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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 54

५४ कठोपनिषद्
जो त्रिणाचिकेत विद्या के ज्ञाता इस अग्नि के इन तीनों स्वरूपों को जानकर नाचिकेत अग्नि का चयन
करते हैं, वे शरीर त्याग से पूर्व ही मृत्यु के पाशों को काटकर स्वर्ग लोक का आनन्द प्राप्त करते हैं ॥१८ ॥
एष तेऽग्निर्नाचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण ।
एतमग्निं तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥ १९ ॥
हे नचिकेता ! यह स्वर्ग प्रदान करने वाली अग्नि विद्या है, तुमने द्वितीय वर के द्वारा जिसका वरण
किया है । मनुष्य (आज से ) इस अग्नि को तुम्हारे ही नाम से जानेंगे और प्रयोग करेंगे। हे नचिकेता !
(अब तुम स्वअभिलषित) तीसरे वर को माँग लो ॥ १९ ॥
येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥ २०॥
(नचिकेता ने कहा-) मनुष्य के मृत हो जाने पर आत्मा का अस्तित्व रहता है, ऐसा ज्ञानियों का
कथन है और अन्य कुछ की मान्यता यह है कि मृत्यु के पश्चात् अस्तित्व नहीं रहता । आपके उपदेश से
मैं इस संदेह से मुक्त होकर आत्म-रहस्य को भली प्रकार जान सकूँ। वरों में यही मेरा तीसरा वर है ॥ २० ॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः।
अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥ २१ ॥
(यम ने कहा-) हे नचिकेता ! पूर्व काल में देवताओं ने भी इस आत्मा के विषय में संशय किया
था । निश्चित ही यह आत्मतत्त्व नामक धर्म (विषय) सरलतापूर्वक जानने योग्य नहीं है । हे नचिकेता ! तुम
मुझसे कोई अन्य वर माँग लो, इस वर से हमें मुक्त कर दो ॥ २१ ॥
देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुविज्ञेयमात्थ ।
वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥ २२ ॥
(नचिकेता ने कहा-) हे मृत्युदेव ! इस आत्मतत्त्व के विषय में देवताओं को भी संशय हुआ था।
आपका भी यही कथन है कि यह विषय सहजता से जानने योग्य नहीं है । विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य
होने से इसे जाना नहीं जा सकता, अतः इस आत्मज्ञान का उपदेष्टा भी आपके समान दूसरा (मुझे) नहीं
मिल सकता तथा न इसके समकक्ष दूसरा कोई वर ही है (जो मैं आप से माँग लूँ) ॥ २२ ॥
शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् ।
भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥ २३ ॥
(यमाचार्य उसे प्रलोभित करते हुए बोले-) हे नचिकेता ! तुम सौ वर्ष पर्यन्त जीवन धारण करने
वाले पुत्र और पौत्रों को, बहुत से (गौ आदि) पशुओं को तथा हाथी, स्वर्ण और अश्वों को (हमसे) माँग
लो । पृथ्वी के बड़े विस्तार वाले साम्राज्य की माँग कर लो । स्वयं भी जितने वर्षों तक जीवनयापन की
आकांक्षा हो, जीवित बने रहो ॥ २३ ॥
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥
इस वर की तरह यदि कोई अन्य वर तुम्हारी दृष्टि में हो, तो उसे माँग लो । धन-सम्पदा तथा अनन्त
काल के निमित्त उपयोगी सुख-साधनों (चिरस्थायी आजीविका) को माँग लो । हे नचिकेता ! तुम इस