विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
विदुर की पत्नि को प्रणाम । पृ० १९८
( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५७
कष्ट उठा चुकी थी जब से मैने उन्हे उपाय वतला दिये और
चिकित्सा करके ठीक कर दिया तब से उनके वालक ठीक होने
लगे और वे हृष्ट पुष्ट हैं।
रज वीर्य के दोषो के कारण जिनके कभी गर्भ रहा ही नही
था, जो सन्तान हीन थी, सन्तान के दुःख से रो रोकर जीवन
व्यतीत कर रही थी, मेरे बताए उपाय और चिकित्सा से उनके
सन्तान होने लगी। ऐसी एक दो नही हजारो स्त्रियां मौजूद हैं।
जिनके नियम विरुद्ध अधिक संभोग के कारण सन्तान नही
होती थी उनको ब्रह्मचर्य से रहकर औषधियो का सेवन कराया
गया, सन्तान होने लगी। इस प्रकार हजारो स्त्रियों के जो वन्ध्या
थी जिनके कभी गर्भ रहा ही न था, सन्तान होने लगी।
यह मेरे अनुभव की वात है। मैं आयुर्वेद की रीति से देशी
चिकित्सा करती हू। आयुर्वेद के अनुसार ही रोगो का निदान
करती हूं, स्त्रियां तो मेरे पास स्वय आकर अपने रोगो की परीक्षा
और चिकित्सा कराती हैं। जो नही आसकती वे अपने रोगो
का पूरा हाल लिखती है। उनके रोगो का निदान और इलाज
उसी हाल से घर बैठे ही औषधि भेजकर करती हू, इस प्रकार
स्त्रियो की जो शिकायते होती हैं दूर होजाती है।
पुरुषो के रोगो की परीक्षा और चिकित्सा के लिये मैने आयुर्वेद
के अनुसार रोगो का निदान जानने के लिये एक फार्म ४० चालीस
प्रश्नो का तैय्यार किया है वही भेजती हूँ। उसे भरकर अर्थात् कुल
प्रश्नो का उत्तर लिख देने से पुरुष रोगियो के रोगो की भी परीक्षा
१७
२५८ आनन्द मन्दिर
ठीक ठीक होजाती है, औषधिया पारसल से भेज दी जाती हैं इस
प्रकार पुरुष रोगी भी आराम होजाते हैं।
जिस प्रकार उत्तम खेती के लिये पहिले खेत का उत्तम बना-
लेना अत्यन्त आवश्यक है उसी प्रकार उत्तम सन्तान उत्पन्न करने
के लिये गर्भाधान क्रिया के पहिले स्त्री रूपी खेत को उत्तम
(आरोग्य) बना लेने की आवश्यकता है अर्थात् रोगी स्त्री को
आरोग्य कर शुद्ध आर्तव (रज) की आवश्यकता है।
पुरुष दोष तथा स्त्रियों के आहार विहार
के अनियम से उत्पन्न होने वाले
स्त्री रोग
पुरुषो की अज्ञानता असावधानी और विषय लोलुपता के
कारण स्त्रियो के शरीर मे नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होजाते हैं
इनमे से अनियम और अधिक स्त्री प्रसंग से उत्पन्न होने वाले
रोगो की संख्या अधिक है, स्त्री रोगो मे ऋतु का अनियम होना
सबसे बड़ा रोग है क्योकि इससे ही स्त्रियो मे अन्य अनेक प्रकार
के भयकर रोग उत्पन्न होजाते हैं।
स्त्री पुरुष दोनो आरोग्य हो तो आयुर्वेद के अनुसार उत्तम
सन्तान उत्पन्न करने के लिये नियम पूर्वक जैसा कि आयुर्वेद
बतलाता है गर्भाधान क्रिया अर्थात् स्त्री सम्भोग करना चाहिये।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५६
सन्तान
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के लिये सम्भोग करने की विधि
पीछे बतलाई गई है उसी विधि से पुरुष स्त्री के पास जावे।
