स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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विषय पृष्ठ
वेदान्त परिशिष्ट
वेदान्तदर्शन ३४६
वेदान्त साहित्य ३४६
वेदान्तदर्शनकी शाखायें ३४७
शंकरका मायावाद ३४८
चार्वाक परिशिष्ट
चार्वाकमत ३४९
चार्वाकों के सिद्धान्त ३५०
चार्वाक साहित्य ३५०
विविध परिशिष्ट
आजीविक ३५१
संवर-प्रतिसंवर ३५१
क्रियावादी-अक्रियावादी ३५२
अनुक्रमणिका
स्याद्वादमंजरीके अवतरण ( १ ) १
स्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रन्थ और ग्रन्थकार ( २ ) १७
स्याद्वादमंजरी ( अन्ययोगव्यवच्छेदिका ) के श्लोकोंकी सूची ( ३ ) २२
स्याद्वादमंजरी ( अन्ययोगव्यवच्छेदिका ) के शब्दोंकी सूची ( ४ ) २४
स्याद्वादमंजरीके न्याय ( ५ ) २५
स्याद्वादमंजरीके विशेष शब्दोंकी सूची ( ६ ) २६
स्याद्वादमंजरीकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ ( ७ ) ३५
अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची ( ८ ) ३७
अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची ( ९ ) ३८
अयोगव्यवच्छेदिकाकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ ( १० ) ३९
परिशिष्टोंके विशेष शब्दोंकी सूची ( ११ ) ४०
परिशिष्टोंमें उपयुक्त ग्रंथ ( १२ ) ४२
सम्पादनमें उपयुक्त ग्रंथ ( १३ ) ४५
शुद्धाशुद्धिपत्र ५०
प्राक्कथन
आज मेरे लिए बड़े हर्ष और सौभाग्यका अवसर है कि मैं अपने सुयोग्य शिष्य तथा प्रिय मित्र
जगदीशचन्द्र जैन एम. ए. द्वारा अनुवादित तथा संपादित स्याद्वादमञ्जरीके आदिमें कतिपय शब्द लिख रहा
हूँ। ग्रन्थ, ग्रन्थकार, ग्रन्थके सिद्धान्तों और उनसे सम्बद्ध अनेक विषयोंका परिचय तो जगदीशचन्द्रजीने पाठकों-
को सरल और निर्दोष राष्ट्रीय भाषामें भली भाँति दे ही दिया है। मुझे इस विषयमें यहाँपर अधिक कुछ
नहीं कहना है। मेरे लिये तो एक ही विषय रह गया है। वह है पाठकोंको सम्पादक महोदयका परिचय देना।
जगदीशचन्द्र जैन सुप्रसिद्ध काशी हिन्दू विश्वविद्यालयके अग्रगण्य स्नातकोंमेंसे हैं। उन्होंने वहाँसे
सन् १९३२ में दर्शन ( Philosophy ) में एम. ए. की उपाधि प्राप्त की थी। विश्वविद्यालयके गर्भमें
भारतीयदर्शन—विशेषतः जैन और बौद्ध—के साथ साथ उन्होंने पाश्चात्य दर्शनका गहरा और विस्तृत अध्य-
यन किया, और दार्शनिक समस्याओंपर निष्पक्ष भावसे स्वतंत्र विचार किया। मुझे उनके आचार-विचार
और आदर्शोंसे खूब परिचिति है, क्योंकि वे कई वर्ष तक मेरी निरीक्षकता ( Wardenship ) में छात्रा-
वासमें रहे हैं, और उन्होंने मेरे साथ मनोविज्ञान ( Psychology ) और भारतीयदर्शनका अध्ययन किया
है। सायंकालके भ्रमणमें अक्सर उनके साथ दार्शनिक विषयोंपर बातचीत हुआ करती थी। अपनी इस परि-
चितिके आधारपर मैं निःसंकोच यह कह सकता हूँ कि जगदीशचन्द्रजी एक बहुत होनहार दार्शनिक विद्वान्
और लेखक हैं। दार्शनिकोंके दो सबसे बड़े गुण—निष्पक्ष और न्यायपूर्वक विचार और समन्वय बुद्धि—
उनमें कूट कूट कर भरे हैं। वे केवल दार्शनिक ही नहीं हैं, सहृदय भी हैं। यही कारण है कि अनेकान्तवाद,
स्याद्वाद और अहिंसावादमें उनकी श्रद्धा है। स्याद्वादमञ्जरीमें इन सिद्धान्तोंका प्रतिपादन है, इसीलिये उन्होंने
इस महत्त्वपूर्ण ग्रन्थका राष्ट्रभाषामें अनुवाद तथा सम्पादन किया है। अनुवाद और सम्पादन बहुत ही उत्तम
रीतिसे हुए हैं। प्रत्येक श्लोक और उसकी टीकाके अनुवादके अन्तमें जो भावार्थ दिया गया है, उसमें विषय-
का बहुत सरलतासे प्रतिपादन हुआ है। कहीं कहीं जो टिप्पणियाँ दी गई हैं, वे भी बहुत उपयोगी हैं। अन्तमें
सब दर्शनों सम्बन्धी—विशेषतः बौद्धदर्शन सम्बन्धी—परिशिष्टों और कई प्रकारकी अनुक्रमणिकाओंने पुस्तकको
बहुमूल्य बना दिया है। गुणज्ञ पाठक स्वयं ही समझ जायँगे कि सम्पादक महोदयने कितना परिश्रम किया है।
मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि इस पुस्तकका प्रचार खूब हो, और विशेषतः उन लोगोंमें हो जो
जैनधर्मावलम्बी नहीं हैं। सत्य और उच्च भाव और विचार किसी एक जाति या मज़हबवालोंकी वस्तु नहीं
हैं। इनपर मनुष्यमात्रका अधिकार है। मनुष्यमात्रको अनेकान्तवादी, स्याद्वादी और अहिंसावादी होनेकी
आवश्यकता है। केवल दार्शनिक क्षेत्रमें ही नहीं, धार्मिक और सामाजिक क्षेत्रमें, विशेषतः इस समय—जब
कि समस्त भूमण्डलकी सभ्यताका एकीकरण हो रहा है और सब देशों, जातियों और मतोंके लोगोंका संपर्क
दिन पर दिन अधिक होता जा रहा है—इन ही सिद्धान्तोंपर आरूढ़ होनेसे संसारका कल्याण हो सकता है।
मनुष्यजीवनमें कितना ही वाञ्छनीय परिवर्तन हो जाय, यदि सभी मनुष्योंको प्रारम्भसे शिक्षा मिले कि सब ही
मत सापेक्षिक हैं; कोई भी मत सर्वथा सत्य अथवा असत्य नहीं है; पूर्ण सत्यमें सब मतोंका समन्वय होना
चाहिये; और सबको दूसरोंके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये जैसा कि वे दूसरोंसे अपने प्रति चाहते
हैं। मैं तो इस दृष्टिके प्राप्त कर लेनेको ही मनुष्यका सभ्य होना समझता हूँ। मैं आशा करता हूँ कि यह
पुस्तक पाठकोंको इस प्रकारकी दृष्टि प्राप्त करनेमें सहायक होगी।
भिक्खनलाल आत्रेय एम. ए., डी. लिट्.,
आषाढ़ पूर्णिमा १९९२ दर्शनाध्यापक,
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय
प्रथम आवृत्तिकी भूमिका
स्याद्वादमंजरीके निम्नलिखित संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं—
१ संपादित, दामोदरलाल गोस्वामी, चौखंवा संस्कृत सीरीज, बनारस, १९००
२ हीरालाल वी० हंसराज, मूल सहित गुजराती अनुवाद, जामनगर, १९०३
३ पंडित जवाहरलाल शास्त्री व पंडित वंशीधर शास्त्री, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, बंबई, वि०सं० १९६६
४ संपादित, पंडित बेचरदास व पंडित हरगोविन्ददास, काशी, वीर संवत् २४३८
५ संपादित, मोतीलाल लाघाजी, पूना, वी. सं. २४५२
६ अगरचन्द्रजी भैरोदानजी सेठिया, सेठिया जैन ग्रंथ माला, बीकानेर, १९२७
७ आनन्दशंकर बापूजी ध्रुव, मूल सहित अंग्रेजी अनुवाद, बम्बई संस्कृत एण्ड प्राकृत सीरीज, बंबई, १९३३
८ जगदीशचन्द्र जैन, मूल सहित हिन्दी अनुवाद, रायचन्द्र जैन शास्त्रमाला, बंबई, १९३५
९ एफ डवल्यू. थॉमस, अंग्रेजी अनुवाद, बर्लिन अकादमी बर्लिन, १९६०
१० उपर्युक्त पुनर्मुद्रण, मोतीलाल, बनारसीदास, १९६८
११ साध्वी सुलोचनाश्री, मूलसहित गुजराती अनुवाद, आत्मानन्द जैन गुजराती ग्रन्थमाला, ९८,
भावनगर वि. सं. २०२४
प्रस्तुत संस्करणको अनेक दृष्टियोंसे परिपूर्ण बनानेका प्रयत्न किया गया है ।
प्रस्तुत संस्करणका संक्षिप्त परिचय
१ संशोधन—इस ग्रंथका संशोधन रायचन्द्रमालाकी एक प्राचीन और शुद्ध हस्तलिखित प्रतिके
आधारसे किया गया है। इस प्रतिके आदि अथवा अन्तमें किसी संवत् आदिका निर्देश न होनेसे इस प्रतिका
ठीक ठीक समय मालूम नहीं हो सका, परन्तु प्रति प्राचीन मालूम होती है ।
