विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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८४ : विज्ञानभैरव
मन की तुष्टि का तात्पर्य मन के आह्लाद में है, मन के क्षोभ में नहीं। मन पर नियं-
त्रण न रखने पर नाना प्रकार के विकल्पों से क्षुब्ध होकर वह मन योगी को योगारूढ़ दशा से
गिरा देता है। काम, क्रोध आदि के क्षोभ को शान्त करके ही योगी मन को स्थिर कर
सकता है। इसलिये कामिनी के वदन-कमल सरीखी जिस-जिस मनोहर वस्तु में, पाँच ज्ञानेन्द्रियों
और पाँच कर्मेन्द्रियों के विषयों में, मन रमता हो, उसको वहीं स्थिर रखने का अभ्यास करे
कि कामिनी के मनोहर शरीर जैसे सभी विषयों में चित् ओर आनन्दमय शिवस्वरूप में मैं ही
विद्यमान हूँ, यह सब मेरी हो विभूति है। इस तरह से काम आदि के क्षोभ को अपने स्वरूप
में ही विलीन करके; अपनी बुद्धि को एकाग्र अर्थात् स्थिर करके योगी यह भावना करे कि
मेरा अपना स्वरूप ही सर्वत्र स्पन्दित हो रहा है। साधारण व्यक्ति का भी शुभ अथवा
अशुभ जिस किसी विषय में मन लग जाता है, तो उस समय अन्य सारी बातों को वह भूल
जाता है। इसी स्थिति को केन्द्र-बिन्दु बना कर योगी जब भावना के अभ्यास से मन की
एकाग्रता को बढ़ाता जाता है, तो उसकी परम आनन्दमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठा हो
जाती है।
तात्पर्य यह है कि साधक को चाहिये कि अतिशय सुन्दर रूप को देखकर भी अपनी
शक्ति के अनुसार मन को पवित्र रखे, उसको मलिन न होने दे। मुमुक्षु साधक की दृष्टि
से यह बात कही गई है। मुक्त साधक में तो इस तरह का क्षोभ उठेगा ही नहीं, क्योंकि
सात प्रकार की समाधि के अभ्यास से उसका मन सदा समाधिस्थ रहता है। उसमें इस
तरह के क्षोभ की लहरियों के उठने का कोई अवसर नहीं है। समाधि और उसके सात
भेदों का वर्णन आगे (श्लो० ११३) किया जायगा। जब साधक के मन का क्षोभ शान्त हो
जाता है, तभी उसको परम पद की प्राप्ति होती है, इस बात को स्पन्दकारिका में भी कहा
गया है—
यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात् परं पदम् । (श्लो० ९)
इसी स्थिति से मिलती जुलती स्थितियों का वर्णन "कामक्रोध०" (श्लो० ९९) और
"यत्र यत्र" (श्लो० ११३-११४) इत्यादि श्लोकों में भी किया गया है। इनकी व्याख्या
वहीं की जायगी। स्वच्छन्दतन्त्र में भी—
यत्र यत्र मनो याति ज्ञेयं तत्रैव चिन्तयेत् ।
चलित्वा यास्यते कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥ (४।३१३)
यहाँ इसी स्थिति का वर्णन किया गया है। शिवदृष्टिकारक भी कहते हैं—
शिवभावनयौषध्या बद्धे मनसि संसृतेः ।
काष्ठकुड्यादिषु क्षिप्ते रसवच्छ्वहेमता ॥ (७।४७-४८)
अर्थात् जैसे अनेक प्रकार की जड़ी-बूटियों में बाँधकर उनके रसों के प्रभाव से रासा-
यिनक परिवर्तन के आधार पर पारा सोना बन जाता है, उसी भांति सभी पदार्थों में शिव
की भावना रूपी औषधी से मन को बाँधकर, अर्थात् सब कुछ शिवमय ही है, इस भावना से
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ८५
मन का परिष्कार कर देने पर वह परिष्कृत मन काष्ठ (लकड़ी), कुड्य (भित्ति) आदि सभी
पदार्थों में शिवता को ही देखने लगता है ॥७३॥
[ धारणा-५१ ]
¹अनागतायां निद्रायां १प्रणष्टे बाह्यगोचरे ।
२सावस्था मनसा गम्या परा देवी प्रकाशते ॥७४॥
निद्रायामनागतायामपि जागरदशायां चित्तवृत्तौ तमसा आच्छन्नायां सत्यां
बाह्यगोचरे बाह्ये विषयपञ्चके प्रणष्टे विनष्टदर्शने या अवस्था निरावरणा मध्येऽस्ति,
सा मनसा गम्या स्वसंविदवष्टम्भस्वीकार्या, तथा सति सैवावस्था परादेवीत्वेन प्रका-
शते भाति ॥७४॥
अभी ठीक तरह से नींद नहीं लगी है, व्यक्ति जब जगा हुआ ही है, किन्तु नींद
आने वाली है, उस स्थिति में उसकी चित्त की वृत्ति तमोगुण से आच्छन्न होने लगती है ।
तब बाहरी विषय उसकी आँखों (सभी ज्ञानेन्द्रियों) के सामने रहते हुए भी उसको दिखाई
नहीं पड़ते । यह जाग्रत् अवस्था और स्वप्नावस्था के बीच की स्थिति है । इस अवस्था में
बाह्य विषयों के रहते हुए भी उनका भान नहीं होता । साधक को अपनी संवित्ति (चेतना)
में इसी स्थिति को लाने का अभ्यास करना चाहिये, जब कि बाह्य विषय उसके सामने रहते
हुए भी न रहने के समान हो जाय । इससे साधक का मन निर्विकल्प हो जाता है, बाह्य
विकल्पों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, वह उनको देखता हुआ भी नहीं देखता । उक्त
दोनों (निद्रा और जाग्रत्) अवस्थाओं के बीच की इस स्थिति को परावस्था कहा जाता है ।
इस परावस्था में साधक का परा देवीमय स्वरूप भासित होने लगता है । इस स्थिति का
वर्णन ²योगवासिष्ठ में भी किया गया है—
निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपजायते ।
तं भावं भावयन् साक्षादक्षयानन्दमश्नुते ॥
यहाँ केवल शब्दों का ही अन्तर है । अर्थ दोनों श्लोकों का एक ही है । विज्ञानभैरव
के प्रस्तुत श्लोक को उद्धृत कर क्षेमराज ने स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) में तथा महेश्वरानन्द ने
परिमल (पृ० १८७) में परा देवी के स्वरूप का भली-भाँति विश्लेषण किया है ॥७४॥
[ धारणा-५२ ]
³तेजसा सूर्यदीपादेराकाशे शबलीकृते ।
दृष्टिं३निवेश्या तत्रैव स्वात्मरूपं प्रकाशते ॥७५॥
१. विनष्टे-स्प०, म० । २. या०-म० । ३. ०ष्टि निवेश्य-ने० ।
- स्पन्दनिर्णय (पृ० ५६) और महार्थ० परि० (पृ० १८७) में उद्धृत है ।
- शिवोपाध्याय ने इस श्लोक को वासिष्ठ दर्शन का बताया है । योगवासिष्ठ में यह उप-
लब्ध नहीं है । - नेत्रतन्त्र (भा० १, पृ० २००) की उद्योत टीका में यह उद्धृत है ।
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८६ : विज्ञानभैरव
दिवसे सूर्यकिरणप्रकाशेन, रात्रौ च चन्द्रज्योत्स्नया शबलीभूतमहाकाशसंब-
न्ध्यूर्ध्वाधोवर्तिस्थानविशेषे, गृहैकदेशवर्तिदीपप्रकाशव्याप्तप्रकोष्ठाकाशचित्रस्थाने वा
अव्यग्रमनस्कतया दृष्टिबन्धमभ्यस्यतः स्वस्वरूपचिदाकाशैकीभावेन स्वात्मस्वरूपाभि-
व्यक्तिर्जायते ॥७५॥
दिन में ऊपर-नीचे, सब तरफ बाहरी आकाश के सूर्य की किरणों से प्रकाशित स्थान
में, रात्रि में चन्द्रमा की चांदनी से आलोकित उन सभी स्थानों में अथवा घर के एक कोने में
रखे हुए दीपक की ज्वाला से प्रकाशित प्रकोष्ठ (कमरा) के चित्रित (चिह्नित) स्थान में मन को
एकाग्र कर दृष्टि को निर्निमेष स्थिर रखने का अभ्यास करने पर योगी के चित्त में उसी
स्थिति में स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति हो जाती है। सर्वत्र स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति
होने से, सर्वत्र चिदाकाश की स्फूर्ति होने से वह योगी अपनी ज्ञानदृष्टि से समस्त भुवनों की
जानकारी रखता है। “भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्”, “चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्” (३।२६-२७)
इन दो पातंजल योगसूत्रों में इसी स्थिति का वर्णन है।
नेत्रतन्त्र के “नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों में इस तरह की
धारणाओं का निषेध है। क्षेमराज ने इन श्लोकों की व्याख्या करते हुए विज्ञानभैरव के अनेक
श्लोकों को उद्धृत करते समय इस भावना को भी इसलिये निषिद्ध माना है कि इसमें आणवी
धारणा वर्णित है। इस दोष के परिहार के लिये शिवोपाध्याय ने इस श्लोक की दूसरी व्याख्या
