्य में गुण-सूत्रों (क्रोमोजोम्स) तथा जीन्स (जीवाणुओं)
में व्यक्तित्व की सभी विशेषताओं का समावेश मानता है। पुरुष के गर्भ में पुरुष का परिपाक यह उपनिषद् की
अपनी दृष्टि है। पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमाएँ हैं, ऋषि उसमें चेतना का संकल्पयुक्त तंत्र देखते हैं।]
तत् स्त्रिया आत्मभूयं गच्छति यथा स्वमङ्गं तथा तस्मादेनां न हिनस्ति।
सास्यैतमात्मानमत्र गतं भावयति॥ २ ॥
जिस प्रकार स्त्री के अपने ही शरीर के अङ्ग होते हैं, उसी प्रकार पुरुष द्वारा सिञ्चित वह वीर्य भी स्त्री
से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। अस्तु, वह स्त्री को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुँचाता। वह स्त्री अपने
उदर में स्थापित पति के (वीर्यरूप) आत्मा का पोषण करती है ॥ २ ॥
[ सृष्टि के आदि में विराट् पुरुष और प्रकृति संयोग जैसा ही यह संयोग होता है।]
सा भावयित्री भावयितव्या भवति तं स्त्री गर्भं बिभर्ति सोऽग्र एव कुमारं जन्मनोऽग्रे
ऽधिभावयति। स यत्कुमारं जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येषां लोकानां
सन्तत्या एवं सन्तता हीमे लोकास्तदस्य द्वितीयं जन्म ॥ ३ ॥
वह पालनकर्त्री स्त्री पालनीया (अपने पति द्वारा पालन करने योग्य) होती है। गर्भवती स्त्री प्रसव से
पूर्व गर्भस्थ जीव का पालन करती है और वह पुरुष (पिता) प्रसवोपरान्त सर्वप्रथम (जातकर्म आदि
संस्कार से) उस शिशु को सुसंस्कृत करता है। वह जन्मोपरान्त शिशु को इस प्रकार संस्कारित करके,
उसकी उन्नति करके वास्तव में अपनी ही उन्नति करता है; क्योंकि इसी प्रकार लोक (चौदहों भुवन) प्रवृद्ध
होते हैं। यही इस (जीव) का द्वितीय जन्म है ॥ ३ ॥
सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो
वयोगतः प्रैति स इतः प्रयन्नेव पुनर्जायते तदस्य तृतीयं जन्म ॥ ४ ॥
इस आत्मा (पिता) का यह पुत्रस्वरूप आत्मा पुण्यों के लिए (पिता के) प्रतिनिधि रूप में प्रतिष्ठित
किया जाता है। तदुपरान्त यह जीव (पितारूप) वयोवृद्ध होकर अपने लौकिक कर्त्तव्यों को पूरा करके इस
लोक से प्रस्थान कर जाता है। इसके पश्चात् उसका पुनर्जन्म होता है। यह इस जीव का तृतीय जन्म है॥ ४॥
तदुक्तमृषिणा- गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा। शतं मा पुर
आयसीररक्षन्नधः श्येनो जवसा निरदीयमिति गर्भ एवैतच्छयानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥
४८ ऐतरेयोपनिषद्
यही बात ऋषि (वामदेव) ने इन शब्दों में कही है- मैंने गर्भ की स्थिति में ही (अन्तःकरण,
इन्द्रियादि) देवताओं के जन्मों का रहस्य भली-भाँति जान लिया है। मैं सैकड़ों लौहयुक्त (लोहे की तरह
कठोर) पिंजरों में आबद्ध था। अब मुझे तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया है, अतः मैं बाज़ पक्षी के समान (उन
पिंजरों को भेदकर) बाहर आ गया हूँ। इस प्रकार गर्भ में शयन करते हुए ऋषि वामदेव ने यह तथ्य प्रकट
किया था॥ ५॥
[ पदार्थ विज्ञानी पदार्थों की प्रयोगशाला में प्रवेश करके प्रयोगों द्वारा अनुसंधान करते हैं। चेतना विज्ञान के
विज्ञानी ऋषिगण चेतना की प्रयोगशालाओं में संकल्पपूर्वक प्रवेश करके अनुसंधान करते थे। वे परम व्योम तक
अपनी चेतना ले जाकर वेद के रहस्य प्रकट कर सकते थे और प्रकृति के सूक्ष्म घटकों में प्रवेश करके उनकी
विशेषताओं का साक्षात्कार कर लेते थे। ऋषि वामदेव ने अपनी आत्म चेतना को इसी अनुसंधान के लिए
संकल्पपूर्वक गर्भरूप में स्थापित किया तथा पूर्ण जागरूक रहकर चेतना के रहस्यों का अध्ययन किया, यही बात
यहाँ स्पष्ट की गयी है।]
स एवं विद्वानस्माच्छरीरभेदादूर्ध्व उत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे
लोके सर्वान् कामानाप्त्वामृतः समभवत् समभवत्॥ ६॥
वे ऋषि वामदेव यह ज्ञान (तत्त्वज्ञान) प्राप्त करके इस शरीर के विनष्ट होने के पश्चात् (इस
लोक से) उत्क्रमण कर (ऊर्ध्वगमन कर) स्वर्ग में समस्त सुखों का उपभोग करते हुए अमृतत्व को
प्राप्त हो गये (अमर हो गये) ॥ ६॥
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमः खण्डः ॥
कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स आत्मा येन वा पश्यति येन वा शृणोति येन
वा गन्धानाजिघ्रति येन वा वाचं व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति॥ १॥
जिस आत्मा की हम उपासना-अर्चना करते हैं, वह कौन है? जिसके द्वारा प्राणी देखता है, जिसके
द्वारा श्रवण करता है, जिसके द्वारा गन्धों को सूँघता है, जिसके माध्यम से वाक् शक्ति का विश्लेषण करता
है और जिसके द्वारा स्वादु-अस्वादु का ज्ञान प्राप्त करता है, वह आत्मा कौन सा है? ॥ १॥
यदेतत् हृदयं मनश्चैतत्। संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानं मेधा दृष्टिर्धृतिर्मतिर्मनीषा
जूतिः स्मृतिः संकल्पः क्रतुरसुः कामो वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि
भवन्ति ॥ २॥
जो यह हृदय है, वही मन भी है। संज्ञान (सम्यक् ज्ञान), आज्ञान (आदेश देने की शक्ति), विज्ञान
(विविध रूपों से जानने की शक्ति), प्रज्ञान (तुरन्त जान लेने की शक्ति), मेधा (धारणाशक्ति), दृष्टि, धृति
