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त्रिशतिका: पाटीगणितसार (श्रीधराचार्य - पं. सुद्युम्नाचार्य सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Trishatika / Patiganitasara of Sridharacharya with Hindi Commentary

श्रीधराचार्य (टीकाकार: पं. सुद्युम्नाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

त्रिशतिका 93
प्रक्षेप या मूलधन ⇒ 2 । 3 । 4 । 5
इनका योग = 14
मूलधन के योग से एकक मात्रा का विभाग 2/14 = 1/7,
1/7 × 210 = 210/7 = 30 प्रथम खेत की उपज
इसके समानुपात से इस प्रकार हल प्राप्त होते हैं –
14 : 210 : : 2 : x अतः x = (210 × 2)/14 = 420/14 = 30
14 : 210 : : 3 : x x = (210 × 3)/14 = 630/14 = 45
14 : 210 : : 4 : x x = (210 × 4)/14 = 840/14 = 60
14 : 210 : : 5 : x = (210 × 5)/14 = 1050/14 = 75
द्वितीयोदाहरणम्
शतस्य लब्धवानेकः पञ्चशत्यास्तथापरः।
फलमन्यः सहस्रस्य सहस्रे षट्शताधिके।। ६८।।
सर्वग्रामफले विद्वन् तत्रोत्पन्नं शतद्वयम्।
ततः किं कस्य भागे स्याद् गणयित्वा निगद्यताम्।। ६९।।
न्यासः 100। 500। 1000। सर्वग्रामफलम् 1600। सर्वोत्पत्तिः 200। लब्धं
पृथक्-पृथक् फलम् 25/2 । 62 ½ । 125
इति प्रक्षेपकप्रकरणम्
सुक्षेमा अनुवाद-हे विद्वन्! सम्पूर्ण ग्राम के कुल 1600 परिमाण के खेत
में एक ने 100, दूसरे ने 500 तथा तीसरे ने 1000 परिमाण वाले खेत से उपज
प्राप्त की। कुल उपज 200 प्रस्थ हुई। तो किसने कितने प्रस्थ अनाज प्राप्त किया।
अनुशीलन-यह भी समानुपात का प्रश्न है। अतः यह मान लिया गया है
कि सभी खेत समान रूप से उपजाऊ थे। श्लोक के नियमानुसार-
100/1600 × 200 = 1/16 × 200 = 200/16 = 12 ½

diagonal.
Now look at the numerator of पिप्पलीमूल्यम्:
It has a round top, diagonal down, flat base: that's 2!
Now look at the numerator of शुण्ठीमूल्यम्:
It has a flat top, diagonal down: that's 7!
Wait, so the printed text literally has:
शुण्ठीमूल्यम् 7/37 पिप्पलीमूल्यम् 2/37!
Wait, wait! Let me look even closer:
Wait, could it be शुण्ठीमूल्यम् 2/37 पिप्पलीमूल्यम् 7/37?
Wait! Look at the first fraction:
Is the numerator २ or 7?
Wait, look at the footnote:
१. तुल. पाटी-गणित सू. 59...
Look at 7 in 57 (at end of line):
The 7 in 57 has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left.
Now look at the numerator of the first fraction (after शुण्ठीमूल्यम्):
It has a straight horizontal top, and a diagonal down to the left! That is unmistakably a 7!
Now look at 2 in 125 (line 3):
It has a curved top, diagonal down to the left, and horizontal baseline to the right.
Now look at the numerator of the second

त्रिशतिका 95
अनुशीलन-यहाँ मिश्रधन 1 तथा समान मूल्य से मात्राओं का अनुपात इस
प्रकार है-
मूल्य पण्य या मात्रा
रूप ⇒ 1 : 1/2 पल
⇒ 1 : 2
⇒ 1 : 7
अब श्लोक के नियमानुसार मूल्य को पण्य से विभाजित करने पर ⇒
1 × 2/1 = 2, 1 × 1/2 = 1/2, 1 × 1/7 = 1/7
इस प्रकार समान मात्राओं का मूल्य से अनुपात-
मात्रा मूल्य
पल ⇒ 1 : 2 ⇐ रूप
⇒ 1 : 1/2 ⇐
⇒ 1 : 1/7 ⇐
मूल्य अथवा फल का योग-
2 + 1/2 + 1/7 = 37/14
श्लोक के नियमानुसार प्रक्षेप या मूल्य की अलग मात्राओं को इनके फल
अथवा योग से विभक्त करके मिश्रधन 1 से गुणित करने पर-
2 × 14/37 × 1 = 28/37 रूप की 14/37 पल हींग
1/2 × 14/37 × 1 = 7/37 रूप की 14/37 पल पीपल
1/7 × 14/37 × 1 = 2/37 रूप की 14/37 पल सोंठ
इस प्रकार 28/37 + 7/37 + 2/37 = 1 रूप से प्रत्येक तीनों की 14/37 पल समान
मात्राएँ प्राप्त होती हैं।
समान मात्रा ज्ञात होने पर इनका मूल्य समानुपात से भी ज्ञात होता है-
1/2 : 1 : : 14/37 : x अतः x = (14 × 2)/37 = 28/37 हींग का मूल्य
2 : 1 : : 14/37 : x ...x = (14 × 1)/(37 × 2) = 7/37 पीपल का मूल्य