इस तरह से की है—सूर्य प्रभृति में ¹संयम का अभ्यास करते समय स्वात्मस्वरूप चिदाकाश
में एकाकारता की, अभेद की, प्रतीति ही स्वात्मस्वरूप का प्रकाश है। यह स्वात्मस्वरूप ही
सब से अधिक अभिलषणीय वस्तु है। अतः इ स धारणा का मुख्य फल यही है, चतुर्दश भुवन,
ताराव्यूह आदि का ज्ञान तो गौण फल है ॥७५॥
[ धारणा-५३ ]
²करङ्किण्या क्रोधनया भैरव्या लेलिहानया ।
खेचर्या दृष्टिकाले च परावा¹प्तिः प्रकाशते ॥७६॥
करङ्किण्या विगतचेष्टं करङ्कमात्रं शवमिव विश्वं पश्यन्त्या, क्रोधनया क्रोधव्यग्रया,
भैरव्या दृक्शक्त्या, लेलिहानया भोक्तुमेवाग्रया, खेचर्या दूरमाकाशदर्शनार्थं प्रसृतया मुद्रया
उपलक्षिते परावाप्तिः प्रकाशते परादेवीप्रकाशनं श्रीव्योमेशीवामेश्वरीत्यादिशब्दवाच्याया
निष्कलादेव्याः सात्म्यं भवति । पाञ्चभौतिकं शरीरं परमाकाशे या विश्रामयति सा कर-
ङ्किणीति ज्ञानसिद्धानां मुद्रा, चतुर्विंशतितत्त्वकं मान्त्रे वपुषि या क्रोडीकरोति सा क्रोध-
नीति मन्त्रसिद्धानां मुद्रा, स्वस्मिन् या सर्वं संहरते सा भैरवीति मेलापसिद्धानां मुद्रा
१. व्याप्तिः-ख०, म० ।
१. “त्रयमेकत्र संयमः” (३।४) इस योगसूत्र के अनुसार किसी एक विषय पर धारणा, ध्यान
और समाधि को केन्द्रित कर देने में संयम शब्द का प्रयोग किया जाता है।
२. इस श्लोक से लेकर ८१ संख्या तक के श्लोक महार्थ० परि० (पृ० ८९-९०) में
एक साथ उद्धृत हैं।
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विज्ञानभैरव : ८७
पूर्णत्वेन या सर्वं पुनः पुनरास्वदते सा लेलिहानेति शाक्तसिद्धानां मुद्रा, शक्तिव्यापि-
न्यादिषु खेषु सदा चरति या सा खेचरीति शाम्भवसिद्धानां मुद्रा ॥७६॥
महार्थमंजरी प्रभृति ¹क्रमदर्शन के ग्रन्थों में करंकिणी, क्रोधना, भैरवी, लेलिहाना और
खेचरी नाम की पांच मुद्राएं प्रसिद्ध हैं । सारे जगत् को संज्ञाशून्य करंक (कंकाल=अस्थिपंजर)
के समान देखने वाली मुद्रा करंकिणी कहलाती है । क्रोध से भरी मुद्रा क्रोधना, दृक् शक्ति
भैरवी, सबको चाट जाने में लगी लेलिहाना और दूर आकाश तक फैली मुद्रा खेचरी कही
जाती है । ये मुद्राएं जब अपने अपने काम में लग जाती हैं, तो उनमें परा देवी का प्रकाश
आलोकित हो उठता है । इस स्थिति में जो साधक इन मुद्राओं की अपने में भावना करता है,
उसका व्योमेशी, वामेश्वरी आदि नामों से बोधित होने वाली निष्कला देवी से सात्म्य (अभेद)
स्थापित हो जाता है ।
करंकिणी मुद्रा पांचभौतिक शरीर को परम आकाश में विलीन कर देती है, इसके
साधक ज्ञानसिद्ध कहलाते हैं । क्रोधनी मुद्रा पृथिवी से लेकर प्रकृति पर्यन्त चौबीस तत्त्वों को
मन्त्रमय शरीर में इकट्ठा कर देती है, इसके साधक मन्त्रसिद्ध कहलाते हैं । भैरवी मुद्रा अपने
स्वरूप में सारे जगत् को विलीन कर लेती है, इसके साधक मेलापसिद्ध कहलाते हैं । लेलिहाना
मुद्रा सारे जगत् का अपने पूर्ण विमर्शमय स्वरूप में बार बार आस्वादन करती रहती है, इसके
साधक शाक्तसिद्ध कहलाते हैं । खेचरी मुद्रा शक्ति, व्यापिनी आदि स्थानों में सदा विचरण
करने वाली है, इसके साधक शांभवसिद्ध कहलाते हैं ।
करंकिणी आदि की दूसरी व्याख्या इस प्रकार है—करंक देह को कहते हैं, . इस देह
के कारण जिसकी प्रतीति होती है, वह करंकिणी कहलाती है । मूलाधार से पैदा होने वाली
मुद्रा क्रोधनी, समस्त जागतिक स्वरूपों का संहार कर देने वाली भैरवी, वासनात्मक पुर्यष्टक
का नाश करने वाली लेलिहाना और आवरक द्रव्य के अभाव में ज्ञानरूपी गगन में अपने
स्वरूप में प्रतिष्ठित रहने वाली मुद्रा ²खेचरी के नाम से प्रसिद्ध है ।
- काश्मीर का शैव (प्रत्यभिज्ञा) दर्शन त्रिक दर्शन कहलाता है। त्रिक शब्द की अनेक व्याख्याएं
मिलती हैं, किन्तु इसमें कुल, क्रम और प्रत्यभिज्ञा इन तीनों अद्वैतवादी दर्शनों के तत्त्वों की
समष्टि होने से इसको यह नाम दिया गया है। क्रम दर्शन को काली नय भी कहते हैं।
इसमें शाक्त उपाय का सहारा लिया जाता है। तन्त्रालोक के चतुर्थ आह्निक में और
महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में क्रम दर्शन का अच्छा विश्लेषण मिलता है। स्वर्गीय डॉ०
कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने और विशेष कर उनके प्रिय शिष्य डॉ० नवजीवन रस्तोगी ने क्रम
दर्शन पर सराहनीय कार्य किया है। - शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत निम्न श्लोक में खेचरी मुद्रा की फलश्रुति बताई गई है—
"इयं सा परमा मुद्रा ह्यापातालाच्छिवावधि । तर्पयित्वा जगत्सर्वं निजसंस्थानतः स्थिता ॥"
अर्थात् यह खेचरी मुद्रा सर्वोत्तम मानी गई है । पाताल लोक से लेकर शिवलोक (अना-
श्रित भुवन) पर्यन्त २२४ भुवनों वाले इस सारे जगत् को आप्यायित करती हुई भी यह
सदा अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहती है ।
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८८ : विज्ञानभैरव
निष्क्रियानन्दनाथ करंकिणी मुद्रा को करांकिणी कहते हैं। निम्न दो श्लोकों में उन्होंने
इनका लक्षण और स्वरूप बताया है—
करास्त्रयोदशाकाराः सर्वाक्षक्षोभवृत्तयः।
अङ्कं तु निर्निकेतायाः संविदो देहविस्तरः ॥
एतत्कराङ्कमाख्यातं तस्य ग्रासादनावृतम्।
निष्कराङ्कं समुद्दिष्टं निरालम्बं परं पदम् ॥
अर्थात् 'क' उन ^1तेरह आकारों को कहते हैं, जो कि सभी इन्द्रियों में क्षोभ उत्पन्न करते हैं।
'अंक' उस निर्निकेत (निराधार = निर्विषय) संवित् स्वरूपिणी भगवती के विस्तार को, विराट्
स्वरूप को कहते हैं। अपने निर्विकल्प, निष्कल स्वरूप में जब यह संवित् स्वरूपिणी भगवती
इस करांक को, अर्थात् प्रमाण-प्रमेय स्वरूप सारे जगत् को अपने सकल स्वरूप के साथ समेट
लेती है, तो यह उसका निष्करांक स्वरूप कहलाता है। इस निष्करांक स्वरूप को न तो कोई
छिपा सकता है और न कोई अपने स्वरूप के सिवाय इसका आश्रय ही बन सकता है। इसका
यह निरावरण और निरालम्ब स्वरूप ही वास्तविक है।
इस विषय को विस्तार से इस तरह समझा जा सकता है—परम आकाश रूपी समुद्र
में, जो कि क्रमदर्शन में 'महाकौलार्णव' नाम से प्रसिद्ध है, अकुल स्वरूपिणी शक्ति की लहरें
उठती हैं। इसकी प्रथम अवस्था को 'पर' नाम से जाना जाता है। यही शक्ति जब सूक्ष्म
रूप में अवतरित होती है, तो उसके अकुल स्वरूप में से क्रमशः कुलपंचक की सृष्टि होने की
प्रक्रिया तो आरम्भ हो जाती है, किन्तु वह सूक्ष्म रूप में, आश्यान दशा (घनावस्था) में एका-
कार बनी रहती है। शक्ति की यह अवस्था व्योमेश्वरी कहलाती है। यह यद्यपि निष्कल है,
तो भी यह आद्या शक्ति सकल स्वरूप में रमण करती हुई वृन्दचक्र पर्यन्त त्रिभुवन में भासित
होती रहती है। कितना भी विश्लेषण किया जाय, उसका स्वरूप नहीं बदलता, वह एकाकार
ही रहती है। इसी का जब विकास होने लगता है, तो उस समय परम आकाश रूपी समुद्र
में अव्यक्त रूप से खेचरी आदि स्वरूपों की प्रतिष्ठा उसी तरह से होने लगती है, जैसे कि
मयूर के अंडे के रस में मयूर के शरीर के रूप में भविष्य में अभिव्यक्त होने वाले सभी वर्ण
अव्यक्त अवस्था में विद्यमान रहते हैं। उस परम आकाश रूपी समुद्र की यह स्पन्दात्मक
पहली लहर वामेश्वरी कहलाती है। यही इसका पहला परिणाम है। दिव्यौघ के पाँच चक्रों