(धैर्य), बुद्धि, मनीषा (मनन करने की शक्ति), जूति (वेग), स्मृति, संकल्पशक्ति, मनोरथ शक्ति,
भोगशक्ति, प्राणशक्ति ये सभी शक्तियाँ परमात्म सत्ता की ही बोधक हैं ॥ २॥
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ४ ४९
अध्याय ३ खण्ड १ मन्त्र ४ ४९
एष ब्रह्मैष इन्द्र एष प्रजापतिरेते सर्वे देवा इमानि च पञ्च महाभूतानि पृथिवी
वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येतानीमानि च क्षुद्रमिश्राणीव। बीजानीतराणि चेतराणि
चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किंचेदं
प्राणि जङ्गमं च पतत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रं प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः
प्रज्ञा प्रतिष्ठा प्रज्ञानं ब्रह्म ॥ ३ ॥
यह (प्रज्ञान स्वरूप आत्मा ही) ब्रह्म, इन्द्र और प्रजा का अधिपति है। यही समस्त देवगण तथा
पृथिवी, वायु, अग्नि, आकाश और जल - पञ्च महाभूत हैं। यही इतर प्राणी तथा उनके कारणरूप बीज
और अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज, जरायुज प्राणी तथा गौ, अश्व, मनुष्य, पक्षी और हाथी सहित यह समस्त
जड़-जङ्गम जगत् प्रज्ञानेत्र और प्रज्ञान में ही समाहित हैं। उस प्रज्ञान में ही समस्त लोक आश्रित हैं, प्रज्ञा
ही उनका विलय स्थल है। अस्तु, प्रज्ञान को ही ब्रह्म कहा गया है॥ ३ ॥
स एतेन प्रज्ञेनात्मनास्माल्लोकादुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान्कामानाप्त्वामृतः
समभवत् समभवत् ॥ इत्योम् ॥ ४ ॥
जो परमेश्वर को इस प्रकार जान लेता है, वह इहलोक से ऊर्ध्वगमन कर स्वर्ग में जाकर समस्त दिव्य
भोगों को प्राप्त करता है और अन्ततः वह ज्ञानी अमरपद को प्राप्त करता है ॥ ४ ॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ वाङ्मे मनसि प्रतिष्ठिता......इति शान्तिः ॥
॥ इति ऐतरेयोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ कठोपनिषद् ॥
यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेद की कठ शाखा के अन्तर्गत है। इसमें दो अध्याय तथा प्रत्येक में तीन-तीन
वल्लियाँ हैं, जिनमें वाजश्रवा के पुत्र नचिकेता और यम के बीच हुए संवाद का सुप्रसिद्ध उपाख्यान है। वाजश्रवा
ने यज्ञ की दक्षिणा में निरर्थक वस्तुओं का दान करके दान की चिह्न-पूजा करनी चाही। उनके पुत्र नचिकेता ने
पिता को यथार्थ बोध कराने के लिए बार-बार पूछा कि आप मुझे किसको प्रदान करेंगे ? पिता ने खीझकर उन्हें
यम को दान करने की बात कही।
नचिकेता यम से मिलते हैं, उन्हें प्रभावित कर लेते हैं। यम उनसे तीन वरदान माँगने को कहते हैं। वे पहले
वरदान में पिता की प्रसन्नता तथा अनुकूलता तथा दूसरे वर में स्वर्ग प्रदायिनी अग्निविद्या माँगते हैं। यम उन्हें दोनों
वर प्रदान करते हैं। तीसरे वर में नचिकेता आत्मविद्या जानना चाहते हैं। यम उन्हें प्रलोभन देकर विचलित करना
चाहते हैं; किन्तु नचिकेता अविचलित बने रहते हैं। इतना प्रकरण प्रथम अध्याय की प्रथम वल्ली में है। द्वितीय,
तृतीय वल्ली में यमदेव आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी विविध पक्ष समझाते हैं। दूसरे अध्याय में परमेश्वर की प्राप्ति में
बाधाएँ, उनके निवारण, हृदय प्रदेश में उनकी स्थिति का वर्णन है। परमात्मा की सर्वव्यापकता संसाररूपी अश्वत्थ
का विवेचन, योग साधना तथा ईश्वर विश्वास एवं मोक्षादि का वर्णन है। अन्त में ब्रह्मविद्या के प्रभाव से नचिकेता
को ब्रह्म प्राप्ति होने का उल्लेख है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु .... इति शान्तिः ॥ (द्रष्टव्य- अमृतनादोपनिषद्)
॥ अथ प्रथमोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमा वल्ली ॥
ॐ उशन् ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥
(यह कथा प्रसिद्ध है कि) यज्ञफल की इच्छा रखने वाले वाजश्रवा ऋषि के पुत्र वाजश्रवस
(उद्दालक) ने (विश्वजित् यज्ञ में) अपने सम्पूर्ण धनादि पदार्थों का दान कर दिया । उनका नचिकेता नाम
का एक पुत्र था ॥ १ ॥
तꣳह कुमारꣳ सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽ मन्यत ॥ २ ॥
जिस समय (ऋत्विजों द्वारा) दक्षिणा में प्राप्त (जराजीर्ण) गौएँ ले जायी जा रही थीं, उन्हें देखकर
अल्प वयस्क नचिकेता के हृदय में श्रद्धा का संचार हुआ। उसने विचार किया ॥ २ ॥
पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः ।
अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥
जो गौएँ जल पी चुकीं, घास खा चुकीं, जिनका दूध दुहा जा चुका और जो इन्द्रियों के शिथिल हो
जाने पर प्रजनन-सामर्थ्य से रहित हैं (जो वृद्धावस्था से जीर्ण और निरर्थक हो चुकी हैं), उन गौओं का
दान करने से मेरे पिता (वाजश्रवस) निश्चित ही सुखों से रहित नरकादि लोकों को प्राप्त करेंगे ॥ ३ ॥
अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १० ५१
अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १० ५१
स होवाच पितरं तत कस्मै मां दास्यसीति।
द्वितीयं तृतीयं तꣳहोवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥ ४ ॥
ऐसा विचार करके नचिकेता ने अपने पिता से कहा- हे तात ! आप मुझे किसको दान स्वरूप देंगे ?