२ संस्कृतटिप्पणी—संस्कृतके अभ्यासियोंके लिये मूल पाठके कठिन स्थलोंको स्पष्ट करनेके लिये इस
ग्रंथमें संस्कृतकी टिप्पणियां लगाई गई हैं। इन टिप्पणियोंमें सेठ मोतीलाल लाधाजीद्वारा संपादित स्याद्वादमंजरी की
संस्कृत टिप्पणियोंका भो उपयोग किया गया है। एतदर्थ हम सम्पादक महोदयके आभारी हैं ।
३ अनुवाद—अनुवादको यथाशक्य सरल और सुबोध बनानेका प्रयत्न किया गया है । इसके लिये
अनुवाद करते समय बहुतसे शब्दोंको छूट भी लेनी पड़ी है । विषयका वर्गीकरण करनेके साथ विषयको सरल
और स्पष्ट बनानेके लिये न्यायके कठिन विषयोंको 'शंका-समाधान,' 'वादी-प्रतिवादी,' 'स्पष्टार्थ' रूपमें
उपस्थित किया गया है। प्रत्येक श्लोकके अंतमें श्लोकका संक्षिप्त भावार्थ दिया गया है। अनेक स्थलोंपर
भावार्थ लिखते समय ग्रंथके मूल विषयके बाह्य विषयोंकी भी विस्तृत चर्चा की गई है। कहीं-कहीं हिन्दी
अनुवाद करते समय और भावार्थ लिखते समय हिन्दीकी टिप्पणियां भी जोड़ी गई हैं ।
४ अयोगव्यवच्छेदिका—इस संस्करणमें हेमचन्द्रकी दूसरी कृति अयोगव्यवच्छेदिकाका अनुवाद भी
दे दिया गया है। इसके साथ तुलनाके लिये सिद्धसेन और समंतभद्रकी कृतियोंमेंसे टिप्पणीमें अनेक श्लोक
उद्धृत किये गये हैं ।
५ परिशिष्ट—इस संस्करणका महत्त्वपूर्ण भाग है। इसमें जैन, बौद्ध, न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग,
पूर्वमीमांसा, वेदान्त, चार्वाक और विविध नामके .आठ परिशिष्ट हैं । जैन परिशिष्टमें तुलनात्मक दृष्टिसे
जैन पारिभाषिक शब्दों और विचारोंका स्पष्टीकरण है । बौद्ध परिशिष्टमें बौद्धोंके विज्ञानवाद, शून्यवाद,
अनात्मवाद आदि दार्शनिक सिद्धांतोंका पालि, संस्कृत और अंग्रेजी भाषाके ग्रंथोंके आधारसे प्रामाणिक विवेचन
किया गया है। आशा है इसके पढ़नेसे पाठकोंकी बौद्धदर्शन संबंधी बहुतसी भ्रांतिपूर्ण धारणायें दूर होंगी ।
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तीसरे न्याय-वैशेषिक परिशिष्टमें ईश्वर संबंधी चर्चा विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । चौथे सांख्य-योग परिशिष्टमें
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध-दर्शनोंकी तुलना करते समय जो ब्राह्मण और श्रमण संस्कृति संबंधी भेद दिखाया
गया है, वह ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण है । पांचवें परिशिष्टमें मीमांसक और जैनोंकी तुलना, छठेमें शंकरके
मायावादकी विज्ञानवाद और शून्यवादसे तुलना, सातवेंमें चार्वाकमत और आनन्दघनजीका उसे जिनभगवानकी
कूख बताना, और आठवें परिशिष्टमें आजीविक सम्प्रदाय—ध्यानपूर्वक पढ़ने योग्य हैं ।
६ अनुक्रमणिका—इस संस्करणमें नीचे लिखी तेरह अनुक्रमणिकायें दी गई हैं—
(१) स्याद्वादमंजरीके अवतरण—इन अवतरणोंमें कई अनुपलब्ध अवतरणोंकी खोज पहली बार की
गई है । अवतरण प्रायः सेठ मोतीलाल लाधाजी और प्रो. ध्रुवकी स्याद्वादमंजरीके आधारसे लिये गये हैं ।
(२) स्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रंथकार
(३) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के श्लोकोंकी सूची
(४) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के शब्दोंकी सूची
(५) स्याद्वादमंजरीके न्याय
(६) स्याद्वादमंजरीके श्लोकोंकी सूची
(७) स्याद्वादमंजरीकी संस्कृत, तथा हिन्दी टिप्पणियोंके ग्रंथ और ग्रंथकार
(८) अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची
(९) अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची
(१०) अयोगव्यवच्छेदिकाकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ
(११) परिशिष्टके शब्दोंकी सूची
(१२) परिशिष्टमें उपयुक्त ग्रंथ
(१३) सम्पादनमें उपयुक्त ग्रंथ
उपसंहार
जिस समय मैं बनारस हिन्दू युनिवर्सिटीमें एम. ए. में आदरणीय प्रो. फणिभूषण अधिकारीसे
स्याद्वादमंजरी पढ़ता था, उस समय मुझे उनके साथ दर्शनशास्त्रके अनेक विषयोंपर चर्चा करनेका अवसर
प्राप्त हुआ था । उसी समयसे मेरी इच्छा थी कि मैं स्याद्वादमंजरीपर कुछ लिखकर जैनदर्शन तथा राष्ट्रभाषा-
की सेवा करूँ । संयोगवश पिछले वर्ष मेरा बम्बईमें आना हुआ, और मैंने रायचन्द्र जैनशास्त्रमालाके व्यवस्था-
पक श्रीयुत मणीलाल रेवाशंकर जगजीवन झवेरीकी स्वीकृतिपूर्वक स्याद्वादमंजरीका काम आरंभ कर दिया ।
इस ग्रंथके आरंभसे इसकी समाप्तिंतक अनेक सज्जनोंने मुझे अनेक प्रकारसे सहयोग दिया है, उसके लिये मैं
उन सबका आभार मानता हूँ । स्नेही श्रीयुत दलसुख डाह्याभाई मालवणियाने स्याद्वादमंजरीके संस्कृत और
उसके अनुवादके बहुतसे प्रूफोंका संशोधन किया है । बंधु साहित्यरत्न पं. दरबारीलालजो न्यायतीर्थने इस
ग्रंथ संबंधी अनेक प्रश्नोंकी चर्चामें रस लेकर अपना बहुमूल्य समय खर्च किया है। स्थानीय बुद्धिस्ट सोसायटी-
के मंत्री के. ए. पाध्ये बी. ए., एलएल. बी., वकील बम्बई हाईकोर्टने स्थानीय एशियाटिक लायब्रेरीमें मुझे
हरेक प्रकारकी सुविधा दिलवाकर, तथा एन. आर. फाटक बी. ए. ने अपनी लायब्रेरीमेंसे बहुतसी पुस्तकें
देकर सहायता की है। रायचन्द्रशास्त्रमालाके मैनेजर श्रीयुत कुन्दनलालजीने आवश्यकीय पुस्तकों आदिका
प्रबन्ध किया है । पं. नाथूरामजी प्रेमी, मुनि हिमांशुविजयजी, मोहनलाल दलीचंद देसाई बी. ए., एलएल.
बी., तथा मोहनलाल भगवानदास झवेरी एम. ए. सोलिसीटर आदि सज्जनोंने भी सहानुभूतिका प्रदर्शन किया
हैं । मेरी पत्नी कमलश्रीने हिन्दीके प्रूफ पढ़वानेमें और अनुक्रमणिका बनानेमें सहायता की है । मैं इन सब
महानुभावोंका हृदयसे आभार मानता हूँ । मुनि मोहनलाल सेंट्रल जैन लायब्रेरी, हीराचन्द गुमानजी जैन
बोर्डिंग लायब्रेरी, ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन तथा न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेसके अध्यक्षोंने अपना पूर्ण सहयोग
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दिया है । इस संस्करणके तैयार करनेमें प्रो. आनन्दशंकर बापूभाई ध्रुवकी स्याद्वादमंजरी तथा अन्य अनेक
ग्रन्थोंसे जो मुझे सहायता मिली है, उसका यथास्थान उल्लेख किया गया है । इन सबका आभारी हूँ ।
जुबेलीबाग,
तारदेव बम्बई \ } \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad जगदीशचन्द्र जैन
२०-६-३५ /
द्वितीय आवृत्ति की भूमिका
स्याद्वादमंजरी संस्कृत एवं अंग्रेजी की विविध परीक्षाओं के पाठ्यक्रम में अनेक वर्षों से नियत है ।
तरुण जैन साधु-साध्वियां भी जैन दर्शन का सरल एवं बोधगम्य भाषा में ज्ञान प्राप्त करने के लिये इस ग्रंथ
का पारायण करते आये हैं ।
किन्तु इधर अनेक वर्षोंसे इस ग्रंथके उपलब्ध न होनेके कारण विद्यार्थियोंको बड़ी कठिनाईका सामना
करना पड़ रहा था । साहित्यप्रेमी डॉक्टर आदिनाथ नेमिनाथ उपाध्येका ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ ।