को विकसित करने वाली वृन्दचक्र की नायिका यह वामेश्वरी ही 'सभी पदार्थ सर्वात्मक हैं'^2
इस तान्त्रिक सिद्धान्त के अनुसार वृन्दचक्र में अपने को डालकर पाँच रूपों में अभिव्यक्त होती
- "करणं त्रयोदशविधं" (३२) सांख्यकारिका के इस श्लोक में पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय
और तीन अन्तःकरण इन सबको मिलाकर तेरह करण प्रतिपादित हैं। यह त्रयोदशविध
करण ही क्षोभ के कारण हैं। - इस सिद्धान्त का संक्षिप्त प्रतिपादन पहले पृ० ६१ की टिप्पणी में किया जा चुका है।
इसके लिये श्लोक १०३ की व्याख्या भी देखनी चाहिये।
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विज्ञानभैरव : ८९
है। इसके ये स्वरूप शांभव, शाक्त, मेलाप, मन्त्र और ज्ञान के नाम से जाने जाते हैं। ये
स्वरूप वामेशी, खेचरी, भूचरी, संहारिणी और रौद्री शक्ति से अधिष्ठित होकर ६४ योगि-
नियों के रूप में परिणत हो जाते हैं। ये ६४ योगिनियां अपने विभिन्न स्वरूपों का परित्याग
कर एकीकार दशा में रौद्रेश्वरी के स्थान में निवास करती हैं, तब सभी प्राणियों का मंगल
करने वाला यह ६५वां स्वरूप महाराज्ञी मंगला भगवती के नाम से प्रसिद्ध होता है। यही स्वरूप
जब परावस्था में पहुँच जाता है, तो साधक में सामरस्य भाव की उत्पत्ति होती है। जैसे कि
अकार आदि वर्ण स्वर कहलाते हैं। ये सोलह होते हैं। इनको ज्ञानसिद्ध कहा जाता है।
ककार से लेकर मकार पर्यन्त पचीस व्यंजन मन्त्रसिद्ध हैं। स्वर और व्यंजनों से मिली हुई
बारह मात्राएँ अथवा प्रणव की कलाएँ मेलापसिद्ध हैं। यकार से लेकर हकार पर्यन्त आठ
व्यंजन शाक्तसिद्ध और आदि वर्ण अकार की अम्बिका, वामा, ज्येष्ठा और रौद्री ये चार
कलाएँ शांभवसिद्ध कहलाती हैं। इन्हीं के कारण अकार चतुष्कल भट्टारक कहलाता है। अकार
की चार कलाओं का वर्णन संकेतपद्धति में इस प्रकार से है—
आदौ यस्य शिरो रौद्री वक्त्रं वामा प्रकीर्तिता।
अम्बिका बाहुरित्युक्ता ज्येष्ठा चैवायुधे स्थिता ॥
यह आदि वर्ण अकार ऊपर वर्णित चौसठ रूपों में ज्ञान, मन्त्र, मेलाप, शाक्त और शांभव
सिद्ध नाम से अभिहित होने वाले पदार्थों के भीतर वाचक रूप में विद्यमान रहता है। क्रम-
दर्शन में यह प्रक्रिया वृन्दचक्र के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रक्रिया का वर्णन महेश्वरानन्द ने—
धाममुद्रावर्णकलासंवित्भावस्वभावतः ।
पातानिकेतदृष्टचा च वृन्दचक्रं प्रकाशितम् ॥ (पृ० ८९)
इस श्लोक में संक्षेप में किया है और आगे कुछ विस्तार से धाम, मुद्रा, वर्ण, कला,
संवित्, भाव, पात और अनिकेत के भेद से वृन्दचक्र को विस्तार से समझाया है। वृन्दचक्र
का दार्शनिक स्वरूप शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत श्लोक में संक्षेप में वर्णित है—
ज्ञानं खकौलार्णवर्मिरूपं स्वबोधविश्रान्तिविमर्शमन्त्रः ।
मेलापसिद्धं स्वविमर्शशून्यं शाक्तं महासंहृति शाम्भवं खम् ॥
इस श्लोक में निहित भाव की व्याख्या ऊपर की जा चुकी है। इस ¹वृन्दचक्र की भावना
करने से साधक की परावस्था प्रकाशित हो जाती है। महार्थमंजरीपरिमल (पृ० ८९) में इसी
प्रसंग में विज्ञानभैरव का यह श्लोक उद्धृत है। वहीं (पृ० ९०) महेश्वरानन्द ने यह भी
बताया है कि इन पाँच मुद्राओं को साधने की विधि विज्ञानभैरव में ही आगे के पाँच श्लोकों
में बताई गई है ॥७६॥
- शिवोपाध्याय इस श्लोक की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करने के बाद लिखते हैं कि वृन्दचक्र
का निर्णय भट्टारक कृत प्राकृतत्रिशिका के विवरण में अनेक प्रकार से किया गया है।
इस विषय का विस्तार वहीं देखना चाहिये (पृ० ६९)। खेद का विषय है कि यह ग्रन्थ
आज मिलता नहीं।
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९० : विज्ञानभैरव
[ धारणा-५४ ]
मृद्वासन स्फिक्जैकेन हस्तपादौ१ निराश्रयम्२ ।
निधाय३ तत्प्रसङ्गेन परा पूर्णा मतिर्भवेत् ॥७७॥
निराश्रयं यथा भवति तथा हस्तौ पादौ च निधाय कृत्वा मृद्वासने कोमले
चैलाद्यासने एकेन स्फिजा कटिप्रोथेन स्थितस्य तत्प्रसङ्गेन धारणाया अस्या अभ्यासेन
तादृगासनप्रकृष्टतरस्थित्या परा पूर्णा मतिर्भवेत् सर्वाङ्गेषु प्रत्यंशं साकल्येन चेतयन्ती
विगलिततमोरजस्का सात्त्विकी मतिर्भवेत् ॥७७॥
ऊँचे-नीचे अथवा कड़े आसन पर बैठने पर भावना में चंचलता आ सकती है, अतः
वस्त्र, ऊन, मृगचर्म आदि के कोमल आसन पर साधक को बैठना चाहिये। उस कोमल आसन
पर गावतकिये के सहारे वह साधक इस तरह से बैठे कि उसका आधा शरीर ही उस आसन
पर टिका रहे। बाकी शरीर को वह ढीला छोड़ दे। इस स्थिति का अभ्यास करते रहने से
शरीर को बड़ा आराम मिलता है। इसी सुखमय स्थिति में चित्त को स्थिर कर देने पर
योगी के सारे शरीर में तमोगुण और रजोगुण से निर्लिप्त शुद्ध सात्त्विक बुद्धि का प्रकाश
फैल जाता है, अर्थात् कोमल आसन पर आराम से बैठने से कुछ क्षण के लिये परम विश्राम
की अनुभूति होती है, उस विश्रान्ति दशा में चित्त को लगा देने पर वह बढ़ती जाती है और
अन्त में योगी का कण-कण उसी आनन्द से आप्लावित हो उठता है ॥७७॥
[ धारणा-५५ ]
उपविश्यासने सम्यग् बाहू कृत्वाऽर्ध४कुञ्चितौ ।
कक्षव्योम्नि मनः ५कुर्वन् शममायाति ६तल्लयात् ॥७८॥
आसने सम्यगुपविश्य बाहू अर्धकुञ्चितौ सामिकुञ्चितौ, 'अवकुञ्चितौ' इति
पाठे संकुचितौ, कृत्वा कक्षव्योम्नि उभयकक्षाकाशे मनः कुर्वन् चित्तस्यैकाग्रतां
निष्पादयन्, 'निराकुर्वन्' इति पाठे संकुचितौ बाहू कक्षव्योम्नि स्थापयन्, तल्लयात्
मनसोऽस्यां मुद्रायां साधितायां लीनत्वाद्धेतोः शममायाति शान्तस्वात्मस्वरूपमभि-
व्यज्यते ॥७८॥
आसन पर ठीक तरह से बैठकर अपने बाजुओं को थोड़ा तिरछा करके समेट कर
उनको अपनी कांख के पास सुविधापूर्वक आराम से टिका दे। इस स्थिति में भी कुछ क्षणों
के लिये परम विश्रान्ति का अनुभव होता है। कक्षि (कांख) गत आकाश में उत्पन्न इस
विश्रान्ति दशा में चित्त की एकाग्रता को बढ़ाने से यह मुद्रा सिद्ध हो जाती है और मन उसी
स्थिति में लीन हो जाता है। उसके शान्त हो जाने से साधक का शान्त स्वात्मस्वरूप अभि-
व्यक्त हो जाता है। नाना विकल्पों की लहरियों के उठते रहने से मन जब अशान्त रहता है,
१. °पादं-म०। २. °ये-ख०। ३. वि°-ख०, म०। ४. °व°-ख०। ५. निरा°-ख०।
६. चिं°-म०।
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विज्ञानभैरव : ९१
तो उसके कारण स्वात्मस्वरूप का बोध नहीं हो पाता। किन्तु मन जब शान्त हो जाता है,
तो अब तक छिपा हुआ उसका स्वात्मबोध प्रकट हो जाता है ॥७८॥
[ धारणा-५६ ]
स्थूलरूपस्य भावस्य स्तब्धां दृष्टिं निपात्य च ।
अचिरेण निराधारं मनः कृत्वा शिवं व्रजेत् ॥७९॥
स्थूलरूपस्य घटदेहादेर्भावस्य उपरि स्तब्धां निरुन्मेषानिमेषां दृष्टिं निपात्य,
चशब्दादन्तर्लक्ष्यां च कृत्वा अचिरेण सत्वरं मनो निराधारं परिहृतविकल्पं यथा
भवति तथा विधाय किञ्चिदप्यचिन्तयन् शिवं परमात्मैक्यं व्रजेत् प्राप्नुयात् ॥७९॥
स्थूल रूप वाले घट, पट, देह आदि भावों पर उन्मेष-निमेष से रहित अत एव स्तब्ध
(एक टक) दृष्टि डाले और उसको अन्तर्मुख बनाने का अभ्यास करे। इस मुद्रा का बार-बार
अभ्यास करते रहने से मन बाह्य आलम्बनों से छुटकारा पा जाता है, वह शीघ्र ही सभी
प्रकार के विकल्पों से शून्य हो जाता है। इस तरह से साधक का चित्त जब सभी बाह्य
