तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ तर्कभाषा [ इन्द्रियाणि
तानि चेन्द्रियाणि षट् । घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि ।
तत्र गन्धोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं घ्राणम् । नासाग्रवर्ति । तच्च पार्थिवं
गन्धवत्त्वाद् घटवत् । गन्धवत्त्वञ्च गन्धग्राहकत्वात् । यदिन्द्रियं रूपा-
दिषु पञ्चसु मध्ये यं गुणं गृह्णाति तदिन्द्रियं तद्गुणसंयुक्तं, तथा चक्षू
रूपग्राहकं रूपवत् ।
वह इन्द्रियां छः हैं । घ्राण, रसना, चक्षु, त्वक्, श्रोत्र [ यह पांच बाह्ये-
न्द्रिय ] और मन [ अन्तरिन्द्रिय अन्तःकरण ] ।
घ्राणेन्द्रिय का निरूपण—
उन [ छहों ] में से गन्ध की उपलब्धि का साधनभूत इन्द्रिय घ्राण [ कह-
लाती ] है । वह नासिका के अग्रभाग में रहती है । और वह [ घ्राणेन्द्रिय ]
गन्धवत् होने से पार्थिव [ पृथिवीजन्य इन्द्रिय ] है । [ घ्राणेन्द्रिय में ] गन्धवत्व,
गन्ध के ग्राहक होने से है । जो इन्द्रिय रूपादि [ रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और
शब्द इन ] पांचों में से जिस गुण को ग्रहण करती है वह उस गुण से युक्त
[ कहलाती ] है जैसे रूप की ग्राहक चक्षु रूपवत् [ कहलाती ] है ।
‘गन्धोपलब्धिसाधनमिन्द्रियं घ्राणम्’ यह घ्राण का लक्षण किया गया
है । इसका पदकृत्य इस प्रकार है । यदि केवल ‘उपलब्धिसाधनं इन्द्रियं
घ्राणम् यह लक्षण कहा जाय तो चक्षुरादि में अतिव्याप्ति हो जायगी । क्योंकि
चक्षुरादि भी उपलब्धि के साधन हैं अतः घ्राण का लक्षण उनमें न चला
जाय इसके वारण के लिए गन्ध पद रखा है । ‘गन्धोपलब्धिसाधनं घ्राणम्’
यह कहा जाय तो केसर आदि सुगन्धित पदार्थ भी गन्धोपलब्धि के साधन
होते हैं उनमें घ्राण का लक्षण अतिव्यास न हो जाय इसके वारण के लिए
‘इन्द्रियं’ पद रखा गया है ।
‘तानि चेन्द्रियाणि षट्’ में इन्द्रियों की छः संख्या बतलाई है । इनमें
घ्राण, रसन, चक्षु, त्वक् और श्रोत्र यह पांच ज्ञानेन्द्रियां कहलाती हैं, और
बाह्य इन्द्रियां मानी जाती हैं । मन अन्तःकरण कहलाता है । सांख्य आदि में
इनके अतिरिक्त ‘वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाण्याहुः’ पांच कर्मेन्द्रियां
भी मानी जाती हैं । यहां केवल ज्ञानेन्द्रियों का उल्लेख किया है, कर्मेन्द्रियां
नहीं गिनाई गई हैं । ज्ञानेन्द्रियों के विषय में सांख्य मत में केवल एक
त्वगिन्द्रिय ही है इस प्रकार का एकेन्द्रियवादी भी एक पक्ष पाया जाता है ।
वह त्वगिन्द्रिय ही चक्षुः, रसना, नासिका, श्रोत्र, आदि स्थलों में विशेष
प्रकार की होकर रूप, रस, आदि भिन्न भिन्न गुणों को ग्रहण करती है । इस
‘एकेन्द्रियवाद’ के खण्डन के लिए यहां इन्द्रियों की संख्या ६ बतलाई है ।