अन्यत्र चित्र में देखो, स्त्री पलंग पर लेटी है, पति सफेद वस्त्र धारण
कर माला हाथ में लिये स्त्री के पास खड़ा है। इस प्रकार पति
स्त्री के पास शय्यापर जाकर अनेक प्रकार से प्यार कर आलिंगन
चुम्बन द्वारा स्त्री को प्रसन्न करके उसकी इच्छा उत्पन्न करे। पति
के सच्चे प्यार से ही स्त्री की इच्छा पूरी होजाती है। यह प्यार ही ऐसा
अमूल्य और सर्व श्रेष्ठ उपाय है कि केश पकड़ने नाखून से नोचने
खसोटने की आवश्यकता नहीं है। जैसा कि आजकल की अनेक
मनगढ़ंत पुस्तकों में पाया जाता है।
चौरासी आसन मनगढ़ंत हैं
प्रकृति का बताया हुआ सर्वश्रेष्ठ आसन सब से उत्तम और
उत्तम सन्तान उत्पन्न करने वाला आसन जिसे मनुष्य मात्र
जानते हैं और जिससे स्त्री प्रसन्न होकर संभोग से तृप्त हो गर्भ-
धारण करती है। वह आसन है स्त्री को सीधा लिटाकर पुरुष को
भी ठीक सीध में लेटना और सम्भोग करना।
आलिंगन चुम्बन और प्यारी बातों से जब स्त्री की इच्छा हो
स्त्री के नेत्रों में कुछ आलस्य सा प्रतीत हो तब पति को सम्भोग मे
प्रवृत्त होना चाहियें, इस कार्य में मूर्खतावश जल्दी नही करनी
२६० आनन्द मन्दिर
चाहिये । पति पत्नी दोनो के विचार उत्तम सन्तान उत्पन्न करने के
होने चाहिये । पति पत्नी के मुह को और पत्नी पति के मुह को ध्यान
पूर्वक वडे स्नेह और प्यार से देखे ।
एक दूसरे को प्यार की दृष्टि से देखने से मग्न होजावे
संसार की अन्य सब बाते चिन्ता शोक इत्यादि भूल जावे ।
सम्भोग के समय कुछ मूर्खों का मत है जो आयुर्वेद के नियमों
को न जानकर मनगढ़त बाते पुस्तको मे लिख डालते हैं और
पाठको को धोखे मे डालते हैं। वे लिखते हैं—
“प्रसग के समय अपने मन को पुरुष कही जंगलो में
लेजाकर भटकने दे अथवा बन्दर बडा चचल जीव है अपने मन
मे सम्भोग करते वक्त किसी बन्दर का ध्यान करे कि एक बन्दर
किसी वृक्ष पर बैठा इधर उधर वृक्ष की शाखाओ पर कूद रहा है
अथवा इसी प्रकार के अन्य खिलाड़ी चंचल जीवो मे ध्यान
लगादेवे या किसी ऐसी बात को विचारने लगजावे कि जिसमे
चित्त उलझ जावे । इस प्रकार चित्त को स्त्री प्रसग से हटा कर
कही दूसरी जगह फंसा देने से पुरुष जल्दी स्खलित नही होता”।
पाठको ! देखा आपने पुस्तक लेखको की बुद्धिमानी और
मनगढ़ंत कामशास्त्र ! उन्हे अभी इस बात की कुछ भी खबर नही
है कि संभोग के समय पुरुष के जैसे विचार होगे वैसे ही विचार
और आकृति वाला बालक उत्पन्न होगा । भला विचार तो कीजिये
ऐसी बुद्धिमानी को बलिहारी है। फिर भला सन्तान बन्दर प्रकृति
की न हो तो क्या हो । सन्तान मूर्ख न हो तो क्या हो ! क्योकि
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६१
सभोग के समय व्यर्थ की बातो का विचार करना सन्तान को
उसी प्रकार का वनाना है ।
लिखा है “इस उपाय से पुरुष स्खलित न होगा । स्त्री पहिले
हो जावेगी तब वड़ा आनन्द आवेगा इत्यादि।” वाहरी मूर्खता !
क्षणिक आनन्द के लिये और स्त्री को स्खलित करने के लिये कैसे
कैसे उपाय वाली पुस्तके प्रकाशित होरही हैं !