यही प्रश्न उसने दो-तीन बार पूछा। तब पिता ने क्रोधित होकर कहा-मैं तुझे मृत्यु (यम) को देता हूँ ॥ ४ ॥
बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किꣳस्विद्यमस्य कर्त्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥
(पिता द्वारा ऐसा कहे जाने पर पुत्र नचिकेता ने विचार किया कि) अनेक शिष्यों तथा पुत्रों में मुझे
प्रथम अर्थात् उत्तम स्थान प्राप्त है और बहुतों के बीच मैं मध्यम श्रेणी का हूँ। मुझे पिताजी द्वारा यमराज को
दिया जा रहा है । यम का ऐसा कौन सा कार्य है, जो मेरे द्वारा सम्पन्न हो सकता है ? ॥ ५ ॥
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥ ६ ॥
क्रोध में अनर्थमूलक वचन कहे जाने से व्यथित हो रहे अपने पिता से नचिकेता ने कहा - हे तात ! आपके
पिता - पितामहादि पूर्वजों ने जैसा आचरण किया है, उस पर विचार करें तथा वर्तमान काल के दूसरे श्रेष्ठ
सदाचारी जैसा आचरण करते हैं, उस पर भी दृष्टिपात करें। मरणधर्मा मनुष्य फसल की भाँति (समय पर) पकता
(जर्जर होकर मृत्यु को प्राप्त होता) है और पुनः (काल क्रमानुसार) उत्पन्न होता है ॥ ६ ॥
वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिर्ब्राह्मणो गृहान्।
तस्यैताꣳ शान्तिं कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७॥
(पुत्र के वचन से सहमत होकर पिता ने नचिकेता की यम के पास भेज दिया । वे बाहर गये थे,
नचिकेता प्रतीक्षारत रहे । लौटने पर यम की पत्नी ने उनसे कहा-) वैश्वानर अग्नि ही ब्राह्मण अतिथि रूप
में घरों में प्रवेश करते हैं। सम्भ्रान्त जन उनका अर्घ्य-पाद्यादि द्वारा सत्कार करते हैं। अतः (अर्घ्य हेतु)
जल प्रदान करें ॥ ७॥
आशाप्रतीक्षे सङ्गतꣳ सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशूꣳश्च सर्वान् ।
एतद्वृङ्क्ते पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥ ८ ॥
जिनके घर में ब्राह्मण-अतिथि भोजन किये बिना निवास करता है, उस मन्दबुद्धि पुरुष की आशा
(अज्ञात इष्टार्थ की प्राप्ति अभिलाषा), प्रतीक्षा (निश्चित इष्टार्थ की प्राप्ति प्रतीक्षा) को, उनके संयोग से
उपलब्ध होने वाले फल को, कूपादि निर्माणजन्य फल को तथा समस्त पुत्र और पशु आदि को (आतिथ्य
सत्कार से रहित) अतिथि नष्ट कर देता है ॥ ८ ॥
तिस्रो रात्रीर्यदवात्सीर्गृहे मेऽनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ९ ॥
(यम का कथन) हे ब्रह्मन् ! आप सम्माननीय अतिथि हैं, अतः आपको नमन है। मेरा कल्याण हो ।
हमारे घर पर (आपने) जो तीन रात तक बिना भोजन किये ही निवास किया है, इसके फलस्वरूप एक-
एक रात्रि के लिए आप हमसे तीन वर माँग लें ॥ ९ ॥
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गौतमो माभि मृत्यो ।
त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥
५२ कठोपनिषद
(नचिकेता ने कहा) हे यमराज! मेरे पिता गौतम पुत्र उद्दालक, मेरे प्रति शान्त संकल्प वाले, प्रसन्न
मन वाले तथा क्रोध रहित हो जाएँ। आपके द्वारा वापस घर भेजे जाने पर मुझे (मेरे पिता) पहचानकर मेरे
साथ पूर्ववत् प्रेमपूर्ण व्यवहार करें, (आपके द्वारा प्रदत्त) तीन वरदानों में से यह प्रथम वर माँगता हूँ ॥१०॥
यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः ।
सुखँरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥ ११ ॥
(हे नचिकेता !) आपको मृत्यु के मुख से मुक्त देखकर हमारे द्वारा प्रेरित अरुणपुत्र उद्दालक पूर्ववत्
ही पहचान लेंगे। (यह हमारा पुत्र नचिकेता है ऐसा मानते हुए) वे दुःख और क्रोध से रहित होकर शेष
रात्रियों में सुखपूर्वक शयन करेंगे ॥ ११ ॥
स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति ।
उभे तीर्त्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥
नचिकेता बोले- हे मृत्युदेव ! स्वर्ग लोक भयकारक नहीं है। वहाँ मृत्युरूप आपका भी भय नहीं
रहता, न वहाँ वृद्धावस्था (संसार की भाँति) डराती है। स्वर्गलोक में मनुष्य भूख-प्यास को पारकर, शोक
से निवृत्त होकर आनन्द प्राप्त करते हैं ॥ १२ ॥
स त्वमग्निँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वँश्रद्दधानाय मह्यम् ।
स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण ॥ १३ ॥
हे यमराज ! आप स्वर्ग के साधनभूत अग्निविद्या को भली-भाँति जानते हैं। अतः मुझ श्रद्धालु को वह
अग्निविद्या भली प्रकार समझाएँ, जिसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त हुए पुरुष अमरत्व को प्राप्त करते हैं। इस
अग्नि विद्या को (मैं) द्वितीय वर के रूप में माँगता हूँ ॥ १३ ॥
[ सूत्र है 'श्रद्धया सत्यमाप्यते'-श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। जैसे आँख से दृश्य तथा कान से शब्द