96 त्रिशातिका
7 : 1 : : 14/37 : x ...x = 14 × 1 / (37 × 7) = 2/37 सोंठ का मूल्य


1 रूप कुल मूल्य
स्पष्टतः यहाँ श्लोक के अनुसार पूर्वोक्त संक्रिया की गई है।
उपर्युक्त सम्पूर्ण नियम बीजगणितीय सामान्य समीकरण से आसानी से सिद्ध
है-
यदि x = एक रूप से प्राप्त होने वाली तीनों वस्तुओं की बराबर अज्ञात मात्रा-
मूल्य चुकाया गया ⇒ 1 रूप
यदि x × 2/1 + x × 1/2 + x × 1/7 = 1 रूप
⇒ x (2/1 + 1/2 + 1/7) = 37/14 x = 1 रूप
प्रश्नानुसार ⇒ 37/14 x = 1 रूप
⇒ x = (14 × 1) / 37 = 14/37 पल
इस प्रकार 14/37 पल ही वह समान मात्रा है जिसके अलग-अलग मूल्यों का योग कुल 1 रूप प्राप्त होता है।
14/37 × 4 = 56/37 = 1 19/37 कर्ष
19/37 × 16 = 304/37 = 8 8/37 माष
8/37 × 5 = 40/37 = 1 3/37 गुंजा
अतः 3/37 गुंजा भाग
विषमक्रयोदाहरणम्
मुद्गाना कुडवाः सप्त लभ्यन्ते नवभिः पणैः।
पणेन कुडवस्यार्धं तण्डुलानामवाप्यते॥ ७१॥
ततः पणत्रयं सार्धं गृहीत्वाशु वणिङ् मम।
तण्डुलानां प्रयच्छाशु मुद्गाना चार्थसंगुणम्१॥ ७२॥


१. तुल. पाटी-गणित उदा. 73-74

त्रिशतिका 97
न्यासः 9 1
7/1 1/2 मिश्रधनम् 7/2 लब्धं मुद्गानां मूल्यं पणः 0
1 2
काकिण्यः 3। वराटकाः 8। वराटकभागाश्च 4/37। तण्डुलानां पणौ 2।
काकिण्यौ 2। वराटकाः 11। वराटकभागाः 33/37। मुद्गानां कुडवः 0।
कुडवभागाः 49/74। तण्डुलानां कुडवः 1। कुडवभागाः 12/37 । इति मिश्रव्यवहारः।
सुक्षेमा अनुवाद-9 पण से 7 कुडव मूँग तथा 1 पण से 1/2 कुडव चावल
प्राप्त होता है। अतः हे वणिक्! मेरे 3½ अर्थात् 7/2 पण लेकर मूँग का 1/2 तथा
तण्डुल 1 भाग शीघ्र प्रदान करो।
अनुशीलन-यहाँ प्रश्नानुसार पण्य अथवा मात्रा 7 तथा 1/2 कुडव का क्रमशः

मिश्रक-व्यवहार: ब्याज-वृद्धि एवं स्वर्ण-वर्ण गणित (श्लोक ५६-७५)

98 त्रिशतिका
63/74 + 98/37 = 259/74 = 7/2
63/74 में पूर्णांक पण 0 है। 63/74 × 4 = 252/74 = 3 30/74 काकिणी
30/74 × 20 = 600/74 = 8 8/74 वराटक तथा इसके भाग 4/37 सिद्ध है।
98/37 = 2 24/37 पण, 24/37 × 4 = 96/37 = 2 22/37 काकिणी, 22/37 × 20 = 440/37 =
11 33/37 वराटक इस प्रकार 33/37 वराटक भाग सिद्ध होते हैं।
अब अपने-अपने भाग या अंश को पूर्वोक्त फल या योग से विभक्त करके
कुल मूल्य से गुणित करने पर-
1/2 × 14/37 × 7/2 = 49/74 कुडव, 1/2 भाग मूँग का परिमाण
1 × 14/37 × 7/2 = 49/37 अथवा 1 12/37, 1 भाग तण्डुल का परिमाण
इस प्रकार स्पष्टतः 49/37 कुडव तण्डुल का मूल्य 98/37 पण है तथा इस परिमाण
के 1/2 भाग 49/74 कुडव का मूल्य 63/74 है। इन दोनों मूल्यों का योग 7/2 है। अतः इस
मूल्य से उपर्युक्त परिमाण के तण्डुल तथा मुद्ग प्राप्त होंगे।
परिमाण ज्ञात होने पर इनके मूल्य समानुपात से भी ज्ञात हो सकते हैं-
7 : 9 :: 49/74 : x ⇒ x = 9 × 49/74 × 1/7 = 441/518 = 63/74 पण
तथा-
1/2 : 1 :: 49/37 : x ⇒ x = 1 × 49/37 × 2/1 = 98/37 पण
यह सम्पूर्ण विधि बीजगणित के सामान्य नियम के अनुसार स्वतः सिद्ध है।
जैसे-
x = कुडव में तण्डुल की वाञ्छित अज्ञात मात्रा
1/2 x = कुडव में मूँग की वाञ्छित अज्ञात मात्रा
प्रश्नानुसार ⇒ 7/9 कुडव मूँग का मूल्य ⇒ 1 पण
⇒ 1/2 कुडव तण्डुल का मूल्य ⇒ 1 पण
कुल मूल्य चुकाया गया ⇒ 7/2 पण
अतः अज्ञात मात्रा के तण्डुल का मूल्य ⇒ x × 2/1
अज्ञात मात्रा के मूँग का मूल्य ⇒ 1/2 x × 9/7
अज्ञात मात्रा का कुल मूल्य x (2/1 + 9/14) = 37/14 x पण
प्रश्नानुसार कुल मूल्य 7/2 है।
अतः 37/14 x = 7/2 पण,