और सुनिये एक और ऐसी ही पुस्तक मे लिखा है—
“अनेक उपाय करने पर भी यदि वीर्य स्तम्भन न हो, स्खलित
होने का समय आही जावे तो कुछ देरी के लिये प्रसंग करने से
रुक जावे। थोड़ी देरी बाद फिर आरम्भ करे। इसी प्रकार जब
वीर्य स्खलित होने का समय आवे तभी रुक जावे । इस अद्भुत
उपाय से पुरुष जितनी देरी तक चाहे उतनी देरी तक स्तम्भन
कर सकता है ।”
पाठको ! यह बुद्धिमानी देखिये । इसके लेखक महाशय को
यह पता नही कि निकलते हुये वीर्य को रोकने से कितनी
अधिक स्वास्थ्य को हानि होती है। मूत्रकृच्छ्र, पथरी आदि अनेक
रोग होजाते है। यही नही और भी भयकर रोग उत्पन्न होते है।
बलिहारी है इस बुद्धिमानी को कि स्त्री के स्खलित करने के
लिये तथा क्षणिक आनन्द के लिये और स्त्री से अपनी वीरता
का सर्टीफिकेट लेने के लिये अपने शरीर का सत्यानाश मारलेना
और फिर पुस्तक लेखको के नाम को जीवन भर रोना । ऐसी
पुस्तको और लेखकों से ईश्वर बचावे ।
२६२ आनन्द मन्दिर
जरा और एक ऊंचे दिमाग वाले महाशय का विचार
सुनिये एक पुस्तक मे लिखते हैं:—
“जव पुरुष समझे कि वीर्य का स्तम्भन नही होता निकलना
ही चाहता है तव अपने हाथ की दो अंगुलियो से अपनी इन्द्री
के नीचे और गुदा के ऊपर वीच के स्थान मे जो वीर्यपात
करने वाली नस है उसे खूव जोर से दवा रक्खे इस प्रकार वीर्य
स्खलित न होगा वाहर निकलता हुआ भी भीतर लौट जावेगा ।
और सभोग वाले की इच्छा पूरी होगी ।”
इस प्रकार जव वीर्य स्खलित होने को हो तव लौटाल देवे
इस उपाय से चाहे जितनी देरी तक वीर्य को स्तम्भन कर सकता
है । यह भी न हो सके तो संभोग करने के शुरू से ही उस नस को
पकड़े रहे इत्यादि । ये सव वाते कितनी रद्दी और अनुचित
हैं। पुस्तको के लेखक या मूढ पुरुष समझते हैं कि इस प्रकार
वीर्य स्खलन करने से तो वस वैकुण्ठ का दरवाजा ही खुल जायगा
और स्त्री स्खलित होकर पति की वीरता और मर्दानगी के वड़े
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६३
सावधान
ऐसे हानिकारक उपाय कभी नही करना चाहिये । निकलते
हुए वीर्य को भूलकर भी किसी अज्ञानी की वातो मे आकर
रोकना नही चाहिये ।
जो उपाय ऊपर वताया गया है उसी के अनुसार स्त्री को
पूरी तरह से सच्चे स्नेह, हृदय से प्यार करके, स्त्री के प्रसन्न होने
पर संभोग आरम्भ करना चाहिये और एक दूसरे मे ध्यान लगा-
कर चिन्ता रहित हो खूब प्रसन्नता से भली भांति सभोग करना
चाहिये ।
यहां एक वात और ध्यान देने योग्य है । यदि पति को किसी
प्रकार का वीर्य दोष नहीं है, गरमी सुजाक प्रमेह कुछ नहीं है
तो ऊपर के उपाय से संभोग करने से स्त्री की अवश्य तृप्ति होगी
इस वात की भूलकर भी कोशिश नही करनी चाहिये कि स्त्री
हमसे पहिले स्खलित हो परन्तु इस वात का अवश्य ध्यान रखना
चाहिये कि दोनो साथ स्खलित न होने पावे यदि स्त्री पति के
बाद् स्खलित होगी तो गर्भ रहने पर कन्या उत्पन्न होगी और पति
पहिले स्खलित होगा तो पुत्र उत्पन्न होगा ।
ध्यान रखना चाहिये, यदि पति मे
१६४ आनन्द मन्दिर
रोगी पुरुष स्त्री की तृप्ति कभी नही कर सकते और इन
मूर्खता के उपायो से भी जो आज कल की कामशास्त्र सम्बन्धी
पुस्तको मे बतलाये गये है नही कर सकते ।