विषयों की चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है, तो उसको शिवभाव ही प्राप्ति हो जाती है, सभी
पदार्थों के साथ उसकी परम एकता स्थापित हो जाती है ॥७९॥
[ धारणा-५७ ]
मध्यजिह्वे स्फारितास्ये मध्ये निक्षिप्य चेतनाम् ।
होच्चारं मनसा कुर्वंस्ततः शान्ते प्रलीयते ॥८०॥
मध्येऽन्तराले एव जिह्वा यस्य, ईदृशे विस्फारिते च आस्ये सति, तन्मध्ये
विस्फारितमुखमध्ये चेतनां बुद्धिं निक्षिप्य होच्चारम् अनच्छहकारमात्रोच्चारं मनसैव
कुर्वन् ततः शान्ते स्वात्मस्वरूपे प्रलीयते विलीनो भवति। शान्तात्मा प्रकाशत
इत्यर्थः ॥८०॥
अपने मुँह को फैलाकर जिह्वा को उलट कर ऊपर तालु प्रदेश में ले जाने से खेचरी
मुद्रा बनती है। इस मुद्रा में अपनी बुद्धि को स्थिर करके केवल मन से अनच्छ (स्वर रहित)
हकार का उच्चारण करने से साधक शान्त अवस्था में लीन हो जाता है। अर्थात् उसका
शान्त स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है।
1प्राण की उच्छ्वास दशा में स्वाभाविक रूप से ‘हं’ का तथा निश्वास दशा में ‘सः’
का उच्चारण होता है—
सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः। (श्लो० १५३)
अर्थात् यह प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और हकार के साथ पुनः प्रविष्ट
होता है। इस वचन के अनुसार प्राण की श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया में ‘हं सः सो हं’ इस अजपा
- पृ० २९-३० की टिप्पणी द्रष्टव्य।
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९२ : विज्ञानभैरव
गायत्री का स्वाभाविक रूप से दिन-रात अनवरत जप चलता रहता है । किन्तु खेचरी मुद्रा
की साधना में जिह्वा के तालु प्रदेश में ही रहने से सकार का बहिर्गमन नहीं होने पाता,
अर्थात् सकार का उच्चारण नहीं होने पाता । अतः उस अवस्था में केवल स्वर रहित हकार
का ही उच्चारण होता है । इसीलिये श्लोक में अनच्क हकार के उच्चारण की बात कही गई
है । इस खेचरी मुद्रा की साधना में भ्रूमध्य में अपनी दृष्टि को स्थिर रखना पड़ता है । जैसा
कि विवेकमार्तण्ड में बताया गया है—
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा ।
भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥
अर्थात् जब जिह्वा को उलट कर तालुप्रदेश में विद्यमान कपालकुहर में प्रविष्ट करा
दिया जाता है और दृष्टि को भ्रूमध्य में स्थिर कर दिया जाता है, तो यह खेचरी मुद्रा कहलाती
है । गीता के निम्न श्लोक में भी लगभग यही स्थिति वर्णित है—
स्पर्शान् कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः ।
1प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ॥ (५।२७)
अर्थात् बाह्य विषयों को मन से बाहर निकाल दे और नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर कर
दे । साथ ही नासिका के भीतर चलने वाले प्राण और अपान की गति को योगी समान कर दे ।
इस तरह से गीता के इस श्लोक में अजपा स्थिति की ओर इङ्गित किया गया है, क्योंकि
उसी प्रक्रिया के अभ्यास से प्राण और अपान की गति में समता, अन्ततः एकता स्थापित
होती है ॥८०॥
[ धारणा - ५८ ]
आसने शयने स्थित्वा निराधारं वि१भावयन्२ ।
३स्वदेहं४ मनसि क्षीणे क्षणात्५ क्षीणाशयो भवेत् ॥८१॥
अजिन-कौशेय-चक्रालात-तूलपटी-मखमल्ल-शीतलपट्टमयोपधानास्तरणशय्यो-
त्तरच्छदसंवलनसमकालमेव आनन्दमयदशोद्भूतौ मनसि चित्ते क्षीणे लीने सति
१. ॰चिन्तयेत्-म० । २. ॰येत्-ख० । ३. स्वं देहं-म० । ४. ॰हे-ख० । ५. ॰द्
भूता॰-ख० ।
- भगवद्गीता की अनेक व्याख्याएं प्रकाशित हो चुकी हैं, किन्तु श्रीधरी टीका के संक्षिप्त
विवेचन को छोड़कर प्राण और अपान के संबन्ध में कहीं भी कुछ नहीं लिखा गया है ।
श्रीधरी में बताया गया है कि उच्छ्वास और निःश्वास के रूप में नासिका से निरन्तर
प्रवहमान प्राण और अपान की ऊपर और नीचे की ओर की गति को कुम्भक प्राणायाम
के अभ्यास से समान कर दिया जाता है । अथवा प्राण को बाहर आने नहीं दिया जाता
और अपान को भीतर नहीं प्रविष्ट होने दिया जाता, किन्तु नासिका के छिद्र तक ही
सीमित कर दिया जाता है । इस तरह से भी उच्छ्वास और निःश्वास की गति को
समान कर लिया जाता है ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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विज्ञानभैरव : ९३
वेद्यराशौ गलिते सति स्वदेहमपि निराधारं विभावयन् स्वदेहावमर्शस्यापि गलनाद्
आस्तरणाद्याश्रयरहितमेव स्ववपुर्विमृशन् क्षणात् सद्य एव क्षीणाशयो निर्वासनो
भवेत् ॥८१॥
मृगचर्म, रेशमी वस्त्र, गलीचा, ऊनी वस्त्र, सूती कपड़ा, मखमल, शीतलपाटी आदि
से बने कोमल आसन, तकिया, बिछावन, शय्या, चादर आदि का उपयोग करने पर शरीर को
बड़ा आराम मिलता है ओर चित्त की सारी वृत्तियाँ कुछ क्षणों तक क्षीण हो जाती हैं । इस
अवस्था में वृत्तियों के क्षीण हो जाने से चित्त जैसे निराधार हो जाता है । उन कोमल,
सुखद वस्तुओं के उपयोग से चित्त की आनन्द भरी अवस्था के उत्पन्न होने पर योगी अपने शरीर
में इसी निराधार भावना का अभ्यास करे । अर्थात् मैं देह नहीं हूँ, मेरा देह नहीं है, यह कोमल
सुखद आसन आदि के उपयोग से आविर्भूत आनन्द दशा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है, इस
तरह की भावना का निरन्तर अभ्यास करते रहने से अपने शरीर के प्रति भी योगी की निरा-
धार भावना दृढ़ हो जाती है, अर्थात् वह इस बात को भूल जाता है कि मेरा शरीर किन्हीं
कोमल-सुखद वस्तुओं पर टिका हुआ है । अन्ततः उसको अपने शरीर की भी विस्मृति हो
जाती है और इस तरह से उसकी सारी वासनाएं क्षण भर में शान्त हो जाती हैं ॥८१॥
[ धारणा-५९ ]
चलासने स्थितस्याथ शनैर्वा देहचालनात् ।
प्रशान्ते मानसे भावे देवि दिव्यौघमाप्नुयात् ॥८२॥
हे देवि, अथ ¹चलासने अतिचञ्चले गन्त्रीगजतुरगादियानासने स्थितस्य उप-
विष्टस्य तद्यानादिकृतदेहचलत्तया, वा अथवा, स्वयमेव शनैः देहचालनात्, मानसे भावे
प्रशान्ते मनसः सत्तायां विलीनायां साधको दिव्यौघं दिव्यानां लोकानां परमयोगिनाम्
ओघं समूहं तत्तेजस्तत्त्वम् आप्नुयात् प्राप्नुयात् । तस्य परमाकाशचिदानन्दप्रवाहावाप्तिः
स्यादिति भावः ॥८२॥
हे देवि, अत्यन्त चंचल, गतिशील बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी, रथ, हाथी, घोड़ा आदि
सवारियों पर बैठने पर सवारी के चलने से व्यक्ति का शरीर अपने आप हिलने-डुलने लगता
है । साधक को चाहिये कि सवारी पर चढ़ कर चलने से उसका शरीर जो स्वाभाविक रूप
से हिलने-डुलने लगा है, उसको जान-बूझ कर अपनी तरफ से और धीरे धीरे हिलावे-डुलावे ।
अथवा किसी चलासन पर बैठे बिना भी अपने शरीर को उसी तरह से हिलावे-डुलावे जैसे कि
वह चलासन पर बैठ कर चल रहा हो । इस प्रक्रिया के अभ्यास से मन की सत्ता क्षीण होने
लगती है, शरीर के हिलने-डुलने से एक अनोखे सुख का अनुभव होने लगता है, जिसमें कि
कुछ क्षणों के लिये साधारण व्यक्ति की भी चित्त-वृत्ति लीन हो जाती है । इस स्थिति में
- शक्तिसंगम तन्त्र के द्वितीय तारा खण्ड के ४७-४९ पटलों में चलासनों का विस्तार से
वर्णन मिलता है ।
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९४ : विज्ञानभैरव
भावना के अभ्यास से चित्त-वृत्ति को पूरी तरह से विलीन कर देने पर साधक को ^1दिव्यौघ
