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तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

आत्मानुमानम् ] प्रमेयनिरूपणम् १४७
तत्र बुद्ध्यादयो न गुणा भूतानां मानसप्रत्यक्षत्वात् । ये हि भूतानां
गुणास्ते न मनसा गृह्यन्ते यथा रूपादयः । नापि दिक्कालमनसां गुणा,
विशेषगुणत्वात् । ये हि दिक्कालादिगुणाः संख्यादयो न ते विशेषगुणास्ते
हि सर्वद्रव्यसाधारणगुणा एव । बुद्ध्यादयस्तु विशेषगुणा, गुणत्वे
सत्येकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वाद्, रूपवत् अतो न दिगादिगुणाः ।
पाँच भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं । और 'विशेष गुण' होने से बुद्ध्यादि
गुण १ दिक्, २ काल, ३ मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । क्यों-
कि दिक्, काल, और मन इन तीनों में 'सामान्य गुण' रहते हैं 'विशेष गुण'
नहीं । और बुद्धि आदि 'विशेष गुण' हैं इसलिए वह दिक्, काल, और मन के
भी गुण नहीं हो सकते हैं । यही बात कहते हैं ।
उसमें बुद्धि आदि [ गुण ] मानस प्रत्यक्ष [ के विषय ] होने से [ पृथिवी
आदि पांच ] भूतों के गुण नहीं हैं । जो [ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, और शब्द
यह पाँच ] भूतों के गुण हैं वह मन से गृहीत नहीं होते हैं जैसे रूपादि [ गुण
से मन से प्रत्यक्ष नहीं होते हैं । इसलिए बुद्धि आदि गुण आठ द्रव्यों में से पाँच
भूतों के गुण नहीं हो सकते हैं ] और न दिक्, काल, तथा मन [ इन तीनों ]
के [ गुण हो सकते हैं ] 'विशेष गुण' होने से । जो संख्या आदि दिक्, काल,
आदि के गुण होते हैं वह 'विशेष गुण' नहीं [ किन्तु ] सर्वद्रव्य [ में रहने वाले ]
'साधारण गुण' ही हैं । और बुद्धि आदि तो 'विशेष गुण' हैं [ इसलिए वह
दिक्, काल, और मन इन तीनों के भी गुण नहीं हो सकते हैं । बुद्धि आदि
को 'विशेष' गुण सिद्ध करने के लिए हेतु देते हैं ] रूप के समान केवल एक
इन्द्रिय मात्र से ही ग्राह्य गुण होने से ।
यहां 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्वात्' इस हेतु के साथ 'गुणत्वे सति' यह विशेषण
जोड़ कर विशिष्ट को हेतु बनाया है । इस विशेषण रूप 'गुणत्वे सति' को
जोड़ने का अभिप्राय यह है कि 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्यत्व' तो रूपत्व आदि जाति
में भी रहता है । यदि केवल उतना ही हेतु रखा जाय तो 'रूपत्व' आदि जाति
भी विशेष गुण कहलाने लगेगी । अतः उसके वारण के लिए 'गुणत्वे सति'
विशेषण रखा गया है । रूपत्वादि जाति 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' होने पर भी
'गुण' नहीं है अतएव उसमें 'गुणत्वे सति' यह विशेषण अंश न होने से वह
'विशेष गुण' नहीं हो सकती है । किसी किसी संस्करण में 'गुणत्वे सति
एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह पाठ है । अर्थात् 'मात्र' पद नहीं रखा गया है । उस
दशा में 'गुणत्वे सति एकेन्द्रियग्राह्यत्वात्' यह विशिष्ट हेतु भी संख्या आदि

१४८ तर्कभाषा [ आत्मानुमानम्
तस्मादेभ्योऽष्टभ्यो व्यतिरिक्तो बुद्ध्यादीनां गुणानामाश्रयो वक्तव्यः
स एवात्मा।
प्रयोगश्च, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः, पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात्। यस्तु पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्त-
द्रव्याश्रितो न भवति, नासौ पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्यानाश्रितत्वे
सति गुणोऽपि भवति यथा रूपादिरिति केवलव्यतिरेकी । अन्वयव्यति-
रेकी वा । तथाहि, बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तद्रव्याश्रिताः पृथि-
व्याद्यष्टद्रव्यानाश्रितत्वे सति गुणत्वात् । यो यदनाश्रितो गुणः स तद्व्यति-
रिक्ताश्रितो भवति । यथा पृथिव्याद्यनाश्रितः शब्दः पृथिव्याद्यति-
'सामान्य गुण में' 'अतिव्याप्त' हो जायगा। क्योंकि संख्या गुण भी है और
'एकेन्द्रिय ग्राह्य' भी है। 'मात्र' पद जोड़ देने से वह दोष नहीं रहता है ।
क्योंकि संख्या 'एकेन्द्रियग्राह्य' होनेपर भी 'एकेन्द्रियमात्रग्राह्य' नहीं है। क्यों-
कि उसका ग्रहण चक्षु तथा त्वचा दोनों से हो सकता है। इसलिए वह पाठ ठीक
नहीं है। अथवा उस पाठ की व्याख्या मात्रपद का सन्निवेश करके ही करना होगा।
इसलिये इन [ पृथ्वी आदि पञ्चभूत तथा दिक्, काल और मन ] आठ
[ द्रव्यों ] से अतिरिक्त [ किसी नवम द्रव्य को ] बुद्धि आदि गुणों का आश्रय
कहना चाहिए । वही [ नवम द्रव्य ] आत्मा है ।
[ इस का साधक ] प्रयोग [ अनुमान वाक्य ] इस प्रकार है। १-बुद्धि
आदि पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित हैं [ यह प्रतिज्ञा हुई ]
२-पृथिव्यादि आठ द्रव्यों में अनाश्रित होकर [ गुण ] होने से [ यह हेतु हुआ ] ।
३-जो पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से भिन्न द्रव्य में आश्रित नहीं होता वह पृथि-
व्यादि आठ द्रव्यों से व्यतिरिक्त द्रव्य में अनाश्रित गुण भी नहीं होता । अपितु
पृथिव्या

विभुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १४६
रिक्ताकाशाश्रय इति। तथा च बुद्ध्यादयः पृथिव्याद्यष्टद्रव्यातिरिक्ताश्रयाः।
तदेवं पृथिव्याद्यष्टद्रव्यव्यतिरिक्तो नवमं द्रव्यमात्मा सिद्धः। स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः। विभुत्वाच्च
नित्योऽसौ व्योमवत्। सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः।
व्याप्ति का उदाहरण पहिले दिखा चुके हैं। इसलिए आत्मा का साधक यह 'अन्वय
व्यतिरेकी' अनुमान वाक्य भी बन सकता है।] इस लिए बुद्धि आदि [गुण]
पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त द्रव्य में आश्रित [गुण] हैं।
इस प्रकार पृथिवी आदि आठ द्रव्यों से अतिरिक्त [बुद्धि आदि गुणों का
आश्रयभूत] नवम द्रव्य 'आत्मा' सिद्ध हो गया। और वह सर्वत्र कार्य [अदृष्टा-
नुरूप फल] की उपलब्धि होने से 'विभु' अर्थात् 'परममहत् परिमाण' वाला है।
और 'विभु' होने से वह आकाश के समान नित्य [भी] है। और [प्रत्येक
व्यक्ति के] सुख आदि के भिन्न होने से प्रत्येक शरीर में [आत्मा भी]
अलग अलग है।
विभुत्ववादी पक्ष—
यहां 'स च सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः, परममहत्परिमाणवानित्यर्थः' यह
पंक्ति विशेष रूप से समझने योग्य है। यहाँ जिस आत्मा का वर्णन किया जा
रहा है उसके विषय में ही आगे 'सुखादीनां वैचित्र्यात् प्रतिशरीरं भिन्नः' यह
भी लिखा है इससे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह 'शरीरस्थ आत्मा'
अर्थात् 'जीवात्मा' का ही वर्णन है। और उसको विभु अर्थात् व्यापक या
'परममहत्परिमाणवान्' माना है। 'जीवात्मा' के इस विभुत्व को सिद्ध करने
के लिए सर्वत्र 'कार्योपलम्भ' को हेतु रूप में प्रस्तुत किया है। 'सर्वत्र कार्योप-
लम्भात्' का अभिप्राय यह है कि न्याय सिद्धान्त में जिस वस्तु से जिस व्यक्ति
को किसी प्रकार का भोग प्राप्त होता है उस वस्तु की उत्पत्ति में वस्तु की
उत्पादक अन्य कारण सामग्री के अतिरिक्त उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' या धर्म और
अधर्म भी एक कारण होता है। अतएव किसी घट के निर्माण में चक्र, चीवर,
कुलाल, कपाल, आदि अन्य कारण सामग्री के साथ उससे भोग होने वाले
व्यक्ति का 'अदृष्ट' भी उसमें कारण होता है। एक ही कुम्भकार के बनाए और
एक ही 'अवा' में पकाए गए घड़ों में भी परस्पर भेद देखा जाता है। कोई
अधिक पका कोई कम पका होता है। यह जो कार्य में भेद मिलता है इसका
कारण भोक्ताओं का 'अदृष्ट' भेद ही है। एक ही उद्यान में खड़े, एक ही पानी
से सींचे गए, वृक्षों के फलों में भेद होता है। वहां भी भोक्ताओं का 'अदृष्ट'