रोगी पुरुषो की स्त्रियां भी प्रायः रोगी रहती है और इस
प्रकार मूर्खता से सभोग करने वाले पतियो की स्त्रियां भी रोगी रहती
हैं। रोगी स्त्रियो के साथ सभोग करना स्त्रियो के साथ बड़ा भारी
अत्याचार करना है और अपने पैरो मे आप कुल्हाडा मारना है ।
इसलिये आरोग्य पति पत्नी ही सभोग के अधिकारी हैं
और आरोग्य पति ही स्त्री की इच्छा पूरी कर सकता है ।
संभोग के समय जल्दी करने से स्त्री पुरुष दोनो को हानि
पहुचती है और यही कारण है जो पुरुषो को इस मूर्खता के
कारण अनेक प्रकार के स्तम्भन उपाय ढूढने पड़ते है । मूर्ख विषयी
पुरुष चाहते है कि हम घटो तक प्रसंग करते रहे । परन्तु प्रकृति
भी ऐसा करने से रोकती है । इसका नियम यही है कि जिस
समय ऋतुस्नान के समय स्त्री की प्रबल इच्छा हो उस समय
सभोग किया जावे तो स्त्री की इच्छा पूरी होगी । किसी उपाय
की आवश्यकता नही है । वगैर स्त्री की इच्छा हुए गर्भ रहता ही
नही, यह बात किसी पुस्तक लेखक को मालूस नही है । यदि मालूम
होती तो इतने मनगढत उपाय लिखने की आवश्यकता न पड़ती
और पाठक धोखे मे न पड़ते ।
यह बात दूसरी है कि स्त्री पुरुष दोनो रोगी हो । गर्भाशय मे
कुछ खराबी हो तो गर्भ न रहे । मासिक धर्म्म के दिनो के
दाम्पत्य प्रेम का सुखमय परिणाम । पृ० २५१ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६५
बाद गर्भाशय का मुख बन्द होजाने पर संभोग होने से भी गर्भ
नहीं रहता ।
वैद्यकशास्त्र बतलाता है:—
तत्र स्त्री पुंसयोः संयोगेतेजः शरीराद्वायुरुदीरयति ।
ततस्तेजोनिलसन्निपाताच्छुक्रंच्युतं योनिमभि-
प्रतिपद्यते संसृज्यतेचार्त्तवेन ॥
अर्थात्—स्त्री पुरुष के संयोग मे आपस के प्रेम सम्पादन
करने और सच्चे प्रेम मे मग्न हो आनन्दित होकर सभोग
करने से स्त्री पुरुष दोनों की इन्द्री के आपस मे संघर्षण के
द्वारा उत्पन्न हुई ऊष्मा (गर्मी) से वायु शरीर से उठता है उस
रगड़ की गरमी के तेज से पुरुष का वीर्य पतला होकर वायु की
सहायता से अपने स्थान से चलकर गर्भाशय के मुख मे गिरकर
गर्भाशय मे जाकर स्त्री के आर्त्तव मे मिल जाता है । इस प्रकार
पुरुष का वीर्य स्त्री के आर्त्तव मे मिलने से गर्भरूप धारण करता है।
सन्तान पर दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव
सुन्दर और हृष्ट पुष्ट सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी
का प्रेम बड़ा भारी कारण है, जादू कैसा असर रखता है। परन्तु
यह प्रेम सच्चा होना चाहिये। सच्चा प्रेम सुन्दर रूप रंग पर
निर्भर नहीं है। सौन्दर्य कुछ और है प्रेम कुछ और। कुरूप पत्नी के
भी सुन्दर सन्तान होती देखी जाती है । सब विचारो की बात है ।
२६६ आनन्द मन्दिर
प्रेम मे एक बड़ी भारी विचित्रता है, प्रेम का बड़ा भारी
महत्व है। यह बात नही है कि सुन्दर स्त्री हो तभी पति का उस
पर प्रेम हो तथा सुन्दर पति हो तभी पत्नी प्रेम करे। जिस प्रेम
मे रंग रूप का भेद भाव रखकर प्रेम होता है वह प्रेम नही
कहा जा सकता ।
ऐसा स्वार्थी प्रेम, प्रेम नही है। वह स्वार्थ का ही प्रेम है।
इसलिये ऐसे दम्पति जो केवल सुन्दरता का विचार करके प्रेम