ग्रहण किये जाते हैं, वैसे ही सत्य को श्रद्धा द्वारा ही ग्रहण किया जा सकता है। इसलिए नचिकेता ने अपनी श्रद्धा
का हवाला देकर विद्यादान माँगा।]
प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निं नचिकेतः प्रजानन् ।
अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतन्निहितं गुहायाम् ॥ १४ ॥
नचिकेता के इस प्रकार कहने पर मृत्युदेव ने कहा - हे नचिकेता ! स्वर्ग प्रदायिनी अग्निविद्या को
विधिपूर्वक जानने वाला मैं उसे विस्तारपूर्वक कहता हूँ, तुम उस विद्या को मुझसे भली प्रकार(एकाग्र मन
से )समझ लो। अनन्त लोक (स्वर्ग लोक) को प्राप्त कराने वाली, संसार की आधार स्वरूपा इस
(अग्नि)विद्या को गुहा में स्थित समझो ॥ १४ ॥
[ गुहा में रखी वस्तु 'गुह्य' अर्थात् बहुत कठिनाई से प्राप्त होने वाली होती है। अन्तःकरण को भी गुहा कहा
गया है। स्वर्ग प्रदायिनी अग्नि विद्या के अन्तःकरण में स्थित होने का संकेत यमाचार्य ने किया है। जिस प्रकार
काष्ठ में लौकिक अग्नि समाहित रहती है, उसी प्रकार अन्तःकरण में स्वर्ग प्रदायिनी ऊर्जा सन्निहित रहती है।]
लोकादिमग्निं तमुवाच तस्मै या इष्टका यावतीर्वा यथा वा।
स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥ १५ ॥
तदनन्तर यमाचार्य ने लोकों की आदिकारण भूत अग्नि विद्या को नचिकेता के समक्ष कहा। जिस
प्रकार की, जितनी इष्टकाओं (ईंटों या इकाइयों) का जिस प्रकार चयन किया जाना है, उसकी सम्पूर्ण
अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १८ ५३
अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र १८ ५३
विधि को समझाया। नचिकेता ने भी जैसा उनसे कहा गया था, ठीक उसी प्रकार यमदेव के समक्ष पुनः
सुना दिया। तब (नचिकेता की ग्राह्य क्षमता से) संतुष्ट होकर यमदेव ने फिर कहा ॥ १५॥
[ वेद में 'इष्टका' शब्द स्थूल ईंटों के अतिरिक्त 'इष्ट' वस्तु के निर्माण में प्रयुक्त सूक्ष्म इकाइयों के लिए भी
प्रयुक्त होता है। यहाँ स्थूल ईंटों के स्थान पर अग्नि की सूक्ष्म इकाइयों का भाव ही ग्राह्य है। लौकिक अग्नि में भी
विभिन्न इकाइयाँ शामिल होती हैं। इनमें ताप (कैलोरी), प्रकाश (ल्यूमेन) तथा रंग (कलर स्पेक्ट्रम) आदि
सबको पता है। स्थूल अग्नि के अनेक अन्य गुण भी उसकी इकाइयाँ कहे जा सकते हैं। यहाँ स्वर्ग प्रदायिनी दिव्य
अग्नि को इकाइयों तथा उनके चयन को बात कही गयी है। गुह्य अन्तःकरण में स्थित ऊर्जा की इकाइयाँ बीज रूप
में स्थित दिव्य प्रवृत्तियाँ कही जा सकती हैं। उन्हीं के जागरण एवं संयोजन से व्यक्ति, विद्वान्, कलाकार, वैज्ञानिक
आदि स्तरों तक पहुँच जाता है। यमदेव ने नचिकेता को स्वर्ग तक पहुँचाने वाली दिव्य अग्नि-ऊर्जा के लिए
आवश्यक सूक्ष्म इकाइयों तथा उनके संयोजन का रहस्य बतलाया है । ]
तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि भूयः ।
तवैव नाम्ना भवितायमग्निःसृंकां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥ १६ ॥
महात्मा यमाचार्य ने प्रसन्न होकर नचिकेता से कहा- आज (माँगे गये तीन वरों के अतिरिक्त) एक
वर और भी देता हूँ। मेरे द्वारा कही गयी यह अग्नि विद्या अब तुम्हारे नाम से ही प्रख्यात होगी। तुम इस
अनेक रूपों वाली शब्दरूपिणी (ज्ञान तत्त्वमयी) माला को स्वीकार करो ॥ १६ ॥
[ नचिकेता का अर्थ होता है 'न चिकेतते विचेष्टते' अर्थात् जो प्रपंच से अलिप्त है। अलिप्त व्यक्ति ही दिव्य
अनुशासन को धारण कर सकता है। विषयों में लिप्त व्यक्ति अपनी प्रतिभा या शक्तियों को सांसारिक कामनाओं
के लिए ही लगाता रहता है, दिव्य अनुशासन पालन में लगाने के लिए उन्हें सुरक्षित नहीं रख पाता। नचिकेता ने
पिता को लौकिक आकांक्षाओं या चतुराइयों से अलिप्त रहकर स्वयं को उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित किया,
इसी आधार पर उसे 'यम' के निकट पहुँचने तथा उनके अनुदान पाने का लाभ मिल सका। यम दिव्य अनुशासन
के देवता हैं। ऋग्वेद १०.१३५ में उन्होंने प्रश्न किया है कि नचिकेता किस रथ (कैरियर) के माध्यम से यहाँ
पहुँचा ? प्रपंच से अलिप्त रहकर दिव्य अनुशासन के लिए समर्पण की वृत्ति ही वह आधार है, जिससे नचिकेता को
दिव्य अग्नि विद्या प्राप्त हुई। इसलिए उस विद्या को 'नाचिकेताग्नि' (लिप्त न होने वाले की विद्या) नाम दिया जाना
ही उचित है ।]
त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धिं त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू ।
ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १७ ॥
त्रिविध 'नाचिकेत' विद्या का ज्ञाता तीन संधियों को प्राप्त होकर, तीन कर्म सम्पन्न करके जन्म-मृत्यु
से पार हो जाता है। वह ब्रह्म यज्ञरूप स्तुत्य देव का साक्षात्कार करके निश्चित रूप से अत्यंत (परम) शान्ति
