विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
३२२ आनन्द मन्दिर
को रोककर उत्तम रीति से शरीर-सम्पत्ति की जिस तरह
हो रक्षा करते थे, इस रीति से रक्षा किए हुए वीर्य से पक्की
अवस्था मे पैदा हुई सन्तान सब अंगो से पूर्ण, निरोगी, बुद्धिमान
पराक्रमी, और बड़ी आयुवाली होती थी ।
कई एक ऐतिहासिक पुस्तके देखने से मालूम होता है कि
हमारे भारतवर्ष मे जो जो पराक्रमी और प्रसिद्ध नामांकित पुरुष
हुए हैं वे सब तरुण अवस्था में विवाहे हुए वीर्य से उत्पन्न
हुए हैं। पता लगाने से यह निश्चय मालूम होगा । इस विषय
के प्रमाण देने से एक ऐतिहासिक बडा भारी ग्रन्थ बन जावेगा
हम इधर उधर की बाते न लिखकर जिस उपयोगी विषय को
आरम्भ किया है उसी से पुस्तक पूरी करनी है । किसी ने ब्रह्म-
चर्य के विषय मे ठीक कहा है:—
सब आश्रमो से परम पावन, ब्रह्मचर्य प्रधान है ।
नर का कहो इस व्रत बिना, होता कहा कल्यान है ॥
बल, बुद्धि, विद्या और वैभव, आदि का दाता यही ।
इसके गुणों के गीत अब भी, गा रही सारी मही ॥१॥
अब ब्रह्मचर्य विहीन भारत, दीन है इस काल में ।
निर्वीर्य निर्बल हो फसा है, व्याधियो के जाल मे ॥
चिर आयु अब होती नहीं, स्वल्पायु का ही राज है ।
देखो जहां तहा सज रहा, अब बाल व्याह कुमाज है ॥२॥
जो आज कहलाते युवा वे, वृद्ध से भी वृद्ध हैं ।
हा, काम के किंकर रसीले, और रसिक प्रसिद्ध हैं ॥
मंदाग्नि और प्रमेह तरुणों, के सखे सच्चे बने ।
श्रीहीन मुरझाए हुए जन, देख पड़ते हैं घने ॥३॥
जब नीव ही दृढ़ है नहीं, कैसे बनें मन्दिर भले ।
जब खोखली जड़ हो गई, कैसे विटप फूलें फलें ॥
फैला हुआ चहुँ ओर देखो, व्याधियों का जाल है ।
जिसको लखो अब तो वही, चलता कटीली चाल है ॥४॥
हा ! भीष्म से योधा भला, अब देश में होते कहां ?
मजनू बने लाखों पड़े है, देख लो अब तो यहां ॥
दाव मार की मारें मिरोरा, दे रही इस काल हैं ।
देखो हजारो छोकरे अब, प्रेम में बेहाल हैं ॥५॥
हा ! ब्रह्मचर्य्याभाव से, इस देश का जो हाल है ।
यदि आंख है तो देख लो, कैसा गिरा इस काल है ॥
बल, बुद्धि, विद्या अर्थ मे, ससार से पीछे पड़ा ।
हां, रूढ़ि भक्ती मूर्खता में, समझ लो सबसे बढ़ा ॥६॥
आर्य्यत्व का अस्तित्व यदि, रखना चहो संसार मे ।
फिर एक बार सुसभ्य हो, रहना चहो ससार में ॥
तो ब्रह्मचर्य पवित्र व्रत, धारण करो अति प्रेम से ।
भोगो सुखों का सार जो, जीवन निभाहो नेम से ॥७॥
अब आप लोग समझ गये होगे कि ब्रह्मचर्य का प्रभाव
कैसा अद्भुत है और ब्रह्मचर्य न रखकर वीर्य को व्यर्थ नष्ट करने
से कितनी हानियां दुःख और अन्त मे जीवन नष्ट करना पड़ता है।
३२४ आनन्द मन्दिर
अब बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक किये हुये वीर्य नाश से उत्पन्न हुये रोगों के विषय के कुछ स्वानुभव लिखती हूं ।
बाल्यावस्था में किये हुए आहार विहार के अनियमों तथा कुटेवो हस्तक्रिया आदि से उस समय तो कुछ समझ में नहीं आता क्योंकि बाल्यावस्था में तो कुछ ज्ञान नहीं होता न कुछ हानि ही मालूम होती है किन्तु कुछ दिनों बाद उसके बुरे फल मालूम होने लगते हैं । इसलिये उन रोगों का बुरा परिणाम समझकर स्त्री पुरुष सब को ही सदैव पूरी तरह से उससे सावधान रहना चाहिए ।
