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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०७
आरोग्यता
शास्त्रकारों ने बतलाया है:—
शरीरे सर्वधातूनां सारं वीर्य प्रकीर्तितम् ।
तदेव चौजस्तेजश्च बलं कांतिःपराक्रमः ॥
यस्मिञ्छुद्धे शरीरस्य गतिः शुद्धा भवेत्तदा ।
ब्रह्मचर्यदशायां हि क्षीणे क्षीण पराक्रमः ॥
धैर्य तेजो विरहितः रोगग्रस्त कलेवरः ।
सारहीनं यथा वस्तु तथैव स नरः स्मृतः ॥
ऊपर लिखे श्लोको का अर्थ यह है कि मनुष्य के शरीर में सब
धातुओ का सार वीर्य ही माना जाता है। वही वीर्य तेज, वल,
कान्ति, पराक्रम और पुरुषत्व रूप से शरीर में विराजमान रहता
है, जिसके शुद्ध रहने से शरीर की सब प्रकार से शुद्धि रहती है,
ब्रह्मचर्य अवस्था में वीर्य के क्षीण होने से मनुष्य का शरीर परा-
क्रम, तेज, बल, धैर्य और पुरुषार्थ से हीन होकर अनेक रोगों
का घर बन जाता है, जैसे सारहीन पदार्थ रद्दी ( बेकाम ) हो
जाता है वैसे ही वीर्य से हीन पुरुष का पुरुषार्थ है। इसीलिये
महात्माओं ने मनुष्य के हित के लिये कहा है कि:—
आहारस्य परं धाम वीर्य तद्रक्ष्यमात्मनः ।
क्षयोयस्य बहून् रोगान्मरणं च नियच्छति ॥

३०८ आनन्द मन्दिर
इसका अर्थ यह होता है कि संसार में इस लोक और पर-
लोक का सुख चाहने वाले बुद्धिमान पुरुषो को आहार के उत्तम
प्रभाव भूत अपने वीर्य की सब तरह से रक्षा करनी चाहिये
क्योकि वीर्य का क्षय होने से अनेक रोग पैदा होते हैं और अन्त
मे कम अवस्था मे ही मृत्यु हो जाती.है।
इसलिये मनुष्य मात्र को अपने जीवन सुधार और मनुष्य
जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करने के लिये ध्यान रखना चाहिये।
आरोग्यता के लक्षण
आरोग्यता के लक्षण आयुर्वेदाचार्य धन्वन्तरी के शिष्य
सुश्रुत जी ने इस प्रकार लिखे हैं “जिस मनुष्य का दोष वात,
पित्त, कफ, अग्नि, जठराग्नि, धातु, रस, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा,
शुक्र, मल विष्टा, मूत्र, पसीना आदि की क्रिया सम अर्थात्
यथार्थ भाव पर हो, और जिसकी आत्मा तथा मन प्रसन्न हो उसको
आरोग्य कहते हैं। यदि उपरोक्त वात, पित्त आदि दोषो की
असमानता और आत्मादि की अप्रसन्नता हो तो रोग कहते हैं।
एक जगह लिखा है कि “रोगस्तु दोष्यम्” दोष यद्यपि ऋतुओ के
परिवर्तन और हीन मिथ्या अति योग से जैसे कि वर्षा ऋतु मे
जल का न पड़ना यह हीन योग कहा जाता है, उसी ऋतु मे
शीत का होना यह मिथ्या योग और वर्षा का अधिक होना यह
अतियोग कहा जाता है। ऐसे योग असमान होकर रोगोत्पत्ति करते
हैं। तथापि जैसा बिगाड़ हम लोगो के मिथ्या आहार बिहार द्वारा

