तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[इन्द्रियाणि ] प्रमेयनिरूपणम् १६५
[उ]च्यमाने कालादेरपीन्द्रियत्वप्रसङ्गोऽत उक्तं ज्ञानकरणमिति। तथापीन्द्रिय-
सन्निकर्षेऽतिप्रसङ्गोऽत उक्तं शरीरसंयुक्तमिति । शरीर संयुक्तं ज्ञानकरण-
मिन्द्रियमित्युच्यमाने आलोकादेरिन्द्रियत्वप्रसङ्गोऽत उक्तमतीन्द्रियमिति ।
चक्षु आदि इन्द्रियों से गृहीत नहीं होते हैं। इसलिए यदि 'अतीन्द्रियं' इतना
ही इन्द्रिय का लक्षण किया जाय तो कालादि भी इन्द्रिय कहलाने लगेंगे।
अतएव उस अतिव्याप्ति का वारण करने के लिए उसके साथ 'ज्ञानकारणम्'
यह अंश भी जोड़ा गया है। काल आदि ज्ञान के करण नहीं हैं अतः अतीन्द्रिय
होने पर भी इन्द्रिय नहीं कहलाते हैं]।
फिर भी [ ज्ञानकरणं को जोड़ कर 'ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम्' ऐसा
लक्षण करने पर भी ] इन्द्रिय [ और अर्थ ] के सन्निकर्ष में अतिव्याप्ति होगी
[ क्योंकि इन्द्रिय का अर्थ के साथ जो संयोगादि षोढा सन्निकर्ष दिखाया गया है
वह ज्ञान का करण है और उसका ग्रहण भी इन्द्रिय से नहीं होता । इसलिए
ज्ञान का करण और अतीन्द्रिय होने से लक्षण उसमें अतिव्याप्त हो जायगा ।
इन्द्रिय सन्निकर्ष को अतीन्द्रिय इसलिए कहा गया है कि जिन पदार्थों का संयोग
सम्बन्ध होता है वह दोनों पदार्थ यदि प्रत्यक्ष होते हैं तब तो उन दोनों का
संयोग भी प्रत्यक्ष होता है । परन्तु यदि वह दोनों पदार्थ अथवा उनमें से कोई
एक अप्रत्यक्ष हो तो उनका संयोग भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है । जैसे वायु का
चक्षु से ग्रहण नहीं होता है तो पुस्तक के साथ वायु के संयोग का भी चाक्षुष
प्रत्यक्ष नहीं होता । इसी प्रकार इन्द्रियों के अतीन्द्रिय होने से इन्द्रिय और अर्थ
का सन्निकर्ष भी अतीन्द्रिय ही है । इसीलिए 'ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम्' यह
लक्षण इन्द्रिय सन्निकर्ष में अतिव्याप्त हो जाता है ] उसके वारण के लिए 'शरीर-
संयुक्तं' यह पद रखा है । [ इन्द्रिय सन्निकर्ष का शरीर के साथ संयोग नहीं
होता है क्योंकि संयोगादि सन्निकर्ष, द्रव्य रूप नहीं है । और संयोग केवल द्रव्यों
का ही होता है ] ।
'शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणं इन्द्रियम्' ऐसा कहने पर आलोक आदि में इन्द्रि-
यत्व प्राप्त होगा [ क्योंकि आलोक का शरीर के साथ संयोग भी है और वह
ज्ञान का करण भी है ] इसलिए [ इस अतिव्याप्ति के वारण के लिए ] 'अती-
न्द्रियम्' यह कहा है । [ आलोक अतीन्द्रिय नहीं है अतः यह लक्षण उस में
अतिव्याप्त नहीं होगा ] इस प्रकार इन्द्रिय के लक्षण में 'शरीरसंयुक्तं' 'ज्ञान-
करणं' और 'अतीन्द्रियं' यह जो तीन पद रखे हैं उन सबका रखना अनिवार्य
है । इस प्रकार इन्द्रिय के 'शरीरसंयुक्तं ज्ञानकरणमतीन्द्रियं इन्द्रियम् । इस लक्षण
का पदकृत्य दिखाया है ]