रायचन्द्र शास्त्रमालाके अधिकारियोंसे उन्होंने पत्रव्यवहार किया । इसका परिणाम है यह प्रस्तुत संस्करण
जो पूर्व संस्करणके ३५ वर्ष बाद प्रकाशित हो रहा है ।
अनुवादके संशोधित और परिमार्जित करनेमें कोई कमी नहीं रखी गई है । फलटण (महाराष्ट्र)के वयो-
वृद्ध संस्कृत एवं जैन दर्शनके विद्वान् प्रोफेसर एम. जी. कोठारीका संशोधनमें हार्दिक सहयोग प्राप्त हुआ है ।
अस्वस्थ रहते हुए भी आपने इस कार्यमें रुचि दिखाई है ।
२८ शिवाजी पार्क
बंबई २८ \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad \qquad जगदीशचन्द्र जैन
१-६-७०
ग्रन्थ और ग्रन्थकार
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हेमचन्द्र
हेमचन्द्र आचार्य श्वेताम्बर परम्परामें महान प्रतिभाशाली असाधारण विद्वान हो गये हैं। हेमचन्द्रा-
चार्यका जन्म ई. स. १०७८ में गुजरातके धन्धुका ग्राममें मोढ़ वणिक् जातिमें हुआ था। हेमचन्द्रके जन्मका
नाम चंगदेव अथवा चांगोदेव था। इनके पिताका नाम चच्च, चाच अथवा चाचिग, और माताका पाहिनी
अथवा चाहिणी था। एक बार देवचन्द्र नामके एक जैन साधु धंधुकामं आये। चंगदेवको अवस्था केवल पांच
वर्षकी थी। पाहिनी अपने पुत्रको लेकर जिनमंदिरके दर्शन करने गई। देवचन्द्र भी इसी मंदिरमें ठहरे थे।
जिस समय पाहिनी जिन प्रतिबिम्बकी प्रदक्षिणा दे रही थी, चंगदेव देवचन्द्रमहाराजके पास आकर बैठ गये।
आचार्य चंगदेवके शरीरपर असाधारण चिह्न देखकर आश्चर्यचकित हुए और उन्होंने चंगदेवके घर जाकर पाहि-
नीसे उसके पुत्रको जैन साधुसंघमें दीक्षित करनेकी अनुमति मांगी¹। पाहिनीने गुरुकी आज्ञा शिरोधार्य की और
चंगदेवको देवचन्द्र आचार्यके सुपुर्द कर दिया। जब चंगदेवके पिता बाहरसे लौटे, इस घटनाको सुनकर बहुत
क्रुद्ध हुए। अन्तमें सिद्धराजके तत्कालीन जैन मंत्री उदयनने चंगदेवके पिताको शान्त किया, तथा चंगदेवका
विधि विधानपूर्वक दीक्षा-संस्कार हो गया। दीक्षाके पश्चात् चंगदेवका नाम सोमचन्द्र रखा गया। प्रतिभा-
शाली सोमचन्द्रने शीघ्र ही तर्क, लक्षण, साहित्य और आगम इन चारों विद्याओंका पाण्डित्य प्राप्त कर लिया।
देवचन्द्रसूरिने अपने शिष्यका अगाध पांडित्य देख सोमचन्द्रको सूरिकी उपाधिसे विभूषित किया, और अब
सोमचन्द्र हेमचन्द्रसूरिके नामसे कहे जाने लगे।
एक बार हेमचन्द्र आचार्य विहार करते करते गुजरातकी राजधानी अणहिल्लपुर पाटणमें पधारे।
उस समय वहां महाराज सिद्धराज जयसिंह राज्य करते थे ! सिद्धराजने हेमचन्द्र आचार्यको राजसभामें आमं-
त्रित किया, और हेमचन्द्रके अगाध पाण्डित्यको देखकर वे बहुत मुग्ध हुए। हेमचन्द्र अणहिल्लपुरमें ही रहने
लगे। सिद्धराजने कोई अच्छा व्याकरण न देखकर हेमचन्द्रसे कोई व्याकरण लिखने का अनुरोध किया । तत्प-
श्चात् हेमचन्द्रने गुजरातके लिये सिद्धहैमशब्दानुशासन नामके व्याकरणकी रचना की। यह व्याकरण राजाके
हाथीपर रखकर राज दरबारमें लाया गया। सिद्धराज शैवधर्मी थे। एक बार हेमचन्द्र सिद्धराजके साथ सोम-
नाथके मंदिरमें गये। हेमचन्द्रने निम्न श्लोकोंसे शिवको नमस्कारकर अपने हृदयकी विशालताका परिचय दिया—
भवबीजांकुरजनना रागाद्या क्षयमुपागता यस्य।
ब्रह्मा वा विष्णुर्वा हरो जिनो वा नमस्तस्मै ॥
यत्र तत्र समये यथा तथा योऽसि सोऽस्यभिधया यया यया ।
वीतदोषकलुषः स चेद्भवानेक एव भगवन्नमोऽस्तु ते ॥
हेमचन्द्रके उपदेशसे सिद्धराजको जैनधर्मके प्रति प्रीति उत्पन्न हुई, और फलस्वरूप सिद्धराजने
पाटणमें ‘रायविहार’ और सिद्धपुरमें ‘सिद्धविहार’ नामक चौबीस जिन प्रतिमावाले मंदिर बनवाये। सिद्ध-
राजके समय हेमचन्द्र केवल अपने विद्या-वैभवके कारण सत्कारके पात्र हुए थे। परन्तु सिद्धराजके उत्तरा-
धिकारी कुमारपाल हेमचन्द्रको राजगुरुकी तरह मानने लगे। हेमचन्द्रके उपदेशसे कुमारपालने अपने राज्यमें
१. सोमप्रभसूरिके अनुसार चंगदेवने स्वयं ही देवचन्द्रसूरिके उपदेश सुनकर उनका शिष्य होनेकी इच्छा प्रगट
की, और वे देवचन्द्रसूरिके साथ-साथ भ्रमण करने लगे। देवचन्द्र भ्रमण करते-करते जब खंभात आये तो
वहां चंगदेवके मामा नेमिचन्द्रने चंगदेवके माता-पिताको समझाया और देवचन्द्रसूरिने चंगदेवको दीक्षा दी।
16 ग्रंथ और ग्रंथकार
देव-देवियोंके निमित्त से की जानेवाली प्राणियोंकी हिंसाको, और, मांस, मद्य, द्यूत, शिकार आदि दुर्व्यसनों-
को रोकनेकी घोषणा कराई, और जैनधर्मके सिद्धांतोंका अधिकाधिक प्रचार किया ।
हेमचन्द्र चारों विद्याओंके समुद्र थे, और अपने असामान्य विद्या-वैभवके कारण कलिकालसर्वज्ञके नाम-
से प्रख्यात थे । मल्लिषेण हेमचन्द्रका पूज्य दृष्टिसे स्मरण करते हैं, और उन्हें चार विद्याओं संबंधी साहित्यके
निर्माण करनेमें साक्षात् ब्रह्माकी उपमा देते हैं । सिद्धहैमशब्दानुशासनके अतिरिक्त हेमचन्द्रने तर्क, साहित्य,
छन्द, योग, नीति, आदि विविध विषयोंपर अनेक ग्रंथोंकी रचना करके जैन साहित्यको पल्लवित बनाया ।
कहा जाता है कि कुल मिलाकर हेमचन्द्रने साढ़े तीन करोड़ श्लोकोंकी रचना की है । हेमचन्द्रके मुख्य ग्रंथ
निम्न प्रकार हैं—
१ सिद्धहैमशब्दानुशासन : ( अ ) प्रथम सात अध्यायों में संस्कृत व्याकरण
( आ ) आठवें अध्यायमें प्राकृत एवं अपभ्रंश व्याकरण
२ द्व्याश्रयमहाकाव्य ( माघकृत भट्टिकाव्य के आदर्श पर )
( अ ) संस्कृत द्व्याश्रय; ( आ ) प्राकृत द्व्याश्रय
३ कोष : ( अ ) अभिधानचिंतामणि-सवृत्ति ( हैमनाममाला ); ( आ ) अनेकार्थसंग्रह; ( इ )
देशोनाममाला-सवृत्ति ( रयणावलि ); ( ई ) निघंटुशेष
४ अलंकार : काव्यानुशासन-सवृत्ति
५ छंद : छंदोनुशासन-सवृत्ति
६ न्याय : ( अ ) प्रमाणमीमांसा [ अपूर्ण ]; ( आ ) अन्ययोगव्यवच्छेदिका ( स्याद्वादमंजरी ); ( इ )
अयोगव्यवच्छेदिका
७ योग : योगशास्त्र-सवृत्ति ( अध्यात्मोपनिषद् )
८ स्तुति : वीतरागस्तोत्र
९ चरित : त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित
इन ग्रंथोंके अतिरिक्त हेमचन्द्रने और भी ग्रंथोंका निर्माण किया है । हेमचन्द्र भारतके एक दैदीप्यमान
रत्न थे; उनके बिना जैन साहित्य ही नहीं, गुजरातका साहित्य शून्य समझा जायेगा । ²
अन्ययोग और अयोगव्यवच्छेद द्वात्रिंशिकायें
दार्शनिक विचारोंको संस्कृत पद्योंमें प्रस्तुत करनेकी पद्धति भारतवर्षमें बहुत समयसे चली जाती है ।
उपलब्ध भारतीय साहित्यमें सर्वप्रथम विज्ञानवादी बौद्ध आचार्य वसुबंधुद्वारा, विज्ञानवादकी सिद्धिके लिये
बीस श्लोकप्रमाण विंशिका. और तीस श्लोकप्रमाण त्रिंशिकाकी रचना देखनेमें आती है । जैन साहित्यमें
सर्वप्रथम सुप्रसिद्ध जैन दार्शनिक सिद्धसेन दिवाकरने द्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की । हरिभद्रने भी विंश-
तिविंशिकाओंको लिखा है । हेमचन्द्रने सिद्धसेनकी द्वात्रिंशिकाओंके अनुकरण पर सरल और मार्मिक भाषामें
अन्ययोगव्यवच्छेद और अयोगव्यवच्छेद नामकी दो द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की है ।