की प्राप्ति हो जाती है, अर्थात् दिव्य लोकों में ! स करने वाले परम योगियों के तेजोमय
स्वरूप की प्राप्ति उसे हो जाती है, वह परम आकाश के समान सर्वत्र विद्यमान चिदानन्द के
प्रवाह में प्रविष्ट हो जाता है, उसका ज्ञानमय और आनन्दमय स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता
है ॥८२॥
[ धारणा-६० ]
^2लीनं मूर्ध्नि वियत्सर्वं खत्वेन भावयेत् ।
तत्सर्वं भैरवाकारं तेजस्तत्त्वं समाविशेत् ॥८३॥
सर्वं जगत्, वियद् आकाशरूपं तिमिररूपं वाऽन्तःकृतसर्वभावपरिपूर्णं भैरवत्वेन
सर्वसंहारकालस्वरूपत्वेन मूर्ध्नि मुख्यभूते हृदयब्रह्मरन्ध्राख्ये, लीनं श्लिष्टम्, भावयेत्
आकाशमयमेव चिन्तयेत् । तदनु तत्सर्वं भैरवाकारं भैरवाकृतिपरप्रकाशस्वरूपम्, तेज-
स्तत्त्वं चित्रप्रकाशरूपं समाविशेत् । सर्वस्य उक्तलक्षणवियद्रूपत्वचिन्तनेन परप्रकाशता
संपद्यत इत्यद्भुतं फलमस्या धारणायाः । यन्नीलपीतादि तत्सर्वं शिवमियमिति भावयतो
ब्रह्म प्रकाशत इति भावः ॥८३॥
योगी को चाहिये कि वह ऐसी भावना करे कि यह सारा जगत् आकाश के रूप में
अथवा अन्धकार के रूप में हृदय, ब्रह्मरन्ध्र आदि प्रमुख स्थानों में उसी तरह से विद्यमान है,
जैसे कि इन स्थानों में जगत् के सभी पदार्थों को अपने मे समेटे हुए सर्वसंहारक कालरूपी
भैरव विद्यमान है। इस भावना के अभ्यास को बढ़ाने पर अन्ततः आकाश, तिमिर, काल,
जगत्, नील-पीत, आदि सभी पदार्थ भैरवस्वरूप प्रकाशमय परम तत्त्व में समाविष्ट हो जाते
हैं। इस धारणा का यह अद्भुत व्यापार है कि इसमें आलम्बन तो अन्धकारमय आकाश को
बनाया जाता है, किन्तु फल मिलता है—परम स्वरूप का प्रकाश । क्योंकि इस धारणा के
अभ्यास से योगी चित्प्रकाश रूप तेजस्तत्त्व (ब्रह्म) में समाहित हो जाता है । अर्थात् इस संसार
में जो कुछ भी नील, पीत आदि पदार्थ हैं, वे सब शिवमयं हैं, शिव से अभिन्न हैं, ऐसी भावना
के दृढ़ हो जाने पर योगी के चित्त में ब्रह्म प्रकाशित हो जाता है ।
शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत मालिनीवार्त्तिक में इसी धारणा को निम्न श्लोकों से स्पष्ट
किया गया है—
१. इतः पूर्वम्—"आकाशं विमलं पश्यन्" इत्यादिकः श्लोकोऽधिको व्याख्यातः शिवोपाध्यायेन।
- तन्त्रशास्त्र में ज्ञान की परम्परा को ओवल्ली या ओघ (प्रवाह) के नाम से जाना जाता
है । दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ के भेद से यह तीन तरह की होती है । देवताओं से
प्राप्त ज्ञान की परम्परा दिव्यौघ, सिद्धों से प्राप्त सिद्धौघ और मानव गुरुओं से प्राप्त
ज्ञान-परम्परा मानवौघ के नाम से प्रसिद्ध है । - मालिनीविजयवार्त्तिक (पृ० ३७) में इसका प्रथम पाद मिलता है ।
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विज्ञानभैरव : ९५
¹लीनं गमयतीत्युक्तेर्लिङ्गनिर्वचनं यतः।
हृदये ब्रह्मरन्ध्रे च वियल्लीनं परे पदे ॥
तदप्यन्तःकृताशेषसृष्टभावसुनिर्भरम् ।
भेदभावकमायीयतेजोंऽशग्रसनाच्च तत् ॥
सर्वसंहारकत्वेन कृष्णं तिमिररूपधृक्। (पृ० ३७)
अर्थात् छिपी हुई वस्तु का ज्ञान करा देने वाला लिंग कहलाता है। हृदय और ब्रह्मरन्ध्र
रूपी पद में सारे जागतिक पदार्थों को अपने में समेटे हुए यह आकाश लीन हो जाता है। यह
आकाश भेद की भावना को जन्म देने वाले मायानिर्मित तेजस्तत्त्व के अंश को खा जाता है।
इस तरह से सबको अपने में समेटे हुए यह आकाश काले घने अन्धकार का रूप धारण कर
लेता है। इस तिमिर रूप में धारणा का अभ्यास करने की बात विज्ञानभैरव के इस श्लोक में
प्रतिपादित है ॥८३॥
[ धारणा-६१ ]
किञ्चिज्ज्ञातं¹ द्वैतदायि बाह्यालोकस्तमः पुनः।
विश्वादि भैरवं रूपं ²ज्ञात्वाऽनन्तप्रकाशभृत् ॥८४॥
किञ्चिज्ज्ञातं किञ्चिन्मात्रं घटकुड्यादिकं ज्ञानविषयीकृतम्, द्वैतदायि भेदप्रथाप्रदं
जाग्रदवस्थागोचरम्, तथा बाह्यालोको बाह्यानां पदार्थानां जाग्रत्संस्कारजातानाम्
आलोकः प्रकाशः स्वप्नावस्थाविषयः, पुनः भूयः, तमः अज्ञानयोगः सुप्तिस्थः, तथा
एतदवस्थात्रयाभिमानि चैतन्यं विश्वादि । आदिशब्देन तैजसप्राज्ञादीनां ग्रहणम्।
एतत्सर्वं विश्वतैजसादिप्रपञ्चजातं भैरवं रूपं तुरीयस्वरूपं ज्ञात्वा अनन्तप्रकाशभृत्
अनन्तप्रकाशरूपो भवेत् । अथवा आदौ भेदमयं ध्यात्वा, ततश्च बाह्यश्चासावालोक-
श्चन्द्रसूर्यादि, ततश्च तमः—एतत्सर्वं भैरवरूपं ध्यात्वाऽनन्तप्रकाशमयो भैरवो भवतीति
श्लोकार्थः ॥८४॥
भेद-बुद्धि को बढ़ावा देने वाले घट, कुड्य (भित्ति=दीवाल) प्रभृति जाग्रत् अवस्था में
प्रतीत हो रहे जिस किसी पदार्थ को, जाग्रत् अवस्था के संस्कारों से उत्पन्न बाह्य पदार्थों का
ज्ञान कराने वाले स्वप्नावस्था के विषयों को, तथा सुषुप्ति अवस्था के विषय तम (अज्ञान)
को एवं इन तीनों अवस्थाओं के अभिमानी विश्व, तैजस और प्राज्ञ नाम से प्रसिद्ध चैतन्य को
भैरव रूप में, अर्थात् तुरीय (चतुर्थ) रूप में जानकर, यह सब उस तुरीय अवस्था के अभि-
मानी भैरव का ही सर्वविध विकास है, इस बात को पूरी तरह से समझ लेने पर साधक योगी
अनन्त प्रकाश से परिपूर्ण हो जाता है।
१. ॰त्वा-ख० । २. ध्या०-ख० ।
- अभिनवगुप्त कृत मालिनीवार्त्तिक (पृ० ३७) में कुछ परिवर्तनों के साथ ये पंक्तियाँ
मिलती हैं।
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९६ : विज्ञानभैरव
श्लोक की यह व्याख्या वेदान्त की प्रक्रिया के अनुसार की गई है। वेदान्त शास्त्र की
दृष्टि से प्रस्तुत विषय को इस प्रकार समझा जा सकता है—सत्त्व, रज और तम—इन तीन
गुणों की साम्यावस्था को प्रकृति कहते हैं। माया और अविद्या के भेद से यह दो तरह की
होती है। माया में विशुद्ध सत्त्व की प्रधानता रहती है और अविद्या में मलिन सत्त्व की।
अर्थात् माया में केवल सत्त्व गुण की प्रधानता रहती है और अविद्या में यह सत्त्व गुण रज
और तम से मलिन हो जाता है। चिदात्मा का जब माया में प्रतिबिम्ब पड़ता है, तो उस
समय 'मैं इस सारे जगत् को जानता हूँ और बनाता हूँ' इस तरह से सर्वज्ञत्व आदि गुणों से
विशिष्ट ईश्वर की अभिव्यक्ति होती है। यह ईश्वर एक ही है। वही चिदात्मा जब अविद्या
में प्रतिबिम्बित होता है, तो उसे 'मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ' इस तरह की प्रतीति होने लगती
है। तब यह जीव कहलाता है। यह स्वतन्त्र न होकर परतन्त्र है, अर्थात् ईश्वर के नियन्त्रण
में रहता है। देव, तिर्यक् आदि के भेद से यह अनेक प्रकार का होता है। १ आतिवाहिक
नामक लिंग शरीर में 'यह मैं हूँ' इस तरह का अभिमान रखने वाले जीव 'मैं सुखी हूँ, मैं
मैं दुःखी हूँ, मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ' इस तरह से अन्तःकरण के स्वभावों को अपना स्वभाव
मान लेते हैं, अर्थात् सुख, दुःख, भूख, प्यास ये सब वस्तुतः अन्तःकरण, शरीर आदि के धर्म
हैं, आत्मा के नहीं; अविद्या के कारण जीव इनको अपनी आत्मा के धर्म मान लेते हैं। ये
जीव तैजस कहलाते हैं। कारण शरीर के नाम से कही जाने वाली अविद्या में 'यह मैं ही हूँ'
इस तरह का अलग-अलग अभिमान रखने वाले जीव 'प्राज्ञ' कहलाते हैं। एक एक स्थूल
शरीर को लेकर 'मैं मोटा हूँ, मैं दुबला हूँ' इस तरह का अभिमान रखने वाले जीव 'विश्व'
कहे जाते हैं। ऊपर बताये गये लक्षण वाला मायोपाधिक परमेश्वर सारे स्थूल शरीरों को