को प्राप्त करता है ॥ १७ ॥
[ नाचिकेत विद्या को त्रिविध कहा गया है, आचार्यों ने इसे प्राप्ति, अध्ययन तथा अनुष्ठान तीन विधियों से
युक्त कहा है। साधक को इन तीनों के साथ आत्म चेतना की संधि करनी पड़ती है अथवा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण
शरीरों को इस विद्या से अनुप्राणित करना पड़ता है। इस प्रक्रिया को त्रिसंधि प्राप्ति कहा जा सकता है। कुछ
आचार्यों ने माता-पिता एवं गुरु से युक्त होने को त्रिसंधि कहा है। तीन कर्म सृजन, पालन, समाहरण अथवा
यज्ञीय संदर्भ में देव पूजन, संगतिकरण एवं दान कहे जाते हैं। इन सबको दिव्याग्नि विद्या के अनुरूप ढालते हुए
साधक जन्म-मरण चक्र से ऊपर उठ जाता है ।]
त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वाँश्चिनुते नाचिकेतम् ।
स मृत्युपाशान्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥
५४ कठोपनिषद्
जो त्रिणाचिकेत विद्या के ज्ञाता इस अग्नि के इन तीनों स्वरूपों को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन
करते हैं, वे शरीर त्याग से पूर्व ही मृत्यु के पाशों को काटकर स्वर्ग लोक का आनन्द प्राप्त करते हैं ॥१८ ॥
एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥
हे नचिकेता ! यह स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि विद्या है, तुमने द्वितीय वर के द्वारा जिसका वरण
किया है । मनुष्य (आज से ) इस अग्नि को तुम्हारे ही नाम से जानेंगे और प्रयोग करेंगे। हे नचिकेता !
(अब तुम स्वअभिलषित) तीसरे वर को माँग लो ॥ १९ ॥
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
(नचिकेता ने कहा-) मनुष्य के मृत हो जाने पर आत्मा का अस्तित्व रहता है, ऐसा ज्ञानियों का
कथन है और अन्य कुछ की मान्यता यह है कि मृत्यु के पश्चात् अस्तित्व नहीं रहता । आपके उपदेश से
मैं इस संदेह से मुक्त होकर आत्म-रहस्य को भली प्रकार जान सकूँ। वरों में यही मेरा तीसरा वर है ॥ २० ॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥
(यम ने कहा-) हे नचिकेता ! पूर्व काल में देवताओं ने भी इस आत्मा के विषय में संशय किया
था । निश्चित ही यह आत्मतत्त्व नामक धर्म (विषय) सरलतापूर्वक जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेता ! तुम
मुझसे कोई अन्य वर माँग लो, इस वर से हमें मुक्त कर दो ॥ २१ ॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
(नचिकेता ने कहा-) हे मृत्युदेव ! इस आत्मतत्त्व के विषय में देवताओं को भी संशय हुआ था।
आपका भी यही कथन है कि यह विषय सहजता से जानने योग्य नहीं है । विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य
होने से इसे जाना नहीं जा सकता, अतः इस आत्मज्ञान का उपदेष्टा भी आपके समान दूसरा (मुझे) नहीं
मिल सकता तथा न इसके समकक्ष दूसरा कोई वर ही है (जो मैं आप से माँग लूँ) ॥ २२ ॥
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥
(यमाचार्य उसे प्रलोभित करते हुए बोले-) हे नचिकेता ! तुम सौ वर्ष पर्यन्त जीवन धारण करने
वाले पुत्र और पौत्रों को, बहुत से (गौ आदि) पशुओं को तथा हाथी, स्वर्ण और अश्वों को (हमसे) माँग
लो । पृथ्वी के बड़े विस्तार वाले साम्राज्य की माँग कर लो । स्वयं भी जितने वर्षों तक जीवनयापन की
आकांक्षा हो, जीवित बने रहो ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
इस वर की तरह यदि कोई अन्य वर तुम्हारी दृष्टि में हो, तो उसे माँग लो । धन-सम्पदा तथा अनन्त
काल के निमित्त उपयोगी सुख-साधनों (चिरस्थायी आजीविका) को माँग लो । हे नचिकेता ! तुम इस
अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र २९ ५५
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विस्तृत भूमण्डल पर वृद्धि प्राप्त करो, हम तुमको कामनाओं (भोगों) का इच्छानुकूल उपभोग करने
वाला बना देते हैं ॥ २४ ॥
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
हे नचिकेता ! मर्त्यलोक में जो-जो भोग्य पदार्थ दुर्लभ हैं, उन सभी को तुम स्वेच्छा पूर्वक माँग लो।
रथ और (कर्ण प्रिय) वाद्य विशेषों से युक्त इन स्वर्ग की अप्सराओं को प्राप्त कर लो, मनुष्यों द्वारा इस
प्रकार की स्त्रियाँ प्राप्त करना सम्भव नहीं है । हमारे द्वारा प्रदत्त इन रमणियों से आप अपनी सेवा-शुश्रूषा
कराएँ; किन्तु हे नचिकेता ! मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है ? यह हमसे न पूछें ॥ २५ ॥
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥
(नचिकेता ने कहा) हे यमराज! जिन साधनों का आपने वर्णन किया है, वे 'कल रहेंगे भी या नहीं',
इसमें पूरा संदेह है । साथ ही ये मनुष्य की इन्द्रिय-सामर्थ्य को भी क्षीण कर डालते हैं । जिसे आप दीर्घ