मेरा तजुरबा
मुझे २५ पच्चीस वर्षे स्त्रियो की चिकित्सा करते व्यतीत हुईं । इस बीच मे मेरे पास लाखो ही स्त्रियां इलाज के लिये आईं और उनके पतियों की चिट्ठियां भी आईं । स्त्रियों की जबानी पतियो के शीघ्रपात सुस्ती प्रमेह सिथिलता और नपुंसकता का हाल मालूम हुआ तथा पुरुषो के पत्रो से मालूम हुआ और होरहा है कि बाल्यावस्था मे हस्तक्रिया अप्राकृतिक व्यभिचार आदि और अन्य प्रकार के कुकर्मों से प्रायः पुरुषों में अनेक खराबियां आगई हैं ।
जो कुछ कमी रहगई वह विवाह होते ही अधिक विषय के कारण पूरी होगई और होजाती है । पुरुष इसप्रकार जब बिलकुल शक्तिहीन होजाते हैं तब इलाज करने की , सूझती है परन्तु
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२५
डाक्टर वैद्य हकीम आदि कोई चिकित्सक पुरुष रोगियों को यह
नहीं वतलाता कि तुम्हारे ही कुकर्मो का यह फल है । सम्भव है
चिकित्सक उन रोगियो से पूरा हाल पूछने की परवाह ही न
करता हो, उसे जरूरत ही क्या है, जो रोग समझ मे आया
औषधि दे दी । रोग की जड़ खोजने की परवाह ही क्या है, रोगी
भी नहीं समझता कि मुझे यह रोग किस कारण से है ।
मेरे पास जव रोगी स्त्रियां आती हैं तव मैं सबसे पहिले
उनके पति का हाल पूछती हूँ, वे सकोच न करके मुझसे
अपने पति का कुल हाल उस समय का जव से वह स्त्री विवाह
कर पति के घर आती है जितना हाल पति के शीघ्रपात प्रमेह
सुस्ती नपुंसकता आदि का होता है कह देती है। तव मैं उसके
पति से पत्र लिखकर सच्चा हाल पूछती हूं और अपने यहां
का रोगी फार्म भेजकर लिख देती हूं कि "आप सकोच न कर
अपनी कुल हालत लिखे जो जो आपने अज्ञानता अथवा वीर्य
सम्वन्धी भूल की हो । अगर आप कुछ वात छिपावेगे तो मेरी
कुछ हानि न होगी आपकी स्त्री का रोग दूर न होगा आपही को
फायदा न होगा"।
तव वे पुरुष अपना पूरा हाल बाल्यावस्था से हाल तक का
सच्चा लिखदेते हैं। मैं सव हाल मालूम कर उनकी वाल्यावस्था
की अज्ञानता से उत्पन्न हुई खराबियों का और पति की खराबियों
से स्त्री के उत्पन्न हुये रोगों का इलाज करती हूं। इस प्रकार स्त्री
पुरुष दोनो के रोग सदैव के लिये दूर होजाते हैं ।
३३६ आनन्द मन्दिर
सन्तान हीन स्त्रियों का इलाज
स्त्री पुरुष दोनो का हाल ऊपर लिखे अनुसार स्त्री को देख-
कर और पुरुष का हाल फार्म भराकर रोग का हाल, रोगो के
उत्पन्न होने का कारण समझ कर जिसमे खराबी होती है उसका
इलाज करदेती हू, उसकी सब शिकायते दूर होकर सन्तान होने
लगती है। इस प्रकार हजारों सन्तान हीन स्त्रियो के सन्तान
उत्पन्न हो चुकी है और लाखो शक्तिहीन पति पत्नियो के रोग दूर
होगये हैं।
अब मैं इस विषय को अधिक न बढ़ाकर आयुर्वेद के अनु-
सार स्त्रियो के गर्भाशय के सम्बन्ध मे लिखती हू जो रोगी
निरोगी सबके लिये हितकारी है जिनको समझ कर स्त्री अपना
जीवन सुखमय बना सकती है।
गर्भाशय के बिगड़ने से रोगो की उत्पत्ति होती है जिसके
कारण सैकड़ा पीछे निन्यानवे स्त्री रोगी पायी जाती हैं और सन्तान
भी निर्वल दुर्बल और कम आयुवाली उत्पन्न होती है। यदि
