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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 330 में से

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पृष्ठ 228

शरीरम् ] प्रमेयनिरूपणम् १६३
शरीरम्
तस्य भोगायतनमन्त्यावयवि 'शरीरम्'। सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारो
भोगः । स च यदवच्छिन्न आत्मनि जायते तद्भोगायतनं, तदेव शरीरम् ।
चेष्टाश्रयो वा शरीरम् । चेष्टा तु हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था क्रिया, न तु
स्पन्दनमात्रम् ।
नरा आदर्शरूपास्ते, लोकशक्तिप्रदायिनः ।
नान्यथास्मत् कृते तेषां चरित्रं दीपकं भवेत् ॥ १०५ ॥
पूज्याः पुरुषरूपेण, वीरपूजास्ति श्रेयसी ।
मर्त्यानां तु ध्रुवं तेषामीश्वरत्वमवैदिकम् ॥ १०६ ॥
मूर्तयो मन्दिरेष्वत्र, तेषामेव प्रतिष्ठिताः ।
तासु प्रतीकरूपासु, न्याय्या नेशत्व भावना ॥ १०७ ॥
वीरपूजाप्रतीकानि, मन्दिराण्युचितानि चेत् ।
ईशपूजानिमित्तत्वे, तत् सर्वमसमञ्जसम् ॥ १०८ ॥
२-शरीर निरूपण—
उस [ आत्मा ] के भोग का आयतन [ आश्रय ] अन्त्य अवयवी शरीर
[ कहलाता ] है। सुख दुःख में से किसी एक का साक्षात्कार, भोग [ कहलाता ]
है ] वह जिससे अवच्छिन्न [ सीमित ] आत्मा में रहता है वह [ उस विभु
आत्मा का ] भोगायतन है और वही शरीर है । अथवा चेष्टा का आश्रय
शरीर [ कहलाता ] है। [ और ] चेष्टा तो हित और अहित के [ यथाक्रम ]
प्राप्ति तथा परिहार [ अर्थात् हित की प्राप्ति और अहित के परिहार ] के लिए
[ की गई ] क्रिया [ विशेष कहलाती ] है केवल [ अचेतन पदार्थ में होने
वाली ] गति मात्र [ चेष्टा ] नहीं [ कही जाती ] है ।
यहाँ 'तस्य भोगायतनं अन्त्यावयवि शरीरम्' यह शरीर का लक्षण किया
गया है शरीर के अवयव करचरणादि के द्वारा भी आत्मा को भोग होता है
इसलिए यदि केवल 'भोगायतनं शरीरं' कहा जाय तो यह लक्षण शरीर के एक
अवयव में भी अतिव्याप्त हो जायगा। अत एव उस अतिव्याप्ति के वारण के
लिए 'अवयवी' पद रखना आवश्यक है। अर्थात् अवयव शरीर नहीं है अपितु
उन अवयवों से बना हुआ अवयवी शरीर है । परन्तु करचरणादि अवयवों
के भी अंगुली आदि अवयव होते हैं । उन अवयवों की दृष्टि से करचरणादि
भी अवयवी हैं । इस लिए 'भोगायतनं' अवयवि शरीरम्' यह लक्षण
करचरणादि में फिर भी अतिव्याप्त हो जावेगा । अतएव उस अतिव्याप्ति