त्रिशतिका 99
... x = 14/37 × 7/2 = 98/74 = 49/37 कुडव तण्डुल परिमाण
तथा 1/2 x = 49/37 × 1/2 = 49/74 कुडव मुद्ग परिमाण
अब पूर्वोक्तानुसार 1/2 कुडव तण्डुल का मूल्य 1 पण
अतः ⇒ 1 ,, ,, ,, ,, 1 × 2/1 पण
... 49/37 ,, ,, ,, ,, 49/37 × 2 = 98/37 तण्डुल मूल्य
इसी प्रकार—
7/9 कुडव मूँग का मूल्य 1 पण
1 कुडव मूँग का मूल्य 1 × 9/7 = 9/7 पण
49/74 ,, ,, ,, ,, 49/74 × 9/7 = 63/74 पण मुद्ग मूल्य
प्रश्नानुसार 98/37 + 63/74 = 7/2 सिद्ध है।
श्रेढीव्यवहारे सूत्रम्
व्येकपदोत्तरघाते सादावन्त्यं धनं तदादियुतम्।
द्विविभक्तं मध्यधनं गच्छगुणं जायते गणितम्।। ३९।।
सुक्षेमा अनुवाद-1 संख्या से न्यून किये गए पद या गच्छ के साथ उत्तर
या चय को गुणित करके ‘सादि’ अर्थात् आदि धन से युक्त होने पर अन्त्यधन
प्राप्त होता है। उस अन्त्यधन के साथ आदि धन को संयुक्त करके 2 संख्या से
विभक्त करने पर मध्यधन होता है। इस मध्यधन को गच्छ या पद से गुणा करने
पर सर्वधन प्राप्त होता है। इसे गणित कहा जाता है।
अनुशीलन-इस प्रकरण में क्रमिक संख्याओं के योग से प्राप्त अनेक
उपलब्धियों का निरूपण किया गया है। संस्कृत में इन्हें ‘श्रेणी’ कहा जाता है।
गणित शास्त्र में इसका प्राकृत रूप ‘श्रेढ़ी’ शब्द लोकप्रिय रहा है।
इसके लिये यहाँ अनेक पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया गया है, जिनका
क्रमिक निरूपण इस प्रकार है—
पारिभाषिक शब्द हिन्दी अर्थ इंग्लिश अर्थ इंग्लिश प्रतीक
आदि-धन, पहला धन अथवा संख्या, first term a
अन्त्य-धन, अन्तिम धन या संख्या, last term l
१. व्येकपदार्धघ्नचयः सादिः पदसंगुणो भवेद् गणितम्।। - पाटी-गणित सूत्र 85, पृ. 110
तुल. आर्यभटीय गणितपाद 1.19, ब्रा.स्फु.सि. 12.17 ग.सा.सं. 2.61 तथा 6.290, ग.कौ.
1.105

100 त्रिशतिका
मध्य-धन, मध्य का धन या संख्या, middle term m
सर्वधन या गणित, सम्पूर्ण धन या संख्या, sum of terms s
उत्तर या चय या प्रचय, प्रत्येक संख्या के साथ क्रमशः
जोड़ी जाने वाली संख्या, common difference d
पद या गच्छ, संख्याओं की गणना, number of terms n
प्रस्तुत श्लोक में अन्त्यधन, मध्यधन तथा सर्वधन प्राप्त करने के सूत्र बताए
गए हैं। इनके लिये अन्य पारिभाषिक शब्दों का भी उपयोग है। अन्त्यधन आदि के
सूत्र को हम इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं-
अन्त्यधन = उत्तर (पद – 1) + आदिधन
अथवा 𝑙 = d (n – 1) + a
मध्यधन = आदिधन + अन्त्यधन
————————————————
2
अथवा m = a + 𝑙
———————
2
सर्वधन = पद (आदिधन + अन्त्यधन) अथवा पद × मध्यधन
—————————————————————
2
अथवा s = n (a + 𝑙) अथवा s = n × m
——————————
2
उदाहरणम्
प्रथमेऽह्नि हरीतक्या दीयेताश्वस्य विंशतिर्यस्य।
पञ्चकचयेन दत्ताः कति ता दिनसप्तकेन स्युः॥ ७३॥
न्यासः।। आदिः 20। उत्तरः 5। गच्छः 7। लब्धमन्त्यदिने हरीतक्यः 50।
मध्ये 35। सर्वहरीतक्यः 245।
सुक्षेमा अनुवाद-प्रथम दिन घोड़े को 20 हरड़ दी गई। उसके पश्चात्
अगले 7 दिनों तक प्रतिदिन क्रमशः 5-5 हरड़ बढ़ाकर दी गई। तो सातवें दिन तथा
बीच वाले दिन कितनी दी गईं। इस प्रकार 7 दिनों में कुल कितनी हरड़ प्रदान की
गई।
अनुशीलन-यहाँ उपर्युक्त क्रम से सातवें दिन प्राप्त की गई हरड़ 'अन्त्य-ध
न' कही जावेगी।