जीवन के रूप में हमें देना चाहते हैं, वह सम्पूर्ण जीवन भी (भोगों के लिए) कम ही है। (अतः) रथादि
वाहन एवं (अप्सराओं के) नाच-गान आपके ही पास रहें अर्थात् मुझे इनकी कोई कामना नहीं ॥ २६ ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥
मनुष्य को धन से संतुष्ट नहीं किया जा सकता । जहाँ हमें आपके दुर्लभ दर्शन-लाभ की प्राप्ति हो
गई, वहाँ धन तो हम (अपने पुरुषार्थ से) उपलब्ध कर ही लेंगे। जब तक आप यमपुरी का शासन करते
रहेंगे, तब तक हम जीवित ही रहेंगे, पर हमारा प्रार्थनीय वर तो वह आत्मज्ञान से सम्बन्धित ही है॥ २७ ॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यःक्वधःस्थःप्रजानन्।
अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
हे यमराज ! वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त होने वाला ऐसा कौन विवेकशील मनुष्य होगा, जो आप जैसे
जरा-मरण रहित देवताओं के दुर्लभ सान्निध्य को प्राप्त करके भी अप्सराओं के सौन्दर्य, प्रेम तथा आमोद-
प्रमोदजन्य क्षणभंगुर सुखों की अभिलाषा करेगा ? ॥ २८ ॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥
हे मृत्युदेव! जिस आत्मतत्त्व के विषय में देवता भी सन्देह करते हैं कि आत्मा का अस्तित्व है या
नहीं है, उसके विषय में आपका जो भी सुनिश्चित मन्तव्य हो, उसे हमें बताएँ । यह जो अत्यन्त गूढ़ तथा
मेरे हृदय पटल पर स्थित वर है, इसके अतिरिक्त अन्य किसी वर की नचिकेता को कामना नहीं ॥ २९ ॥
[ नचिकेता-अलिप्त व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति ही इस प्रकार के प्रलोभनों को नकार सकता है । इसी आत्म-
निष्ठा के आधार पर वह आत्मतत्त्व की प्राप्ति का अधिकारी बनता है ।]
॥ द्वितीया वल्ली ॥
५६ कठोपनिषद्
॥ द्वितीया वल्ली ॥
अन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयस्ते उभे नानार्थे पुरुषँ सिनीतः।
तयोः श्रेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥ १ ॥
यमराज ने नचिकेता से कहा- श्रेय (कल्याण) का मार्ग और प्रेय (सांसारिक भोग्य पदार्थों) का
मार्ग दोनों पृथक्-पृथक् हैं। भिन्न-भिन्न परिणाम देने वाले दोनों श्रेय और प्रेय मार्ग मनुष्य को अपनी-
अपनी ओर आकर्षित करते हैं। उन दोनों में से श्रेय (कल्याण) मार्ग को स्वीकार करने वाले साधकों को
श्रेष्ठ फल प्राप्त होते हैं और जो सांसारिक भोगों से युक्त प्रेय मार्ग के पथिक हैं, वे मानव जीवन के महान्
उद्देश्य से भटककर पतन-पराभव को प्राप्त करते हैं ॥ १ ॥
श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ संपरीत्य विविनक्ति धीरः ।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद्वृणीते ॥ २ ॥
श्रेय और प्रेय दोनों ही मार्ग मनुष्य के समक्ष उपस्थित होते हैं। बुद्धिमान् मनुष्य उन दोनों को भली
प्रकार विचार कर उन्हें पृथक्-पृथक् रूप से जान लेते हैं। विवेकशील साधक निश्चित रूप से प्रिय लगने
वाले भोग-साधनों की अपेक्षा कल्याण पथ को श्रेयस्कर मानकर उसे ही वरण करते हैं। मन्दमति
अविवेकीजन योग (अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त वस्तु के संरक्षण) की अभिलाषा से
बाह्याकर्षणों के वशीभूत होकर प्रेय-पथ को ही स्वीकार करते हैं ॥ २ ॥
स त्वं प्रियान्प्रियरूपाँश्च कामानभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ।
नैतां सृङ्कां वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥ ३ ॥
हे नचिकेता ! सांसारिक भोग-विलास के नश्वर साधनों को तुमने विचारपूर्वक त्याग दिया है। भौतिक
जगत् के जिन मायावी प्रलोभनों में अज्ञानी पुरुष जकड़े रहते हैं, तुम उन बन्धनों में नहीं पड़े ॥ ३ ॥
दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्येति ज्ञाता।
विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥
जो (श्रेय और प्रेय मार्ग) विद्या और अविद्या के रूप में जाने गये हैं, वे दोनों परस्पर बिल्कुल
विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाले हैं। हे नचिकेता ! तुमको हम श्रेय (आध्यात्मिक) मार्ग
का साधक मानते हैं, क्योंकि तुम्हें (चकाचौंध पैदा करने वाले) भोग-विलास के साधनों ने
प्रलोभित नहीं किया ॥ ४ ॥
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितं मन्यमानाः ।
दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥
अविद्या-अज्ञानान्धकार के मध्य में स्थित होते हुए भी स्वयं को विद्वानों और विशेषज्ञों की श्रेणी का
मानने वाले मूढ़जन, अनेक प्रकार के कुटिल मार्गों का सहारा लेते हुए (ठीक उसी प्रकार) ठोकरें खाते
फिरते हैं, जैसे अन्धों के द्वारा ले जाये जाने वाले अन्धे ॥ ५ ॥
न सांपरायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् ।
अयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥ ६ ॥
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र १२ ५७
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र १२ ५७
धन के व्यामोह से जकड़े हुए विवेकहीन, प्रमादी मनुष्य के अन्तरंग में पारलौकिक विचारधारा का
अभ्युदय नहीं होता; क्योंकि वह जीवन के अस्तित्व को प्रत्यक्षवाद पर ही आधारित मानता है । आध्यात्मिक
जीवन के अस्तित्व को नकारने वाले शरीराभिमानी मनुष्य, बार-बार जन्म-मरण के बन्धन में घूमता हुआ
हमारे (यमराज के) वशीभूत होकर रहता है ॥ ६ ॥
श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः।
आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः ॥ ७ ॥
जन साधारण को आत्म-तत्त्वज्ञान के संबंध में जानने का सुअवसर तक नहीं मिलता, अगर संयोग से
ऐसा अवसर मिला भी, तो अधिकांश ज्ञान-प्रकाश के अभाव में अपने जीवन को तदनुरूप ढालने में सक्षम
नहीं होते । उस तत्त्वज्ञान का भली प्रकार प्रतिपादन करने वाले भी अतिदुर्लभ ही हैं । उस ज्ञान को ग्रहण
करने वाला भी कोई कुशल जिज्ञासु ही सुपात्र होता है । विशेषज्ञ आचार्य द्वारा तत्त्वज्ञान से अनुप्राणित
तत्त्ववेत्ता भी अति दुर्लभ ही होता है ॥ ७ ॥
न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः ।
अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र नास्त्यणीयान्ह्यतर्क्यमणूप्रमाणात् ॥ ८ ॥
अनाधिकारी मनुष्य (जिसने इसका भली प्रकार साक्षात्कार नहीं किया) द्वारा कहा गया यह आत्मतत्त्व
सहजता से जानने योग्य नहीं। किसी तत्त्ववेत्ता आचार्य द्वारा न समझाये जाने पर भी इस सम्बन्ध में कोई
प्रगति नहीं हो पाती। यह विषय बड़ा गूढ़ है, अतएव वह तर्क-वितर्क के दायरे में सीमाबद्ध नहीं है ॥ ८ ॥
नैषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।
यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृङ्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ॥ ९ ॥
हे प्रिय नचिकेता ! श्रेष्ठ आत्मज्ञान के निमित्त शुष्क तर्क-वितर्क की ऊहापोह से भिन्न आपकी बुद्धि
प्रखर है, ऐसी मेधा शक्ति को तर्क द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता । हे नचिकेता ! आप सचमुच ही यथार्थ
सत्य के अन्वेषक हैं, (हमारी अन्तरंग इच्छा यही है कि) आप जैसे जिज्ञासु शिष्य ही हमें प्राप्त हों ॥ ९ ॥
जानाम्यहं शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्रुवैः प्राप्यते हि ध्रुवं तत् ।
ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्निरनित्यैर्द्रव्यैः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥ १० ॥
मैं जानता हूँ कि यह कर्मफलजन्य सम्पदा नाशवान् है, नश्वर साधनों के द्वारा उस नित्य (आत्मतत्त्व)
को प्राप्त किया जाना शक्य नहीं । मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि का चयन किया गया है । उन्हीं अनित्य पदार्थों
अथवा साधनों द्वारा मैंने अभिलषित नित्य आत्मतत्त्व (यम-पद) को प्राप्त किया है ॥ १० ॥
कामस्याप्तिं जगतः प्रतिष्ठां क्रतोरनन्त्यमभयस्य पारम् ।
स्तोममहदुरुगायं प्रतिष्ठां दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥ ११ ॥
हे नचिकेता ! आपने भोग्य साधनों से भरपूर यज्ञ के चिरस्थायी फल से युक्त, असीम निर्भयता
से युक्त, स्तुत्य और प्रशंसनीय प्रतिष्ठा से सम्पन्न स्वर्गलोक को धैर्यपूर्वक छोड़ दिया है। यह आपका
अति बुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय है ॥ ११ ॥
तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्।
अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥ १२ ॥
५८ कठोपनिषद्
विशिष्ट तपः साधना द्वारा देखे जाने योग्य, सांसारिक विषय-वासनाओं से परे अत्यन्त गुप्त
स्थान में स्थित, बुद्धिरूपी गुफा में निहित, गहन स्थल में विद्यमान अर्थात् अन्तःकरण में विराजमान
सनातन उस दिव्य गुण सम्पन्न परमात्मा को अध्यात्मयोग के द्वारा जानकर बुद्धिमान् मनुष्य हर्ष और
शोक से मुक्त हो जाता है ॥ १२ ॥
एतच्छ्रुत्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य।
स मोदते मोदनीयँ हि लब्ध्वा विवृतँ सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥ १३॥
हे नचिकेता ! तुम्हारे जैसे साधक इस आत्मिक ज्ञान को सुनकर, इसे भली प्रकार ग्रहण कर तथा
विवेकपूर्वक इस पर चिंतन करके धारण करने योग्य इस सूक्ष्म आत्मतत्त्व को समुचित रूप से जान लेते हैं।
वे इस आनन्दस्वरूप आत्मा को पाकर चिरन्तन आनन्द में लीन हो जाते हैं। तुम्हारे निमित्त तो ब्रह्म प्राप्ति
का द्वार सदैव खुला हुआ है, ऐसा मेरा मन्तव्य है ॥ १३॥