करते हैं वे महा मूर्ख हैं। उनकी सन्तान सुन्दर कदापि नही हो
सकती । सच्चे प्रेम से पति पत्नी का हृदय एक हो जाता है।
विचार एक हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर प्रेम करने वाले
दम्पति सुन्दर सन्तान उत्पन्न करते हैं।
गर्भाधान के समय दाम्पत्य प्रेम का बड़ा ही सच्चा प्रभाव
पड़ता है इसी से रूपवान गुणवान सन्तान उत्पन्न होती है।
किसी की पत्नी यदि रूपवती न हो अथवा किसी का पति सुन्दर
न हो तो उसे रूपवान, गुणवान, सन्तान उत्पन्न करने की
निराशा नही होनी चाहिये । आपस मे सच्चा प्रेम होना चाहिये
पति को अपनी कुरूप स्त्री को सुन्दर रूपवती समझ कर प्रेम
करना चाहिये और उसी प्रकार पत्नी को भी अपने कुरूप पति
को सर्व श्रेष्ठ रूपवान समझ कर प्रेम करना चाहिये ।
प्रेम के प्रभाव से कुरूप पति पत्नियो के भी सुन्दर गुणवान
सन्तान हो सकती है और प्रेम न होने से रूपवान गुणवान
दम्पति के भी कुरूप और मूर्ख सन्तान उत्पन्न होती है। इस
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६७
प्रकार जो पति पत्नी सुन्दर न होने पर भी सुन्दर सन्तान उत्पन्न
करने की इच्छा रखते हो उन्हे परस्पर सच्चे प्रेम से ही गर्भाधान
क्रिया करनी चाहिये ।
एकवार मेरे पास इलाज के लिये एक स्त्री आई उसके
साथ मे एक लड़की थी और एक लड़का भी चार पांच वर्ष का
था लड़की दो वर्ष की थी । वह स्त्री सुन्दर थी, पजाव की रहने
वाली थी । मैंने उसकी लड़की को देख कर हंसी मे कहा कि आप
तो वड़ी सुन्दर हैं यह लड़की कैसी कुरूप पैदा की है ? तव वह
हसकर कहने लगी । न जाने क्या वात है लड़का मेरे ही रग रूप
का है यह लड़की वदसूरत हुई है । आपही वतलावे क्या
कारण है ?
इस प्रकार वातचीत होरही थी इतने ही मे उसकी नौक-
रानी जो वाहर वैठी हुई थी उस स्त्री को वुलाने आई । उसके
पति ने कुछ पूछने को वाहर वुलाया था । जव वह नौकरानी मेरे
सामने आई तो मैने देखा उस नौकरानी और उस लड़की की
जिसके वावत मुझसे वातचीत होरही थी, सूरत विलकुल मिलती
थी मैने नौकरानी को देखकर कहा, देखिये आपकी लड़की
नौकरानी की शक्ल की है । जव आपकी यह लड़की गर्भ मे थी
तव यह नौकरानी हर समय आपके पास रहती होगी । उस स्त्री
ने हस कर कहा—हां देवी जी ! यह वात तो वहुत ठीक
आपने वतलाई । जव यह लडकी गर्म मे थी तव मै वीमार होगई
थी तभी यह नौकरानी रक्खी गई थी । कोई और स्त्री मेरे
१६८ आनन्द मन्दिर
पास रहने के लिये घर मे नही थी । मेरे पति दफ्तर चले जाते
थे यह मेरे पास हर वक्त बैठी रहती थी ।
मैंने उस स्त्री से कहा, अब गर्भ की दशा मे कभी इसे अपने
पास मत रखना नही तो अब जो बालक होगा वह भी ऐसा ही
काला कलूटा बदशक्ल इसी लडकी की तरह होगा, वह स्त्री
हंसने लगी और बोली—देवी जी ! मुझे यह बात मालूम न थी ।
एक और दूसरी स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आईँ । उसके
लड़के का कान बहता था । लडके की अवस्था सात आठ महीने
की थी । मैने उससे पूछा, इसका कान कब से बहता है क्योकि
कान से सवाद आता है ? उस स्त्री ने कहा, जब से यह पैदा हुआ
है इसी तरह कान से मवाद आता है। मैंने उससे पूछा, जब यह
गर्भ मे था तब आपके कान मे कोई शिकायत तो नही थी ? उस
