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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

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पृष्ठ 55

अध्याय १ वल्ली १ मन्त्र २९ ५५
विस्तृत भूमण्डल पर वृद्धि प्राप्त करो, हम तुमको कामनाओं (भोगों) का इच्छानुकूल उपभोग करने
वाला बना देते हैं ॥ २४ ॥
ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामाँश्छन्दतः प्रार्थयस्व ।
इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः ।
आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥ २५ ॥
हे नचिकेता ! मर्त्यलोक में जो-जो भोग्य पदार्थ दुर्लभ हैं, उन सभी को तुम स्वेच्छा पूर्वक माँग लो।
रथ और (कर्ण प्रिय) वाद्य विशेषों से युक्त इन स्वर्ग की अप्सराओं को प्राप्त कर लो, मनुष्यों द्वारा इस
प्रकार की स्त्रियाँ प्राप्त करना सम्भव नहीं है । हमारे द्वारा प्रदत्त इन रमणियों से आप अपनी सेवा-शुश्रूषा
कराएँ; किन्तु हे नचिकेता ! मृत्यु के पश्चात् आत्मा का क्या होता है ? यह हमसे न पूछें ॥ २५ ॥
श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः ।
अपि सर्वं जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥
(नचिकेता ने कहा) हे यमराज! जिन साधनों का आपने वर्णन किया है, वे 'कल रहेंगे भी या नहीं',
इसमें पूरा संदेह है । साथ ही ये मनुष्य की इन्द्रिय-सामर्थ्य को भी क्षीण कर डालते हैं । जिसे आप दीर्घ
जीवन के रूप में हमें देना चाहते हैं, वह सम्पूर्ण जीवन भी (भोगों के लिए) कम ही है। (अतः) रथादि
वाहन एवं (अप्सराओं के) नाच-गान आपके ही पास रहें अर्थात् मुझे इनकी कोई कामना नहीं ॥ २६ ॥
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥
मनुष्य को धन से संतुष्ट नहीं किया जा सकता । जहाँ हमें आपके दुर्लभ दर्शन-लाभ की प्राप्ति हो
गई, वहाँ धन तो हम (अपने पुरुषार्थ से) उपलब्ध कर ही लेंगे। जब तक आप यमपुरी का शासन करते
रहेंगे, तब तक हम जीवित ही रहेंगे, पर हमारा प्रार्थनीय वर तो वह आत्मज्ञान से सम्बन्धित ही है॥ २७ ॥
अजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यःक्वधःस्थःप्रजानन्।
अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदानतिदीर्घे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥
हे यमराज ! वृद्ध होकर मृत्यु को प्राप्त होने वाला ऐसा कौन विवेकशील मनुष्य होगा, जो आप जैसे
जरा-मरण रहित देवताओं के दुर्लभ सान्निध्य को प्राप्त करके भी अप्सराओं के सौन्दर्य, प्रेम तथा आमोद-
प्रमोदजन्य क्षणभंगुर सुखों की अभिलाषा करेगा ? ॥ २८ ॥
यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् ।
योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥ २९ ॥
हे मृत्युदेव! जिस आत्मतत्त्व के विषय में देवता भी सन्देह करते हैं कि आत्मा का अस्तित्व है या
नहीं है, उसके विषय में आपका जो भी सुनिश्चित मन्तव्य हो, उसे हमें बताएँ । यह जो अत्यन्त गूढ़ तथा
मेरे हृदय पटल पर स्थित वर है, इसके अतिरिक्त अन्य किसी वर की नचिकेता को कामना नहीं ॥ २९ ॥
[ नचिकेता-अलिप्त व्यक्तित्व सम्पन्न व्यक्ति ही इस प्रकार के प्रलोभनों को नकार सकता है । इसी आत्म-
निष्ठा के आधार पर वह आत्मतत्त्व की प्राप्ति का अधिकारी बनता है ।]