गर्भाशय ठीक हो तो रोग उत्पन्न न हो।
आनन्द
मन्दिर
तेरहवां अध्याय
—:०:—
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पिता के व्यभिचार का सन्तान पर दुखद परिणाम । पृ० ३९९
(सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३२६
स्त्री की जननेन्द्री
चित्र नं० १ मे नं० १—२—३— गर्भाशय और ४—५—६
गर्भाशय का मुख इसके बाद नीचे को योनि मार्ग उसके नीचे
प्रवेशद्वार अर्थात् योनि मुख और इसके इधर उधर गुदाद्वार और
मूत्र मार्ग है ऊपर मलाशय और मूत्राशय है जैसा चित्र मे दिख-
लाया गया है ।
इस बात को सभी स्त्री पुरुष जानते हैं कि योनि मार्ग से
सभोग के समय पुरुष की जननेन्द्री स्त्री की जननेन्द्री मे प्रवेश
करती है तब सभोग होता है । स्त्री की जननेन्द्री ऊपर से ढकी
रहती है जिससे उसे किसी प्रकार की हानि न पहुंचे । ऊपर से
देखने से केवल एक दरार सी मालूम देती है। उस दरार को हाथ
की उंगलियो से इधर उधर हटा देने से उसके भीतरी अवयव
दिखलाई देते हैं ।
स्त्री की जननेन्द्री को खोलकर देखने से योनि मार्ग दिखलाई
देता है। योनि मुख से लेकर गर्भाशय के मुख के पास तक अर्थात्
चित्र एक मे नं० ६ के पास तक योनि मार्ग कहलाता है। गर्भाशय
की चौड़ाई आगे की ओर अर्थात् मुख के पास कम और पीछे
की ओर अधिक है। गर्भाशय का मुख रोहू मछली की समान है
गर्भाशय का मुख योनि मार्ग से लगा हुआ है । योनि मार्ग का
विशेष काम है पुरुष की जननेन्द्री द्वारा निकला हुआ वीर्य
गर्भाशय के मुख तक पहुँचा देना ।
गर्भाशय
१ २
३
मलाशय
मूत्राशय
योनि मार्ग
गुदा द्वार
योनि मुख
मूत्र मार्ग
चित्र नं० १
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३१
आयुर्वेद बतलाता है:—
मनोभवागारमुखेऽबलानां,
तिस्रोभवन्ति प्रमदा जनानाम् ।
समीरणा चन्द्रमुखी च गौरी,
विशेषसातामुपवर्णयामि ॥
अर्थात्—कामगृह यानी स्त्री के योनि मुख में तीन प्रकार
की नाड़ियां होती हैं एक समीरणा दूसरी चन्द्रमुखी और तीसरी
गौरी । इनका वर्णन इस प्रकार है—
प्रधानभूता मदनातछत्रे,
समीकरणानाम विशेषनाडी ।
तस्यामुखेयत्पतितंतुवीर्यं,
तन्निष्फलं स्यादितिचन्द्रमौलिः ॥
अर्थात्—मदन रूपी छत्र में सर्व प्रधान नाड़ी समीरणा
नाम की है उस नाडी के मुख मे संभोग के समय जव वीर्य
गिरता है तो वह निष्फल जाता है ऐसा किसी किसी आचार्य
का मत है ।
याचापराचान्द्रमसी च नाडी,
कन्दर्पगेहेभवति प्रधाना ।
३३२ आनन्द मन्दिर
सासुन्दरी योषितमेवसूते,
साध्या भवेदल्परतोत्सवेषु ॥
दूसरी चान्द्रमसी ( चन्द्रमुखी ) नामक नाड़ी कामगृह मे
प्रधान होती है उस नाड़ी मे वीर्य पड़ने से वह स्त्री कन्या उत्पन्न
करती है और थोड़े ही सभोग से शीघ्र तृप्त होजाती है ।
गौरीतिनाडीयदुपस्थगर्भे-
प्रधान भूताभवतिस्वभावात् ।
पुत्रं प्रसूते बहुधाङ्गनासा,
कष्टोपभोग्यासुरतोपविष्टा ॥
अर्थात्—स्त्री की भग मे स्वभाव से प्रधान भूत ऐसी गौरी
नामक नाड़ी है उसमे वीर्य पड़ने से वह स्त्री बहुधा करके पुत्र
उत्पन्न करती है और संभोग के समय बड़ी कठिनाई से उत्पन्न
होती है ।
इन तीनो नाड़ियो का मुख क्रमशः खुलता रहता है सम