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३०६
होता है, वैसा ऋतुओं के परिवर्तन से नहीं होता है और उपरोक्त
दोष आदिको मे परस्पर ऐसा दृढ़ संबन्ध है कि दोष के बिगड़ने
से अग्नि आदि भी बिगड़ जाती हैं और मनुष्य नाना प्रकार के
रोगों से ग्रसित हो जाता है इसलिये इनको आरोग्य शास्त्र के
अनुसार समभाव पर रखने का निरंतर यत्न करना चाहिये,
तभी मनुष्य आरोग्य रह् सकता है ।
मिथ्या आहार विहार
मिथ्या आहार विहार के विषय मे संक्षेप से वर्णन किया
जाता है जिससे मनुष्य मात्र मे रोग फैले हुए हैं। बात यह है कि
स्नान, कसरत, स्त्री संग आदि यावत् विहार लोग अपनी शक्ति
से अधिक करते हैं अथवा शक्तिमान होकर भी जो नही करते
उसी को मिथ्या विहार कहना चाहिये ।
उदाहरणार्थ.—घण्टों तक स्नान करना या परिश्रम करने
के पश्चात् तत्काल ही स्नान करना अथवा दिन मे कई बार स्नान
करना, जैसा कि कोई कोई मल मूत्रोत्सर्ग के पश्चात् भी किया
करते हैं। यह शक्ति से अधिक स्नान हुआ और स्नान करना ही
नहीं यह शक्तिमान होकर भी न करना है। इसी प्रकार कसरत
आदि में भी जानना चाहिये । सम्प्रति संपूर्णा प्रकार के मिथ्या
विहारों मे अनैसर्गिक उपायो से शुक्र ( जो शरीर का राजा है।
जैसे प्रान्तिक राजाओं के विनाश से अनेक शत्रु उस प्रान्त
में अशान्ति फैला देते है उसी प्रकार वीर्य नाश से इस शरीर

३१० आनन्द मन्दिर

में दुख रूपी शत्रु अशान्ति फैला देते हैं) का अपरिमित व्यय
पाया जाता है।
यह प्रथम ही लिखा गया है कि दोष अग्नि आदि मे दृढ
संबन्ध होने के कारण एक के न्यूनाधिक होने से प्रायः सब ही
असमान हो जाते हैं और इनकी असमानता ही को रोग कहा
जाता है। बहुत दुःख के साथ लिखना पडता है कि ऐसे अमूल्य
पदार्थ का जो सम्पूर्ण पुरुषार्थों का देने वाला है, उसको क्षणिक
सुख (जिसका परिणाम दुःख ही दुख है) के लिये हमारी
धर्म माता व वहिने व पुरुष आदि स्वभाव विरुद्ध कर्मों मे व्यय
करते हैं। हाय, हाय वे लोग नहीं जानते कि किया हुआ
आहार क्रिया विशेष द्वारा परिपक होकर रस से रक्त, रक्त से
मास, मांस से मेद, मेद से अस्थि, अस्थि से मज्जा होता है और
पुनः पचकर ४० दिनो मे शुक्र (वीर्य) रूप धारण करता है।
इसलिये मनुष्य मात्र को वीर्य की रक्षा करनी चाहिये। देखो पशु
पक्षी भी नियमित काल मे शुक्र का पतन करते हैं। क्या आप उन
से भी अज्ञान हैं जो अपने आपही अपने पैर में कुल्हाड़ी मार
कर जीवन नष्ट करते हैं।
यही शुक्र अन्य छहों धातुओं का अन्तिम परिणाम है और
इसी के अधिक व्यय से शरीर नाना प्रकार के रोगो से रुग्ण
रहता है और मनुष्य पुरुषार्थहीन हो जीवन पर्यन्त रोगी रह
कर तथा रोगी निर्बल दुर्बल सन्तान उत्पन्न कर दुःखमय जीवन
व्यतीत करता है।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३११
शरीर रक्षा
इस जगत में अपने शरीर की रक्षा करना प्रत्येक मनुष्य का
पहिला काम है क्योंकि शरीर की रक्षा से मनुष्य जो जो काम
करना चाहता है वह कर सकता है। शरीर की रक्षा के लिये
आयुर्वेद मे कहे हुए नियमो के ज्ञान की और उन नियमो के
अनुसार बरतने की बहुत आवश्यकता है। कारण कि वैद्यक शास्त्रो
में कहे हुए नियमों के जानने के सिवाय और उनके बरतने के
सिवाय और किसी तरह से शरीर की रक्षा नही हो सकती।
आयुर्वेद में शरीर की रक्षा के निमित्त बहुत से नियम देखने
में आते हैं परन्तु उन सब मे ब्रह्मचर्य हो मुख्य होने से उसका
वर्णन इस पुस्तक मे भी कुछ किया गया है। ब्रह्मचर्य का
ठीक ठीक पालन करने से वीर्य की रक्षा होती है और वीर्य की
रक्षा से शरीर की रक्षा होती है इसलिये पहिले ब्रह्मचर्य के
सामान्य स्वरूप और उसके प्रकार जानने की जरुरत है।
ब्रह्मचर्य का सामान्य स्वरूप
मन को स्त्री के ख्यालात से दूर रखना, स्त्रियों के साथ बात-
चीत न करना, काम विकार के नेत्रों से उनकी ओर न देखना,
और शरीर से उनका स्पर्शमात्र भी न करना यह ब्रह्मचर्य का
साधारण स्वरूप है।
यह ब्रह्मचर्य आठ तरह का है। जो पुराने समय में लगभग
आठ वर्ष से चौबीस वर्ष की आयु तक विद्याभ्यास के साथ ही

