तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
अध्याय १: सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र व प्रमाण-नय
अध्याय - १
That (This right faith) is attained by intuition or by
acquisition of knowledge.
जीवाजीवास्त्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षास्तत्त्वम् ॥४॥
[ जीवाजीवास्त्रवबन्धसंवरनिर्जरामोक्षाः ] 1. जीव,
2. अजीव, 3. आस्रव, 4. बन्ध, 5. संवर, 6. निर्जरा और
7. मोक्ष - यह सात [ तत्त्वम् ] तत्त्व हैं।
(The) soul, (the) non-soul, influx, bondage,
stoppage, gradual dissociation and liberation
constitute reality.
नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्न्यासः ॥५॥
[ नामस्थापनाद्रव्यभावतः ] नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से
[ तन्न्यासः ] उन सात तत्त्वों तथा सम्यग्दर्शनादि का लोक
व्यवहार होता है।
These are installed (in four ways) by name,
representation, substance (potentiality) and actual
state.
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अध्याय - १
प्रमाणनयैरधिगमः ॥६॥
सम्यग्दर्शनादि रत्नत्रय और जीवादि तत्त्वों का [ अधिगमः ]
ज्ञान [ प्रमाणनयैः ] प्रमाण और नयों से होता है।
Knowledge (of the seven categories) is attained by
means of pramāṇa¹ and naya².
निर्देशस्वामित्वसाधनाऽधिकरणस्थितिविधानतः ॥७॥
[ निर्देश स्वामित्व साधन अधिकरण स्थिति विधानतः ]
निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान से
भी सम्यग्दर्शनादि तथा जीवादिक तत्त्वों का अधिगम होता है।
(Knowledge of the seven categories is attained) by
description, ownership, cause, resting place
(substratum), duration, and division.
सत्संख्याक्षेत्रस्पर्शनकालान्तरभावाल्पबहुत्वैश्च ॥८॥
[ च ] और [ सत् संख्या क्षेत्र स्पर्शन काल अन्तर
भावाल्पबहुत्वैः ] सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर,
भाव और अल्पबहुत्व इन आठ अनुयोगों के द्वारा भी पदार्थ
का ज्ञान होता है।
¹ pramāṇa : comprehensive knowledge
² naya : standpoint
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अध्याय - १
(The seven categories are known) also by existence,
number (enumeration), place or abode, extent of
space (pervasion), time, interval of time, thought-
activity, and reciprocal comparison.
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानि ज्ञानम् ॥९॥
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान
ये पाँच [ ज्ञानम् ] ज्ञान हैं।
Knowledge is of five kinds – sensory knowledge,
scriptural knowledge, clairvoyance, telepathy, and
omniscience.
तत्प्रमाणे ॥१०॥
[ तत् ] उपरोक्त पाँचों प्रकार के ज्ञान ही [ प्रमाणे ] प्रमाण
(सच्चे ज्ञान) हैं।
These (five kinds of knowledge) are the two types
of pramāṇa (valid knowledge).
आद्ये परोक्षम् ॥११॥
[ आद्ये ] प्रारम्भ के दो अर्थात् मतिज्ञान और श्रुतज्ञान
[ परोक्षम् ] परोक्ष प्रमाण हैं।
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अध्याय - १
The first two (kinds of knowledge) are indirect
(knowledge).
प्रत्यक्षमन्यत् ॥१२॥
[ अन्यत् ] शेष तीन अर्थात् अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञान
[ प्रत्यक्षम् ] प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
The remaining three constitute direct (knowledge).
मतिः स्मृतिः संज्ञा चिन्ताऽभिनिबोध इत्यनर्थान्तरम्
॥१३॥
[ मतिः ] मति, [ स्मृतिः ] स्मृति, [ संज्ञा ] संज्ञा, [ चिन्ता ]
चिन्ता, [ अभिनिबोध ] अभिनिबोध, [ इति ] इत्यादि,
[ अनर्थान्तरम् ] अन्य पदार्थ नहीं हैं, अर्थात् वे मतिज्ञान के
नामांतर हैं।
Sensory cognition, remembrance, recognition,
induction, and deduction are synonyms.
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अध्याय - १
तदिन्द्रियानिन्द्रियनिमित्तम् ॥१४॥
[ इन्द्रियानिन्द्रिय ] इन्द्रियाँ और मन [ तत् ] उस मतिज्ञान के
[ निमित्तम् ] निमित्त हैं।
That is caused by the senses and the mind.
