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सर्वकोश
विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

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पृष्ठ 388

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २५३
सुख और आनन्द भोगने के लिये, उत्तम सन्तान उत्पन्न करने
के लिये उत्तम आदर्श स्वास्थ्य रखने के लिये है। जो अज्ञानी पुरुष
केवल रतिसुख को ही जीवन का सुख मानते हैं वे ससार मे
आकर इस जीवन मे कुछ नही करते। कुछ दिन मे रतिसुख से
उन्हे इतने अधिक दुःख उठाने पडते हैं कि वे पछताते और स्वय
कहते हैं कि जीवन व्यर्थ है क्योकि मेरे पास ऐसे रोगी पुरुषो
की लाखो चिट्ठिया अब तक आ चुकी हैं और अनेक चिट्ठियां
प्रतिदिन आया करती हैं। उन्होंने विवाह होते ही रतिसुख को
ही जीवन का सर्वस्व समझकर अनियम रतिक्रिया करके अपनी
निरपराध प्यारी पत्नी को अनेक रोगो का घर बना दिया और
आप भी रोगी हो गये तथा सन्तान भी रोगी निर्बल और दुर्बल
उत्पन्न हुई।
महात्मा भर्तृहरि जी ने ठीक कहा है —
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता-
स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याता-
स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
अर्थात् हमने विषयो को नही भोगा परन्तु विषयो ने ही हमारा
भुगतान कर दिया अर्थात् विषयवासना को हमने खतम नही
किया उसने ही हमारा खातमा करदिया, हमने तप न तपा परन्तु