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥ १४ ॥
(नचिकेता का कथन-) हे यमराज ! जिस आत्मतत्त्व को आप यज्ञादि धर्मकृत्यों तथा शास्त्र-निषिद्ध
कर्मों से पृथक् मानते हैं, जो कार्य-कारणरूप जगत् एवं भूत, भविष्यत् (तथा वर्तमानकाल) से भी भिन्न
है, उसी परम आत्मतत्त्व के सम्बन्ध में हमें बताएँ ॥ १४॥
सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५॥
(यम ने कहा-) सभी वेद जिस ब्राह्मी स्थिति (परमपद) का बार-बार उल्लेख करते हैं।
सभी तपः साधनाएँ जिस स्थिति का अनुभव कराती हैं, जिसे प्राप्त करने की अभिलाषा से
साधकगण ब्रह्मचर्यादि व्रतों का पालन करते हैं। हे नचिकेता ! मैं तुमसे उसी स्थिति का संक्षेप में
वर्णन करता हूँ। "ॐ" ही वह परमपद है ॥ १५ ॥
एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतद्धयेवाक्षरं परम्।
एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥ १६ ॥
यह ॐ ही अक्षर ब्रह्म है। यही ॐ परब्रह्म अर्थात् सर्वोत्तम है। इसी अक्षर को भली प्रकार जानकर
जो साधक जिस अभीष्ट की कामना करते हैं, उन्हें उसकी प्राप्ति होती है ॥ १६॥
एतदालम्बनँ श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम्।
एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७॥
यह प्रणव (ओङ्कार) ही आत्म साक्षात्कार का श्रेष्ठ अवलम्बन है। यही परमात्मा के ध्यान का
आधार होने से सर्वश्रेष्ठ है। इस ब्रह्मप्राप्ति के आश्रय को जानकर साधकगण ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं॥
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ १८ ॥
यह नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा न तो उत्पन्न होता है और न मृत्यु को ही प्राप्त होता है। यह आत्मा न तो
किसी अन्य से उत्पन्न हुआ है और न इससे ही कोई उत्पन्न हुआ है। यह आत्मा अजन्मा, नित्य, शाश्वत
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९
अध्याय १ वल्ली २ मन्त्र २४ ५९
और क्षय तथा वृद्धि से रहित है। शरीर के नष्ट होने पर भी यह आत्मा विनष्ट नहीं होता ॥ १८॥
हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥ १९ ॥
यदि हनन करने वाला व्यक्ति अपने को मारने में सक्षम मानता है और हनन किया हुआ व्यक्ति स्वयं
को मारा हुआ मानता है, तो वे दोनों ही (आत्मतत्व के सम्बन्ध में) अनभिज्ञ हैं; क्योंकि यह आत्मा न तो
किसी को विनष्ट ही करता है और न किसी के द्वारा इसे मारा जाना शक्य है ॥ १९॥
अणोरणीयान्महतो महीयानात्मास्य जन्तोर्निहितो गुहायाम्।
तमक्रतुः पश्यति वीतशोको धातुप्रसादान्महिमानमात्मनः ॥ २० ॥
परमात्म चेतना इस जीवात्मा की हृदयरूपी गुफा में अणु से भी अतिसूक्ष्म और महान् से भी अति
महान् रूप में विराजमान है। निष्काम कर्म करने वाले तथा शोकरहित कोई विरले साधक ही, परमात्मा की
अनुकम्पा से ही उसे देख पाते हैं॥ २० ॥
आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः ।
कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥ २१ ॥
एक स्थान पर विद्यमान होते हुए भी वह परम चेतना दूर चली जाती है और शयन करते हुए भी सभी
जगह गमन करती है। हर्षयुक्त और हर्षरहित उस देव को मेरे अतिरिक्त अन्य कौन भली प्रकार जानने में
सक्षम हो सकता है ॥ २१ ॥
अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥ २२ ॥
जो शरीरों में शरीररहित तथा स्थिर न रहने वालों (अनित्यों) के मध्य नित्यस्वरूप में स्थित है। उस
महान् सर्वव्यापक आत्मतत्त्व को जानकर बुद्धिमान् मनुष्य शोकातुर नहीं होते ॥ २२ ॥
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन।
यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्॥ २३ ॥
परमात्म तत्त्व को मात्र धर्मोपदेश सुनकर, स्तुति-वन्दना के रूप में उसकी चर्चा करके तथा शास्त्रों
का अध्ययन करके नहीं जाना जा सकता। जिस पर उसकी कृपा होती है, वही उसे जान पाता है। वह
परमात्मतत्त्व अधिकारी साधक के समक्ष अपने वास्तविक स्वरूप को स्वयं ही अभिव्यक्त कर देता है॥
[ जड़ पदार्थपरक ज्ञान सुनकर या पुस्तक से पढ़कर प्राप्त किया जा सकता है। आत्म तत्त्व परक ज्ञान-चेतन
होता है. वह सत्यात्र का स्वयं वरण करता है। वह कैसे साधक का वरण करता है, यह तथ्य अगले मंत्र में स्पष्ट
किया गया है।]
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः ।
नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४॥
जो मनुष्य दुष्कर्मों के पाप से निवृत्त नहीं है, जिनकी इन्द्रियाँ स्वयं के नियन्त्रण में नहीं हैं तथा
जिनके मन पूरी तरह से सांसारिकता से निवृत्त नहीं हैं, ऐसे व्यक्ति प्रकृष्ट ज्ञानवान् होते हुए भी परिष्कृत
जीवन के अभाव में इस आत्मतत्त्व को जानने में समर्थ नहीं होते ॥ २४ ॥