अवग्रहेहावायधारणाः ॥१५॥
[ अवग्रह ईहा अवाय धारणाः ] अवग्रह, ईहा, अवाय, और
धारणा यह चार भेद हैं।
(The four divisions of sensory knowledge are)
apprehension (sensation), speculation, perceptual
judgment, and retention.
बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥१६॥
[ बहु ] बहुत [ बहुविध ] बहुत प्रकार [ क्षिप्र ] जल्दी
[ अनिःसृत ] अनिःसृत [ अनुक्त ] अनुक्त [ ध्रुवाणां ] ध्रुव
[ सेतराणां ] उनसे उल्टे भेदों से युक्त अर्थात् एक, एकविध,
अक्षिप्र, निःसृत, उक्त, और अध्रुव, इस प्रकार बारह प्रकार
के पदार्थों का अवग्रह ईहादिरूप ज्ञान होता है।
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अध्याय - १
(The subdivisions of each of these are) more, many
kinds, quick, hidden, unexpressed, lasting, and
their opposites.
अर्थस्य ॥१७॥
उपरोक्त बारह अथवा 288 भेद [ अर्थस्य ] पदार्थ के (द्रव्य
के - वस्तु के) हैं।
(These are the attributes) of substances (objects).
व्यञ्जनस्यावग्रहः ॥१८॥
[ व्यञ्जनस्य ] अप्रगटरूप शब्दादि पदार्थों का [ अवग्रहः ]
मात्र अवग्रह ज्ञान होता है, ईहादि तीन ज्ञान नहीं होते।
(There is only) apprehension of indistinct things.
न चक्षुरनिन्द्रियाभ्याम् ॥१९॥
व्यञ्जनावग्रह [ चक्षुः अनिन्द्रियाभ्याम् ] नेत्र और मन से
[ न ] नहीं होता।
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अध्याय - १
Indistinct apprehension does not arise by means of
the eyes and the mind.
श्रुतं मतिपूर्वं द्व्यनेकद्वादशभेदम् ॥२०॥
[ श्रुतम् ] श्रुतज्ञान [ मतिपूर्वं ] मतिज्ञान पूर्वक होता है अर्थात्
मतिज्ञान के बाद होता है, वह श्रुतज्ञान [ द्व्यनेकद्वादशभेदम् ]
दो, अनेक और बारह भेदवाला है।
Scriptural knowledge preceded by sensory
knowledge is of two kinds, which are of many and
twelve subdivisions.
भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम् ॥२१॥
[ भवप्रत्ययः ] भवप्रत्यय नामक [ अवधिः ] अवधिज्ञान
[ देवनारकाणाम् ] देव और नारकियों के होता है।
Clairvoyance (avadhi) based on birth is possessed
by celestial and infernal beings.
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अध्याय - १
क्षयोपशमनिमित्तः षड्विकल्पः शेषाणाम् ॥२२॥
[ क्षयोपशमनिमित्तः ] क्षयोपशमनैमित्तक अवधिज्ञान
[ षड्विकल्पः ] अनुगामी, अननुगामी, वर्धमान, हीयमान,
अवस्थित और अनवस्थित - ऐसे छह भेदवाला है, और वह
[ शेषाणाम् ] मनुष्य तथा तिर्यंचों के होता है।
Clairvoyance from destruction-cum-subsidence (i.e.
arising on the lifting of the veil) is of six kinds. It is
acquired by the rest (namely human beings and
animals).
ऋजुविपुलमती मनःपर्ययः ॥२३॥
[ मनःपर्ययः ] मनःपर्ययज्ञान [ ऋजुमतिविपुलमतिः ]
ऋजुमति और विपुलमति दो प्रकार का है।
Ṛjumati and vipulmati are the two kinds of
telepathy (manahparyaya).
विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां तद्विशेषः ॥२४॥
[ विशुद्ध्यप्रतिपाताभ्यां ] परिणामों की विशुद्धि और
अप्रतिपात अर्थात् केवलज्ञान होने से पूर्व न छूटना
[ तद्विशेषः ] इन दो बातों से ऋजुमति और विपुलमति ज्ञान
में विशेषता (अन्तर) है।
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अध्याय - १
The differences between the two are due to purity
and infallibility.
विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्योऽवधिमनःपर्यययोः ॥२५॥
[ अवधिमनःपर्यययोः ] अवधि और मनःपर्ययज्ञान में
[ विशुद्धिक्षेत्रस्वामिविषयेभ्यः ] विशुद्धता, क्षेत्र, स्वामी और
विषय की अपेक्षा से विशेषता होती है।
Telepathy (manahparyaya) and clairvoyance
(avadhi) differ with regard to purity, space, knower
and objects.
मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ॥२६॥
[ मतिश्रुतयोः ] मतिज्ञान और श्रुतज्ञान का [ निबंधः ]
विषय-सम्बन्ध [ असर्वपर्यायेषु ] कुछ (न कि सर्व) पर्यायों
से युक्त [ द्रव्येषु ] जीव पुद्गलादि सर्व द्रव्यों में है।
The range of sensory knowledge and scriptural
knowledge extends to all the six substances but not
to all their modes.
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अध्याय - १
रूपिष्ववधेः ॥२७॥
[ अवधेः ] अवधिज्ञान का विषय-सम्बन्ध [ रूपिषु ] रूपी
द्रव्यों में है अर्थात् अवधिज्ञान रूपी पदार्थों को जानता है।
The scope of clairvoyance is that which has form.
तदनन्तभागे मनःपर्ययस्य ॥२८॥
[ तत् अनन्तभागे ] सर्वावधिज्ञान के विषयभूत रूपी द्रव्य के
अनन्तवें भाग में [ मनःपर्ययस्य ] मनःपर्ययज्ञान का
विषय-सम्बन्ध है।
The scope of telepathy is the infinitesimal part of
the matter ascertained by clairvoyance.
सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य ॥२९॥
[ केवलस्य ] केवलज्ञान का विषय-सम्बन्ध
[ सर्वद्रव्य-पर्यायेषु ] सर्व द्रव्य और उनकी सर्व पर्याय हैं,
अर्थात् केवलज्ञान एक ही साथ सभी पदार्थों को और उनकी
सभी पर्यायों को जानता है।
Omniscience (kevala jñāna) extends to all entities
(substances) and all their modes simultaneously.
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अध्याय - १
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥३०॥
[ एकस्मिन् ] एक जीव में [ युगपत् ] एक साथ
[ एकदीनि ] एक से लेकर [ आचतुर्भ्यः ] चार ज्ञान तक
[ भाज्यानि ] विभक्त करने योग्य हैं, अर्थात् हो सकते हैं।
From one up to four kinds of knowledge can be
possessed simultaneously by a single soul.
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥
[ मतिश्रुतावधयः ] मति, श्रुत और अवधि यह तीन ज्ञान
[ विपर्ययश्च ] विपर्यय भी होते हैं।
Sensory knowledge, scriptural knowledge and
clairvoyance may also be erroneous knowledge.
सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥
[ यदृच्छोपलब्धेः ] अपनी इच्छा से चाहे जैसा ग्रहण करने के
कारण [ सत् असतोः ] विद्यमान और अविद्यमान पदार्थों का
[ अविशेषात् ] भेदरूप ज्ञान (यथार्थ विवेक) न होने से
[ उन्मत्तवत् ] पागल के ज्ञान की भाँति मिथ्यादृष्टि का ज्ञान
विपरीत अर्थात् मिथ्याज्ञान ही होता है।
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अध्याय - १
नैगमसंग्रहव्यवहारर्जुसूत्रशब्दसमभिरूढैवंभूता
नयाः ॥३३॥
[ नैगम ] नैगम, [ संग्रह ] संग्रह, [ व्यवहार ] व्यवहार,
[ ऋजुसूत्र ] ऋजुसूत्र, [ शब्द ] शब्द, [ समभिरूढ ]
समभिरूढ, [ एवंभूता ] एवंभूत - यह सात [ नयाः ] नय हैं।
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे प्रथमोऽध्यायः ॥
अध्याय - २
अथ द्वितीयोऽध्यायः
The Category of the Living
औपशमिकक्षायिकौ भावौ मिश्रश्च जीवस्य
स्वतत्त्वमौदयिकपारिणामिकौ च ॥१॥
[ जीवस्य ] जीव के [ औपशमिकक्षायिकौ ] औपशमिक
और क्षायिक [ भावौ ] भाव [ च मिश्रः ] और मिश्र तथा
[ औदयिक-पारिणामिकौ च ] औदयिक और पारिणामिक
यह पाँच भाव [ स्वतत्त्वम् ] निजभाव हैं अर्थात् यह जीव के
अतिरिक्त दूसरे में नहीं होते।
The distinctive characteristics of the soul are the
dispositions (thought-activities) arising from
subsidence, destruction, destruction-cum-
subsidence of karmas, the rise of karmas, and the
inherent nature or capacity of the soul.