दिनों मे अर्थात् मासिक धर्म के चौथे छठे, आठवे, दसवे और
बारहवे दिन गौरी नामक नाड़ी का मुख खुलता है यदि उससे वीर्य
ग्रहण करके गर्भधारण हो गया तो उससे पुत्र उत्पन्न होता है ।
ऋतु के दिनों मे अर्थात् पांचवे सातवे नवे ग्यारहवे और
तेरहवे दिन चान्द्रमसी नाड़ी का मुख खुलता है उसके मुख
में वीर्य पड़ने से कन्या का गर्भधारण होता है और इसके बीच
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३३
में कई तिथियां संभोग के लिये वर्जित हैं। इनमें समीरण नामक
नाडी का मुख खुला रहता है इसमे वीर्य जाने से गर्भाशय में
नहीं ठहरता, थोड़ी देरी में अथवा एक दो दिन मे बाहर निकल
आता है। इसी कारण ऋषियों ने गर्भाधान के लिये तिथियां
नियत की हैं और जिनमे गर्भ नहीं रहता वीर्य व्यर्थ जाता है उन
तिथियो में सभोग करना मना किया है।
स्त्री की जनेन्द्री तथा अन्य अवयव
सभोग तथा गर्भाधान क्रिया करने के पहिले स्त्री पुरुष दोनों
को जनेन्द्री तथा उसके अन्य अवयवो का हाल जान लेना पर-
मोपयोगी है। इसके न जानने से अनेक प्रकार के रोग पति पत्नी
मे उत्पन्न होजाते हैं और दाम्पत्य प्रेम का जैसा चाहिये आनन्द
नहीं मिलता क्योंकि रोगों के कारण दाम्पत्य प्रेम का सुख
नष्ट हो जाता है।
देखिये चित्र नं० २ मे न० १ कामाद्रि—यह योनि का ऊपरी
हिस्सा है जब कन्या की युवावस्था आरम्भ होती है तब पहिले
इस हिस्से मे बाल उत्पन्न होते हैं और जिस प्रकार युवावस्था
बढ़ती जाती है उसी क्रम से बाल घने होते जाते हैं। बाल आना
यह युवापन आरम्भ होने का चिन्ह है।
न० २ यह बडे भगोष्ठ हैं यह भग दर्वाजे के किवाड़ सम-
झना चाहिये। प्रकृति ने इन्हें ऐसा बनाया है कि बिना हटाये
हुए ये स्वय नही हटते। संभोग के समय इन दोनों भगोष्ठो
को हटाने से योनि मार्ग सम्भोग के योग्य होता है। जो मूर्ख
१
२
३ १
४ २
५ ३
४
५
चित्र न० २
बेमेल विवाह, बाल विवाह पृ० ४५३ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३७
अपने गुप्त रोगों का खुलासा हाल संकोच न करके कह सकें या लिखकर ही अपने रोग का खुलासा हाल समझा सके ।
विदेशी चिकित्सा प्रणाली के अनेक नगरों और कसवो तक में चिकित्सालय हैं परन्तु विदेशी चिकित्सा प्रणाली में स्त्री रोगों का इतना अधिक विस्तार से निदान नहीं है इस कारण हमारे देश की स्त्रियों का इलाज विदेशी चिकित्सा प्रणाली की चिकित्सा करने वाली लेडी डाक्टर स्त्रियां भी ठीक २ नहीं कर सकतीं।
जब से मैंने आयुर्वेद स्त्री औषधालय खोला है तब से कई लाख स्त्रियां मेरे पास इलाज के लिये आईं, इनमें बहुत सी स्त्रियां ऐसी थीं जो लेडी डॉक्टरों तथा अन्य चिकित्सकों से वर्षों इलाज कराकर हजारों रुपया खर्चकर निराश होचुकी थी। उनके गुप्त रोगों की परीक्षा ही ठीक न हो सकी। किसी की समझ में रोग नहीं आये। इसी कारण फायदा नहीं हुआ। जब वे रोगी स्त्रियां मेरे पास आईं तब मैंने उनके रोगों की परीक्षा कर थोड़े ही दिन मे कम खर्च में ही रोग दूर कर दिये।