स्त्री ने कहा, जब यह पैदा नही हुआ था तब मेरे कान मे फुड़िया
निकली थी, कान बहने लगा था । यह शिकायत मुझे कई महीने
तक रही । जब यह गर्भ मे था तब भी कई महीने तक कान मे
तकलीफ रही, डाक्टरी इलाज होता रहा। गर्भावस्था मे भी पिच-
कारी से कान धोया जाता था, फिर अच्छा होगया । अब मुझे
जब से यह पैदा हुआ है कान की कोई शिकायत नही है ।
मैने उस स्त्री से कहा, बस यही बात है जब यह गर्भ मे था
तब आपका कान बहता था बल्कि गर्भ रहने के पहिले ही आपके
कान मे शिकायत थी इसीलिये वही असर लड़के मे आगया
है । इस लड़के का कान बहना बडी कठिनाई से दूर तो होजावेगा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६६
परन्तु उसकी जड़ नहीं जावेगी। कुछ न कुछ शिकायत कान की
इसे उम्र भर रहेगी। मैंने दवा बतला दी और कह दिया
कि अधिक दिन तक इलाज करने से फायदा होगा। वह स्त्री दवा
लेकर अपने घर चलीगई।
एक स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आई उसकी एक लड़की
जिसकी अवस्था ६, साल की थी कुछ कुछ पागल होगई थी
उसी लड़की के इलाज के लिये वह स्त्री मेरे पास आई थी, मैंने
उस लडकी का हाल पूछा कि इसकी यह दशा कितने दिन से
है ? उस स्त्री ने कहा कि यह कुछ सनक मिजाज की कई वर्ष से
मालूम होती थी अब जिस प्रकार बडी होती जाती है वैसे ही इसका
मिजाज सनकी होता जाता है। मैने उस स्त्री से पूछा कि जब
यह लडकी गर्भ मे थी उस समय आपके यहां कोई सनकी मिजाज
का मनुष्य तो नही था ? उस स्त्री ने कहा, मेरी भौजाई पागल थी
जब मै गर्भवती हुई तब मेरे पति ने मुझे मेरे पिता के यहां भेज-
दिया। मै गर्भावस्था मे बराबर पिता के यहां रहीं और वही यह
लड़की पैदा हुई।
मेरी भौजाई पागल थी मै उसे खाना खिलाती कपडे पहिनाती।
वह कपड़े उतार कर फेंक देती थी तो मैं बार बार कपड़े पहिनाती
थी उसकी सेवा करती थी। वह दस पन्द्रह दिन को कभी कभी
अच्छी भी होजाती थी।
मैंने कहा—यही कारण इस लडकी के सनकी होने का है
इसका कोई इलाज नहीं है इसका आराम होना कठिन है। मैंने
२७० आनन्द मन्दिर
पूछा-आपकी भौजाई अभी है या नहीं ? उसने कहा भौजाई अभी
जिन्दा है और भौजाई का अब यह हाल है कि जब वह गर्भवती
होजाती है तो जब तक बालक पैदा नही होता तब तक बिलकुल
अच्छी रहती है। नाम मात्र को भी पागल पन नहीं रहता,
मेरी भौजाई बड़ी चतुर और गृहस्थी के कामकाज मे परिश्रम
करने वाली पढ़ी लिखी स्त्री है। गर्भावस्था मे सब काम ठीक करती
है। बालक होते ही कुछ दिन बाद फिर पागल होजाती है। बच्चो
की परवरिश के लिये गाय का दूध पिलाया जाता है उसके पास
तक बच्चो को नही जाने दिया जाता।
मैंने कहा इसी प्रकार यह तुम्हारी लड़की भी होगी। इसका
आराम होना तो कठिन है।
इसप्रकार के सैकड़ो उदाहरण मेरे देखने मे आये हैं क्योकि
सभी प्रकार की स्त्रियां रोगी निरोगी प्रतिदिन आया करती हैं।
इस विषय को अधिक उदाहरण देकर बढ़ाने से पुस्तक बहुत बड़ी
होजायगी। इस विषय मे कहना यही है कि माता पिता के शरीर
मे किसी प्रकार का रोग न हो और दोनो प्रसन्न चित्त हो और
संभोग के समय दोनो की प्रबल इच्छा सम्भोग करने की हो
तभी सन्तान आरोग्य होती है। रोगी माता पिता की सन्तान
