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सर्वकोश
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

पृष्ठ 44, कुल 505 में से

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पृष्ठ 44

४४ ऐतरेयापानषद
(परमात्मा की आज्ञा पाकर) अग्निदेव वाणी का रूप धारण कर मुख में प्रविष्ट हुए, वायुदेव प्राण
बनकर नासिका के छिद्रों में प्रविष्ट हुए, सूर्यदेव चक्षु बनकर नेत्रों के गोलकों में प्रविष्ट हुए, दिशाएँ
श्रोत्रेन्द्रिय बनकर कर्ण छिद्रों में प्रविष्ट हुईं, वनस्पतियाँ रोम बनकर त्वचा में प्रविष्ट हुईं, चन्द्रदेव मन बनकर
हृदयक्षेत्र में प्रविष्ट हुए, मृत्युदेव अपान बनकर नाभि प्रदेश में प्रविष्ट हुए और आपः देवता वीर्य बनकर
उपस्थ क्षेत्र में प्रविष्ट हुए ॥ ४ ॥
[यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवता विराट् पुरुष के जिन अंगों से जिस माध्यम से प्रकट हुए थे,
उसी क्रम से उन्होंने मनुष्य के उन्हीं अंगों में स्थान बनाया।]
तमशनायापिपासे अब्रूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वां
देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यौ करोमीति। तस्माद्यस्यै कस्यै च देवतायै हविर्गृह्यते
भागिन्यावेवास्यामशनायापिपासे भवतः ॥ ५॥
(तब) क्षुधा और पिपासा ने परमेश्वर से कहा- (आपने सब देवताओं को तो स्थान दे दिया) हमारे
लिए भी आश्रय स्थल की व्यवस्था करें। परमेश्वर ने कहा- मैं तुम दोनों को इन देवताओं में ही भाग प्रदान
करता हूँ। जिस किसी देवता को कोई आहार (हवि) प्रदान किया जायेगा। उसमें तुम दोनों का भी हिस्सा
होगा, (तभी से इन्द्रियों द्वारा आहार ग्रहण करने पर भूख और प्यास को भी परितृप्ति मिलती है।) ॥ ५ ॥
[ऋषि स्पष्ट करते हैं कि भूख-प्यास का कोई स्वतंत्र स्थान नहीं है, वे विभिन्न अंग-अवयवों में संव्यास
देवशक्तियों के साथ संयुक्त हैं। शरीर विज्ञान के वर्तमान शोध-निष्कर्ष भी यही कहते हैं। भूख-प्यास शरीर के
प्रत्येक कोश में होती है। जब तक पेट में अन्न-जल का भण्डार होता है, तब तक भूख-प्यास की अनुभूति नहीं
होती। रोग की स्थिति में 'ड्रिप' द्वारा जल एवं पोषण पहुँचाने से भूख-प्यास शान्त हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि
भूख-प्यास प्रत्येक जीवित कोश के साथ संयुक्त है।]
॥ तृतीयः खण्डः ॥
स ईक्षतेमे नु लोकाश्च लोकपालाश्चान्नमेभ्यः सृजा इति ॥ १ ॥
इसके अनन्तर परमात्मा ने विचार किया कि समस्त लोकों और लोकपालों की सृष्टि तो सम्पन्न हो
चुकी, अब इनके लिए अन्न की भी रचना करनी चाहिए ॥ १ ॥
सोऽपोऽभ्यतपत् ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत। या वै सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥
फिर परमेश्वर ने अप् प्रवाह को अभितप्त किया। उस तपाये हुए (अमूर्त अप्) से जो मूर्त स्वरूप बना,
वह मूर्त रूप ही वस्तुतः अन्न है ॥ २ ॥
[ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इस नयी सृष्टि में भी 'अप्' प्रवाह को ही तप्त अथवा परिपक्व किया गया।]
तदेतत्सृष्टं पराङत्यजिघांसत् तद्वाचा जिघृक्षत्तन्नाशक्नोद्वाचा ग्रहीतुम्। स
यद्धैनद्वाचाऽग्रहैष्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ३ ॥
उस सृष्ट (रचे हुए) अन्न ने उन (लोकपालों) की ओर से परे (पराङ्मुख होकर) भागने की चेष्टा
की, तब उस पुरुष ने उसे (अन्न को) वाणी के द्वारा ग्रहण करना चाहा; किन्तु वह उसे वाणी द्वारा ग्रहण
करने में असमर्थ रहा। यदि वह. पूर्ण पुरुष अन्न को वाणी से ग्रहण कर लेता, तो अब (इस समय या इस
युग में) भी मनुष्य वाणी से अन्न को बोलकर ही तृप्ति प्राप्त कर लिया करते ॥ ३ ॥