विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ आनन्द मन्दिर
तप ने ही हमे तपा डाला, काल व्यतीत नही हुआ परन्तु काल ने
हमे बिता दिया अर्थात् हमारी उम्र बीत गई, तृष्णा पुरानी नहीं
हुई परन्तु हम ही पुराने हो गये।
और भी शास्त्रकारो ने कहा हैः—
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मैव भूय एवाभिवर्द्धते ॥
मनुष्य की विषय भोगो से शान्ति नही होती इसका ऐसा
प्रभाव है कि इसमे जितनी ही मनुष्य तृप्ति की इच्छा करता है
उतनी ही इच्छा और भी अधिक प्रबल होती जाती है।
मनुष्य की कामाग्नि उस अग्नि की समान है कि जिसमे
चाहे जितना घी डालते जाओ परन्तु अग्नि और भी अधिक
तेज होती है, कम नही होती। अग्नि की शान्ति नही होती
और असख्य मन घी स्वाहा हो जाता है इसी प्रकार मनुष्य
का यह असंख्य धन से भी कीमती जीवन कामाग्नि की तृप्ति
मे ही भस्म हो जाता है।
मेरे पास ऐसी रोगी स्त्रियो के प्रति दिन बीसो पत्र आया
करते है कि जिनके पतियो ने अनियम रतिक्रिया करके थोडी ही
अवस्था मे अपने शरीर का सत्यानाश मार लिया है इसी के
कारण क्षय आदि भयकर रोगो मे न जाने कितने नवयुवक
दम्पति काल का कलेवा बनते जारहे हैं और बनेगे।