३१२ आनन्द मन्दिर
साथ पालन किया जाता था। जब अच्छी तरह से आठों प्रकार का
ब्रह्मचर्य पालने मे आता था तब चौबीस वर्ष की उमर तक पुरुष
अपने वीर्य को रोक लेते थे और किसी तरह की काम वासना के
अभाव से उन दिनों पुरुषो का वीर्य उस बड़ी उमर में जाकर
पकता था, परन्तु आज काल के समय मे प्रथम कहे हुए ब्रह्मचर्य
का यथार्थ पालन नहीं होने से पुरुष के वीर्य का नाश लगभग
१०-१२ वर्ष की उमर से ही शुरू हो जाता है।
बिना पके हुए कुछ वीर्य के निकलन से ही मनुष्य के वल
बुद्धि, पराक्रम, उत्साह, तेज, स्मरण शक्ति ( याददास्त ) इत्यादि
नाश होते है और दूसरे कितने ही भयकर रोग लगजाते हैं।
इसीलिये ससार सुख, आरोग्यता और बड़ी आयु चाहने वाले
पुरुषों को ब्रह्मचर्य अवश्य ही पालन करना चाहिये।
ब्रह्मचर्य के आठ प्रकार
ब्रह्मचर्य के आठ भेद हैं जिसका वर्णन मैं नीचे लिखती हूँ।
( १ ) स्त्रियो की याद न करना, ( २ ) स्त्रियों के गुण का
वर्णन न करना, ( ३ ) स्त्रियों के साथ रमण न करना, ( ४ )
स्त्रियो को काम की दृष्टि से न देखना, ( ५ ) स्त्रियों के साथ
अकेले में चुप चाप बात न करना, ( ६ ) स्त्री सम्बन्धी कल्पना
मन मे न लाना, ( ७ ) स्त्रियों के सम्बन्ध मे किसी प्रकार का
मिलने वगैरह का निश्चय न करना और ( ८ ) स्त्रियों से शारीरिक
संग न करना।