द्विनवाष्टादशैकविंशतित्रिभेदाः यथाक्रमम् ॥२॥
उपरोक्त पाँच भाव [ यथाक्रमम् ] क्रमशः [ द्वि नव
अष्टादश एकविंशति त्रिभेदाः ] दो, नव, अट्ठारह, इक्कीस
और तीन भेद वाले हैं।
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अध्याय - २
(These are of) two, nine, eighteen, twenty-one, and
three kinds respectively.
सम्यक्त्वचारित्रे ॥३॥
[ सम्यक्त्व ] औपशामिक सम्यक्त्व और [ चारित्रे ]
औपशामिक चारित्र - इस प्रकार औपशामिकभाव के दो भेद
हैं।
(The two kinds are) right belief and conduct.
ज्ञानदर्शनदानलाभभोगोपभोगवीर्याणि च ॥४॥
[ ज्ञान दर्शन दान लाभ भोग उपभोग वीर्याणि ]
केवलज्ञान, केवलदर्शन, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग,
क्षायिकउपभोग, क्षायिकवीर्य तथा [ च ] च कहने पर,
क्षायिकसम्यक्त्व और क्षायिकचारित्र - इस प्रकार क्षायिकभाव
के नौ भेद हैं।
(The nine kinds are) knowledge, perception, gift,
gain, enjoyment, re-enjoyment, energy, etc.
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अध्याय - २
ज्ञानाज्ञानदर्शनलब्धयश्चतुस्त्रित्रिपञ्चभेदाः
सम्यक्त्वचारित्रसंयमासंयमाश्च ॥५॥
[ ज्ञान अज्ञान ] मति, श्रुत, अवधि और मनःपर्यय यह चार
ज्ञान तथा कुमति, कुश्रुत और कुअवधि ये तीन अज्ञान,
[ दर्शन ] चक्षु, अचक्षु और अवधि ये तीन दर्शन, [ लब्धयः ]
क्षायोपशमिक दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य ये पाँच
लब्धियाँ [ चतुः त्रि त्रि पञ्च भेदाः ] इस प्रकार
4+3+3+5=15 भेद तथा [ सम्यक्त्व ] क्षायोपशमिक सम्यक्त्व
[ चारित्र ] क्षायोपशमिक चारित्र [ च ] और [ संयमासंयमाः ]
संयमासंयम - इस प्रकार क्षायोपशमिकभाव के 18 भेद हैं।
(The eighteen kinds are) knowledge, wrong
knowledge, perception, and attainment, of four,
three, three, and five kinds, and right faith,
conduct, and mixed disposition of restraint and
non-restraint.
गतिकषायलिंगमिथ्यादर्शनाज्ञानासंयतासिद्ध
लेश्याश्चतुश्चतुस्त्र्येकैकैकैकषड्भेदाः ॥६॥
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अध्याय - २
[ गति ] तिर्यंच, नरक, मनुष्य और देव – यह चार गतियाँ,
[ कषाय ] क्रोध, मान, माया, लोभ - यह चार कषायें,
[ लिंग ] स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुसंकवेद – यह तीन लिंग,
[ मिथ्यादर्शन ] मिथ्यादर्शन [ अज्ञान ] अज्ञान [ असंयत ]
असंयम [ असिद्ध ] असिद्धत्व तथा [ लेश्याः ] कृष्ण, नील,
कापोत, पीत, पद्म और शुक्ल – यह छह लेश्यायें, इस प्रकार
[ चतुः चतुः त्रि एक एक एक एक षड् भेदाः ]
4+4+3+1+1+1+1+6=21, इस प्रकार सब मिलाकर
औदयिकभाव के 21 भेद हैं।
(These are) the conditions of existence, the
passions, sex, wrong belief, wrong knowledge, non-
restraint, non-attainment of perfection (imperfect
disposition), and colouration, which are of four,
four, three, one, one, one, one, and six kinds.