अपना ही मानता है और 'हिरण्यगर्भ' कहलाता है। वही ईश्वर जब सारे स्थूल शरीरों को
अपना मानता है, तो उसको 'वैश्वानर' कहा जाता है। प्राज्ञ जीव अविद्या को अपना स्वरूप
मानते हैं। इस स्वरूप का ज्ञान उन्हें सुषुप्ति अवस्था में स्पष्ट होता है। जब वह सुषुप्ति
अवस्था से उठता है, तब 'मैं उस समय मूढ़ हो गया था', 'मैं अपने को भी नहीं जानता'
इस तरह की प्रतीति होती है। परमेश्वर की अविद्याविषयक प्रतीति इससे भिन्न प्रकार की
होती है। वह मानता है कि 'सभी प्राज्ञों का मैं ही कर्ता हूँ'। इस तरह से प्राज्ञों के कर्ता के
रूप में उसमें अविद्याविषयक अभिमान होता है, साक्षात् नहीं, क्योंकि वह तो सर्वज्ञ है।
प्रलय अवस्था में जब ईश्वर योगनिद्रा में निमग्न हो जाता है, तब भी अविद्या उसमें वासना
के रूप में विद्यमान रहती है। यदि ऐसा न हो तो कर्तृत्व आदि का अभिमान पैदा करने
वाली अविद्या के न रहने से ब्रह्म अपनी कूटस्थ दशा से कैसे जीव दशा को प्राप्त कर सकता
है ? इस प्रकार "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (छा० उ० ३।१४।१) इस श्रुति के अनुसार विश्व,
तैजस, प्राज्ञ प्रभृति चेतन और इनके अतिरिक्त सारा अचेतन जगत् भी उस ब्रह्म का ही,
- लिंग शरीर को आतिवाहिक इसलिए कहा जाता है कि इसी के सहारे आत्मा एक शरीर
को छोड़कर दूसरे शरीर में प्रवेश करती है। "अतिवाहे इहलोकात् परलोकप्रापणे
नियुक्त आतिवाहिकः" आतिवाहिक शब्द की इस व्युत्पत्ति से यही अर्थ निकलता है।
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विज्ञानभैरव : ९७
परभैरव तुरीय स्वरूप का ही विस्तार है, ऐसा जानकर साधक अनन्त प्रकाश से आलोकित
हो उठता है ।
वस्तुतः इस श्लोक में भी प्रस्तुत तिमिर भावना का ही प्रकारान्तर से विधान किया
गया है । प्रारम्भ में द्वैत दृष्टि के आधार पर किसी बाह्य स्थूल आलम्बन को धारणा का
विषय बनाया जाता है । बाद में उसको छोड़कर बाह्य चन्द्र, सूर्य प्रभृति के प्रकाश पर
धारणा स्थिर की जाती है । अन्त में उसको भी छोड़कर तिमिर में दृढ़ भावना का अभ्यास
किया जाता है । इन सब स्वरूपों में परभैरव का स्वरूप ही विद्यमान है, इस भावना के
अभ्यास से योगी स्वयं अनन्त प्रकाशस्वरूप भैरव हो जाता है ॥८४॥
[ धारणा-६२ ]
¹एवमेव दुर्निशायां कृष्णपक्षागमे चिरम् ।
तैमिरं भावयन्² रूपं भैरवं रूपमेष्यति ॥८५॥
एवमेव पूर्वोक्ततिमिरभावनावत्, कृष्णपक्षागमे दुर्निशायाम्, मेघच्छन्ना रात्रि-
र्दुर्निशा, तस्यामन्धतामिस्रमहातामिस्रतामिस्ररूपायाम्, चिरं तैमिरं रूपं कालश्याम-
लादि भयङ्कररूपं भैरवमुद्रितं भैरवमुद्राङ्कितं भयङ्करत्वाददृश्यं भावयन् योगी भैरवं
रूपम् एष्यति प्राप्स्यति । तद्रूपस्य अत्याश्चर्यकारित्वादक्षयानन्दमाप्नुयादित्यर्थः ।
इयमक्षणोन्मीलनेन तिमिरभावना उक्ता ॥८५॥
पूर्व श्लोकों में बताई गई तिमिर भावना के समान ही कृष्ण पक्ष की घनघोर काले
बादलों से भरी रात्रि में चिर काल तक तिमिर स्वरूप की भावना करे । मेघ से आच्छन्न
रात्रि को दुर्निशा कहा जाता है । अन्धकार के गाढ़े और हलकेपन के कारण यह अन्धतामिस्र,
महातामिस्र और तामिस्र के नाम से अभिहित होती है । इस घने अन्धकार में काले-सांवले
रंग का कोई भयंकर स्वरूप आंखों के सामने एकाएक आ जाय, तो डर के मारे आदमी की
घिग्घी बंध जाती है, वह उस स्वरूप को पूरी तरह से देख भी नहीं पाता । इस भयंकर
अन्धकारमय स्वरूप में अपनी धारणा को केन्द्रित करना ही यहाँ तिमिर भावना कही गई है ।
यह परभैरव का ही अत्यन्त भयंकर स्वरूप माना जाता है । इसमें भावना को स्थिर करने
से योगी को भैरव स्वरूप की प्राप्ति हो जाती है, अर्थात् उसमें अक्षय आनन्द की अभिव्यक्ति
हो जाती है और इसके कारण उसके सभी तरह के सांसारिक भय शान्त हो जाते हैं । इस
भावना का अभ्यास करते समय योगी अपनी आंखों को खुली रखता है ॥८५॥
[ धारणा-६३ ]
²एवमेव निमील्यादौ नेत्रे कृष्णाभमग्रतः ।
प्रसार्य भैरवं रूपं भावयंस्तन्मयो भवेत् ॥८६॥
१. भावयेद् भैरवं रूपं भावयन्द्भिर्दुराभिदम्-मा० । २. ॰येद्-ख० म० । ३. ॰येत्त°-ख० ।
- महार्थमंजरीपरिमल (पृ० १४०) और मालिनीवार्तिक (पृ० ३७) में देखिये ।
- नेत्रतन्त्र की क्षेमराज कृत व्याख्या (भा० १, पृ० २००) में देखिये ।
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९८ : विज्ञानभैरव
अथाक्ष्णोर्निमीलनेन भावनामाह—एवमेव कृष्णपक्षदुर्निशाद्यभावेऽपि आदौ
स्वनेत्रे निमील्य अग्रतः कृष्णाभं तमोरूपं भैरवं भावयन् पश्चात् नेत्रे प्रसार्यापि कृष्णाभं
भैरवरूपं किमेतदित्याश्चर्यकारि, एतदेव भैरवं रूपमिति भावयन् तन्मयः प्रकाशमयो
भवेत् ॥८६॥
इस श्लोक में निमीलन भावना को बताया गया है, अर्थात् आँख बन्द करके इस
भावना का अभ्यास किया जाता है। कृष्ण पक्ष की घनी अँधियारी रात के न होने पर
साधक को चाहिये कि वह अपनी आँखें बन्द कर ले और अपने सामने भयानक घने काले
अन्धकार की भावना करे। इस भावना का अभ्यास बढ़ाने पर उसको आँखें खोल देने के
बाद भी भगवान् भैरव का यह भयंकर स्वरूप ही भासित होता रहता है। अन्ततः उसकी
भयंकरता समाप्त हो जाती है और अत्यन्त आश्चर्यजनक प्रकाशमय भैरव स्वरूप की प्रतीति
होने लगती है।
“नोर्ध्वं ध्यानं प्रयुञ्जीत” (८।४१-४४) इत्यादि श्लोकों की व्याख्या करते हुए
क्षेमराज ने नेत्रतन्त्रोद्योत में अक्षि-निमीलन धारणा का निषेध करते हुए इसी श्लोक का
उदाहरण दिया है ॥८६॥
[ धारणा-६४ ]
यस्य कै१स्येन्द्रियस्यापि२ व्याघाताच्च निरोधतः ।
प्रविष्टस्याद्वये शून्ये तत्रै३वात्मा प्रकाशते ॥८७॥
यस्य कस्यापि इन्द्रियस्य व्याघाताद् विरुद्धसमुच्चयाद् बाह्याभिभावककृतात्,
निरोधतः निरोधात् स्वरसोत्थात् प्रायत्निकाद् वा, अद्वये द्वयरहिते शून्ये तत्त्वे प्रविष्टस्य
अन्तर्मुखपदे निरुद्धस्य, तत्रैव आत्मा परं चैतन्यं प्रकाशते ॥८७॥
जिस किसी भी इन्द्रिय का बाह्य विषयों से संपर्क दो तरह से टूट जाता है। या तो
बाहरी विरोधी पदार्थों के जुट जाने से उसकी शक्ति क्षीण या नष्ट हो जाती है, जैसे कि सूर्य
के प्रकाश से चौंधिया जाने पर कुछ क्षणों तक आँखों से कुछ दिखाई नहीं पड़ता; या कभी-
कभी चेचक आदि के प्रकोप से आँखों की ज्योति नष्ट हो जाती है। इसी तरह से स्वाभाविक
रूप से अथवा प्रयत्नपूर्वक इन्द्रियों को बाह्य विषयों की ओर प्रवृत्त होने से रोका जा सकता
है। इन दोनों ही स्थितियों में इन्द्रियों का बाह्य विषयों से संपर्क छूट जाने पर साधक
अन्तर्वृत्ति हो जाता है, उसकी द्वैत दृष्टि दब जाती है और सर्वत्र अद्वय तत्त्व का उन्मेष हो
उठता है, वह सर्वत्र स्वात्मस्वरूप परम तत्त्व का ही दर्शन करने लगता है। अर्थात् बाह्य
विषयों के न रहने से इन्द्रियाँ खाली-खाली सी हो जाती हैं, शून्यावस्था में प्रविष्ट हो जाती
हैं। इस खालीपन में भावना को दृढ़ करने पर, चित्त की अन्तर्मुखता को स्थिर कर लेने पर,
१. य°-ख० । २. °दो-ख० । ३. °दै°-ख० ।
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विज्ञानभैरव : ९९
साधक के चित्त में चैतन्य ¹ आत्मा प्रकाशित हो उठती है ॥८७॥
[ धारणा-६५ ]
अबिन्दुमविसर्गं च अकारं जपतो महान् ।
उदेति देवि सहसा ज्ञानौघः परमेश्वरः ॥८८॥
बिन्दुः अविभागसंवेदनमद्वैतज्ञानम्, विसर्गः भेदप्रथासर्जनक्रियारम्भो ब्राह्म्या-