प्रेमालिङ्गन । पृ० ३५३ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१३
ब्रह्मचर्य के अमूल्य गुण
ऊपर कहे हुए आठ प्रकार के ब्रह्मचर्य का यथार्थ पालन करने
मे पुरुष के पके हुए वीर्य का ठीक उमर मे व्यय होता है केवल
ऐसाही नहीं, परन्तु बहुत दिन तक रोका हुआ वीर्य पुरुष के बल,
बुद्धि, वर्ण, कांति को बढ़ाकर शरीर के अंगों को मजबूत करता
है और आत्मा को आनन्द का अनुभव कराते हुए दुनियादारी के
कामों में उत्साह देकर लम्बी आयुष्य देता है। इससे उलटी रीति
से यदि मनुष्य अपने वीर्य को बिना पके हुए उसका खर्च करने
लग जाता है तो उस दशा मे शरीर की नसे शिथिल होजाती
हैं, मन बेचैनी मे रहता है, कामकाज मे नहीं लगता है और अन्त
में जिन्दगी के बिगड़ने से मनुष्य मौत के पंजे मे फंस जाता है।
प्राचीन काल में ब्रह्मचर्य
प्राचीन काल मे ब्रह्मचर्य पालन के साथ विद्याभ्यास होता था
और यह रिवाज जितना फैला हुआ था उतनी ही देश की स्थिति
उन्नत थी परन्तु समय के फेर मे जैसे जैसे ब्रह्मचर्य का लोप
होता गया वैसे वैसे देश की बहुत ही हीन अवस्था होने लगी।
प्रचीन काल मे स्त्रियां १६ वर्ष तक और पुरुष २४ वर्ष तक अष्ट-
विध ब्रह्मचर्य का पालन करते थे और कितने ही के ४८ वर्ष
तक ब्रह्मचर्य पालने के उदाहरण मिलते हैं। इसका इतिहास से
पता चलता है। परन्तु दुःख है वह समय चला गया, अब तो
आठ या दस वर्ष की उमर के बालक बालिकाओं का विवाह

३१४ आनन्द मन्दिर
देखने में आता है। प्रथम तो आठ वर्ष की उमर में अपनी
जाति की रीति के अनुसार उपनयनादि सस्कार होता था फिर
विद्याभ्यास आरभ होता था। भारत वर्ष के अधिकांश नर नारी
इसप्रकार कम से कम १६ और २४ वर्ष ब्रह्मचर्य का पालन तो
किया ही करते थे ।
आदि कवि वाल्मीकि कृत रामायण तथा महात्मा व्यास
कृत महाभारत को देखने से मालूम होता है कि हनुमान और
भीष्म पितामह जीवन पर्यंत ब्रह्मचारी रहे थे। उन्होने असाधारण
और मनुष्य की कल्पना मे न आने योग्य जो २ पराक्रम किये थे
सब केवल उनके ब्रह्मचर्य का ही प्रभाव था । श्री हनुमान जी
का जीवन चरित्र तो सब जानते ही होंगे कि जो अपने स्वामी
श्रीरामचन्द्र की आज्ञा मानकर ब्रह्मचर्य के प्रभाव से मनुष्यों को
अचम्भे मे डालने वाले सौ योजन लम्बे समुद्र को तैर कर
पार कर गये थे और जिन्होने असख्य बलवान राक्षसो के बीच
में अपनी अलौकिक शक्ति दिखाकर रावण जैसे महावीर योद्धाओ
को जीतकर ऐसा काम कर दिखाया था कि जिससे सारी पृथ्वी
में उनका नाम आज तक शूरवीरो की गणना मे पहिले आता है।
और सब जिसके ब्रह्मचर्य की धाक मानते हैं ।
उसी तरह भीष्म पितामह का वृत्तान्त भी सब लोगों को
मालूम होगा कि जिन्होने महाभारत के युद्ध में कौरवो की रक्षा
के लिये उनका पक्ष स्वीकार कर श्रीकृष्ण जैसे रणवीर योद्धा की
प्रतिज्ञा भंग करवाकर अपनी प्रतिज्ञा अखंड कर दिखाई थी

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१५

उसी तरह महाराज युधिष्ठिर और अर्जुनादि जैसे महापराक्रमी
पांडवों को भी पितामह ने कितना कंपायमान कर दिया था और
अन्त मे कुरुक्षेत्र के युद्ध मे शरीर के रग २ से बांधे जाने पर
भी उनको कुछ कष्ट नहीं हुआ था, भीष्म पितामह की इस असा-
धारण शक्ति का कारण यही था कि उन्होने जीवन भर ब्रह्मचर्य
का पालन किया था । उनकी मृत्यु उनकी इच्छा से हुई थी । यह
सब ब्रह्मचर्य का ही प्रताप था ।
प्राचीन काल मे केवल पुरुष ही ब्रह्मचर्य का पालन नही
करते थे स्त्रियां भी ब्रह्मचर्य का पालन करती थी । अब तो
ब्रह्मचर्य की ओर किसी का ध्यान ही नही है ।