१५० तर्कभाषा [ मध्यमपक्षः
उस भेद का कारण है। इस प्रकार एक व्यक्ति के जीवन में जिस जिस वस्तु से
भोग प्राप्त होता है वह किन किन स्थानों में विभक्त है इसका परिगणन सम्भव
नहीं है। जहां भी वह पुरुष पहुंच जाय वहीं उसको भोग प्राप्त होगा। इसलिए
उसके भोग की सामग्री सर्वत्र है यही मानना चाहिए। उस स्थान विशेष पर
उस वस्तु की उत्पत्ति में यदि उस व्यक्ति का 'अदृष्ट' कारण है तो यह मानना
चाहिए कि सर्वत्र उस 'अदृष्ट' का सम्बन्ध है। यह तभी हो सकता है जब कि
उस 'अदृष्ट' के अधिकरण 'आत्मा' की सत्ता सर्वत्र मानी जाय। इसीलिए आत्मा
की सर्वत्र सत्ता मानने के लिए उसको 'विभु' या परममहत् परिमाण वाला मानना
आवश्यक है। यही 'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' इस पंक्ति का आशय है।
मध्यमपरिमाणवादी पक्ष—
न्याय आदि अनेक दर्शनों में जीवात्मा को 'विभु' माना गया है और इस
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' को ही उसके 'विभुत्व' का उपपादक हेतु माना
गया है। परन्तु इसके अतिरिक्त आत्मा को 'मध्यमपरिमाण और 'अणुपरिमाण'
मानने वाले पक्ष भी पाये जाते हैं। जैन विद्वान् आत्मा को 'मध्यम परिमाण'
अथवा 'देहपरिमाण' मानते हैं।
परन्तु 'मध्यम परिमाण' मानने में सबसे प्रमुख दोष यह है कि 'मध्यम
परिमाण' वाले सभी पदार्थ अनित्य होते हैं। 'मध्यम परिमाण' जन्य या
अनित्य पदार्थों में ही रहता है। नित्य पदार्थ या तो 'अणु परिमाण' वाले होते
हैं अथवा 'विभु' अर्थात् 'परममहत्परिमाण' वाले। 'जीवात्मा' के फल भोग
आदि की व्यवस्था उसको नित्य मानने पर ही बन सकती है। इसलिए उसको
नित्य मानना आवश्यक है। और नित्य होने की दशा में दो ही मार्ग हैं या
तो उसे 'अणु परिमाण' माना जाय अथवा 'विभु'। 'मध्यम परिमाण' नहीं
माना जा सकता है। इसलिए 'जीवात्मा' को 'मध्यम परिमाण' अथवा 'देह
परिमाण' वाला मानना उचित नहीं है।
न्याय के अतिरिक्त सांख्य आदि अन्य दर्शनों में भी जीवात्मा को विभु
माना गया है। विभु मानने का आधार ऊपर दिखाया जा चुका है। 'स च
सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः'। सर्वत्र 'अदृष्टानुरूप फलभोग रूप' 'कार्य' की
उपलब्धि होने से जीवात्मा विभु है। इसके अतिरिक्त अणु पक्ष में एक देश-
स्थित आत्मा से सकल देह व्यापिनी चेष्टा आदि का नियंत्रण नहीं हो
सकता है। इसलिए जीवात्मा को विभु मानना चाहिए यह विभुवादियों का
अभिप्राय है।

अणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५१
जीवात्मा के 'विभुत्ववाद' की आलोचना—
परन्तु यह 'विभुत्व पक्ष' भी नितान्त निर्दोष पक्ष नहीं कहा जा सकता
है देहादि के साथ जीवात्मा का सम्बन्ध होना ही जन्म और देहादि से उसका
वियोग होना ही मृत्यु है। जन्म के समय जीवात्मा का शरीर में आना और
मृत्यु के समय जीवात्मा का शरीर को छोड़ जाना यह दोनों बातें उसको
'विभु' मानने में नहीं बन सकती हैं। विभु पदार्थ तो सर्वत्र व्यापक है ।,
उसका आना जाना नहीं बन सकता है। फिर जीवात्मा को भोग तो शरीर
देश में ही होता है। बिना शरीर के अथवा शरीर से बाहर तो किसी प्रकार
का भोग नहीं होता। तब शरीर से बाहर उसको 'विभु' मानने से क्या लाभ।
'सर्वत्र कार्योपलम्भाद् विभुः' कह कर जो उसके 'विभुत्व' का उपपादन किया
है सो सुख-दुःख रूप कार्य की सर्वत्र उपलब्धि तो देह के वहां पहुंचने पर
ही होती है देह के पहुंचे बिना नहीं होती। उस दशा में वहां अन्य समय
में भी जीवात्मा रहता है ऐसा मानना उचित प्रतीत नहीं होता है।
और प्रत्येक पदार्थ की उत्पत्ति में भोक्ता के अदृष्ट को कारण मान कर
उस पदार्थ की उत्पत्ति काल में भोक्ता के अदृष्ट का सम्बन्ध हो सके केवल
इस दृष्टि से जीवात्मा को विभु कहा जा सकता है। उसमें भी आपत्ति यह
है कि एक वस्तु से अनेकों व्यक्तियों को भोग होता है उन सबका अदृष्ट
उस वस्तु के निर्माण में कारण होगा तो इस प्रकार प्रत्येक पदार्थ के अनन्त
कारण मानने होंगे और उससे बड़ा गौरव होगा। इसके अतिरिक्त यह सभी
जीवात्मा एक समान आकार वाले समान परिमाण वाले हैं। उन सबकी
एकत्र स्थिति कैसे हो सकेगी। व्याप्य-व्यापक भाव से तो दो पदार्थ एक
जगह रह सकते हैं। परन्तु व्याप्य-व्यापक भाव के लिए उनमें स्थूल सूक्ष्म का
तारतम्य होना चाहिए जीवात्माओं में परस्पर वैसा तारतम्य नहीं है।
इसलिये समानाकार अनेक जीवात्माओं की एकत्र स्थिति का उपपादन
भी नहीं हो सकता है। यदि आत्मा को विभु मानेंगे तो उसके साथ
अनेकात्मवाद के स्थान पर 'एकात्मवाद' का मानना अधिक सुसङ्गत होगा।
जो कि नैयायिकों को अभीष्ट नहीं है। ऐसी दशा में विभुत्व पक्ष भी सुसङ्गत
प्रतीत नहीं होता।
जीवात्मा का अणुत्ववादी पक्ष—
उस दशा में जीवात्मा के परिमाण के विषय में तीसरा अणुत्व पक्ष शेष
रह जाता है। इस अणुत्व पक्ष में मुख्य दोष यह दिया जाता है कि शरीर के
एक देश में जीवात्मा के स्थित होने पर सारे शरीर की क्रियाओं का नियंत्रण