१. एक विद्वान्ने इस व्याकरणकी प्रशंसा निम्न श्लोकसे की थी—
भ्रातः संवृणु पाणिनिप्रलपितं कातन्त्रकंथा वृथा
मा कार्षीः कटुशाकटायनवचः क्षुद्रेण चान्द्रेण किम् ।
किं कंठाभरणादिभिर्व्यथयत्यात्मानमन्यैरपि
श्रूयन्ते यदि तावदर्थमधुराः श्रीसिद्धहेमोक्तयः ।। जैन साहित्यनो इतिहास पृ. २९४ ।
२. विशेषके लिये देखिये प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होनेवाली 'भारतके
सांस्कृतिक अग्रदूत' पुस्तकमें लेखक का 'आचार्य हेमचन्द्र' नामक निबंध ।
हेमचन्द्र 17
हेमचन्द्रकी उक्त दोनों द्वात्रिंशिकाएं महावीर भगवानकी स्तुतिरूप हैं। दोनोंमें बत्तीस-बत्तीस श्लोक
हैं जिनमें इकतीस श्लोक उपजाति और अन्तका एक श्लोक शिखरिणी छन्दमें हैं। अन्ययोगव्यवच्छेदिकामें १
अन्य दर्शनोंमें दूषणोंका प्रदर्शन किय गया है। इसमें आदिके तीन और अन्तके तीन श्लोकोंमें भगवानकी
स्तुति; सतरह श्लोकोंमें न्याय-वैशेषिक, मीमांसा, वेदान्त, सांख्य, बौद्ध ओर चार्वाकदर्शनोंकी समीक्षा; तथा
नौ श्लोकोंमें स्याद्वादकी सिद्धिकी गई हैं—
१-—स्तुतिरूप छह श्लोकोंमें भगवानके अतिशय, उनके यथार्थवाद, नयमार्ग, और निष्पक्ष शासनका
वर्णन करते हुए अन्तमें जिन भगवानके द्वारा ही अज्ञानांधकारमें पड़े हुए जगतकी रक्षाकी शक्यताका प्रति-
पादन किया हैं।
२--( क ) अन्य दर्शनोंके समीक्षात्मक रूप सतरह श्लोकोंमें से छह श्लोकोंमें ( ४-१० ) न्याय-
वैशेषिकोंके सामान्यविशेषवाद, नित्यानित्यवाद, ईश्वरकर्तृत्व, धर्म-धर्मिका भेद, सामान्यका भिन्नपदार्थत्व,
आत्मा और ज्ञानका भिन्नत्व, बुद्धि आदि आत्माके गुणोंके उच्छेदसे मुक्ति, आत्माकी सर्वव्यापकता, तथा
छल, जाति और निग्रहस्थानके ज्ञानसे मुक्ति मानना—इन सिद्धांतों की समीक्षा की गई है।
( ख ) ११-१२ वें श्लोकमें मीमांसकोंकी,
( ग ) १३ वें श्लोकमें वेदान्तियोंके मायावादकी,
( घ ) १४ वें में एकान्त सामान्य और एकान्त विशेष रूप वाच्य-वाचक भावकी,
( ङ ) १५ वें में सांख्यदर्शनके सिद्धांतोंकी, तथा
( च ) १६-१९ में बौद्धोंके प्रमाण और प्रमितिकी अभिन्नता, ज्ञानाद्वैत, शून्यवाद और क्षणभंगवादकी,
तथा
( छ ) २० वें श्लोकमें चार्वाकदर्शनकी समीक्षा की गई है।
३--शेष नौ श्लोकोंमें वस्तुमें उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यकी सिद्धि, सकलादेश और विकलादेशसे
सप्तभंगीका प्ररूपण, स्याद्वादमें विरोध आदि दोषोंका खंडन, एकान्तवादोंका खंडन, दुर्नय, नय और प्रमाणका
स्वरूप, और सर्वज्ञनिर्दिष्ट जीवोंकी अनन्तताके प्ररूपणके साथ स्याद्वादकी सर्वोत्कृष्टता सिद्ध की गई है।
अयोगव्यवच्छेदिका द्वात्रिंशिकामें स्वपक्षकी सिद्धि की गई है। अन्ययोगव्यवच्छेदिका और अयोगव्य-
वच्छेदिकाके श्लोकोंका उल्लेख हेमचन्द्रकी प्रमाणमीमांसावृत्ति, योगशास्त्रवृत्ति आदि ग्रंथोंमें मिलता हैं। इससे
मालूम होता है इन ग्रंथोंके बननेसे पहले ही द्वात्रिंशिकाओंकी रचना हो चुकी थी। अयोगव्यवच्छेदिकामें
हेमचन्द्र आचार्यने तीर्थंकरोंके आगमको सदोष सिद्ध करके जिनशासनकी महत्ताका प्रतिपादन किया है।
हेमचन्द्राचार्यकी मान्यता है कि जैनेतर शास्त्रोंमें हिंसा आदिका विधान पाया जाता है, अतएव पूर्वापरविरोध
से रहित यथार्थवादी जिन भगवानका शासन ही प्रामाणिक हो सकता है। जिन शासनके सर्वोत्कृष्ट और
कल्याणरूप होने पर भी जो लोग जिन शासनकी उपेक्षा करते हैं, वह उन लोगोंके दुष्कर्मका ही परिणाम
समझना चाहिये। हेमचन्द्र घोषित करते हैं कि वीतरागको छोड़कर अन्य कोई देव, और अनेकान्तको छोड़-
कर अन्य कोई न्यायमार्ग नहीं है-
इमां समक्षं प्रतिपक्षसाक्षिणामुदारघोषामवघोषणां ब्रुवे।
न वीतरागात्परमस्ति दैवतं न चाप्यनेकान्तमृते नयस्थितिः ॥
अन्तमें हेमचन्द्र जिनदर्शनके प्रति पक्षपात और जिनेतर दर्शनोंके प्रति द्वेषभावका निराकरण करते हुए अपने
समदर्शीपनेका उद्घोष करते हुए जिनशासनकी ही महत्ता सिद्ध करते हैं--
न श्रद्धयैव त्वयि पक्षपातो न द्वेषमात्रादरुचिः परेषु।
यथावदाप्तत्वपरीक्षया तु त्वामेव वीर प्रभुमाश्रिताः स्मः ॥
१. अन्ययोगव्यवच्छेदिकाके कई श्लोंका उल्लेख माधवाचार्यने सर्वदर्शनसंग्रहमें किया है।
३
18 ग्रंथ और ग्रंथकार
टीकाकार मल्लिषेण
मल्लिषेण नामके अनेक जैन आचार्य हो गये हैं।¹ हेमचन्द्रकी अन्ययोगव्यवच्छेदिकाके ऊपर स्याद्वाद-
मंजरी टीका लिखनेनेवाले प्रस्तुत मल्लिषेणसूरि श्वेताम्बर विद्वान हैं। मल्लिषेणने अन्ययोगव्यवच्छेद द्वात्रिं-
शिकाकी टीकाके अतिरिक्त अन्य कौनसे ग्रन्थोंकी रचनाकी है, ये कहांके रहनेवाले थे, आदि बातोंके संबंधमें
कुछ विशेष पता नहीं लगता । स्याद्वादमंजरीके अंतमें दी हुई प्रशस्ति²से केवल इतना ही मालूम होता है कि
नागेन्द्रगच्छीय³ उदयप्रभसूरि⁴ मल्लिषेणके गुरु थे, तथा शक संवत् १२१४ ( ई. स. १२९३) में दीपमालिका
१. पं. नाथूराम प्रेमीजीने अपनी विद्वद्रत्नमाला ( प्रथम भाग ) में मल्लिषेण नामके दो दिगम्बर विद्वानों-
का उल्लेख किया है। एक मल्लिषेण उभयभाषाचक्रवर्ती कहे जाते थे, जो संस्कृत और प्राकृत दोनों
भाषाओंके महाकवि थे । अब तक इनके महापुराण, नागकुमार महाकाव्य, और सज्जनचित्तवल्लभ नामके
तीन ग्रन्थोंका पता लगा है । दूसरे मल्लिषेण 'मलधारिन्' नामसे प्रसिद्ध थे । ये शक संवत् १०५०
में फाल्गुन कृष्ण तृतीयाके दिन श्रवणवेलगुलमें समाधिस्थ हुए थे । प्रवचनसारटीका, पंचास्तिकायटीका,
ज्वालिनीकल्प, प द्मावतीकल्प, वज्रपंजरविधान, ब्रह्मविद्या और आदिपुराण नामक ग्रन्थ भी मल्लिषेण
आचार्यके नामसे प्रसिद्ध हैं । परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि ये ग्रन्थ कौनसे मल्लिषेणने रचे थे ।
२. नागेन्द्रगच्छगोविन्दवक्षोऽलंकारकौस्तुभाः ।
ते विश्ववन्द्या नन्द्यासुरुदयप्रभसूरयः ॥
श्रीमल्लिषेणसूरिभिरकारि तत्पदगगनदिनमणिभिः ।
वृत्तिरियं मनुरविमितशाकाब्दे दीपमहसि शनौ ॥
श्रीजिनप्रभसूरिणां साहाय्योद्भिन्नसौरभा ।
श्रुतावृत्तंसतु सतां वृत्तिः स्याद्वादमंजरी ॥
३. मोतीलाल लाघाजीने आर्हंतमतप्रभाकर पूनासे प्रकाशित स्याद्वादमंजरीकी प्रस्तावनामें नागेन्द्रगच्छके
आचार्योंकी परम्परा निम्न प्रकारसे दी है—
शीलगुणसूरि
|
देवचन्द्रसूरि
|
शीलरुद्रगणि ――――――――――――――――|―――――――――――――――― पार्श्वलगणि
महेन्द्रसूरि
|
आनन्दसूरि ――――― शान्तिसूरि ――――― अमरचन्द्रसूरि
|
|___ हरिभद्रसूरि
|
|___ विजयसेनसूरि
|
|
| | |
उदयसेनसूरि उदयप्रभसूरि यशोदेवसूरि
|
मल्लिषेणसूरि
४. उदयप्रभसूरिने धर्माभ्युदयमहाकाव्य, आरंभसिद्धि, उपदेशमालाकर्णिकावृत्ति आदि ग्रन्थोंकी रचनाकी है ।
?
Let's look: Char 2 is 'वि'. Char 3 is 'धी' (dha with ii-matra)! Char 4 is 'य'! Char 5 is 'मा'! Char 6 is 'णा'!
Wait, look at:
द + ? -> is it 'दू'?
No, it has an i-matra!
Wait, what if it is 'द्रि'?
Wait, look at: 'द्रि' 'वि' 'धी' 'य' 'मा' 'णा' 'ने' 'क'...