दिशक्तिरूपककाराद्यक्षररूपः, तद्रहितम् अकारं प्रथमाक्षरम् अविद्यमानः कारः कारणं
यस्य तत् एवम्विधम् अकिञ्चिच्चिन्तनात्मकमनुत्तरं विमृशतस्तत्क्षणमेवानेकज्ञानप्रसर-
स्रष्टा परमेश्वरः प्रादुर्भवति ।
अथवा 'अं' इत्यत्र 'अः' इत्यत्र च बिन्दुविसर्गौ परित्यज्य कुम्भकस्थस्य 'अ'
इत्येवमेव केवलं जपतः सहसा तत्क्षणमेव परमेश्वरो ज्ञानौघ उदेति सर्वविकल्पराहित्येन
विकल्पादीन् संत्यज्य यत् शिष्यते तदेव भवतीत्यर्थः ॥८८॥
विभाग अर्थात् भेद रूप से प्रतीत न होना ही अद्वैत ज्ञान है । इस अद्वैत ज्ञान को यहाँ
'बिन्दु' नाम दिया गया है । विसर्ग भेद ज्ञान की सृष्टि करता है, क्योंकि ककार प्रभृति अक्षरों
की सृष्टि विसर्ग से ही होती है, जिनकी कि ब्राह्मी प्रभृति शक्तियाँ अधिष्ठातृ देवता हैं । इस
द्वैत और अद्वैत ज्ञान से रहित, अर्थात् दोनों प्रकार के ज्ञानों से अतीत अकार को, जो कि
वर्णमाला का पहला अक्षर है, जिसका 'अविद्यमानः कारः कारणं यस्य तत्' इस व्युत्पत्ति के
आधार पर कोई कारण नहीं है और जो सभी प्रकार की चिन्तन प्रक्रिया से मुक्त है, उस
अनुत्तर अकार का विमर्श करने वाले योगी के चित्त में तत्क्षण अनेक ज्ञानों के विविध आकारों
के स्रष्टा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं । "एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म" (छा० उ० ६।२।१), "सर्वं
खल्विदं ब्रह्म" (छा० उ० ३।१४।१) इत्यादि श्रुतियाँ परमेश्वर के एकत्व, अद्वितीयत्व को ही
बताती हैं । वाणी और मन जहाँ नहीं पहुँच सकते, उस अनुत्तर तत्त्व में द्वित्व की कल्पना
कैसे हो सकती है ? अकार को अनुत्तर या निरूत्तर इसलिये कहा जाता है कि इसके बाद
कोई तत्त्व नहीं बचता, जिसमे कि इसका लय हो । अर्थात् मातृका की सृष्टि अकार से ही
होती है और पूरी मातृका का संहार भी अकार में ही होता है । ऐसा कोई वर्ण अकार के
बाद नहीं है, जिसमे कि इसका लय हो या जिससे इसकी सृष्टि हो । अतः अकार को
²अनुत्तर या निरुत्तर कहना उचित ही है। इसी तरह से ब्रह्म भी अनुत्तर या निरुत्तर माना
- विकल्पावस्था में चिति ही चित्त के रूप में परिणत हो जाती है और निर्विकल्पावस्था में
चित्त पुनः अपने चिति स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । इस विषय का विवेचन
प्रत्यभिज्ञाहृदय के "चितिरेव चेतनपदावरूढा चेत्यसंकोचिनी चित्तम्" (५) और
"तत्परिज्ञाने चित्तमेवान्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्यारोहाच्चितिः" (१३) इन दो सूत्रों में
किया गया है । - पालि साहित्य में अनुत्तर पद भगवान् बुद्ध का वाचक है । बौद्ध तान्त्रिक वाङ्मय में
अनुत्तर योग की चर्चा आती है । ऐसे स्थलों में अनुत्तर पद का प्रयोग सर्वोत्तम के अर्थ
में हुआ है ।
Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)
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१०० : विज्ञानभैरव
जाता है। “नेति नेति” (बृह० उ० ३।९।२६) इत्यादि श्रुतियां इस तत्त्व का प्रतिपादन
निषेध मुख से ही कर पाती हैं, क्योंकि सभी द्वैत वस्तुओं का निषेध कर देने पर जो बच
रहता है, वही अद्वय तत्त्व अनुत्तर या निरुत्तर ब्रह्म के नाम से जाना जाता है। अतः यह
उचित ही है कि अनुत्तर अकार में धारणा की स्थिरता से अनुत्तर ब्रह्म की प्रतीति हो ।
श्लोक का दूसरा अर्थ यह किया जाता है—अं और अः इन दोनों स्वरों के बिन्दु
और विसर्ग को छोड़कर, जो कि पूरक और रेचक प्राणायाम के प्रतीक हैं (अं का उच्चारण
करते समय प्राण का पूरण और विसर्ग का उच्चारण करते समय प्राण का रेचन होता है,
यह बात अनुभव से सिद्ध है) कुम्भक प्राणायाम में स्थित होकर केवल अकार का जप करने
वाले योगी के चित्त में सहसा परमेश्वर प्रकट हो जाते हैं, जिससे कि चित्त में ¹ज्ञान-समुद्र के
लहराने से सभी विकल्पों का नाश हो जाता है। संचित विकल्पों का नाश हो जाने से और
नये विकल्पों की उत्पत्ति न होने से परमेश्वर के ज्ञानमय स्वरूप के अतिरिक्त कुछ भी नहीं
बच रहता। अतः इस धारणा के अभ्यास से साधक ज्ञानस्वरूप हो जाता है, क्योंकि अन्त में
सभी विकल्पों से अतीत यही स्वरूप बचा रहता है।
विज्ञानभैरव के इस श्लोक की अद्वयसम्पत्तिकार वामननाथ ने एक भिन्न प्रकार की
व्याख्या की है। उनका यह कहना है—
“बुद्धिरूपी भूमि के ऊपर ²अहंकारमयी भूमि है। इस अहंकार से यह सारा
जगत् भरा हुआ है। इस अहंकार भूमि का सही ज्ञान हो जाने पर प्राणी मुक्त हो जाता
है। इसी को संवित् स्वरूप वाली पराशक्ति कहा जाता है, जो कि परमेश्वर से कभी
अलग नहीं रहती। इसी को ज्ञानशक्ति कहा जाता है और यही मन्त्रशक्ति के रूप में
प्रतीत होने लगती है। शिव और शक्ति से अभिन्न स्वरूप वाला अहंकार ही मन्त्र
कहलाता है। यही अहंकार अपरिमित अहन्ता, अर्थात् ³पूर्णाहन्ता के रूप में परिणत
- पहले ७६ वीं कारिका की व्याख्या में इस विषय पर प्रकाश डाला जा चुका है।
- सांख्य दर्शन के अनुसार आरोह क्रम में मन, अहंकार और बुद्धि—यह तत्त्वों का क्रम
है। इसके विपरीत प्रस्तुत स्थल में अहंकार को बुद्धि से ऊपर माना गया है। अहंकार
शब्द का प्रयोग यहाँ सांख्यसंमत अर्थ में न होकर विमर्श दशा के अर्थ में किया गया
है। प्रकाशात्मक शिव की इस विमर्श दशा में ही यह सारा जगत् अन्तर्लीन है, छिपा
हुआ है। विमर्श शक्ति ही इस सारे जगत् को उन्मीलित (प्रकट) करती है। प्रत्यभिज्ञा-
हृदय के “स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति” (२) इस सूत्र में यही बात कही गई
है। इसी अभिप्राय के अन्य अनेक वचन शास्त्रों में मिलते हैं। महार्थमञ्जरीपरिमल
(पृ० ६१, ८८) में भी अहंकार की प्रधानता बताई गई है। - अपरिमित अहन्ता, अर्थात् पूर्णाहन्ता ही विरूपाक्षपंचाशिका प्रभृति शास्त्रों में विश्वाहन्ता
के नाम से प्रसिद्ध है। इस विषय की विवेचना हमने “तान्त्रिक योग की चरमोपलब्धिः
विश्वाहन्ता” शीर्षक निबन्ध में की है। यहाँ भी १०२ संख्या के श्लोक की व्याख्या में
इसकी संक्षिप्त चर्चा की जायगी।
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विज्ञानभैरव : १०१
हो जाता है।
मातृका अर्थात् वर्णमाला का पहला अक्षर अकार है। वह परमेश्वर शिव से
अभिन्न है। यह जब नाद और बिन्दु से संयुक्त हो जाता है, तो वह ईश्वर की शक्ति
कहलाता है। यह शिव और शक्तिमय अकार इस सारे अचर और चर, स्थावर और
जंगम जगत् का बीज माना जाता है, अर्थात् बीज से वृक्ष की तरह शिवशक्तिमय अकार
से सारे विश्व की सृष्टि होती है। स्वर और व्यंजन सभी वर्ण इसी से व्याप्त हैं, अर्थात्
इन सबमें अकार किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इसीलिये यथार्थ तत्त्व की खोज में
लगे योगी इसको शब्दब्रह्म के नाम से पुकारते हैं। प्राण और स्वर के रूप में जो अभी
परिणत नहीं हुआ है, उस अकार का निर्विभाग (विभाग रहित) अवस्था में विद्यमान
पश्यन्ती की सहायता से चिन्मात्र स्वरूप में चिन्तन करने वाला योगी परम पद में प्रविष्ट
हो जाता है, स्वात्मस्वरूप में विलीन हो जाता है।
शास्त्रों में आचार्यों ने¹ इस बात को इस तरह से स्पष्ट किया है—नाभि से
एक वितस्ति (बित्ता) ऊपर और कंठ से छः अंगुल नीचे हृदय विद्यमान है। इस हृदय