भी रोगी होती है। गर्भ रह जाने पर भी गर्भावस्था मे गर्भवती
को बडी सावधानी से रहना चाहिये। गर्भावस्था मे भी जैसे आचार
व्यवहार किये जाते हैं उसका प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। सन्तान
के उत्पन्न होने तक माता के विचारो का असर सन्तान पर पड़ता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७१
सन्तान पर माता पिता के रोगों का प्रभाव
जिस प्रकार गर्भावस्था में गर्भवती के आचार विचार तथा
अन्य कामो का प्रभाव सन्तान पर पडता है उसी प्रकार माता
पिता के रोगो का भी प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। यह प्रभाव
ऐसा भयंकर होता है कि माता पिता की अज्ञानता और मुर्खता
से सन्तान का जीवन नष्ट होजाता है। सन्तान जीवन पर्यन्त कष्ट
भोगती है और बहुतेरे बच्चे गर्भ मे ही तथा उत्पन्न होते ही
काल का कलेवा बनजाते हैं।
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम सन्तान
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम और आरोग्य तथा दीर्घजीवी
सन्तान उत्पन्न होती है और दूषित तथा रोगी रज वीर्य से अनेक
दोषो वाली तथा रोगी सन्तान उत्पन्न होती है। इस कारण
यहां मै शुद्ध रज वीर्य और रज क्या है, वीर्य क्या है, स्त्री
और पुरुष के रजवीर्य तथा जननेन्द्रियो मे किस प्रकार रोग
उत्पन्न होते है और उनका प्रभाव सन्तान पर कैसा पडता है
इस विषय को प्रसगानुसार लिखूगी।
सन्तान होने में बालक रोग
वीर्य को अधिक व्यय करने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है।
जो अज्ञानी पुरुष वाल्यावस्था मे कुसंगति मे पड़कर अपने वीर्य
को अपने हाथ से नष्ट करते हैं उसे हस्तमैथुन कहते हैं। आगे
चलकर जवानी मे उन्हें २० बीस प्रकार के प्रमेहों में कोई सा प्रमेह
उत्पन्न होता है। प्रमेह वीर्य सम्बन्धी बडे भारी रोगो मे एक रोग
है। वैद्यक शास्त्र बतलाता है कि प्रमेह रोग स्वभाव से ही महादुष्ट
रोगी है। इस कारण इसका इलाज बडी सावधानी से करना
चाहिये। प्रमेह रोग मे पुरुष की जान मे प्रकट रूप मे कोई विशेष
कष्ट तो शुरू मे होता नही क्योंकि स्वप्न मे वीर्य निकल जाने से
कोई तकलीफ मालूम नही होती, पाखाना फिरते समय जोर
करने मे धातु निकलना कुछ भी दुखदाई नही प्रतीत होता,
पेशाब के साथ धातु जाने मे भी कुछ दिक्कत नहीं होती। संभोग
के समय शीघ्रपात होना इत्यादि किसी प्रकार के धातु विकार
मे कुछ तकलीफ मालूम न होने से रोगी पुरुष कुछ भी परवाह
नही करते और कुछ चिन्ता भी नही रहती। दुनियां के सभी काम
रोते भीकते गिरते पडते चले ही जाते हैं।
रोग बढ़ते बढ़ते जब अधिक बढ़ जाता है और शरीर आल सी
और असमर्थ होता मालूम होने लगता है तब कुछ २ चिन्ता होती
है सो भी ऐसी नही कि लगाकर औषधि हो जिससे रोग दूर होजावे।
प्रमेह मौजूद है और सहवास मे कमी न होने पावे यह विचार
सदैव बना रहता है। औषधि मगाया करते हैं सो भी प्रमेह की
नहीं, शीघ्रपात की। जिससे स्त्री प्रसन्न रहे। वे लोग महामूर्ख हैं
जो प्रमेह रोगो को सरल समझ कर परवाह नही करते वे अपने
पैरो मे आप कुल्हाड़ी मारते हैं। सन्तान भी वैसी ही होती है।