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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 330 में से

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पृष्ठ 229

१६४ तर्कभाषा [ इन्द्रियाणि
इन्द्रियम्
शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणमतीन्द्रियं 'इन्द्रियम्' । अतीन्द्रियमितीन्द्रियमित्यु-
का वारण करने के लिए 'अन्त्यावयवि' विशेषण रखा गया है। करचरणादि
अवयवी तो हैं परन्तु अन्त्य अवयवी नहीं हैं। अन्त्य अवयवी सम्पूर्ण शरीर है।
इसलिए 'तस्य भोगायतनं अन्त्यावयवि शरीरम्' ऐसा लक्षण करने पर वह
करचरणादि में अतिव्याप्त नहीं होता है। अन्त्यावयवि का अर्थ 'द्रव्यान्त-
रानारम्भक अवयवी' है। कर चरण आदि शरीर रूप द्रव्यान्तर के आरम्भक
होने से अन्त्यावयवी नहीं कहे जा सकते हैं। शरीर किसी दूसरे द्रव्य का
आरम्भक नहीं है अतएव वह अन्त्यावयवी है।
यदि केवल 'अन्त्यावयवि शरीरम्' यह लक्षण रखा जाय अर्थात् भोगायतनं
पद को लक्षण में न रखा जाय तो घटादि में अतिव्याप्ति हो जायगी।
क्योंकि घटादि भी द्रव्यान्तर के अनारम्भक होने से अन्त्यावयवी तो हैं ही।
इसलिए 'अन्त्यावयवि शरीरम्' यह लक्षण उनमें अतिव्याप्त हो जायगा।
अत एव उस अतिव्याप्ति का वारण करने के लिए लक्षण में भोगायतनं पद का
सन्निवेश किया गया है।
न्याय सूत्रकार ने '१चेष्टेन्द्रियार्थाश्रयः शरीरम्'। इस प्रकार शरीर का
लक्षण किया है। उसको ध्यान में रख कर शरीर का दूसरा लक्षण 'चेष्टाश्रयो
वा शरीरम्' किया है। चेष्टा का अर्थ साधारण गति या साधारण क्रिया नहीं
अपितु 'प्रयत्नवदात्मसंयोगासमवायिकारणिका क्रिया' है। प्रयत्नवान् आत्मा का
संयोग जिसका असमवायि कारण है उस क्रिया को 'चेष्टा' कहते हैं। यह
क्रिया मुख्यतः हित की प्राप्ति अथवा अहित के परिहार के लिए ही होती है
इसलिए ग्रन्थकार ने 'हिताहितप्राप्तिपरिहारार्था क्रिया चेष्टा' इस प्रकार 'चेष्टा'
का लक्षण किया है। यह चेष्टा जड़ पदार्थ में नहीं रह सकती है, अपितु चेतन
के शरीर में ही रह सकती है। इसलिए शरीर का दूसरा लक्षण 'चेष्टाश्रयः
शरीरम्' किया है।
३—इन्द्रिय निरूपण—
आगे इन्द्रिय का लक्षण कहते हैं—
शरीर से संयुक्त, अतीन्द्रिय [ इन्द्रियों से गृहीत न होने वाला ] ज्ञान का
करण 'इन्द्रिय' [कहलाता] है। [ इस लक्षण का पद कृत्य दिखलाते हैं] 'अतीन्द्रियं
इन्द्रियम्' ऐसा कहने [ केवल इतना लक्षण करने ] पर काल आदि में भी
इन्द्रियत्व [अर्थात् इन्द्रिय का लक्षण] चला जायगा, इसलिए 'ज्ञानकरणम्' [ यह
विशेषण और ] कहा है। [ काल, आकाश आदि पदार्थ भी अतीन्द्रिय हैं अर्थात्
१ न्यायदर्शन १, १, ११ ।