त्रिशतिका 101
यहाँ प्रथम दिन दी गई 20 हरड़ आदिधन (a) है, प्रतिदिन अतिरिक्त दी
जाने वाली संख्या उत्तर या चय (d) 5 है, दिनों की कुल संख्या पद या गच्छ (n)
7 है। इस स्थिति में उपर्युक्त सूत्र का प्रयोग करने पर–
5 (7-1) + 20 = 50 अन्त्यधन
यह अन्त्यधन का सर्वथा समुचित सूत्र है। क्योंकि वह घोड़ा निम्न क्रम से
हरड़ प्राप्त करता है–
प्रथम दिन, द्वितीय दिन, तृतीय दिन, चतुर्थ दिन, पञ्चम दिन, षष्ठ दिन, सप्तम दिन
a, (a + d), (a + 2d), (a + 3d), (a + 4d), (a + 5d), (a + 6d)
20, 20+5=25, 20+10=30, 20+15=35, 20+20=40, 20+25=45, 20+30=50
तालिका से स्पष्ट है कि प्रत्येक दिन तथा अन्तिम 7वें दिन भी nवें दिन
से 1 कम से गुणित उत्तर (d) के साथ आदिधन (a) संयुक्त है। अतः प्रस्तुत सूत्र
में यही कहा गया है।
प्रस्तुत उदाहरण में मध्य दिन चतुर्थ दिन है। अन्त्यधन के उपाय से मध्यधन
जानने के प्रस्तुत सूत्र अनुसार–
(20 + 50) / 2 = 35 मध्यधन
इसी प्रकार सातों दिन में कुल हरड़ सर्वधन जानने के लिये उपर्युक्त सूत्र
का प्रयोग करने पर–
7 (20 + 50) / 2 = 245 अथवा 7 × 35 = 245 सर्वधन
पाटी-गणित में सर्वधन के सूत्र में अन्त्यधन का सम्पूर्ण सूत्र सम्मिलित
करते हुए सूत्र भी प्रदान किया है।¹ उससे अन्ततः यही पूर्वोक्त सूत्र प्राप्त होता है–
सर्वधन = n (a + ℓ) / 2
पाटी-गणित में इस स्थिति को ज्यामितीय समलम्ब चतुर्भुज (trapazium)
का रूप देते हुए एक ऐसे ‘शराव’ नामक पात्र से तुलना की है, जिसकी आधार
भुजा छोटी तथा सम्मुख भुजा बड़ी हो। प्रस्तुत उदाहरण में आदिधन 20, अन्त्यधन
50 तथा दिनों की संख्या 7 मान कर यह चित्र प्रस्तुत करते हैं–
१. व्येकपदार्धघ्नचयः सादिः पदसंगुणो भवेद् गणितम्॥ - पाटी-गणित सूत्र 85, पृ. 110
तुल. आर्यभटीय गणितपाद 1.19, ब्रा.स्फु.सि. 12.17 ग.सा.सं. 2.61 तथा 6.290, ग.कौ.
1.105

102 त्रिशतिका
नापियाँ मिलीमीटर में हैं।
यहाँ दिनों की संख्या या गच्छ को शीर्षलम्ब बताया है१। यह समलम्ब
चतुर्भुज है। अतः इसके लिये पाटी-गणित का यह नियम प्राप्त करते हैं-
श्रेढ़ीक्षेत्रे तु फलं भूमुखयोगार्धलम्बहतिः
अर्थात् इस आकार का श्रेढ़ी फल आधार भुजा तथा इसकी सम्मुख भुजा
के योग के आधे का शीर्षलम्ब से गुणन द्वारा प्राप्त होता है। स्पष्टतः यह समलम्ब
चतुर्भुज के क्षेत्रफल का सूत्र है तथा यह पूर्वोक्त सर्वधन के सूत्र के ठीक समतुल्य
बैठता है।
त्रिशतिका सूत्र 42 पृ. 84 में भी अन्य शब्दों में यही सूत्र प्रस्तुत किया है।
इस चतुर्भुज में 20 × 7 का एक आयत तथा 15/2 × 7 के दो त्रिभुज हैं। इन
दोनों के सूत्रों को मिलाने पर हम पुनः वही 7 (15 + 20) = 245 क्षेत्रफल प्राप्त
करते हैं। इस प्रकार 15 + 20 = 35 यह प्रतिदिन के दान का औसत या मध्यधन
प्रकट होता है।
निम्नांकित तालिका से भी प्रकट है कि यही प्रतिदिन के दान का औसत
है-
समान क्रम ⟹ 20 25 30 35 40 45 50 = 245
विपरीत क्रम ⟹ 50 45 40 35 30 25 20 = 245
योग ⟹ 70 70 70 70 70 70 70 = 490
यहाँ दोनों क्रम से लिखी संख्याओं का योग एक समान 490 होने से प्रकट
है कि परिमाण समान है। साथ ही प्रथम 20 + 50 = 70 स्पष्टतः a + ℓ है। आगे
भी सभी का योग 70 होने से सिद्ध है कि ये सभी जोड़े a + ℓ के समकक्ष हैं।
तालिका से यह भी प्रकट है कि सम्पूर्ण दिनों की संख्या या n से गुणित a + ℓ
श्रेढ़ीफल का दुगुना 490 है। अतः निश्चय ही श्रेढ़ी फल n गुणित a + ℓ का ½
होगा। सूत्र में यही प्रकट किया गया है। यह a + ℓ का ½ मध्यधन ही है। अतः
n गुणित मध्यधन को भी सर्वधन कहा जा सकता है। सूत्र में यही प्रकट किया
गया है।
१. गच्छसमो लम्बकस्तस्य - पाटी-गणित सूत्र 79, पृ. 107