१५२ तर्कभाषा [अणुत्वपक्षः
और शरीर के भिन्न भिन्न स्थानों में होने वाली वेदनाओं का अनुभव जीवात्मा
को कैसे हो सकेगा । इसका समाधान अधिक कठिन नहीं है शरीर की रचना
में तारयंत्र के समान इस प्रकार की व्यवस्था की हुई है कि किसी भी स्थान
पर हुई क्रिया की सूचना तुरन्त केन्द्रस्थान में पहुँच जाती है और उसकी
प्रतिक्रिया उचित स्थान पर हो जाती है। इसके लिए शरीर में ज्ञानवाही
और क्रियावाही तन्तु माने गए हैं। उनके द्वारा आत्मा को एक देशस्थ मानने
पर भी देहव्यापिनी क्रियाओं के नियंत्रण में कोई बाधा नहीं होती । इसलिए
जीवात्मा को अणु परिमाण मानने में कोई बाधक हेतु प्रतीत नहीं होता है ।
इसके अतिरिक्त जीवात्मा को अणु मानने में जन्म के समय उसके शरीर
के साथ संयोग तथा मृत्यु के समय शरीर से वियोग का उपपादन भी हो
सकता है । जो विभुत्व पक्ष में नहीं बन सकता है । अतएव 'अणुत्व' पक्ष
अधिक युक्तिसङ्गत है । उपनिषदों में जीवात्मा के अणुत्व के प्रतिपादक
अनेक वचन भी मिलते हैं । उनमें कुछ वाक्य यहां दे रहे हैं -
'१एषो अणुरात्मा चेतसा वेदितव्यः' ।
'२अन्तःशरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रोऽयं पश्यन्ति यतयः क्षीणदोषाः' ।
'३अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' ।
'तं स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतमिति' ॥
इन वाक्यों में 'अंगुष्ठमात्रः' शब्द जीवात्मा के अणुत्व का ही सूचक है।
'अङ्गुष्ठमात्रं पुरुषं निश्चकर्ष यमो बलात्' आदि वचनों में अन्यत्र भी आत्मा को
'अंगुष्ठमात्र' कहा गया है। परन्तु यहां अंगुष्ठमात्र पद सूक्ष्मशरीर सहित आत्मा
का ग्राहक है अथवा लक्षणया अणुत्व का बोधक है यही मानना होगा ।
अन्यथा अंगुष्ठमात्रत्व के 'मध्यम' परिमाण में आ जाने से वह 'अंगुष्ठमात्र' भी
अनित्य हो जायगा। कठोपनिषद् के उपर्युक्त वचन में शरीर से उसके
निष्क्रमण का वर्णन बड़े सुन्दर दृष्टान्त से किया गया है 'मुञ्जादिवेषीकां'
जैसे सरकण्डे की मूंज के भीतर से सींक निकल आती है और मूंज ज्यों की
त्यों बनी रहती है। इसी प्रकार 'धैर्येण' धीरे से आत्मा को निकाल लिया
जाता है । यह जो जीवात्मा का देह में प्रवेश और देह से निर्गम है वह
अणुत्व पक्ष के अतिरिक्त अन्य पक्षों में नहीं बनता है। इसलिए जीवात्मा को
अणु ही मानना युक्तिसङ्गत है।
आत्मा का स्थान -
अणु होने की अवस्था में शरीर में आत्मा का स्थान कौन सा माना जाय
१ मुण्डक ३, ९ । २ मुण्डक ३, ५ । ३ कठ० २, १७ ।

अणुत्वपक्षः ] प्रमेयनिरूपणम् १५३
यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसका उत्तर उपयुक्त कठोपनिषद् के वाक्य में ही
मिल जाता है। 'सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः' कह कर कठोपनिषद् ने हृदय
को ही उसका स्थान माना है। भारतीय विचार धारा के अनुसार हृदय ही
आत्मा का स्थान है। इसीलिए हृदय शब्द की 'हृदि अयम् हृदयम्' यही
निरुक्ति की गई है। 'तस्य एतदेव निरुक्तं हृदि अयं हृदयमिति' । यूनानी
दार्शनिकों में 'अरस्तू' [३८४ से ३२२ ई० पूर्व] हृदय को ही ज्ञान और आत्मा
का केन्द्र मानता था। सत्रहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक 'डेकार्टे'
[ १५९६ से १६५० ] ने हृदय के स्थान पर मस्तिष्क की नलिका में स्थित
'पीनियल' नामक ग्रन्थि को ज्ञान अथवा आत्मा का केन्द्र माना है।
हमने अपने 'दर्शनमीमांसा' ग्रन्थ में इस सब विषय को इस प्रकार लिखा है—
जीवात्मानं निरूपयति—
तत्रात्मा चेतनो नित्यो, ज्ञानादीनां समाश्रयः ।
समाहितैकधीगम्यो, स्वगुणानुमितोऽथवा ॥ १ ॥
न्यायसूत्रेषु प्राधान्याज्जीवात्मैव निरूपितः ।
परं शास्त्रेषु जीवात्मा, परमात्मा चेति स द्विधा ॥ २ ॥
मध्यमपरिमाणवादं निराकरोति—
विभुर्न्यायादिसिद्धान्ते, जीवोऽणुर्वैदिके नये ।
देहमात्रपरिच्छिन्नो मध्यमो जिनसम्मतः ॥ ३ ॥
जीव एव शरीरस्थश्चेष्टते सर्वदेहगः ।
शरीरव्यापिनीः सर्वाः स च गृह्णाति वेदनाः ॥ ४ ॥
देहाकारस्ततो जीवो जिनशास्त्रेषु सम्मतः ।
अनित्यत्वप्रसङ्गात्तु मतमेतन्न सङ्गतम् ॥ ५ ॥
अनित्यास्तु मताः सर्वे मध्याकारा घटादयः ।
अनित्यो मध्यमो जीवो, नित्योऽणुर्विभुरेव वा ॥ ६ ॥
विभुत्ववादमालोचयति—
अणुर्नानुभवेत् सर्वं, सर्वदेहं न चालयेत् ।
तस्मान्न्यायादिसिद्धान्ते सम्मतो विभुरेव सः ॥ ७ ॥
परं विभुत्व-पक्षोऽयं बहुदोषसमाकुलः ।
न सामान्येन सौकर्यात् स्वीकर्तुं तत्त शक्यते ॥ ८ ॥
१ दर्शन मीमांसा ५।