Wait! "द्रिविधीयमाणा"? Or "द्विविधीयमाणा"?
Wait, why would it be "द्रिविधीयमाणा"?
Could it be "विद्रुवीक्रियमाणा"? No.
Let's look at character 1 of line 22:
It is 'द्रि'! (or 'द्वि'). Look at 'द्वि' in 'द्विविद्या':
Wait, look at 'वि' in 'विविध': 'द्वि' has 'द' + 'व'. Here, under 'द' there is a diagonal slash to the left, which is 'र' (dra). So 'द्रि'.
Wait, is there a dot/repha?
Wait, what about Char 3:
Is it 'धा'? It has a line going right: 'धी'!
Wait, is it 'द्रिविधीयमाना'?
Wait, look at the text:
"द्र
20 ग्रंथ और ग्रंथकार
मल्लिषेण हरिभद्रसूरिकी कोटिके सरल प्रकृतिके उदार और मध्यस्थ विचारोंके विद्वान थे । सिद्धसेन
आदि जैन विद्वानोंकी तरह मल्लिषेण भी 'सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंके समूहको जैनदर्शन' प्रतिपादित कर 'अन्ध-
गजन्याय' का उपयोग करते हैं । अन्य दर्शनोंके विद्वानोंके लिये पशु, वृषभ आदि असभ्य शब्दोंका प्रयोग न
कर वेदान्तियोंका सम्यग्दृष्टि, व्यासका ऋषि, कपिलका परमर्षि, उदयनका प्रामाणिकप्रकाण्ड रूपसे उल्लेख
करना, तथा श्वेताम्बर परंपराके अनुयायी होते हुए भी समंतभद्र, विद्यानन्द आदि दिगम्बर विद्वानोंके उद्धरण
निःसंकोच भावसे प्रस्तुत करना मल्लिषेणकी धार्मिक सहिष्णुताके साथ उनके समदर्शीपनेको प्रमाणित करता
है । स्याद्वादमंजरीमें सर्वज्ञसिद्धिकी चर्चाके प्रसंगपर भी मल्लिषेण स्त्रीमुक्ति और केवलिमुक्ति जैसे दिगम्बर
और श्वेताम्बर सम्प्रदायके विवादस्थ प्रश्नोंके विषयमें मौन रहते हैं, इससे भी प्रतीत होता है कि अन्य दिग-
म्बर एवं श्वेताम्बर आचार्योंकी तरह मल्लिषेणको साम्प्रदायिक चर्चाओंमें रस नहीं था । अनेक वृक्षोंसे पुष्पों-
को चुनने के समान, अनेक दर्शन संबंधी शास्त्रोंसे प्रमेयोंको चुन-चुनकर, निस्सन्देह मल्लिषेणसूरिने 'अकृत्रिम-
बहुमति' स्याद्वादमंजरी नामकी माला गूंथकर जैनन्यायको समलंकृत किया है ।
स्याद्वादमंजरीका विहंगावलोकन
श्लोक १-३
ये श्लोक स्तुतिरूप हैं । इनमें चार अतिशयों सहित भगवानके यथार्थवादका प्ररूपण करते हुए उनके
शासनको सर्वोत्कृष्टता बताई गई है ।
श्लोक ४-१०
इन छह श्लोकोंमें न्याय-वैशेषिकोंके निम्न सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) सामान्य और विशेष भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।
( २ ) वस्तुको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य मानना न्यायसंगत नहीं है ।
( ३ ) एक, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और नित्य ईश्वर जगतका कर्ता नहीं हो सकता ।
( ४ ) धर्म-धर्मीमें समवाय संबंध नहीं बन सकता ।
( ५ ) सत्ता ( सामान्य ) भिन्न पदार्थ नहीं है ।
( ६ ) ज्ञान आत्मासे भिन्न नहीं है ।
( ७ ) आत्माके बुद्धि आदि गुणोंके नाश होनेको मोक्ष नहीं कह सकते ।
( ८ ) आत्मा सर्वव्यापक नहीं हो सकती ।
( ९ ) छल, जाति, निग्रहस्थान आदि तत्त्व मोक्षके कारण नहीं हो सकते ।
तथा—
( क ) तम ( अंधकार ) अभावरूप नहीं है, वह आकाशकी तरह स्वतंत्र द्रव्य है, और पौद्गलिक है।
( ख ) 'अप्रच्युत, अनुत्पन्न और सदास्थिरत्व' नित्यका लक्षण मानना ठीक नहीं । 'पदार्थके स्वरूप-
का नाश नहीं होना' ही नित्यका लक्षण ठीक हो सकता है ।
( ग ) किरणें गुणरूप नहीं हैं, उन्हें तैजस पुद्गलरूप मानना चाहिये ।
( घ ) नैयायिकोंके प्रमाण, प्रमेय आदिके लक्षण दोषपूर्ण हैं ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( अ ) जैनदृष्टिसे आकाश आदिमें नित्यानित्यत्व,
( ब ) पतंजलि, प्रशस्तकार और बौद्धोंके अनुसार वस्तुओंका नित्यानित्यत्व,
( स ) अनित्यैकान्तवादी बौद्धोंके क्षणिकवादमें दूषण,
टीकाकार मल्लिषेण 21
( ड ) वैदिकसंहिता, स्मृति आदिके वाक्योंमें पूर्वापरविरोध, तथा
( इ ) केवलिसमुद्घात अवस्थामें जैनसिद्धान्तके अनुसार आत्म-व्यापकताकी संगतिका प्ररूपण किया
गया है ।
श्लोक ११-१२
इन श्लोकोंमें पूर्वमीमांसकोंके निम्न सिद्धान्तोंपर विचार किया गया है—
( १ ) वेदोंमें प्रतिपादित हिंसा धर्मका कारण नहीं हो सकती ।
( २ ) श्राद्ध करनेसे पितरोंकी तृप्ति नहीं होती ।
( ३ ) अपौरुषेय वेदको प्रमाण नहीं मान सकते ।
( ४ ) ज्ञानको स्वपरप्रकाशक न माननेसे अनेक दूषण आते हैं, इसलिये ज्ञानको स्व और परका
प्रकाशक मानना चाहिये ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( क ) जिनमंदिरके निर्माण करनेका विधान,
( ख ) सांख्य, वेदान्त और व्यास ऋषि द्वारा याज्ञिक हिंसाका विरोध, तथा
( ग ) ज्ञानको अनुव्यवसायगम्य माननेवाले न्याय-वैशेषिकोंका खंडन किया गया है ।
श्लोक १३
इस श्लोकमें ब्रह्माद्वैतवादियोंके मायावादका खंडन है । यहांपर प्रत्यक्ष प्रमाणको विधि और निषेध
रूप प्रतिपादन किया है ।
श्लोक १४
इस श्लोकमें एकान्त-सामान्य और एकान्त-विशेष वाच्य-वाचक भावका खंडन करते हुए कथंचित्
सामान्य और कथंचित् विशेष वाच्य-वाचक भावका समर्थन किया गया है । इस श्लोकमें निम्न महत्वपूर्ण
विषयों का प्रतिपादन है—
( १ ) केवल द्रव्यास्तिकनय अथवा संग्रहनयको माननेवाले अद्वैतवादी, सांख्य और मीमांसकोंका
सामान्यैकान्तवाद मानना युक्तियुक्त नहीं है ।
( २ ) केवल पर्यायास्तिकनयको माननेवाले बौद्धोंका विशेषैकान्तवाद ठीक नहीं है ।
( ३ ) केवल नैगमनयको स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिकोंका स्वतन्त्र और परस्पर निरपेक्ष
सामान्य-विशेषवाद मानना ठीक नहीं है ।
तथा—
( क ) शब्द आकाशका गुण नहीं है, वह पौद्गलिक है, और सामान्य-विशेष दोनों रूप है ।
( ख ) आत्मा भी कथंचित् पौद्गलिक है ।
( ग ) अपोह, सामान्य अथवा विधिको शब्दार्थ नहीं मान सकते ।
श्लोक १५
इस श्लोकमें सांख्योंकी निम्न मान्यताओंकी समीक्षा की गई है—
( १ ) चित्शक्ति ( पुरुष ) को ज्ञानसे शून्य मानना परस्पर विरुद्ध है ।
( २ ) बुद्धि ( महत् ) का जड़ मानना ठीक नहीं है । अहंकारको भी आत्माका ही गुण मानना
चाहिये, बुद्धिका नहीं ।
२४ ग्रंथ और ग्रंथकार
( ३ ) सत्कार्यवाद माननेवाले सांख्य लोगोंका आकाश आदिका पांच तन्मात्राओंसे उत्पत्ति मानना
असंगत है ।
( ४ ) बंध पुरुषके ही मानना चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
( ५ ) वाक्, पाणि आदिको पृथक् इन्द्रिय नहीं कह सकते, इसलिये पांच ही इन्द्रियां माननी चाहिये ।
( ६ ) केवल ज्ञानमात्रसे मोक्ष नहीं हो सकता ।
श्लोक १६-१९
इन श्लोकोंमें बौद्धोंके निम्न मुख्य सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) प्रमाण और प्रमाणके फलको सर्वथा अभिन्न न मानकर कथंचित् भिन्नाभिन्न मानना चाहिये ।
( २ ) सम्पूर्ण पदार्थोंको एकान्त रूपसे क्षणध्वंसी न मानकर उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य सहित स्वी-
कार करना चाहिये ।
( ३ ) पदार्थोंके ज्ञानमें तदुत्पत्ति और तदाकारताको कारण न मानकर क्षयोपशम रूप योग्यताको ही
कारण मानना चाहिये ।
( ४ ) विज्ञानवादी बौद्धोंका विज्ञानाद्वैत मानना ठीक नहीं है ।
( ५ ) प्रमाता, प्रमेय आदि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं, इसलिये माध्यमिक बौद्धोंका शून्य-
वाद युक्तिसंगत नहीं है ।
( ६ ) बौद्धोंके क्षणभंगवादमें अनेक दोष आते हैं, अतः क्षणभंगवादका सिद्धांत दोषपूर्ण है ।
( ७ ) क्षणभंगवादकी सिद्धिके लिये नाना क्षणोंकी परम्परारूप वासना अथवा संतानको मानना भी
ठीक नहीं ।
तथा—
( क ) नैयायिकोंके प्रमाण और प्रमितिमें एकान्त-भेद नहीं बन सकता ।
( ख ) आत्माकी सिद्धि ।
( ग ) सर्वज्ञकी सिद्धि ।
श्लोक २०
इस श्लोकमें चार्वाक मतके सिद्धांतोंका खण्डन किया गया है ।
श्लोक २०-२९
इन श्लोकोंमें स्वपक्षका समर्थन करते हुए स्याद्वादकी सिद्धि की गई है । इन श्लोकोंमें निम्न सिद्धां-
तोंका प्रतिपादन किया गया है—
( १ ) प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है । द्रव्यकी अपेक्षा वस्तुमें ध्रौव्य और पर्यायकी