... Physical line 4:वित्तं प्रयच्छति... Physical line 5:पूर्वोक्तोदाहृतवन्न्यासः... Physical line 6:17। मध्यधनम् 9¾। सर्वधनम् 292½ Physical line 7:सुक्षेमा अनुवाद-कोई धनी किसी याचक को प्रथम दिन 2½ अथवा 5/2 रूप Physical line 8:वित्त देकर एक मास तक प्रत्येक अन्य दिन ½ रूप बढ़ाकर प्रदान करता है, तो Physical line 9:मास के अन्तिम तथा मध्य दिन वह कितने रूप प्रदान करेगा। साथ ही सम्पूर्ण Physical line 10:कुल कितने रूप अथवा सर्वधन दिया जावेगा। Physical line 11:यहाँ उत्तर (d) ½, गच्छ (n) 30 है। Physical line 12:पूर्वोक्त सूत्रानुसार- Physical line 13:½ (30-1) + 5/2 = 29/2 + 5/2 = 34/2 = 17 रूप अन्त्य धन Physical line 14:5/2 + 17 = 39/2 × ½ = 39/4 = 9¾ रूप मध्यधन(with bar under 5/2 + 17) Physical line 15: 2`
Physical line

104 त्रिशतिका
आदिधन (a) = s/n - (n-1) d / 2
इस सूत्र को सर्वधन के विस्तृत सूत्र द्वारा प्राप्त किया गया है। ऊपर जो
सर्वधन का सूत्र उल्लिखित है, उसमें l के स्थान पर उसका सूत्र लिखने पर सर्वधन
का विस्तृत सूत्र तथा उसके आदिधन का यह सूत्र इस प्रकार प्राप्त करते हैं–
सूत्र उदाहरण
सर्वधन¹७ s =n {2a + (n-1)d} 245 = 7/2 {2 × 20 + (7-1)5} = 7/2 × 70
= 490 / 2
⇒ 2s = n {2a + (n-1)d} 490 = 7{2 × 20 + (7-1)5} = 7 × 70
⇒ 2s/n = 2a + (n-1)d 490/7 = 2 × 20 + (7-1)5 = 40 + 30 = 70
⇒ 2a = 2s/n - (n-1)d 40 = 490/7 - (7-1)5 = 70-30
⇒ a = 2s/2n - (n-1)d/2 20 = 490/14 - (7-1)5/2 = 35-15
a = s/n - (n-1)d/2 20 = 245/7 - (7-1)5/2 = 35-15
इस प्रकार हमने आदिधन के लिये सर्वधन के द्वारा ठीक वही सूत्र प्राप्त
कर लिया है, जिसका श्लोक में उल्लेख है। वास्तव में बीजगणितीय समीकरण
के सामान्य नियमों के द्वारा किसी भी धन के परिज्ञान के आधार पर आदिधन का
पता लगाया जा सकता है। जैसे अन्त्यधन (ℓ) के आधार पर–
ℓ = a + (n-1)d 50 = 20 + (7-1)5 = 20 + 30
a = ℓ - (n-1)d 20 = 50-(7-1)5 = 50-30
मध्यधन के आधार पर–
m = (a + ℓ)/2 35 = (20 + 50)/2
2m = a + ℓ 70 = 20+50
a = 2m-ℓ 20 = 70-50
सर्वधन के सूत्र में उल्लिखित सूत्र के आधार पर–
s = n (a + ℓ)/2 245 = 7 (20 +50)/2 = 7 × 35