के बीच के भाग में एक कमल है। इस कमल के बीच में तीन कोनों वाली कर्णिका है।
इस कर्णिका के मध्य भाग में अकार का स्वरूप धारण कर आत्मा रहती है। इस अकार
के भीतर अत्यन्त सूक्ष्म तत्त्व निवास करता है, जिसमें कि चित् तत्त्व का निरन्तर स्फुरण
होता रहता है। विज्ञानभैरव के "अबिन्दुर्माविसर्गं च" इत्यादि श्लोक में इसी चित् तत्त्व
की उपासना का विधान है।
आत्मा के उसी निवास स्थान में ईश्वर की शक्ति भी निवास करती है,
जिसको कि कुण्डलिनी कहते हैं। इसी का संयोग होने पर शिव सृष्टि करने में समर्थ
होते हैं। अतः यह विश्व की जननी है। यह कुण्डलिनी शक्ति सांप की तरह साढ़े तीन
लपेटे खाकर बिना किसी आधार के यहाँ बैठी रहती है। इसी को प्राणशक्ति कहा
जाता है। यह शक्ति शरीर में हकार रूपी नाद के स्वरूप में सदा नदन करती रहती
है। योगी अपने दोनों कानों को बन्द कर इसके नदन व्यापार को सुन सकता है। यह
शक्ति भ्रूमध्य में बिन्दु के रूप में निवास करती है। सारे संसार की यही मंगलमयी
जननी है। अपने तेज से प्रकाशित इस बिन्दु रूप शक्ति का योगी नित्य दर्शन करते
हैं। उस बिन्दु के चन्द्र और सूर्य वाम और दक्षिण नेत्र हैं। इनको आश्रय हीन कर,
अर्थात् विषयों से हटा कर, योगी परम पद अर्थात् ब्रह्म में प्रविष्ट हो जाता है।"
- प्रस्तुत उद्धरण में वामननाथ ने विज्ञानभैरव और सिद्धादिष्ट सिद्धान्तसंग्रह की चर्चा की
है। तान्त्रिक साहित्य (पृ० ७०१) के अनुसार किसी सिद्धान्तसंग्रह का उल्लेख
पुरश्चर्यार्णव में हुआ है। वामननाथ और उनके ग्रन्थ आदि के सम्बन्ध में लुप्तागमसंग्रह
के द्वितीय भाग के उपोद्घात में विचार किया गया है। देखिये पृ० १५, ६५-६६ तथा
अन्यत्र भी।
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संक्षेप में इसका अभिप्राय यह हुआ कि अकार अर्थात् परम शिव के नाद और बिन्दु
अवस्था से अतीत शुद्ध स्वरूप का चिन्तन करने पर साधक सनातन ब्रह्मस्वरूप में विलीन हो
जाता है ॥८८॥
[ धारणा-६६ ]
वर्णस्य¹ सविसर्गस्य विसर्गान्तं² चितिं कुरु ।
निराधारेण चित्तेन स्पृशेद् ब्रह्म सनातनम् ॥८९॥
निराधारेण प्रक्षीणवेद्येन चित्तेन सविसर्गस्य विसर्गसहितस्य वर्णस्य अकारस्य
विसर्गान्तं चितिं कुरु विविधसर्गस्वभावयुक्तस्य वर्णजातेः ककाराद्यक्षररूपस्य ब्राह्म्या-
दिशक्तिसमूहस्य पशुभावोपकरणस्य विसर्गस्य अन्तो यथा भवति तथा अन्तर्मुख-
स्वभावविमर्शाधिक्यात् तत्समावेशेन तन्मयीभावापादनस्वरूपतया बुद्धिं विधेहि। ततः
संवेदनस्य निराश्रयत्वे सति सनातनं ब्रह्म विशेत्, नित्यः परब्रह्मस्पर्शाविर्भावः स्यात् ।
'विसर्गान्ते' इति सप्तम्यन्तपाठे त्वयमर्थः—सर्वोऽयं मातृकाप्रपञ्चोऽकुलस्य शिवबिन्दु-
नामधेयस्य शक्तिरूपो विसर्ग इति तस्मिन् विसर्गे बुद्धिं विधेहीति ॥८९॥
किसी जानने लायक वेद्य वस्तु के अभाव में चित्त निराधार हो जाता है। चित्त की
इस अवस्था में विसर्ग के साथ आद्य वर्ण अकार में अपनी धारणा को स्थिर करे । अकार के
द्वारा नाना प्रकार की सृष्टि करने में ककार प्रभृति अक्षरों का और उनकी अधिष्ठात्री ब्राह्मी
प्रभृति मातृकाओं का सहयोग रहता है । इन्हीं की सहायता से अज्ञानी जीव का सारा व्यव-
हार चलता है। अतः यह सारी सृष्टि भी विसर्ग के नाम से ही जानी जाती है । इसका अन्त
किये बिना स्वात्मस्वरूप की अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । अनुत्तर अकार विसर्ग की सहायता
से ही सभी ककार प्रभृति वर्णों की और सारे जगत् की सृष्टि करता है, अतः इस विसर्ग का
अकार में उपसंहार करने पर ही इस सारी सृष्टि का उपसंहार हो सकता है । प्रस्तुत धारणा
में अकार की इस उपसंहार दशा में ही निराधार चित्त को स्थिर करने का अभ्यास किया
जाता है, जिससे कि अपने अन्तर्मुख स्वभाव का गहराई से चिन्तन करने से साधक अपने
स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। जब वह अपने स्वरूप में समाविष्ट होता है, तो उसके अपने
स्वाभाविक स्वरूप के अभिव्यक्त हो जाने से उसका अब तक का काल्पनिक स्वरूप उसी में
लीन हो जाता है, उसी आकार को धारण कर लेता है । उसकी अलग से कोई सत्ता नहीं रह
जाती । साधक जब अपनी चित्त-वृत्ति को भी तदाकार बना लेता है, तब संवेदन अर्थात् ज्ञान
का कोई बाह्य आलम्बन न रहने से उसका परब्रह्म स्वरूप में नित्य समावेश हो जाता है ।
'विसर्गान्ते' ऐसा पाठ मानने पर उसका अर्थ यह होगा—यह सारा स्वर-व्यंजनात्मक मातृका
का विस्तार, सभी वर्णों की उत्पत्ति शिवबिन्दु नामक शक्ति से ही होती है। यह कौलिकी
शक्ति विसर्ग नाम से जानी जाती है। इसी से सारी वर्णमाला का विकास होता है । इस
१. सविसर्गस्य वर्णस्य-ख० । २. ॰न्ते-ख० ।
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विषय को समझने के लिए विस्तार की अपेक्षा है। कुल प्रक्रिया का विवेचन करते समय इस
विषय पर उपोद्घात में विचार किया जायगा।
भट्ट आनन्द ने इस श्लोक की व्याख्या इस तरह से की है— अं और अः (बिन्दु और
विसर्ग) से अकार को निकाल देने पर केवल बिन्दु (ं) और विसर्ग (:) ही बच रहेंगे। बिना
आधार (अकार) के इनको समझ पाना कठिन है। योगी जब इनमें धारणा करते हुए अपने
चित्त को भी इसी तरह से निराधार, निर्विषय बना लेता है, तो उसको परम निर्वृति (मोक्ष)
प्राप्त हो जाती है। पहले श्लोक में बिन्दु और विसर्ग से रहित 'अकार' में धारणा का और
इस श्लोक में अकार से रहित निराधार बिन्दु अथवा विसर्ग में धारणा का विधान है। यह
इन दोनों धारणाओं में स्पष्ट भेद है ॥८९॥
[ धारणा-६७ ]
व्योमाकारं स्वमात्मानं ध्यायेद् दिग्भिरनावृतम् ।
निराश्रया चितिः शक्तिः स्वरूपं दर्शयेत् तदा ॥९०॥
यदा व्योमाकारमित्यनाकृतिं न तु तुच्छम्, स्वमात्मानं दिग्भिर्नीलपीतादिभि-
रुपाधिभिरनावृतं विवर्जितम्, विश्वव्यापिनमिति यावत्, कृत्वा ध्यायेत्, तदा चिति-
शक्तिर्निराश्रया सती स्वं रूपं दर्शयेत् ॥९०॥
आकाश की कोई आकृति न रहने पर भी जैसे उसकी सत्ता मानी जाती है, उसी तरह
से जिस व्योमाकार अर्थात् निराकार, शून्यस्वभाव स्वात्मस्वरूप में यहाँ धारणा को स्थिर
करने का विधान है, वह भी अलीक, तुच्छ, मिथ्या न होकर केवल किसी भी प्रकार की
आकृति से रहित ही माना जाता है। इस नील, पीत आदि उपाधियों से रहित, अर्थात् विश्व-
व्यापी स्वात्मस्वरूप में धारणा को स्थिर कर देने पर चिति शक्ति बाह्य आलम्बनों से मुक्त
होकर अपने सहज स्वरूप को दिखा देती है, अर्थात् साधक अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो
जाता है। स्वच्छन्दतन्त्र में १"अहमेव परो हंसः परमात्मा परात्परः" (४।३९९) इत्यादि ग्रन्थ
में इस स्थिति का वर्णन किया गया है ॥९०॥
[ धारणा-६८ ]
किञ्चिदङ्गं विभिद्यादौ तीक्ष्णसूच्यादिना ततः ।
तत्रैव चेतनां१ युक्त्वा२ भैरवे३ निर्मला गतिः ॥९१॥
आदौ प्रथमं किञ्चिदङ्गम् अङ्गुल्यङ्गुष्ठादिकं तीक्ष्णसूच्यादिना निशितसूचीकण्ट-
कादिना विभिद्य छित्त्वा ततस्तदनन्तरं तत्रैव चेतनां संविदं युक्त्वा संयोज्य भैरवे
१. ०ना-ख० । २. ०क्ता-ख० । ३. ०वी-ख० ।
- यह पाठ भट्टानन्द की टीका में मिलता है (पृष्ठ ३७)। शिवोपाध्याय ने “अहमेव परो
हंसः शिवः परमकारणम्" (पृ० १३०) ऐसा पाठ स्वीकार किया है। मुद्रित स्वच्छन्द-
तन्त्र (भा० २, प० ४, पृ० २५३) में भी यही पाठ मिलता है।