अपेक्षा सदा उत्पाद और व्यय होता है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर सापेक्ष हैं ।
( २ ) आत्मा, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि सम्पूर्ण द्रव्योंमें नाना अपेक्षाओंसे नाना धर्म रहते
हैं, अतएव प्रत्येक वस्तुको अनन्तधर्मात्मक मानना चाहिये । जो वस्तु अनन्तधर्मात्मक नहीं होती, वह वस्तु
सत् भी नहीं होती ।
( ३ ) प्रमाणवाक्य और नयवाक्यसे वस्तुमें अनन्त धर्मोंकी सिद्धि होती है । प्रमाणवाक्यको सकला-
देश और नयवाक्यको विकलादेश कहते हैं । पदार्थके धर्मोंका काल, आत्मरूप, अर्थ, संबंध, उपकार गुणिदेश,
संसर्ग और शब्दकी अपेक्षा अभेदरूप कथन करना सकलादेश; तथा काल, आत्मरूप आदिकी भेदविवक्षासे
पदार्थोंके धर्मोंका प्रतिपादन करना विकलादेश है । स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्तिअवक्तव्य,
टीकाकार मल्लिषेण 23
स्यान्नास्तिअवक्तव्य, और स्यादस्तिनास्तिअवक्तव्यके भेदसे सकलादेश और विकलादेश प्रमाणसप्तभंगी और
नयसप्तभंगीके सात सात भेदोंमें विभक्त है ।
( ४ ) स्याद्वादियोंके मतमें स्व द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा वस्तुमें अस्तित्व और पर द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा नास्तित्व है । जिस अपेक्षासे वस्तुमें अस्तित्व है, उसी अपेक्षासे वस्तुमें
नास्तित्व नहीं है । अतएव सप्तभंगी नयमें विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति
और अभाव नामक दोष नहीं आ सकते ।
( ५ ) द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा वस्तु नित्य, सामान्य, अवाच्य, और सत् है, तथा पर्यायार्थिक नयकी
अपेक्षा अनित्य, विशेष, वाच्य और असत् है । अतएव नित्यानित्यवाद, सामान्यविशेषवाद, अभिलाप्यानभि-
लाप्यवाद तथा सदसद्वाद इन चारों वादोंका स्याद्वादमें समावेश हो जाता है ।
( ६ ) नयरूप समस्त एकांतवादोंका समन्वय करनेवाला स्याद्वादका सिद्धांत ही सर्वमान्य हो सकता है।
( ७ ) भावाभाव, द्वैताद्वैत, नित्यानित्य आदि एकांतवादोंमें सुख-दुख, पुण्य-पाप, बन्ध-मोक्ष आदिकी
व्यवस्था नहीं बनती ।
( ८ ) वस्तुके अनन्त धर्मोंमेंसे एक समयमें किसी एक धर्मकी अपेक्षा लेकर वस्तुके प्रतिपादन करने-
को नय कहते हैं। इसलिये जितने तरहके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं। नयके एकसे लेकर
संख्यात भेद तक हो सकते हैं। सामान्यसे नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये
सात भेद किये जाते हैं। न्याय-वैशेषिक केवल नैगमनयके, अद्वैतवादी और सांख्य केवल संग्रहनयके, चार्वाक
केवल व्यवहारनयके, बौद्ध केवल ऋजुसूत्रनयके, और वैयाकरण केवल शब्दनयके माननेवाले हैं । प्रमाण
सम्पूर्ण नयरूप होता है । नयवाक्योंमें स्यात् शब्द लगाकर बोलनेको प्रमाण कहते हैं । प्रत्यक्ष और परोक्षके
भेदसे प्रमाणके दो भेद होते हैं ।
( ९ ) जितने जीव व्यवहारराशिसे मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि निगोदकी अव्यवहार-
राशिसे निकलकर व्यवहारराशिमें आ जाते हैं, और यह अव्यवहारराशि आदिरहित है, इसलिये जीवोंके
सतत मोक्ष जाते रहनेपर भी संसार जीवोंसे कभी खाली नहीं हो सकता ।
( १० ) पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिमें जीवत्वकी सिद्धि ।
( ११ ) प्रत्येक दर्शन नयवादमें गर्भित होता है । जिस समय नयरूप दर्शन परस्पर निरपेक्ष भावसे
वस्तुका प्रतिपादन करते हैं, उस समय ये दर्शन परसमय कहे जाते हैं। जिस प्रकार सम्पूर्ण नदियां एक समुद्रमें
जाकर मिलती है, उसी तरह अनेकांत दर्शनमें सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय होता है, इसलिये जैनदर्शन
स्वसमय है ।
श्लोक ३०-३२
यहाँ महावीर भगवानकी स्तुतिका उपसंहार करते हुए अनेकांतवादसे ही जगतका उद्धार होनेकी
शक्यताका प्रतिपादन किया गया है ।
जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान
एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुत्वमितरेण ।
अन्तेन जयति जैनी नीतिमन्थानमिव गोपी ।। ( अमृतचन्द्र )
स्याद्वादका मौलिक रूप और उसका रहस्य—विज्ञानने इस बातको भले प्रकार सिद्ध कर दिया
है कि जिस पदार्थको हम नित्य और ठोस समझते हैं, वह पदार्थ बड़े वेगसे गति कर रहा है, जो हमें काले, पीले,
लाल आदि रंग दिखाई पड़ते है, वे सब सफेद रंगके रूपान्तर हैं, जो सूर्य हमें छोटासा और बिलकुल पास
दिखाई देता है, वह पृथिवी मंडलसे साढ़े बारह लाख गुना बड़ा और यहाँसे नौ करोड़ तीस लाख मीलकी
ऊँचाईपर है ! इससे सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि हम अनन्त समय बीत जानेपर भी ब्रह्माण्ड-
की छोटीसे छोटी वस्तुओंका भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके, तो जिसको हम दार्शनिक भाषामें पूर्ण सत्य
( Absolute ) कहते हैं, उसका साक्षात्कार करना कितना दुष्कर होना चाहिये । भारतके प्राचीन तत्त्व-
वेत्ताओंने तत्त्वज्ञान संबंधी इस रहस्यका ठीक-ठीक अनुभव किया था । इसीलिये जब कभी आत्मा, परब्रह्म,
पूर्ण सत्य आदिके विषयमें पूर्वकालकी परिषदोंमें प्रश्नोंकी चर्चा उठती, तो 'नैषा तर्केण मतिरापनेया ( कठ ),
'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन' ( मुण्डक ), 'सव्वे सरा नियट्टंति तक्का तत्थ न विज्जइ'
( आचारांग ), 'परमार्थो हि आर्याणां तूष्णींभावः ( चन्द्रकीर्ति )—'वह केवल अनुभवगम्य है, वह वाणी
और मनके अगोचर है, वहाँ जिह्वा रुक जाती है, और तर्क काम नहीं करती, वास्तवमें तूष्णींभाव ही परमार्थ
सत्य है', आदि वाक्योंसे इन शंकाओंका समाधान किया जाता था १ । इसका मतलब यह नहीं कि भारतीय
ऋषि अज्ञानवादी थे, अथवा उनको पूर्ण सत्यका यथार्थ ज्ञान नहीं था । किन्तु इस प्रकारके समाधान प्रस्तुत
करनेसे उनका अभिप्राय था कि पूर्ण सत्य तक पहुँचना तलवारकी धार पर चलने के समान है, अतएव
इसकी प्राप्तिके लिये अधिकसे अधिक साधनाकी आवश्यकता है । वास्तवमें जितना-जितना हम पदार्थोंका
विचार करते हैं, उतने ही पदार्थ विशीर्यमाण दृष्टिगोचर होते हैं । महर्षि सुकरातके शब्दोंमें, हम जितना-
जितना शास्त्रोंका अवलोकन करते हैं, हमें उतना ही अपनी मूर्खताका अधिकाधिक आभास होता है ।
जैनदर्शनका स्याद्वाद भी इसी तत्त्वका समर्थन करता है । जैन दार्शनिकोंका सिद्धांत है कि मनुष्यकी
शक्ति बहुत अल्प है, और बुद्धि बहुत परिमित है । इसलिये हम अपनी छद्मस्थ दशामें हजारों-लाखों प्रयत्न
करनेपर भी ब्रह्माण्डके असंख्य पदार्थोंका ज्ञान करनेमें असमर्थ रहते हैं । हम विज्ञानको ही लें । विज्ञान
अनन्त समयसे विविध रूपमें प्रकृतिका अभ्यास करनेमें जुटा है, परन्तु हम अभी तक प्रकृतिके एक अंश मात्र-
को भी पूर्णतया नहीं जान सके । दर्शनशास्त्रकी भी यही दशा है । सृष्टिके आरंभसे आज तक अनेक ऋषि-
महर्षियोंने तत्त्वज्ञान संबंधी अनेक प्रकारके नये-नये विचारोंकी खोज की, परन्तु हमारी दार्शनिक गुत्थियां
आज भी पहलेकी तरह उलझी पड़ी हुई हैं । स्याद्वाद यही प्रतिपादन करता है कि हमारा ज्ञान
पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता, वह पदार्थोंकी अमुक अपेक्षाको लेकर ही होता है, इसलिये हमारा ज्ञान
आपेक्षिक सत्य है । प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म हैं । इन अनन्त धर्मोंमेंसे हम एक समयमें कुछ धर्मोंका
ही ज्ञान कर सकते हैं, और दूसरोंको भी कुछ धर्मोंका ही प्रतिपादन कर सकते हैं । जैन तत्त्ववेत्ताओंका
कथन है कि जिस प्रकार कई अंधे मनुष्य किसी हाथीके भिन्न भिन्न अवयवोंकी हाथसे टटोलकर
हाथीके उन भिन्न-भिन्न अवयवोंको ही पूर्ण हाथी समझकर परस्पर विवाद उत्पन्न करते हैं, इसी
प्रकार संसारका प्रत्येक दार्शनिक सत्यके केवल अंशमात्रको ही जानता है, और सत्यके इस अंशमात्रको
सम्पूर्ण सत्य समझकर परस्पर विवाद और वितण्डा खड़ा करता है । यदि संसारके दार्शनिक अपने एकान्त