त्रिशतिका १०५
2s / n = a + l 490 / 7 = 20 + 50
a = (2s / n) - l 20 = (490 / 7) - 50 = 70-50
द्वितीय उदाहरण के आदिधन को भी श्लोकोक्त सूत्र के अनुसार इस प्रकार
प्राप्त करते हैं–
a = s/n - (n-1)d / 2 , a = 1170 / (4 × 30) - (30-1) ½ / 2 ⇒ 1170/120 - 29/2 × ½
⇒ 117/12 - 29/4 = 30/12 = 5/2 आदिधन
प्रचयज्ञानाय करणसूत्रम्
पदहृतफलं मुखोनं निरेकपददलहृतं प्रचयः¹।
न्यासः।। आदिः 20। उ० 0। गच्छः 7। गणितम् 245। लब्धमुत्तरः 5।
द्वितीये न्यासः।। आ ५/२। उ० 0। ग० 30। गणितम् 292½। लब्धमुत्तरः ½।
सुक्षेमा अनुवाद–पद अथवा गच्छ (n) से विभाजित फल अथवा सर्वधन
(s) में से मुख या आदि धन (a) को घटावें। प्राप्त संख्या को 1 कम पद (n) से
विभाजित करें तो प्रचय (d) का परिज्ञान होता है।
अनुशीलन–प्रस्तुत नियमानुसार प्रचय (d) के लिये यह सूत्र प्राप्त करते हैं–
प्रथम उदाहरण में समन्वय
प्रचय (d) = [2 (s/n - a)] / (n - 1) [2 (245/7 - 20)] / (7 - 1) = 2 (35-20) / 6 = 30/6 = 5
यह सूत्र पूर्वोक्त सर्वधन के सूत्र के आधार पर समीकरण द्वारा अनायास
प्राप्त है–
१. यह सूत्र पूर्वोक्त पृ. 101 में वर्णित पाटी-गणित से ध्वनित है।

106 त्रिशतिका

सूत्र | उदाहरण
s = n/2 {2a + (n-1)d} | 245 = 7/2 {2 × 20 + (7-1)5} = 7/2 × 70 = 490/2
2s/n = 2a + (n-1)d | 490/7 = 2 × 20 + (7-1)5 = 40 + 30
(n-1)d = 2s/n - 2a | 6 × 5 = 490/7 - 2 × 20 = 70-40
d = (2s/n - 2a) / (n-1) | 5 = (490/7 - 2 × 20) / (7-1) = (70-40)/6 = 30/6 = 5
अथवा d = (s/n - a) / (n-1) | 2(245/7 - 20) / (7-1) = 2 × (35-20) / 6 = 30/6 = 5
पूर्वोक्त अन्त्यधन (ℓ) के सूत्र के

त्रिशतिका 107
सूत्र उदाहरण
d = 2 ( s/n - a ) / (n-1) 2 ( 1170 / (4 × 30) - 5/2 ) / (30-1) = 2 ( 1170/120 - 5/2 ) / 29 = [2 (1170–300) / 120] / 29
⇒ 2 × 870/122 × 1/29 = 1740/3480 = 1/2
गच्छज्ञानाय सूत्रम्
अष्टोत्तरहतफलतो द्विगुणादिप्रचयविवरकृतियुक्तात्।
मूलं द्विगुणमुखोनं सचयं द्विचयोद्धृतं गच्छः१॥ 41॥
न्यासः॥ आदिः 20। उ० 5। गच्छः 0। गणितम् 245 लब्धो गच्छः 7।
द्वितीयोदाहरणे न्यासः॥ 5/2। उ० 1/2। गच्छः 0।
सुक्षेमा अनुवाद-8 संख्या से गुणित उत्तर या चय (d) तथा उससे गुणित
फल या सर्वधन (s) प्राप्त करें। पुनः 2 से गुणित आदिधन (a) में से प्रचय (d) को
घटाकर उसका वर्ग करें। पूर्वोक्त गुणनफल में इस वर्ग को जोड़ दें। पुनः इसका
वर्गमूल प्राप्त करें। इसमें से द्विगुणित मुख या आदिधन (a) चय (d) को घटाने से
प्राप्त संख्या को घटावें। पश्चात् द्विगुणित चय (d) से भाग देवें तो गच्छ (n) प्राप्त
होता है।
अनुशीलन-श्लोक के इस विवरण के अनुसार हम गच्छ (n) के लिये यह
सूत्र प्राप्त करते हैं-
गच्छ (n) = [√((2a-d)² + 8sd) - (2a-d)] / 2d
इस प्रकार यहाँ गच्छ (n) को वर्ग-समीकरण के सूत्र द्वारा हल किया गया
है। श्रीधराचार्य ने अपने अन्य ग्रन्थ में वर्ग-समीकरण का सूत्र दिया है। जिसे
भास्कराचार्य ने अविकल रूप से उद्धृत करते हुए अपनाया है। यहाँ गच्छ (n)
ज्ञात करने के लिये इसे द्विघात-समीकरण के आकार में प्रस्तुत करना सम्भव होने
के कारण यह सूत्र अन्वित होता है। अतः प्रथम सर्वधन के उपाय से अज्ञात गच्छ
(n) के लिये द्विघात समीकरण का आकार प्राप्त करते हैं-

१. तुल. आर्यभटीय, गणितपाद 1.20, ब्रा.स्फु.सि. 12.18, ग.कौ.पृ. 107, सि.शे. 13.24,
लीलावती श्रेढी व्यवहार श्लोक 5