ब्रह्मचर्य के अभाव से हानि

आजकल के समय में पुरुष का वीर्य जल्दी पकता है इस के
अनेक कारण हैं । इसीसे बहुत समय तक अर्थात् ऊपर कहे हुये
समय तक पुरुष अपने वीर्य को नहीं रोक सकता है । इसका
कारण केवल इतना ही है कि ब्रह्मचर्य का पालन ठीक २ नहीं
हो सकता । यदि इन दिनो अष्टविधि ब्रह्मचर्य का यथार्थ पालन
करने में आवे तो पुरुष के वीर्य की पुष्टि भी बड़ी उमर मे ही
होगी यह बात हर कोई समझ सकता है ।
ब्रह्मचर्य के नियमो पर चलने वाले मनुष्य अपनी शारीरिक
सम्पत्ति की रक्षा कर सकते हैं । आरोग्यता और दीर्घ जीवन
प्राप्त कर सकते हैं इतना ही नही वरन नियमों के अनुसार

३१६ आनन्द मन्दिर
चलने वाले अपनी भविष्य सन्तान को भी उन्नति पर पहुंचा सकते
हैं क्योंकि ब्रह्मचर्य पालन करने वाले की सन्तान पूरे २ अंगवाली,
निरोगी, हृष्ट पुष्ट, बलवान, बुद्धिमान, पराक्रमी, भाग्यशाली, और
बढ़ी उमरवाली होती है । इससे उलटी रीति मे ब्रह्मचर्य को
व्यर्थ समझ विषय व्यापार मे लगजाने वाले की सन्तान अधूरे
अङ्ग वाली, हीन वीर्य, मूर्ख, रोगी, कृश, निर्बल, पराक्रम रहित,
और कम आयु वाली होती है ।
ब्रह्मचर्य के न पालने के दो मुख्य कारण हैं एक तो आज
कल के विद्याभ्यास के ढंग की अयोग्यता और दूसरा आजकल
के विवाह आदि की बुरी प्रथा । आजकल यदि विद्याभ्यास तथा
विवाहादिक क्रम उचित रीति पर हो तो ब्रह्मचर्य का पालन
कुछ भी कठिन मालूम नही होगा । प्राचीन काल में विद्याभ्यास
तथा विवाह आदि का ऐसा अच्छा क्रम था कि बालकों
को कुछ भी कष्ट उठाये विना विद्याभ्यास, ब्रह्मचर्य पालने तथा
बहुत दिन तक वीर्य को रोक रखने का मौका सहज ही मिल
जाता था ।
इस जगह प्राचीन विद्याभ्यास का ढग और प्राचीन विवाह
क्रम पद्धति की उत्तमता दिखलाये विना हाल के विद्याभ्यास और
विवाह क्रम की अहीनता अनुभव में कदापि नही आसकती ।
अतएव संक्षेप मे यहां पर इस विषय पर प्रकाश डालना अनु-
चित न होगा और पाठक भी प्राचीन तथा नवीन शिक्षा प्रणाली
का ढंग समझ लेंगे ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१७
प्राचीन विद्याभ्यास का ढंग
प्राचीन काल मे चौवीस वर्ष की आयु तक अच्छे २ शिक्षको
की देख रेख तथा निगहवानी से विद्याभ्यास कराया जाता था
और दुनियादारी के व्यवहार की वासना वालको के ऊपर असर
न करे इस निमित्त वालकों के पढ़ने के स्थान शहर या गाव से
थोडी दूर साफ हवा और पानी की जगह मे वनाये जाते
थे । जव वालक विद्याभ्यास कराने योग्य होता था तव उसके
मां वाप अथवा अन्य रक्षक उस वालक को शिक्षक की रक्षा मे
करदेते थे । उस समय मे वालक की शारीरिक सपत्ति का नाश
न हो इस वात का ध्यान रख विद्याभ्यास शुरू कराया जाता
था। विद्याभ्यास के लिये वालकों को शिक्षको के सुपुर्द कर देने
पर वहुत जरूरी कारण होने पर भी उनके मा वाप से वालको
की भेट नही होती थी कि जिनके समागम से उनके मन में
ससार की वासनाओ का अंकुर पैदा हो, ऐसे दुष्ट और दुराचारी
मनुष्यों की सोहवत मे बैठने का मौका उन वालको को कहां
मिलता था । उन विद्यालयो मे केवल नीति और धर्म सम्वन्धी ही
पुस्तके पढ़ाई जाती थी, नीति ज्ञान और धर्म सम्वधी उत्तमोत्तम
पुस्तको के सिवाय जिससे अनीत और इश्कवाजी की तरफ
उनका मन जाय अन्य पुस्तको की ओर उनकी दृष्टि भी नहीं
जाती थी । इसतरह से वालक थोड़े समय मे वहुत कुछ
अभ्यास कर लेते थे क्योकि दूसरी वातों मे वे अपना मन लगा