१५४ तर्कभाषा [ अणुत्वपक्षः
¹विभुर्यदि भवेज्जीवो बहिर्देहाद् विनिःसृतः ।
सर्वस्त्वनुभवो देहे बहिष्ट्वे किं प्रयोजनम् ॥ ९ ॥
विभोश्च सर्वव्यापित्वान्न गतागतिसम्भवः ।
जीवस्यातो विभुत्वे हि, न स्यादस्य गतागतिः ॥ १० ॥
जन्म देहादिभिर्योगो वियोगो मृत्युरेव च ।
विभोर्जन्म च मृत्युश्च गत्यभावान्न सम्भवेत् ॥ ११ ॥
विभोर्देहादिभिर्योगो जीवस्य सुस्थिरः सदा ।
जन्ममृत्यु-व्यवस्थायै कल्प्यं हेत्वन्तरं भवेत् ॥ १२ ॥
विभुत्वे तुल्यरूपत्वं बहुत्वं चापि सम्मतम् ।
बहूनां तुल्यरूपाणां कथमेकत्र संस्थितिः ॥ १३ ॥
अणुत्वपक्षं सिद्धान्तयति—
तस्मादणुर्मतो जीवो नित्योऽनेकः समः सदा ।
एकदेशस्थितो देहे सर्वं वेत्तुं च स क्षमः ॥ १४ ॥
यांत्रिकी रचना देहे तादृशी प्रभुणा कृता ।
स क्षमः सर्वविज्ञाने हृद्देशेऽपि स्थितो यथा ॥ १५ ॥
हृद्देशे सुस्थितो जीव ईशश्चात्र प्रतिष्ठितः ।
तस्मादत्रैव संप्रोक्तः साक्षात्कारोऽनयोः सदा ॥ १६ ॥
ईश्वर की चर्चा—
आत्मा के साथ 'ईश्वर' का विवेचन दर्शनों का मुख्य विषय होना चाहिए
था । परन्तु प्रायः प्रमाणों के विवेचन के प्रपञ्च में फँस कर दर्शनों ने मुख्य
प्रमेय परमात्मा के निरूपण में बहुत उदासीनता से काम लिया है । यहां भी
तर्कभाषाकार ने ईश्वर के विषय में कुछ भी नहीं लिखा है । तत्त्वदृष्टि से देखा
जाय तो प्रमाणों के विषय में इतना विस्तार न करके यदि सबसे मुख्य प्रमेय
ईश्वर के विवेचन में अधिक से अधिक भाग का उपयोग होता तो वह अधिक
उपयुक्त होता । परन्तु जान पड़ता है कि इन ग्रन्थकारों ने 'साधन' भूत प्रमाणों
को ही सब कुछ समझ कर उनको ही 'साध्य' जैसी प्रधानता दे दी है । और
मुख्य प्रमेय ईश्वर की नितान्त उपेक्षा कर दी है । यह दर्शनशास्त्र के गौरव को
कम करनेवाली स्थिति है । तर्कभाषा की इस कमी को पूरा करने के लिए हम
अपने लिखे 'न्यायकुसुमाञ्जलिपरिशिष्ट' में से कुछ कारिकाएं जिन में ईश्वर-
विषयक चर्चा की गई है यहां उद्धृत कर रहे हैं ।
१ दर्शनमीमांसा ५ ।

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १५५
¹प्रमाणविषयीभूतं, यावज्ज्ञानस्य गोचरम् ।
प्रमेयं तद्धि विज्ञेयं, संविभक्तं द्विधा स्थितम् ॥ १ ॥
दृश्यं तत्र प्रकृत्याख्यं, जगदेतज्जडात्मकम् ।
चेतनं सर्वमात्माख्यं, द्विधा जीवेशरूपतः ॥ २ ॥
तदेतत् त्रितयं नित्यं, मिथो भिन्नं स्वरूपतः ।
तत्त्वं 'सौपर्णदृष्टान्ते' वेदे विस्पष्टमीरितम् ॥ ३ ॥
'ऋग्वेद' में एक मन्त्र आया है जो इस प्रकार है—
²द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते ।
तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति, अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति ॥
इस मन्त्र का भावार्थ यह है कि मित्र रूप और साथ रहने वाले दो पक्षी
एक समान वृक्ष पर बैठे हुए हैं उनमें से एक उस वृक्ष के स्वादु फलों का
भक्षण करता है और दूसरा न खाता हुआ शोभित हो रहा है । इस मन्त्र में
अलङ्कार रूप से 'प्रकृति' रूप 'वृक्ष' के ऊपर बैठे हुए 'जीव' तथा 'ईश्वर'
रूप दो 'पक्षियों' का वर्णन है । जिनमें से एक अर्थात् 'जीवात्मा' उस 'प्रकृति'
रूप वृक्ष के फलों को भोगता है और दूसरा उस का भोग नहीं करता है ।
यह प्रतिपादन किया गया है । इसी 'द्वा सुपर्णा' वाले दृष्टान्त को ऊपर की
कारिका में 'सौपर्ण दृष्टान्त' कहा है । इस मन्त्र से 'सौपर्ण दृष्टान्त' के द्वारा
ईश्वर, जीव तथा प्रकृति इन तीनों तत्त्वों की नित्य सत्ता सिद्ध होती है ।
न्यायशास्त्र भी इन तीनों की नित्य सत्ता मानता है । ईश्वर नित्य है और
वह जगत् का निमित्त कारण है । प्रकृति भी नित्य है और वह जगत् का
उपादान कारण है । जीवात्मा भी नित्य है उसी के भोगापवर्ग सम्पादन के
लिए ईश्वर, प्रकृति रूप उपादान कारण से घटादि के समान सृष्टि का निर्माण
करता है । 'क्षित्यादिकं सकर्तृकं कार्यत्वात् घटवत्' इत्यादि रूप में ईश्वर सिद्धि
के लिए जिन अनुमानों का प्रयोग नैयायिक आदि करते हैं उनका यही
अभिप्राय है ।
परमात्मानं निरूपयति—
³परमात्मा जगत्स्रष्टा, सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
सच्चिदानन्दरूपश्च, ह्येको नित्यो विभुस्तथा ॥ ४ ॥
निमित्तमात्रं सर्गेऽसौ, जीवाच्च प्रकृतेः पृथक् ।
प्रणवादिपदैर्वाच्यस्तथा वेदप्रकाशकः ॥ ५ ॥
१ न्यायकुसुमाञ्जलि परिशिष्ट । २ ऋग्वेद १, १६४, २० । तथा मुण्डक ३, १ ।

१५६ तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
तदस्तित्वे च तद्रूपे विवादो बहु दृश्यते ।
दर्शनानां च धर्माणां भेदस्तन्मूलको मतः ॥ ६ ॥
'जडाद्वैतं' निराकरोति—
१बृहस्पतिसमाः प्रज्ञा नव्याश्च स्पेन्सरादयः ।
जडाद्वैतपरा नून-मात्ममात्रापलापकाः ॥ ७ ॥
पञ्चभूतानि तत्त्वानि, यद्वा भूतचतुष्टयम् ।
जडाऽजडात्मकं तेभ्यो जगत्सर्वं प्रवर्तते ॥ ८ ॥
जडाद्वैतपरा ये तु, चेतनाद्वैतिनश्च ये ।
अगृहीतार्थतत्त्वौ तु, समावेताववैदिकौ ॥ ९ ॥
जडं वा चेतनं तत्त्वमेकमेव भवेद् यदि ।
कथञ्चामावकल्पेत, दृश्यमाना भिदानयोः ॥ १० ॥
स्वभाववादं निराकरोति—
लोकायताश्च बौद्धाश्च, तथा चान्येऽपि नास्तिकाः ।
सर्गं स्वाभाविकं मत्वा, प्रतिषेधन्ति चेश्वरम् ॥ ११ ॥
सर्गस्याकस्मिकत्वे तु, तद्विनाशो न सम्भवी ।
हेतोर्नाशात्तु कार्याणां, विनाशोऽप्युपपद्यते ॥ १२ ॥
नियतावधिकार्याणां, दर्शनाच्छुतिबोधितः ।
कार्यकारणभावोऽयं, स्वीकर्तव्यस्त्वकामतः ॥ १३ ॥
मनसाप्यचिन्त्यरूपस्य, सूक्ष्मस्य जगतो ध्रुवम् ।
उत्पत्तिश्च व्यवस्था च सर्वज्ञादेव सम्भवेत् ॥ १४ ॥
बुद्धयपेक्षा व्यवस्थाऽस्य, रचना च सुदुष्करा ।
चेतनापेक्षिणी नित्यं, जडाद्वैते न कल्पते ॥ १५ ॥
अग्निरुष्णो जलं शीतं, सर्गमेवं निदर्शनात् ।
यस्तु स्वाभाविकं ब्रूते, नासौ न्यायेन सङ्गतः ॥ १६ ॥
स्वाभाविकेऽपि सामर्थ्ये, चेष्टिकादौ विशेषतः ।
न भवनादिनिर्माणं, दृष्टं चेतनमन्तरा ॥ १७ ॥
एवं प्रकृतिसामर्थ्य-मात्रान्न सर्गसम्भवः ।
नापि युक्ता व्यवस्थाऽस्य, सम्भवेच्चेतनं विना ॥ १८ ॥
यतः सर्गो व्यवस्था च, नियन्तारमपेक्षते ।
तस्मान्नैव जडाद्वैत-पक्षो युक्तियुतो भवेत् ॥ १९ ॥
१ न्यायकुसुमाञ्जलि परिशिष्ट क ।