दूसरा कारण यह है कि हमारे देश की स्त्रियों का शरीर इसी देश की आवोहवा (जल वायु) से वना है इसलिये हमारे ही देश की उत्पन्न हुई जंगली औषधियां हमारे देश की स्त्रियों के रोगों को जड़ से दूर कर सकती हैं।
मेरे पास सैकड़ो स्त्रियां योनि सम्बन्धी ऐसे रोगों वाली भी आईं जो इस प्रकार की शिकायत से परेशान थीं।
२२
३३८ आनन्द मन्दिर
तीन वर्ष के लगभग का समय व्यतीत हुआ एक रानी
साहबा मेरे पास इसी रोग वाली आईं। उन्होंने मुझसे अपनी इस-
शिकायत का हाल बतलाया। उन्होंने कहा—छै महीने से मेरी
यह दशा है कि रात दिन सम्भोग के लिये चित्त चंचल रहता है
मै संकोच और लज्जा के कारण इस बात को किसी से कह नहीं
सकती, न जाने क्या कारण है। छै महीने से बड़ी व्याकुलता
हो रही है। पति से मैने यह बात नहीं कही, कहते लज्जा मालूम
होती है, न जाने वह क्या समझ जावे। किसी डाक्टर वैद्य से
भी कह नही सकती। खुजली होती है और खुजली के साथ ही
सम्भोग की इच्छा होती है। पति जी से योनि की पीड़ा का
बहाना करके आपके पास इलाज कराने आई हू।
मै रानी साहबा से इतना हाल सुनते ही समझ गई और
कमरे के भीतर लेजाकर मैने उनकी जनेन्द्री की परीक्षा की तो
उनके छोटे भगोष्ठों मे छाले पड़े हुये थे और सूजन भी आगई
थी। मैने उसी दिन औषधि का काढ़ा कराकर योनि मार्ग को
धुलवाया और रानी साहबा से पूछा कि आप योनि कभी धोती नहीं
हैं ऐसा मालूम होता है ? उन्होंने कहा मै बाहर से तो प्रतिदिन
धोया करती हूं, भीतर नहीं धोती, क्या भीतर भी धोना चाहिये ?
मैंने उन्हे समझाया और न धोने की हानि बतलाई, मैंने
एक सप्ताह उन्हे अपने यहां रोगी आश्रम मे ठहरा कर इलाज
किया वे बिलकुल ठीक होगईं।
एक और स्त्री ने मुझे लिखा कि मेरे पति घर पर नहीं हैं
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३३६
तीन महीने से बाहर गये हुए हैं, मेरे गुप्त स्थान में खुजली होकर
संभोग की अत्यन्त इच्छा होती है, मैने खाना भी छोड़ दिया
है। एक वक्त केवल रूखी रोटी नमक से खाकर रहती हूँ
मुझे कोई ऐसी औषधि भेजिये जिससे मेरी इच्छा न हो। मैं
लगभग छै महीने से ब्रह्मचर्य से हू। मेरे पति प्रायः बाहर रहा
करते हैं, बीच बीच में दस बीस दिन को आते हैं। अभी हाल
में आये थे एक सप्ताह रहकर चले गये।
कृपा करके मुझे ऐसी औषधि भेजिये जिससे यह शिकायत
दूर हो। मैं बडी परेशान हूं आपको भी बड़े संकोच से लिखा है
क्षमा करें।
मैने उस स्त्री को औषधियां भेज दीं, केवल योनि धोने की
औषधियों से ही उसकी शिकायत एक सप्ताह में दूर हो गई।
इस रोग वाली स्त्री के पति को भी अनेक रोग उत्पन्न हो
जाते हैं, उसकी इन्द्री में भी यह रोग हो जाता है। अज्ञानतावश
इस रोग के उत्पन्न होने का कारण न जानने से इस रोग वाली
स्त्रियां अप्राकृतिक रूप से अपनी इच्छा पूरी करती हैं परन्तु
इच्छा पूरी नहीं होती क्योंकि यह रोग के कारण इच्छा उत्पन्न
होती है, जब तक रोग दूर न हो इच्छा बनी ही रहती है।
इस रोग वाली स्त्रियों के चरित्र भ्रष्ट हो जाने की भी शंका
रहती है। मेरे पास इस विषय की भी स्त्रियों की अनेक चिट्ठियां
आया करती हैं वे लिखती हैं कि जल्द इसका उपाय बताइये
हम पति से अपनी इस इच्छा का हाल खुलासा नहीं कह सकतीं।