108 त्रिशतिका
n/2 {2a + (n-1)d} = s
n {2a + (n-1)d} = 2s
n {2a + nd-d} = 2s
2an + n²d-nd-2s = 0
dn² + 2an-nd-2s = 0
dn² + (2a-d)n-2s = 0
इस क्रम का अनुसरण करते हुए त्रिशतिकाकार के प्रथम उदाहरण को इस
प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं—
d a d S
5n² + (2x20-5) n - 2 × 245 = 0
⇒ 5n²+35n-490=0
इस स्थिति में पूर्वोक्त सूत्र—
n = (√1225+9800 - 35) / 10
= (105-35) / 10 = 7
इस सूत्र की उपपत्ति के लिये प्रस्तुत प्रश्न को बीजगणितीय समीकरण के
सामान्य नियमों द्वारा हल करते हैं-
5n²+35n=490
सभी पक्षों को 4a से गुणा करने पर—
⇒ 100n² + 700n = 9800
⇒ (10n)² + 2 × 10n × 35 + 35² = 1225 + 9800
(10n+35)² =1225+9800
10n + 35 = √1225 + 9800
n = (√1225 + 9800 - 35) / 10 = n = 7
इस प्रकार हमने ठीक वही सूत्र प्राप्त कर लिया है, जिसका उपरिलिखित
श्लोक में उल्लेख किया है। श्रीधराचार्य का वर्ग-समीकरण का सामान्य सूत्र तथा
आधुनिक सूत्र भी ठीक इसके अनुरूप है। अतः सिद्ध है कि वर्ग-समीकरण के

त्रिशतिका 109
सामान्य नियम द्वारा इसका हल प्राप्त किया गया है। इस प्रकार गच्छ (n) का मान
7 प्राप्त हो जाता है।
द्वितीय उदाहरण को भी उपरिलिखित विधि से हल करते हैं-
उदाहरणानुसार सर्वधन × 2 = {2 × 5/2 + (n-1) 1/2} n = 1170/2 = 585
⇒ {2 × 5/2 + (n-1) 1/2} n - 1170/2 = 0
वर्गसमीकरण का आकार... ⇒ 1/2 n² + 9/2 n - 585 = 0
सभी पक्षों को 4a से गुणा करने पर ⇒ 1n² + 9n - 1170 = 0
⇒ (1n)² + 2 × 1n × 9/2 + (9/2)² = (9/2)² + 1170
⇒ (n + 9/2)² = 81/4 + 1170
⇒ n + 9/2 = √(81/4 + 1170)
⇒ n = √(81/4 + 1170) - 9/2
n = 69/2 - 9/2 = 60/2 = 30
इस समीकरण के द्वारा पुनः श्लोकोक्त सूत्र को प्राप्त कर लिया गया है।

110 त्रिशतिका
रेखा - गणितम्
क्षेत्रव्यवहारे करणसूत्रम्
समचतुरस्रायतयोर्भुजकोटिहतिः प्रजायते गणितम्।।
सुक्षेमा अनुवाद-समकोण वाले चतुर्भुज वर्ग (square) अथवा आयत
(rectangle) की भुज या आधार (base) तथा कोटि अर्थात् लम्ब (perpendicu-
lar) का गुणनफल ही उनका गणित या क्षेत्रफल होता है।
अनुशीलन-प्रस्तुत श्लोक में वर्ग तथा आयत के क्षेत्रफल के सूत्र अंकित
हैं। इसके अनुसार-
वर्ग का क्षेत्रफल = भुज × कोटि (लम्बाई × चौड़ाई) अथवा भुज² या
कोटि²
आयत का क्षेत्रफल = भुज × कोटि (लम्बाई × चौड़ाई)
उदाहरणम्
समचतुरस्रक्षेत्रे चतुष्कबाहौ च किं भवेद् गणितम्।
सार्धत्रिकरभुजे च यदि गणितविधिं विजानासि १ ।। 75।।
4
न्यासः 4 [वर्ग] 4 लब्धं क्षेत्रफलम् 16 [वर्ग] 7/2 लब्धं क्षेत्रफलम् 12 1/4
सुक्षेमा अनुवाद-समकोण वाले चतुष्कोणीय वर्ग में, जिसकी प्रत्येक भुजा
4 मात्रा की है, उसका क्षेत्रफल क्या होगा। इसी प्रकार 3½ या 7/2 मात्रा की एक भुजा
वाले वर्ग का क्षेत्रफल बताओ, यदि गणित विधि जानते हो।
अनुशीलन-यहाँ पूर्वोक्त नियमानुसार-
प्रथम वर्ग का क्षेत्रफल = 4 × 4 = 16
द्वितीय वर्ग का क्षेत्रफल = 7/2 × 7/2 = 49/4 = 12 1/4
१. यह श्लोक पाटी-गणित उदा. 122 पृ. 161 से तुलनीय है-
समचतुरश्रे क्षेत्रे बाहुसमा वक्त्रभूमिलम्बाः स्युः।
तेऽध्यर्धहस्तसंख्याः कथय सखे किं फलं तत्र।।
यहाँ 3/2 भुज कोटि वाले चतुर्भुज का क्षेत्रफल पूछा है। स्पष्टतः 3/2 × 3/2 = 9/4 हस्त या 2
हस्त 6 अंगुल