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १५७
'चेतनाद्वैतवादं' निराकरोति
लोके बहुतरं तत्त्वं, जडमत्रानुभूयत ।
चेतनाद्वैतपक्षे तु, तत्सर्वं नावकल्पते ॥ २० ॥
कूटस्थं चेतनं ब्रह्म, कथन्नाम जडीभवेत् ।
तदभावे कथं लोके, पृथिव्याद्युपलभ्यते ॥ २१ ॥
इदं दृश्यमयं द्रष्टा, चेतनोऽयं जडं स्विदम् ।
कथं स्याच्चेतनाद्वैते, भेदोऽयं सर्वसाक्षिकः ॥ २२ ॥
अतो नव्याश्च प्रज्ञाश्च, चेतनाद्वैतवादिनः ।
प्रत्यात्मानुभवाद्भिन्नं, विश्वं मिथ्येति चक्षते ॥ २३ ॥
रज्जौ सर्पादि विभ्रान्ति-स्तथा स्वप्नादिप्रत्ययः ।
बाध्यतेऽतो मतो मिथ्या, न चेदं बाध्यते जगत् ॥ २४ ॥
अबाध्यतेऽपि मिथ्येति, वचो साहसमात्रकम् ।
चेतनाद्वैतपक्षोऽयं, तस्मान्नैवोपपद्यते ॥ २५ ॥
अस्मिन् पक्षे तु संदृष्टा, सर्वं मिथ्येति कल्पना ।
लोकानुभवविरोधात्, सैव मिथ्येति निश्चयः ॥ २६ ॥
अथवाङ्गीकृतेऽद्वैतेऽनुपपत्तेस्तु लाघवात् ।
चेतनाद्वैततो नूनं जडाद्वैतस्य साधुता ॥ २७ ॥
चेतनाऽद्वैतविज्ञानाद्वैतयोः साहश्यं दर्शयति—
विज्ञानं तु निराचष्टे शङ्करो दृढयुक्तिभिः ।
योगक्षेमे समं ब्रह्म-वादमातिष्ठते पुनः ॥ २८ ॥
स्वप्नवत् कल्पिता अर्था, मता विज्ञानिनां यथा ।
सांवृताः शाङ्करेऽप्येवं स्वप्नवत् परिकल्पिताः ॥ २९ ॥
विज्ञानाद्वैतवादश्चेद्, युक्तिभिर्नोपपद्यते ।
नतरां तस्य युक्तः स्याद्, ब्रह्मवादोऽपि तादृशः ॥ ३० ॥
नास्तिकास्तु जडाद्वैतं, चेतनाद्वैतमास्तिकाः ।
मन्वते इति भेदोऽपि, वस्तुतो नोपपद्यते ॥ ३१ ॥
समावनीश्वरौ वादावुभावेताववैदिकौ ।
दुर्बलश्चेतनाद्वैतः, प्रत्यक्षादिविरोधतः ॥ ३२ ॥
अभिन्ननिमित्तोपादानसिद्धान्तं निराकरोति—
ब्रह्मोपादानकञ्चैव, जगद् ब्रह्मनिमित्तकम् ।
लूतानिदर्शनाद् घोषः, सदोषोऽद्वैतवादिनाम् ॥ ३३ ॥

१५८ तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
लूतातन्तूपादानं, शरीरं तद्ध्यचेतनम् ।
चेतनं च निमित्तं स्या-न्नाभिन्नमुभयं ततः ॥ ३४ ॥
जडचेतनसंभिन्ना, लूतैकाभिमता यदि ।
जडाऽजडात्मकं तर्हि, किन्नु ब्रह्मापि कल्प्यते ॥ ३५ ॥
जडाऽजडं विरुद्धं तु, रूपमेकत्र पश्यता ।
सामानाधिकरण्यं हि, तेजस्तिमिरयोः कृतम् ॥ ३६ ॥
किन्ते प्रयोजनं सिद्ध्येत्, कुर्वतः क्लिष्टकल्पनाम् ।
जडाऽजडात्मकं तत्त्वं भिन्नमास्थीयतामतः ॥ ३७ ॥
लूतातन्तुदृष्टान्तं सङ्गमयति—
जगतः सृजने चैव, पालने चाथ नाशने ।
निमित्तत्वं प्रभोः प्रोक्तं, नोभयत्वं निदर्शने ॥ ३८ ॥
स्वदेहसुलभं तत्त्वमुपादाय जडं यथा ।
‘सृजते गृह्णते’ तन्तुं, लूता काले यथोचितम् ॥ ३९ ॥
एवं प्रकृतिमादाय, विश्वं निर्माति चेश्वरः ।
क्षिणोति च स्वयं काले, सोऽयमर्थो निदर्शने ॥ ४० ॥
नैवाभिन्ननिमित्तोपा-दानकत्वमुदीरितम् ।
जडाऽजडं विरुद्धं नो ततो ब्रह्म प्रकल्प्यताम् ॥ ४१ ॥
मृत्पिण्डदृष्टान्तं सङ्गमयति—
यत्र च ब्रह्मणो ज्ञानात्, सर्वज्ञानं प्रतिश्रुतम् ।
यथा मृत्पिण्डविज्ञानात्, ज्ञातं सर्वन्तु मृण्मयम् ॥ ४२ ॥
एवंविधे तु दृष्टान्ते, विकारार्थे मयट् श्रुतः ।
तदर्थः प्रकृतेर्ज्ञानाद्, विकारो ज्ञायतेऽखिलः ॥ ४३ ॥
एवञ्चेद् ब्रह्मणो ज्ञानात्, सर्वज्ञानमभीप्सितम् ।
विकृतं वै भवेद् ब्रह्म, कूटस्थं नोपपद्यते ॥ ४४ ॥
किञ्च ज्ञातेऽप्युपादाने, लौहे चाथ मृदादिके ।
तद्विकारास्तु दुर्ज्ञेया, यन्त्रदेहादयो मताः ॥ ४५ ॥
ब्रह्मज्ञानेऽपि न ज्ञातं विश्वनिर्माणकौशलम् ।
तत एषा प्रतिज्ञा तु हीयते लोकदर्शनात् ॥ ४६ ॥
किञ्च दृष्टान्तसामर्थ्यात्, प्रकृतित्वं समर्थितम् ।
न निमित्तमतो ब्रह्म, जडं स्यान्नोभयात्मकम् ॥ ४७ ॥
नवीनवेदान्तस्य अवैदिकत्वं दर्शयति—
नोपादानमतो ब्रह्म निमित्तं केवलन्तु तत् ।

jagat?
Wait, look at line 6:
तत्त्वं ब्रह्मैव जीवेशौ तद्विवर्तौ जगत् तथा ॥ ५० ॥
तद्विवर्तौ: त द्वि व र्तौ (ta-dvi-var-tau).
जगत् तथा ॥ ५० ॥
Line 7:
प्रकृतिर्भावभूताऽपि, 'माया' शब्दात्तथोदिता ।
Look at 'माया': it has single quotes: 'माया'.
Line 8:
स्वप्नवच्च निरालम्बा सर्वा सर्गस्थितिर्मता ॥ ५१ ॥
Line 9:
एषां नैकोऽपि सिद्धान्तो, वास्तवो वैदिकोऽथवा ।
Line 10:
सा सर्वा शाङ्करी माया, तत्त्वदृष्टिं व्यपोहति ॥ ५२ ॥
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श ा ङ्क री -> yes, ङ्क.
Line 11:
अबाध्यं लोकप्रत्यक्षं, यच्च वेदोदितं ध्रुवम् ।
Line 12:
तन्मिथ्याऽगोचरं बुद्धेः, कल्पनाप्रभवं च सत् ॥ ५३ ॥
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बुद्धेः, -> yes, visarga followed by comma.
Line 13:
तथ्यं वित