१. पश्चिमके विचारक ब्रैडले ( Bradley ), बर्गसाँ ( Bergson ) आदि विद्वानोंने भी सत्यको बुद्धि
और तर्कके बाह्य कहकर उसे Experience और Intution का विषय बताया है ।
जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 25
आग्रहको छोड़कर अनेकान्त अथवा स्याद्वाददृष्टिसे काम लेने लगें, तो हमारे जीवनके बहुतसे प्रश्न सहजमें ही
हल हो सकते हैं । वास्तवमें सत्य एक है, केवल सत्यकी प्राप्तिके मार्ग जुदा-जुदा हैं । अल्प शक्तिवाले छद्मस्थ
जीव इस सत्यका पूर्ण रूपसे ज्ञान करनेमें असमर्थ है, इसलिये उनका सम्पूर्ण ज्ञान आपेक्षिक सत्य ही कह जाता
है। यही जैन दर्शनकी अनेकांत दृष्टिका गूढ़ रहस्य है।
यहाँ शंका हा सकती है कि इस सिद्धांतके अनुसार हमें केवल आपेक्षिक अथवा अर्ध सत्यका ही ज्ञान
हो सकता है, स्याद्वादसे हम पूर्ण सत्य नहीं जान सकते । दूसरे शब्दोंमें कहा जा सकता है कि स्याद्वाद हमें
अर्ध सत्योंके पास ले जाकर पटक देता है, और इन्हीं अर्ध सत्योंको पूर्ण सत्य मान लेनेकी हमें प्रेरणा करता
है । परन्तु केवल निश्चित-अनिश्चित अर्ध सत्योंको मिलाकर एक साथ रख देनेसे वह पूर्ण सत्य नहीं कहा जा
सकता । तथा किसी न किसी रूपमें पूर्ण सत्यको माने बिना कोई भी दर्शन पूर्ण कहे जानेका अधिकारी नहीं
है। इस भावको भारतके प्रसिद्ध विचारक विद्वान् प्रो० राधाकृष्णनने निम्न प्रकारसे उपस्थित किया है—
The theory of Relativity cannot be logically sustained without the hypo-
thesis of an absolute............The Jains admit that things are one in their unive-
rsal aspect ( Jati or Karana ) and many in their partcular aspect ( vyakti or
karya ). Both these, according to them, are partial points of view. A plurality
of reals is admittedly a relative truth. We must rise to the complete point of
view and took at the whole with all the wealth of its attitudes. If Jainism stops
short with plurality, which is at best a relative and partial truth, and does not
ask whether there is any higher truth pointing to a one which particularises
itself in the objects of the world, connected with one another, vitally, essentially
and imminently, it throws overboard its own logic and exalts a relative truth
into an absolute one.¹
इस शंकाका समाधान स्पष्ट है। वह यह है, जैसा कि ऊपर बताया गया है कि स्याद्वाद
पदार्थोंके जाननेकी एक दृष्टि मात्र है। स्याद्वाद स्वयं अंतिम सत्य नहीं है। यह हमें अन्तिम सत्य तक पहुँ-
चानेके लिये केवल मार्गदर्शकका काम करता है। स्याद्वादसे केवल व्यवहार सत्यके जाननेमें उपस्थित होनेवाले
विरोधोंका ही समन्वय किया जा सकता है, इसीलिये जैन दर्शनकारोंने स्याद्वादको व्यवहार सत्य माना२ है ।
१. इन्डियन फिलासफी जि. १, पृ. ३०५-६ । इसी प्रकारके विचार ‘इन्डियन फिलॉसफिकल कांग्रेसके किसी
अधिवेशनके समय Jain Instrumental theory of knowledge नामक लेखमें, संभवतः हनुमंतराव
एम. ए. ने प्रगट किये हैं। लेखका कुछ अंश निम्न प्रकरसे है—
Its great defect lies in the fact that it ( the doctrine of Syadvada )
yields to the temptation of an easy compromise without overcoming the con-
tradictions inherent in the opposed standpoints in a higher synthesis........
........It takes care to show that the truths of science and of every day exper-
ience are relative and one-sided, but it leaves us in the end with the view
that truth is a sum of relative truths. A mere putting together of half truths
definite-indefinite cannot give us the whole truth.
२. स्याद्वादसे ही लोकव्यवहार चल सकता है, इस बातको सिद्धसेन दिवाकरने निम्न गाथामें व्यक्त किया है—
जेण विणा लोगस्सवि ववहारो सव्वहा न निव्वडइ ।
तस्स भुवणेक्कगुरुणो णमो अणेगंतवायस ।।
४
26 ग्रंथ और ग्रंथकार
व्यवहार सत्यके आगे भी जैनसिद्धान्तमें निरपेक्ष सत्य माना गया है, जिसे जैन पारिभाषिक शब्दोंमें केवलज्ञान
के नामसे कहा जाता है । स्याद्वादमें सम्पूर्ण पदार्थोंका क्रम-क्रमसे ज्ञान होता है, परन्तु केवलज्ञान सत्यप्राप्तिकी
वह उत्कृष्ट दशा है, जिसमें सम्पूर्ण पदार्थ और उन पदार्थोंकी अनन्त पर्यायोंका एक साथ ज्ञान होता है ।
स्याद्वाद परोक्षज्ञानमें गर्भित होता है, इसलिये स्याद्वादसे केवल इन्द्रियजन्य पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, किन्तु
केवलज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष है, अतः केवलज्ञानमें भूत, भविष्य और वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थ प्रतिभासित
होते १ हैं । अतएव स्याद्वाद हमें केवल जैसे-तैसे अर्ध सत्योंको ही पूर्ण सत्य मान लेनेके लिये बाध्य नहीं करता ।
किन्तु वह सत्यका दर्शन करनेके लिये अनेक मार्गोंकी खोज करता है । स्याद्वादका कहना है कि
मनुष्यकी शक्ति सीमित है, इसलिये वह आपेक्षिक सत्यको ही जान सकता है । पहले हमें व्यावहारिक
विरोधोंका समन्वय करके आपेक्षिक सत्यको प्राप्त करना चाहिये । आपेक्षिक सत्यके जाननेके बाद हम पूर्ण
सत्य-केवलज्ञान-का साक्षात्कार करनेके अधिकारी हैं ।
स्याद्वादपर एक ऐतिहासिक दृष्टि—अहिंसा और अनेकान्त ये जैनधर्मके दो मूल सिद्धांत हैं । महावीर
भगवानने इन्हीं दो मूल सिद्धांतोंपर अधिक भार दिया था । महावीर शारीरिक अहिंसाके पालन करनेके साथ
मानसिक अहिंसा (intellectual toleration) के ऊपर भी उतना ही जोर देते हैं । महावीरका कहना
था कि उपशम वृत्तिसे ही मनुष्यका कल्याण हो सकता है, और यही वृत्ति मोक्षका साधन है । भगवानका
उपदेश था कि प्रत्येक महान् पुरुष भिन्न-भिन्न द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके अनुसार ही सत्यकी प्राप्ति करता
है । इसलिये प्रत्येक दर्शनके सिद्धांत किसी अपेक्षासे सत्य हैं । हमारा कर्तव्य है कि हम व्यर्थके वाद-विवादमें
न पड़कर अहिंसा और शांतिमय जीवन यापन करें । हम प्रत्येक वस्तुको प्रतिक्षण उत्पन्न होती
हुई और नष्ट होती हुई देखते हैं, और साथ ही इस वस्तुके नित्यत्वका भी अनुभव करते हैं, अतएव
प्रत्येक पदार्थ किसी अपेक्षासे नित्य और सत्, और किसी अपेक्षासे अनित्य और असत् आदि
अनेक धर्मोंसे युक्त है । अनेकांतवाद सम्बन्धी इस प्रकारके विचार प्रायः प्राचीन आगम ग्रंथोंमें
देखनेमें आते हैं । गौतम गणधर महावीर भगवान्से पूछते हैं—'आत्मा ज्ञान स्वरूप है, अथवा
अज्ञान स्वरूप ?' भगवान उत्तर देते हैं—'आत्मा नियमसे ज्ञान स्वरूप है । क्योंकि ज्ञानके बिना
आत्माकी वृत्ति नहीं देखी जातीं । परन्तु आत्मा ज्ञान रूप भी है और अज्ञानरूप भी है२ ।
१. समंतभद्रने आप्तमीमांसामें स्याद्वाद और केवलज्ञानके भेदको स्पष्ट रूपसे निम्न श्लोकोंमें प्रतिपादन
किया है—
तत्त्वज्ञानं प्रमाणं ते युगपत्सर्वभासनं ।
क्रमभावि च यज्ज्ञानं स्याद्वादनयसंस्कृतं ॥ १०१ ॥
उपेक्षाफलमाद्यस्य शेषस्यादानहानधीः ।
पूर्वं वाऽज्ञाननाशो वा सर्वस्यास्य गोचरे ॥ १०२ ॥
स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने ।
भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ॥ १०५ ॥
तथा देखिये अष्टसहस्री, पृ. २७५-२८८
२. सर्वेनयानां जिनप्रवचनस्यैव निबंधनत्वात् । किमस्य निबंधनमिति चेत् । उच्यते । निबंधनं चास्य 'आय
भन्ते नाणे अन्नाणे' इति स्वामी गौतमस्वामिना पृष्टो व्याकरोति--'गोदमा णाणे णियमा' अतो ज्ञानं
नियमादात्मनि । ज्ञानस्यान्यव्यतिरेकेण वृत्त्यदर्शनात् । नयचक्र, हस्तलिखित ।
( जैनसाहित्यसंशोधक १-४, पृ. १४६ )
के रूपमें ही पाया जाता है। स्याद्वादको प्रस्फुटित करनेवाले जैन आचार्योंमें ईसवी सन्को
Wait, look at "सन्को" or "सन् की" or "सन्को"?