त्रिशतिका ·111
द्वितीयोदाहरणम्
आयतचतुरस्रस्य च त्रिहस्तकोटेस्चतुःकर भुजस्य।
अध्यर्धकरभुजस्य च करार्धकोटेः फलं कथय¹।। 76।।
4 3
न्यासः 3 ½ लब्धे क्षेत्रफले 12। ¾।।
सुक्षेमा अनुवाद-किसी 3 हाथ कोटि या लम्ब तथा 4 हाथ भुज अथवा
आधार वाले चतुष्कोणीय आयत क्षेत्र का क्षेत्रफल बताओ तथा इसी प्रकार 1½ या
3/2 हाथ या भुज तथा ½ हाथ कोटि वाले आयत का क्षेत्रफल कहो।
अनुशीलन-यहाँ आयत के क्षेत्रफल का उदाहरण प्रस्तुत है। श्लोक के
नियमानुसार-
4 हाथ कोटि या लम्ब तथा 3 हाथ भुज या आधार वाले आयत का क्षेत्रफल
= 4 × 3 = 12 हाथ²
½ हाथ लम्ब तथा 3/2 हाथ आधार वाले आयत का क्षेत्रफल = ½ × 3/2 = ¾ हाथ²
अन्यत् करणसूत्रम्
चतुरस्रेष्वन्येषु च लम्बगुणं कुमुखयोगार्धम्²।। 42।।
सुक्षेमा अनुवाद-अन्य चतुष्कोणीय चतुर्भुज अर्थात् समलम्ब चतुर्भुज (tra-
pezium) का क्षेत्रफल समलम्ब के आधार वाली कु तथा मुख नामक दोनों
भुजाओं के योग के आधे को शीर्षलम्ब (perpendicular) के साथ गुणनफल से
प्राप्त होता है।
अनुशीलन-इस श्लोक में समलम्ब चतुर्भुज के क्षेत्रफल प्राप्त करने की
विधि बताई गई है। जिस चतुर्भुज की दो भुजाएँ समान्तर हों उसे समलम्ब चतुर्भुज
कहते हैं। इन भुजाओं के किसी भी बिन्दु से समान्तर रेखा तक सरल रेखा में
खींचे गए शीर्ष लम्ब की दूरी बराबर होती है। पर इनकी अन्य दो भुजाएँ
असमान्तर होने से इनके बिन्दुओं से दूसरी असमान्तर रेखा तक खींची गई सरल
रेखा की दूरी बराबर नहीं होती। श्लोक के अनुसार इस समलम्ब के क्षेत्रफल का
सूत्र इस प्रकार होगा-
१. तुलनीय - यत्रायतचतुरश्रे भूवदने सार्धपञ्चकरसंख्ये।
पार्श्वभुजमध्यलम्बास्त्रिहस्तकास्तत्र किं गणितम्। पाटी-गणित श्लोक 123, पृ. 161 यहाँ 3
हाथ लम्बे तथा 11/2 आधार वाले आयताकार पात्र का क्षेत्रफल पूछा है।
स्पष्टतः 3 × 11/2 = 33/2 अर्थात् 16 हाथ तथा 12 अंगुल।।
२. तुल. भूवदनसमासार्धं मध्यमलम्बेन संगुणितम्- पाटी-गणित सूत्र 115, पृ. 161 तथा म.सि.
15.78, सि.शे. 13.30, लीलावती क्षेत्रव्यवहार श्लोक 23

112 त्रिशतिका
समलम्ब का क्षेत्रफल = ½ (समान्तर रेखाएँ क्रमशः 'कु' + 'मुख') ×
शीर्षलम्ब (h)
उदाहरणम्
यस्य द्विकरमुखमृजु लम्बो द्वादश चतुष्कृतिर्भूमिः।
त्रिकपञ्चकसहिता दश पार्श्वभुजौ तस्य किं गणितम्।। 77।।
न्यासः 2 लब्धं फलम् 108
13 12 15
5 2 9
16
सुक्षेमा अनुवाद-जिस समलम्ब चतुर्भुज की समान्तर भुजाओं में से मुख
या ऊपर की भुजा (b₂) 2 हाथ है तथा भूमि या आधार भुजा (b₁) 4² अर्थात् 16
हाथ है तथा उस पर सरल रेखा में 12 हाथ का शीर्षलम्ब खींचा गया है। इसकी
पार्श्व की असमान्तर भुजाएँ क्रमशः 13 तथा 15 हाथ हैं। ऐसे चतुर्भुज का क्षेत्रफल
क्या होगा।
अनुशीलन-त्रिशतिका में वर्णित चित्र में अंकित संख्या तिगुने मिलीमीटर
हैं। यहाँ आधार रेखा 'कु' 16 तथा इसके समान्तर मुख रेखा 2 हाथ वाली है इसमें
12 हाथ का शीर्षलम्ब है। अतः सूत्रानुसार-
½ (16 + 2) × 12 = 9 × 12 = 108 वर्ग हस्त
इसकी उपपत्ति के लिये आगे प्रदर्शित चित्र के अनुसार इनके 3 अलग-अलग
आयत का रूप देते हैं-
प्रथम आयत का क्षेत्रफल = 12 × 5 = 60 वर्ग हस्त
द्वितीय आयत का क्षेत्रफल = 12 × 2 = 24 वर्ग हस्त
तृतीय आयत का क्षेत्रफल = 12 × 9 = 108 वर्ग हस्त
प्रथम तथा तृतीय आयत का आधा त्रिभुज है। अतः
प्रथम त्रिभुज का क्षेत्रफल = ⁶⁰⁄₂ = 30 वर्ग हस्त