१६० तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
वेदेऽप्यपौरुषेयेऽतो, स्वतः प्रामाण्यसम्भवात् ।
नेश्वरापेक्षि प्रामाण्यं, ततो नासौ प्रकल्प्यताम् ॥ ६३ ॥
कश्चिन्मीमांसकम्मन्य-स्तर्काभाससमाश्रयः ।
वेदानुगोऽपि वै चित्रं, प्रत्याचष्टे परेश्वरम् ॥ ६४ ॥
नासदीये तु ऋक्सूक्ते, लयावस्था प्रदर्शिता ।
अभिध्यानात्तथेशस्य, सर्गोत्पत्तिश्च वर्णिता ॥ ६५ ॥
आविर्भावश्च वेदानां, परेशाद् दर्शितो मुहुः ।
स्फुटं पुरुषसूक्ते च, ततो नापौरुषेयता ॥ ६६ ॥
ततश्चापौरुषेयत्व-नित्यत्वे वेदसर्गयोः ।
न वेदे सम्मते क्वापि, ध्रुवं तेऽवैदिके ततः ॥ ६७ ॥
ज्ञानं गुणो गुणी चेशो, वेदो नूनं तदाश्रयः ।
सर्वविद्यामयो ज्ञेयो, न कर्मैकपरो मतः ॥ ६८ ॥
वैदिकेनाप्यनेनैवं, दर्शिता वेदबाह्यता ।
मूर्खमित्रादतः श्रेष्ठो विद्वान् शत्रुः प्रकीर्तितः ॥ ६९ ॥
ईश्वरस्य स्वरूपं दर्शयति—
ईश्वरोऽयं निराकारः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
अनादिरविकारी चा-नन्तः सर्वगतो विभुः ॥ ७० ॥
सच्चिदानन्दरूपोऽपि, दयालुर्न्यायतत्परः ।
सर्गे स्थितौ लये हेतुः नित्यतृप्तो निराशयः ॥ ७१ ॥
सृष्टिकर्तृत्वे सांख्यस्य पूर्वपक्षः—
प्रेक्षावतां प्रवृत्तिस्तु स्वार्थात् कारुण्यतोऽथवा ।
व्याप्ता संदृश्यते लोके, न स्तः सर्गक्रमे च ते ॥ ७२ ॥
स्वार्थमूला प्रवृत्तिश्चे-न्नित्यतृप्तः कथं प्रभुः ।
सर्गोद्भवञ्च कारुण्यं, कथं सर्गे प्रवर्त्तयेत् ॥ ७३ ॥
ततः सर्गक्रमो नैव, प्रेक्षावद्वृत्तिमूलकः ।
प्रकृत्यैव कृतो नूनमिति सांख्यनयो मतः ॥ ७४ ॥
तस्य निराकरणम्—
परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यमन्तराऽपि तद् ।
स्वार्थहीनाः प्रवर्त्तन्ते, स्वकर्तव्यपरायणाः ॥ ७५ ॥
‘कुर्वन्नेवेह कर्माणि’, घोषोऽयं वैदिकस्तु नः ।
स्वार्थकारुण्यहीनां वै ब्रूते कर्तव्यभावनाम् ॥ ७६ ॥

ईश्वरमीमांसा ] प्रमेयनिरूपणम् १६१
अतस्तु सांख्यम्मन्यानां, सर्वोऽयं बुद्धिविभ्रमः ।
न तु षोडशमं तत्त्वं किञ्चित्तत्र लभेमहि ॥ ७७ ॥
सृष्टिकर्तृत्वेऽपरः पूर्वपक्षः—
ईश्वरो विश्वनिर्माणादात्मानं खेदयत्यपि ।
जीवांश्च पातयत्यस्मिन्, दुःखे संसारसागरे ॥ ७८ ॥
ईशस्यैतेन कार्येण, कश्चिल्लाभो न सम्भवी ।
हानिश्चैषा ध्रुवं दृष्टा, सर्वसन्तापकारिणी ॥ ७९ ॥
तस्मादमुष्यव्यापारो, बुद्धिपूर्वो न दृश्यते ।
अव्यापारो वरं तस्य, दुःखात् सर्वान् विमोचयेत् ॥ ८० ॥
तस्य निराकरणम्—
लीलानिःश्वसितन्याया-ज्जगदेतत् प्रवर्तते ।
तस्मादत्र परेशस्य स्वात्मखेदः कथं भवेत् ॥ ८१ ॥
वेदे विश्वमिदं नैव हेयं दुःखमयं मतम् ।
जीवानाम्प्यतो नैव, लोको दुःखैककारणम् ॥ ८२ ॥
यत्र रात्रि-दिनं चैव, पर्यायात् संप्रवर्तते ।
तत्राश्वासः सुखं चैव, न रात्रौ न दिने सदा ॥ ८३ ॥
जीवश्चेच्चेतनः कश्चि-दन्धकूपे निपातितः ।
न प्रकाशं सुखं पश्येत्, का नु तस्य भवेद् गतिः ॥ ८४ ॥
यदि सृष्टिर्न जायेत, सुभगेयं दिनात्मिका ।
अन्धे तमसि सीदन् वै, जीवः कष्टतमं व्रजेत् ॥ ८५ ॥
जीवानाञ्च समुद्धार-स्ततः सर्गक्रमाद्भवेत् ।
आनन्दालोकलाभश्च, सृष्टेर्लाभोऽमितस्ततः ॥ ८६ ॥
सर्वशक्तित्वे पूर्वपक्षः—
स्वाधीनोऽथ पराधीनः, परेशोऽयं जगत्कृतौ ।
स्वाधीनश्चेदुपादानमदृष्टञ्चेहते कथम् ॥ ८७ ॥
स्वाधीनोऽयमनार्याणां यत्र ‘कुन’ शब्दमात्रतः ।
जगत् सञ्जायते सर्वं, नोपादानमपेक्षते ॥ ८८ ॥
ईशोऽयं पुनरस्माकमदृष्टं प्रकृतिं विना ।
अक्षमो विश्वनिर्माणे, न स्वाधीनः प्रतीयते ॥ ८९ ॥
चेतनो जडतन्त्रश्चेद् विश्वं निर्मातुमक्षमः ।
जितं हन्त जडेनैव, क्व चैश्वर्यं जगत्प्रभोः ॥ ९० ॥
११ त० भा०

