तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - १
एकादीनि भाज्यानि युगपदेकस्मिन्नाचतुर्भ्यः ॥३०॥
[ एकस्मिन् ] एक जीव में [ युगपत् ] एक साथ
[ एकदीनि ] एक से लेकर [ आचतुर्भ्यः ] चार ज्ञान तक
[ भाज्यानि ] विभक्त करने योग्य हैं, अर्थात् हो सकते हैं।
From one up to four kinds of knowledge can be
possessed simultaneously by a single soul.
मतिश्रुतावधयो विपर्ययश्च ॥३१॥
[ मतिश्रुतावधयः ] मति, श्रुत और अवधि यह तीन ज्ञान
[ विपर्ययश्च ] विपर्यय भी होते हैं।
Sensory knowledge, scriptural knowledge and
clairvoyance may also be erroneous knowledge.
सदसतोरविशेषाद्यदृच्छोपलब्धेरुन्मत्तवत् ॥३२॥
[ यदृच्छोपलब्धेः ] अपनी इच्छा से चाहे जैसा ग्रहण करने के
कारण [ सत् असतोः ] विद्यमान और अविद्यमान पदार्थों का
[ अविशेषात् ] भेदरूप ज्ञान (यथार्थ विवेक) न होने से
[ उन्मत्तवत् ] पागल के ज्ञान की भाँति मिथ्यादृष्टि का ज्ञान
विपरीत अर्थात् मिथ्याज्ञान ही होता है।
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