३१८ आनन्द मन्दिर
न पाते थे । ब्रह्मचर्य पूर्वक केवल विद्याभ्यास में ही लवलीन रहने
वाला बालक बहुत दिन का काम थोड़े दिन में कर सकता है।
इस तरह से दी हुई शिक्षा का प्रभाव बहुत अच्छा होता
था इतना ही नही किन्तु विद्यार्थी के अन्तःकरण से जन्म
भर विद्या के संस्कार नही भूलते थे और विद्यार्थी की शारी-
रिक तथा मानसिक संपत्ति ऐसी अच्छी तरह से दृढ़ हो जाती
थी कि विद्याभ्यास के पीछे वह जो २ काम करता था उसमे
साधारणतः ही सफलता पाता था । कठिन से कठिन कार्य उसके
मार्ग में रोड़े न अटका पाते थे ।
आज कल का विद्याभ्यास
वर्त्तमान काल मे विद्याभ्यास का ढंग बड़ा ही उलटा देखने
में आता है । आजकल एक तो बालकों की शारीरिक दशा पर
बिलकुल ध्यान न देते हुये जल्दी पढ़ाने के लोभ से धैर्य न रखने
वाले माता पिता अपने बालको को आवश्यकीय खेल कूद के
आनन्द से या जिससे बालको की शारीरिक संपत्ति स्थिर होती
है ऐसे कामों से अलग रख उन्हे छोटी ही उमर में पाठशाला में
ढकेल देते हैं । ऐसा बहुधा देखा जाता है कि छोटे २ बालको
को उनकी इच्छा के विरुद्ध पाठशाला मे भेजने के कारण
पढ़ने के नाम से उनको डर लगने लगता है, और विद्या तथा
गुरु की ओर वास्तविक में जो बालकों को पूज्य दृष्टि से बर्ताव
रखना चाहिये सो उसके बदले उनकी ओर अरुचि उत्पन्न होजाती

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१६
है, और ऐसी रीति से किया हुआ विद्याभ्यास कैसा फल देगा
इसका ध्यान हमारे प्रिय पाठक पाठिकाएं ही सोच सकती हैं।
पढ़ाने वाला कैसा चाहिये
जिनके हाथो मे अपने बालक को सौंप रहे हैं उनके सम्बन्ध
मे भी कुछ सोच लेना ज़रूरी है। जब बालक को विद्याभ्यास
कराना हो तब कुलीन नीतिवान धार्मिक विचार वाले और
विद्याभ्यास के उत्तम फल को अनुभव कर विद्यार्थी को अनु-
भव कराने वाले धर्मज्ञ शिक्षको के हाथ में पढ़ने के लिये
बालको को सौंपना चाहिये। शिक्षक (पढ़ाने वाला) केवल
अच्छा पढ़ा लिखा हो उसी पर बस नही परन्तु उसके साथ २
वह शिक्षक लोकप्रिय और सद्गुणी भी होना चाहिये क्योकि
बालक मे शिक्षक के पास बहुत दिन तक बैठने से उसके गुण
अथवा अवगुण का अनुभव बराबर देखते रहने से शिक्षक की
अच्छी या बुरी बातो का असर उसके कोमल अन्तःकरण पर
हुए बिना रहता ही नही, दुर्गुणी शिक्षक को सुपुर्द किये हुए
बालक की जिन्दगी बिल्कुल बरबाद हो जाती है इसलिये विद्या
देने वाले शिक्षक के गुण दोष की परीक्षा किये विना बालक को
उसके हाथ मे सौंपना न चाहिये।
आज कल विद्या पढ़ने वाले बालक की शारीरिक संपत्ति का
नाश करना केवल दुराचारी गुरुओ से विद्या पढ़ाना आरभ कर
देना ही नही बल्कि छोटी उमर मे ब्याह देना भी है। इस कम