१६२ तर्कभाषा [ ईश्वरमीमांसा
भूतान्यचेतनान्येव, अदृष्टञ्चाप्यचेतनम् ।
सर्वशक्तिस्तदाधीनो, हास्यत्वं किन्न यात्यसौ ॥ ९१ ॥
तस्य समाधानम्—
जीवानामुपभोगो हि सृष्टेराद्यं प्रयोजनम् ।
तन्नियामकमदृष्टं, न नियामकमीश्वरे ॥ ९२ ॥
ईश्वरो विभजत्येभ्यः, कर्मयोग्यं फलं यदा ।
सा न्यायपरतैवास्य, पारतन्त्र्यन्न तन्मतम् ॥ ९३ ॥
भोग्यञ्च प्राकृतं, देहः प्राकृतो भोगसाधनम् ।
भोगः प्रकृतितन्त्रो हि, न तत्तन्त्रः परेश्वरः ॥ ९४ ॥
सृष्टिः स्थितिलयश्चैवमीश्वरेच्छावशात् सदा ।
तादृशो महिमा तस्य परैश्वर्यप्रयोजकः ॥ ९५ ॥
बहुदेववादं निराकरोति—
विराड् रूपं श्रुतं तस्य, विभुत्वद्योतनाय यत् ।
'तन्मूलं वास्तवं रूपं, लोके कैश्चित् प्रकल्पितम् ॥ ९६ ॥
ब्रह्मा विष्णुः शिवश्चेति, वरुणाग्नियमादिकाः ।
संज्ञा वेदे श्रुतास्ताः स्युरन्वर्था गुणयोगतः ॥ ९७ ॥
एकस्यैव परेशस्य, नामभेदात् प्रकीर्तनम् ।
'एकं सद् विप्रा बहुधा', वदन्तीति श्रुतेर्वचः ॥ ९८ ॥
ते तद्बोधाक्षमैः सर्वैः भिन्ना देवाः प्रकल्पिताः ।
भिन्नानि कल्पितान्येषां शरीराणि रूपाणि च ॥ ९९ ॥
एवं साकारवादो वा, बहुदेववादोऽथवा ।
वेदार्थस्यानभिज्ञानात्, संप्रवृत्तो न वैदिकः ॥ १०० ॥
स्वतन्त्राः शक्तिसम्पन्नाः, प्रभवो बहवो यदि ।
मिथस्तेषां विरोधे तु, सर्वं स्यात् कार्यमाकुलम् ॥ १०१ ॥
प्रसिद्धश्च पुराणादौ, विरोधस्तादृशः स्वयम् ।
तस्मादसङ्गतावेतौ, वादौ नूनमवैदिकौ ॥ १०२ ॥
अवतारवादं निराकरोति—
परिणामोऽनयोरेवावतारश्चाप्यवैदिकः ।
अवतारं विना कार्ये सर्वशक्तिर्न किं क्षमः ॥ १०३ ॥
नरा रामादयोऽप्यासन्, लौकिकाश्च गुणोत्तराः ।
नावतीर्णस्ततस्त्वत्र, देहधारी परेश्वरः ॥ १०४ ॥

शरीरम् ] प्रमेयनिरूपणम् १६३
शरीरम्
तस्य भोगायतनमन्त्यावयवि 'शरीरम्'। सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारो
भोगः । स च यदवच्छिन्न आत्मनि जायते तद्भोगायतनं, तदेव शरीरम् ।
चेष्टाश्रयो वा शरीरम् । चेष्टा तु हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था क्रिया, न तु
स्पन्दनमात्रम् ।
नरा आदर्शरूपास्ते, लोकशक्तिप्रदायिनः ।
नान्यथास्मत् कृते तेषां चरित्रं दीपकं भवेत् ॥ १०५ ॥
पूज्याः पुरुषरूपेण, वीरपूजास्ति श्रेयसी ।
मर्त्यानां तु ध्रुवं तेषामीश्वरत्वमवैदिकम् ॥ १०६ ॥
मूर्तयो मन्दिरेष्वत्र, तेषामेव प्रतिष्ठिताः ।
तासु प्रतीकरूपासु, न्याय्या नेशत्व भावना ॥ १०७ ॥
वीरपूजाप्रतीकानि, मन्दिराण्युचितानि चेत् ।
ईशपूजानिमित्तत्वे, तत् सर्वमसमञ्जसम् ॥ १०८ ॥
२-शरीर निरूपण—
उस [ आत्मा ] के भोग का आयतन [ आश्रय ] अन्त्य अवयवी शरीर
[ कहलाता ] है। सुख दुःख में से किसी एक का साक्षात्कार, भोग [ कहलाता ]
है ] वह जिससे अवच्छिन्न [ सीमित ] आत्मा में रहता है वह [ उस विभु
आत्मा का ] भोगायतन है और वही शरीर है । अथवा चेष्टा का आश्रय
शरीर [ कहलाता ] है। [ और ] चेष्टा तो हित और अहित के [ यथाक्रम ]
प्राप्ति तथा परिहार [ अर्थात् हित की प्राप्ति और अहित के परिहार ] के लिए
[ की गई ] क्रिया [ विशेष कहलाती ] है केवल [ अचेतन पदार्थ में होने
वाली ] गति मात्र [ चेष्टा ] नहीं [ कही जाती ] है ।
यहाँ 'तस्य भोगायतनं अन्त्यावयवि शरीरम्' यह शरीर का लक्षण किया
गया है शरीर के अवयव करचरणादि के द्वारा भी आत्मा को भोग होता है
इसलिए यदि केवल 'भोगायतनं शरीरं' कहा जाय तो यह लक्षण शरीर के एक
अवयव में भी अतिव्याप्त हो जायगा। अत एव उस अतिव्याप्ति के वारण के
लिए 'अवयवी' पद रखना आवश्यक है। अर्थात् अवयव शरीर नहीं है अपितु
उन अवयवों से बना हुआ अवयवी शरीर है । परन्तु करचरणादि अवयवों
के भी अंगुली आदि अवयव होते हैं । उन अवयवों की दृष्टि से करचरणादि
भी अवयवी हैं । इस लिए 'भोगायतनं' अवयवि शरीरम्' यह लक्षण
करचरणादि में फिर भी अतिव्याप्त हो जावेगा । अतएव उस अतिव्याप्ति

१६४ तर्कभाषा [ इन्द्रियाणि
इन्द्रियम्
शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणमतीन्द्रियं 'इन्द्रियम्' । अतीन्द्रियमितीन्द्रियमित्यु-
का वारण करने के लिए 'अन्त्यावयवि' विशेषण रखा गया है। करचरणादि
अवयवी तो हैं परन्तु अन्त्य अवयवी नहीं हैं। अन्त्य अवयवी सम्पूर्ण शरीर है।
इसलिए 'तस्य भोगायतनं अन्त्यावयवि शरीरम्' ऐसा लक्षण करने पर वह
करचरणादि में अतिव्याप्त नहीं होता है। अन्त्यावयवि का अर्थ 'द्रव्यान्त-
रानारम्भक अवयवी' है। कर चरण आदि शरीर रूप द्रव्यान्तर के आरम्भक
होने से अन्त्यावयवी नहीं कहे जा सकते हैं। शरीर किसी दूसरे द्रव्य का
आरम्भक नहीं है अतएव वह अन्त्यावयवी है।
यदि केवल 'अन्त्यावयवि शरीरम्' यह लक्षण रखा जाय अर्थात् भोगायतनं
पद को लक्षण में न रखा जाय तो घटादि में अतिव्याप्ति हो जायगी।
क्योंकि घटादि भी द्रव्यान्तर के अनारम्भक होने से अन्त्यावयवी तो हैं ही।
इसलिए 'अन्त्यावयवि शरीरम्' यह लक्षण उनमें अतिव्याप्त हो जायगा।
अत एव उस अतिव्याप्ति का वारण करने के लिए लक्षण में भोगायतनं पद का
सन्निवेश किया गया है।
न्याय सूत्रकार ने '१चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्'। इस प्रकार शरीर का
लक्षण किया है। उसको ध्यान में रख कर शरीर का दूसरा लक्षण 'चेष्टाश्रयो
वा शरीरम्' किया है। चेष्टा का अर्थ साधारण गति या साधारण क्रिया नहीं
अपितु 'प्रयत्नवदात्मसंयोगासमवायिकारणिका क्रिया' है। प्रयत्नवान् आत्मा का
संयोग जिसका असमवायि कारण है उस क्रिया को 'चेष्टा' कहते हैं। यह
क्रिया मुख्यतः हित की प्राप्ति अथवा अहित के परिहार के लिए ही होती है
इसलिए ग्रन्थकार ने 'हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था क्रिया चेष्टा' इस प्रकार 'चेष्टा'
का लक्षण किया है। यह चेष्टा जड़ पदार्थ में नहीं रह सकती है, अपितु चेतन
के शरीर में ही रह सकती है। इसलिए शरीर का दूसरा लक्षण 'चेष्टाश्रयः
शरीरम्' किया है।
३—इन्द्रिय निरूपण—
आगे इन्द्रिय का लक्षण कहते हैं—
शरीर से संयुक्त, अतीन्द्रिय [ इन्द्रियों से गृहीत न होने वाला ] ज्ञान का
करण 'इन्द्रिय' [कहलाता] है। [ इस लक्षण का पद कृत्य दिखलाते हैं] 'अतीन्द्रियं
इन्द्रियम्' ऐसा कहने [ केवल इतना लक्षण करने ] पर काल आदि में भी
इन्द्रियत्व [अर्थात् इन्द्रिय का लक्षण] चला जायगा, इसलिए 'ज्ञानकरणम्' [ यह
विशेषण और ] कहा है। [ काल, आकाश आदि पदार्थ भी अतीन्द्रिय हैं अर्थात्
१ न्यायदर्शन १, १, ११ ।