जीवभव्याभव्यत्वानि च ॥७॥
[ जीवभव्याभव्यत्वानि च ] जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व
– इस प्रकार पारिणामिक भाव के तीन भेद हैं।
(The three are) the principle of life (consciousness),
capacity for salvation, and incapacity for salvation.
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अध्याय - २
उपयोगो लक्षणम् ॥८॥
[ लक्षणम् ] जीव का लक्षण [ उपयोगः ] उपयोग है।
Consciousness is the differentia (distinctive
characteristic) of the soul.
स द्विविधोऽष्टचतुर्भेदः ॥९॥
[ सः ] वह उपयोग [ द्विविधः ] ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग
के भेद से दो प्रकार का है, और वे क्रमशः [ अष्ट चतुः
भेदः ] आठ और चार भेद सहित हैं अर्थात् ज्ञानोपयोग के
मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवल (यह पाँच सम्यग्ज्ञान)
और कुमति, कुश्रुत तथा कुअवधि (यह तीन मिथ्याज्ञान) इस
प्रकार आठ भेद हैं। तथा दर्शनोपयोग के चक्षु, अचक्षु, अवधि
तथा केवल इस प्रकार चार भेद हैं। इस प्रकार ज्ञान के आठ
और दर्शन के चार भेद मिलकर उपयोग के कुल बारह भेद
हैं।
Consciousness is of two kinds. And these in turn
are of eight, and four kinds respectively.
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अध्याय - २
संसारिणो मुक्ताश्च ॥१०॥
जीव [ संसारिणः ] संसारी [ च ] और [ मुक्ताः ] मुक्त -
ऐसे दो प्रकार के हैं। कर्म सहित जीवों को संसारी और कर्म
रहित जीवों को मुक्त कहते हैं।
The transmigrating and the emancipated souls.
समनस्काऽमनस्काः ॥११॥
संसारी जीव [ समनस्काः ] मनसहित-सैनी [ अमनस्काः ]
मनरहित-असैनी, यों दो प्रकार के हैं।
(The two kinds of transmigrating souls are those)
with and without minds.
संसारिणस्त्रसस्थावराः ॥१२॥
[ संसारिणः ] संसारी जीव [ त्रस ] त्रस और [ स्थावराः ]
स्थावर के भेद से दो प्रकार के हैं।
The transmigrating souls are (of two kinds), the
mobile and the immobile beings.
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अध्याय - २
पृथिव्यप्तेजोवायुवनस्पतयः स्थावराः ॥१३॥
[ पृथिवी अप् तेजः वायुः वनस्पतयः ] पृथ्वीकायिक,
जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक
- यह पाँच प्रकार के [ स्थावराः ] स्थावर जीव हैं। (इन
जीवों के मात्र एक स्पर्शन इन्द्रिय होती है।)
Earth, water, fire, air and plants are immobile
beings.
द्वीन्द्रियादयस्त्रसाः ॥१४॥
[ द्वीन्द्रिय आदयः ] दो इन्द्रिय से लेकर अर्थात् दो इन्द्रिय,
तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पाँच इन्द्रिय जीव [ त्रसाः ] त्रस
कहलाते हैं।
The mobile beings are from the two-sensed beings
onwards.
पश्चेन्द्रियाणि ॥१५॥
[ इन्द्रियाणि ] इन्द्रियाँ [ पञ्च ] पाँच हैं।
The senses are five.
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अध्याय - २
द्विविधानि ॥१६॥
सब इन्द्रियाँ [ द्विविधानि ] द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय के भेद
से दो प्रकार की हैं।
(The senses are of) two kinds.
निर्वृत्त्युपकरणे द्रव्येन्द्रियम् ॥१७॥
[ निर्वृत्ति उपकरणे ] निवृत्ति और उपकरण को
[ द्रव्येन्द्रियम् ] द्रव्येन्द्रिय कहते हैं।
The physical sense consists of accomplishment (of
the organ itself) and means or instruments – (its
protecting environment).
लब्ध्युपयोगौ भावेन्द्रियम् ॥१८॥
[ लब्धि उपयोगौ ] लब्धि और उपयोग को [ भावेन्द्रियम् ]
भावेन्द्रिय कहते हैं।
The psychic sense consists of attainment and
consciousness.
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