३२० आन्द मन्दिर

उसर के ब्याह से भविष्य मे सन्तान को क्या नुकसान होता है
इसका विचार न कर कितने ही अनसमझ माता पिता अपनी
सन्तान को बहुत ही छोटी उम्र मे अर्थात् जो समय विद्याभ्यास
का होता है उस समय उनको विवाह जंजाल मे फंसा देते हैं।
कितनी ही जातियो मे तो यह बाल विवाह की चाल इतनी
ज्यादा चलगई है कि बहुत ही छोटी अवस्था मे अर्थात् पांच
सात वर्ष के भीतर अपने बच्चो का कि जिन्हे विवाह किसे
कहते है यह भी नहीं मालूम ऐसे अज्ञान वालको का आप
माता पिता विवाह के चाव के मारे विवाह कर उनका भविष्य
बिगाड़ते है। ऐसे वालको को दोनो तरह से नुकसान पहुँचता.है
उस अवस्था मे विवाह के फंदे मे फसाया हुआ वालक केवल
विद्या ही नही पढ़ सकता किन्तु उसकी शारीरिक संपत्ति को
इतना धक्का लगता है कि जो एक योग्य वैद्य के इलाज से कही
वडी मेहनत के साथ भी अपनी असली दशा मे नही आता। आज
कल के समय को आप लोग यदि विचार करके देखे तो पहिले
के समय को देखते हुए अब मनुष्यो की मृत्यु बहुत ही छोटी
अवस्था मे होती है, इसका मुख्य कारण बाल विवाह है। इस
प्रसग पर हर एक का ध्यान पहुँचे इसलिये मैं यहां अच्छी तरह
खुलासा करके सब लिख रही हूं। ।आज कल सन्तान की
शारीरिक तथा मानसिक संपत्ति का नाश होने का कारण
खास करके वालविवाह है। इस बाल विवाह ने हिन्दू समाज का
बहुत नुकसान किया है और उसे गड्ढे मे गिराया है।

पतिध्यान मग्ना ऋतुस्नाता का पति-चित्र-दर्शन । पृ० ३९१ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२१
आजकल की सरकारी रिपोर्टों मे मृत्यु सख्या देखने मे
बहुत से मनुष्यों की अकाल मृत्यु देखने में आती है उनके कारणों
पर विचार करके देखने से बालकपन का विवाह ही पहला कारण
मुख्य रूप से दृष्टि में आवेगा। जब से मैने औषधालय खोला है
इन २५ वर्षों मे लाखों चिट्टियां कालेज में पढने वाले विद्यार्थियो
की मेरे पास आईं और प्रति दिन आया करती हैं जो बाल्यावस्था
मे ही कुसगति मे पड़कर बालविवाह के कारण अनेक रोगों के
रोगी बन बैठे हैं।
बालविवाह के कारण पुरुष केवल अपने तन की ही खराबी
करते हैं ऐसा नहीं किन्तु उनकी सन्तान तक की बरबादी होती
है। आजकल जो हीन वीर्य्य, निर्बल, पराक्रम रहिन, शरीर से
बालक पैदा होते हैं वे ऊपर बताये हुए कारणों के पंजे मे फंसे
हुए मनुष्यों के वीर्य से उत्पन्न हुए हैं। यह २५ पच्चीस वर्ष तक
लाखो स्त्री पुरुषों की चिकित्सा करने से मालूम हुआ है।
प्रचीन विवाह क्रम
पुराने समय मे वीर्य रोककर ब्रह्मचर्य पालने के साथ शुरू
किया हुआ विद्या