[इन्द्रियाणि ] प्रमेयनिरूपणम् १६५
[उ]च्यमाने कालादेरपीन्द्रियत्वप्रसङ्गोऽत उक्तं ज्ञानकरणमिति। तथापीन्द्रिय-
सन्निकर्षेऽतिप्रसङ्गोऽत उक्तं शरीरसंयुक्तमिति । शरीर संयुक्तं ज्ञानकरण-
मिन्द्रियमित्युच्यमाने आलोकादेरिन्द्रियत्वप्रसङ्गोऽत उक्तमतीन्द्रियमिति ।
चक्षु आदि इन्द्रियों से गृहीत नहीं होते हैं। इसलिए यदि 'अतीन्द्रियं' इतना
ही इन्द्रिय का लक्षण किया जाय तो कालादि भी इन्द्रिय कहलाने लगेंगे।
अतएव उस अतिव्याप्ति का वारण करने के लिए उसके साथ 'ज्ञानकारणम्'
यह अंश भी जोड़ा गया है। काल आदि ज्ञान के करण नहीं हैं अतः अतीन्द्रिय
होने पर भी इन्द्रिय नहीं कहलाते हैं]।
फिर भी [ ज्ञानकरणं को जोड़ कर 'ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम्' ऐसा
लक्षण करने पर भी ] इन्द्रिय [ और अर्थ ] के सन्निकर्ष में अतिव्याप्ति होगी
[ क्योंकि इन्द्रिय का अर्थ के साथ जो संयोगादि षोढा सन्निकर्ष दिखाया गया है
वह ज्ञान का करण है और उसका ग्रहण भी इन्द्रिय से नहीं होता । इसलिए
ज्ञान का करण और अतीन्द्रिय होने से लक्षण उसमें अतिव्याप्त हो जायगा ।
इन्द्रिय सन्निकर्ष को अतीन्द्रिय इसलिए कहा गया है कि जिन पदार्थों का संयोग
सम्बन्ध होता है वह दोनों पदार्थ यदि प्रत्यक्ष होते हैं तब तो उन दोनों का
संयोग भी प्रत्यक्ष होता है । परन्तु यदि वह दोनों पदार्थ अथवा उनमें से कोई
एक अप्रत्यक्ष हो तो उनका संयोग भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । जैसे वायु का
चक्षु से ग्रहण नहीं होता है तो पुस्तक के साथ वायु के संयोग का भी चाक्षुष
प्रत्यक्ष नहीं होता । इसी प्रकार इन्द्रियों के अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष भी अतीन्द्रिय ही है । इसीलिए 'ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम्' यह
लक्षण इन्द्रिय सन्निकर्ष में अतिव्याप्त हो जाता है ] उसके वारण के लिए 'शरीर-
संयुक्तं' यह पद रखा है । [ इन्द्रिय सन्निकर्ष का शरीर के साथ संयोग नहीं
होता है क्योंकि संयोगादि सन्निकर्ष, द्रव्य रूप नहीं है । और संयोग केवल द्रव्यों
का ही होता है ] ।
'शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणं इन्द्रियम्' ऐसा कहने पर आलोक आदि में इन्द्रि-
यत्व प्राप्त होगा [ क्योंकि आलोक का शरीर के साथ संयोग भी है और वह
ज्ञान का करण भी है ] इसलिए [ इस अतिव्याप्ति के वारण के लिए ] 'अती-
न्द्रियम्' यह कहा है । [ आलोक अतीन्द्रिय नहीं है अतः यह लक्षण उस में
अतिव्याप्त नहीं होगा ] इस प्रकार इन्द्रिय के लक्षण में 'शरीरसंयुक्तं' 'ज्ञान-
करणं' और 'अतीन्द्रियं' यह जो तीन पद रखे हैं उन सबका रखना अनिवार्य
है । इस प्रकार इन्द्रिय के 'शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम् । इस लक्षण
का पदकृत्य दिखाया है ]

१६६ तर्कभाषा [ इन्द्रियाणि
तानि चेन्द्रियाणि षट् । घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि ।
तत्र गन्धोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं घ्राणम् । नासाग्रवर्ति । तच्च पार्थिवं
गन्धवत्त्वाद् घटवत् । गन्धवत्त्वञ्च गन्धग्राहकत्वात् । यदिन्द्रियं रूपा-
दिषु पञ्चसु मध्ये यं गुणं गृह्णाति तदिन्द्रियं तद्गुणसंयुक्तं, तथा चक्षू
रूपग्राहकं रूपवत् ।
वह इन्द्रियां छः हैं । घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक्, श्रोत्र [ यह पांच बाह्ये-
न्द्रिय ] और मन [ अन्तरिन्द्रिय अन्तःकरण ] ।
घ्राणेन्द्रिय का निरूपण—
उन [ छहों ] में से गन्ध की उपलब्धि का साधनभूत इन्द्रिय घ्राण [ कह-
लाती ] है । वह नासिका के अग्रभाग में रहती है । और वह [ घ्राणेन्द्रिय ]
गन्धवत् होने से पार्थिव [ पृथिवीजन्य इन्द्रिय ] है । [ घ्राणेन्द्रिय में ] गन्धवत्व,
गन्ध के ग्राहक होने से है । जो इन्द्रिय रूपादि [ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और
शब्द इन ] पांचों में से जिस गुण को ग्रहण करती है वह उस गुण से युक्त
[ कहलाती ] है जैसे रूप की ग्राहक चक्षु रूपवत् [ कहलाती ] है ।
‘गन्धोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं घ्राणम्’ यह घ्राण का लक्षण किया गया
है । इसका पदकृत्य इस प्रकार है । यदि केवल ‘उपलब्धिसाधनं इन्द्रियं
घ्राणम् यह लक्षण कहा जाय तो चक्षुरादि में अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि
चक्षुरादि भी उपलब्धि के साधन हैं अतः घ्राण का लक्षण उनमें न चला
जाय इसके वारण के लिए गन्ध पद रखा है । ‘गन्धोपलब्धिसाधनं घ्राणम्’
यह कहा जाय तो केसर आदि सुगन्धित पदार्थ भी गन्धोपलब्धि के साधन
होते हैं उनमें घ्राण का लक्षण अतिव्यास न हो जाय इसके वारण के लिए
‘इन्द्रियं’ पद रखा गया है ।
‘तानि चेन्द्रियाणि षट्’ में इन्द्रियों की छः संख्या बतलाई है । इनमें
घ्राण, रसन, चक्षु, त्वक् और श्रोत्र यह पांच ज्ञानेन्द्रियां कहलाती हैं, और
बाह्य इन्द्रियां मानी जाती हैं । मन अन्तःकरण कहलाता है । सांख्य आदि में
इनके अतिरिक्त ‘वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः’ पांच कर्मेन्द्रियां
भी मानी जाती हैं । यहां केवल ज्ञानेन्द्रियों का उल्लेख किया है, कर्मेन्द्रियां
नहीं गिनाई गई हैं । ज्ञानेन्द्रियों के विषय में सांख्य मत में केवल एक
त्वगिन्द्रिय ही है इस प्रकार का एकेन्द्रियवादी भी एक पक्ष पाया जाता है ।
वह त्वगिन्द्रिय ही चक्षुः, रसना, नासिका, श्रोत्र, आदि स्थलों में विशेष
प्रकार की होकर रूप, रस, आदि भिन्न भिन्न गुणों को ग्रहण करती है । इस
‘एकेन्द्रियवाद’ के खण्डन के लिए यहां इन्द्रियों की संख्या ६ बतलाई है ।