"ईसवी सन्को" -> wait, look at the matra: "ईसवी सन्को" or "सन् की"?
It is "सन्को": स + न् + क + ो = सन्को. Yes!
Line 17:
चौथी शताब्दीके विद्वान् सिद्धसेन दिवाकर और समंतभद्रका नाम सबसे महत्वपूर्ण है। ये दोनों अपूर्व प्रतिभा-
Line 18:
शाली उच्च कोटिके दार्शनिक विद्वान थे। इन विद्वानोंने जैन तर्कशास्त्रपर सन्मतितर्क, न्यायावतार, युक्त्यनु-
Line 19:
शासन, आप्तमीमांसा आदि स्वतंत्र ग्रन्थोंकी रचना की। सिद्धसेन और समंतभद्रने अनेक प्रकारके
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दृष्टांतोंसे और नयोंके सापेक्ष वर्णनसे स्याद्वादका अभूतपूर्व ढंगसे प्रतिपादन किया, तथा जैनेतर सम्पूर्ण दृष्टियों
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को अनेकान्त दृष्टिके अंशमात्र प्रतिपादन कर३ मिथ्यादर्शनोंके समूहको जैनदर्शन बताते हुए४ अपनी सर्वसमन्व-
Notice कर३ and हुए४ have supers
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समझे जाते थे । इन्होंने अनेकांतवादका प्रतिपादन करनेके लिये नयचक्र आदि ग्रन्थोंकी रचना की । जिन-
भद्रगणि श्वेताम्बर आगमोंके मर्मज्ञ पण्डित थे, इन्होंने विशेषावश्यकभाष्य आदि शास्त्रोंकी रचना की । जिन-
भद्रने प्रायः सिद्धसेन दिवाकरकी शैलीका ही अनुसरण किया । इन विद्वानोंके पश्चात् ईसाकी आठवीं-नौवीं
शताब्दीमें अकलंक और हरिभद्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । इन विद्वानोंने स्याद्वादका नाना प्रकार-
से ऊहापोहात्मक सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन कर स्याद्वादको सांगोपांग परिपूर्ण बनाया । १ इस समय
प्रतिपक्षी लोग अनेकांतवादपर अनेक प्रहार करने करने लगे थे । कोई लोग अनेकांतको संशय कहते
थे, कोई केवल छलका रूपान्तर कहते थे, और कोई इसमें विरोध, अनवस्था आदि दोषोंका प्रतिपादन इसका
खंडन करते थे । ऐसे समयमें अकलंक और हरिभद्रने तत्त्वार्थराजवार्तिक, सिद्धिविनिश्चय, अनेकांतजयपताका,
शास्त्रवार्तासमुच्चय आदि ग्रन्थोंका निर्माण कर योग्यतापूर्वक उक्त दोषोंका निवारण किया, और
अनेकांतकी जयपताका फहराई । ईसाकी नौवीं शताब्दीमें विद्यानन्द और माणक्यनन्दि सुविख्यात दिगम्बर
विद्वान् हो गये हैं । विद्यानन्द अपने समयके बड़े भारी नैयायिक थे । इन्होंने कुमारिल आदि वैदिक विद्वानोंके
जैनदर्शनपर होनेवाले आक्षेपोंका बड़ी योग्यतासे परिहार किया है । विद्यानन्दने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अष्ट-
सहस्री, आप्तपरीक्षा आदि ग्रन्थोंको लिखकर अनेक प्रकारसे तार्किक शैलीद्वारा स्याद्वादका प्रतिपादन और
समर्थन किया है । माणक्यनन्दिने सर्वप्रथम जैन न्यायको परीक्षामुखके सूत्रोंमें गूंथ अपनी अलौकिक प्रतिभा-
का परिचय देकर जैनन्यायको समुन्नत बनाया है । ईसाकी दसवीं-ग्यारहवी शताब्दीमें होनेवाले प्रभाचन्द्र और
अभयदेव महान तार्किक विद्वान थे । इन विद्वानोंने सन्मतितर्कटीका (वादमहार्णव), प्रमेयकमलमार्तण्ड, न्याय-
कुमुदचन्द्रोदय आदि जैनन्यायके ग्रन्थोंकी रचना कर जैनदर्शनकी महान सेवा की है । इन विद्वानोंने सौत्रां-
तिक, वैभाषिक, विज्ञानवाद, शून्यवाद, ब्रह्माद्वैत, शब्दाद्वैत आदि वादोंका समन्वय करके स्याद्वादका नैयायिक
पद्धतिसे प्रतिपादन किया है । इनके पश्चात् ईसाकी बारहवीं शताब्दीमें वादिदेवसूरि और कलिकालसर्वज्ञ
हेमचन्द्रका नाम आता है । वादिदेव वादशक्तिमें असाधारण माने जाते थे । वादिदेवने स्याद्वादका स्पष्ट विवेचन
करनेके लिए प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार, स्याद्वादरत्नाकर आदि ग्रन्थ लिखे हैं । हेमचन्द्र अपने समयके असा-
धारण पुरुष थे । इन्होंने अन्ययोगव्यवच्छेदिका, अयोगव्यवच्छेदिका, प्रमाणमीमांसा आदि ग्रन्थ लिखकर
अपूर्व ढंगसे स्याद्वादकी सिद्धिकर जैनदर्शनके सिद्धांतोंको पल्लवित किया है । ईसवी सन्की सतरहवीं-अठारहवीं
शताब्दीमें उपाध्याय यशोविजय और पंडित विमलदास जैनदर्शनके अन्तिम विद्वान हो गये हैं । उपाध्याय
यशोविजयजी जैन परम्परामे लोकोत्तर प्रतिभाके धारक असाधारण विद्वान थे । इन्होंने योग, साहित्य, प्राची-
न न्याय आदिका गंभीर पांडित्य प्राप्त करनेके साथ नव्य न्यायका भी पारायण किया था । स्याद्वादके द्वारा
अभूतपूर्व ढंगसे सम्पूर्ण दर्शनोंका समन्वय करके स्याद्वादको 'सार्वतांत्रिक' सिद्ध करना, यह उपाध्याय-
जीकी ही प्रतिभाका सूचक है । २ यशोविजयजीने शास्त्रवार्तासमुच्चयकी स्याद्वादकल्पलताटीका, नयोपदेश,
नयरहस्य, नयप्रदीप, न्यायखंडखाद्य, न्यायालोक, अष्टसहस्रीटीका आदि अनेक ग्रंथोंकी रचना की है ।
पं. विमलदास दिगम्बर विद्वान थे । इन्होंने नव्य न्यायको अनुकरण करनेवाली भाषामें सप्तभंगीतरंगिणी नामक
स्वतंत्र ग्रंथकी संक्षिप्त और सरल भाषामें रचना करके एक महान क्षति की पूर्ति की है ।
स्याद्वादका जैनेतर साहित्यमें स्थान — किसी वस्तुको भिन्न भिन्न अपेक्षाओंसे विविध रूपमें दर्शन
करनेके स्याद्वादसे मिलते जुलते सिद्धांत जैन साहित्यके अतिरिक्त अन्यत्र भी उपलब्ध होते हैं । ऋग्वेदमें कहा
१. देखिये तत्त्वार्थराजवार्तिकमें 'प्रमाणनयैरधिगमः' सूत्रकी व्याख्या, तथा अनेकांतजयपताका ।
२. तुलनीय—ब्रुवाणा भिन्नभिन्नार्थान्नयभेदव्यपेक्षया ।
प्रतिक्षेपैर्यनो वेदाः स्याद्वाद्वं सार्वतांत्रिकम् ।। ५१ ।। अध्यात्मसार ।
in line 37:कम्hasक+म्. In line 31: तद्विलक्षणम् ।hasण+म्. In line 32: वदन्ननुभवोचितम् ।Wait, let's look at line 32:जातिव्यक्त्वात्मकं वस्तु वदन्ननुभवोचितम् ।It's definitelyवदन्ननुभवोचितम् ।(orवदन्ननुभवोचिम्४? No, look at चितम्: it's चि+त+म्). It is चितम्where the printing was slightly smudged. Line 33:भट्टो वापि मुरारिर्वा नानेकान्तं प्रतिक्षिपेत् ॥Line 34:अबद्धं परमार्थेन बद्धं च व्यवहारतः ।Line 35:ब्रुवाणो ब्रह्मवेदान्ती नानेकान्तं प्रतिक्षिपेत् ॥Line 36:ब्रुवाणा भिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया ।Wait, let's re-verifyभिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया: Is it भिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया? Wait, look at न्धी`: does it have an anusvara?
Above the letter,