स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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समझे जाते थे । इन्होंने अनेकांतवादका प्रतिपादन करनेके लिये नयचक्र आदि ग्रन्थोंकी रचना की । जिन-
भद्रगणि श्वेताम्बर आगमोंके मर्मज्ञ पण्डित थे, इन्होंने विशेषावश्यकभाष्य आदि शास्त्रोंकी रचना की । जिन-
भद्रने प्रायः सिद्धसेन दिवाकरकी शैलीका ही अनुसरण किया । इन विद्वानोंके पश्चात् ईसाकी आठवीं-नौवीं
शताब्दीमें अकलंक और हरिभद्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । इन विद्वानोंने स्याद्वादका नाना प्रकार-
से ऊहापोहात्मक सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन कर स्याद्वादको सांगोपांग परिपूर्ण बनाया । १ इस समय
प्रतिपक्षी लोग अनेकांतवादपर अनेक प्रहार करने करने लगे थे । कोई लोग अनेकांतको संशय कहते
थे, कोई केवल छलका रूपान्तर कहते थे, और कोई इसमें विरोध, अनवस्था आदि दोषोंका प्रतिपादन इसका
खंडन करते थे । ऐसे समयमें अकलंक और हरिभद्रने तत्त्वार्थराजवार्तिक, सिद्धिविनिश्चय, अनेकांतजयपताका,
शास्त्रवार्तासमुच्चय आदि ग्रन्थोंका निर्माण कर योग्यतापूर्वक उक्त दोषोंका निवारण किया, और
अनेकांतकी जयपताका फहराई । ईसाकी नौवीं शताब्दीमें विद्यानन्द और माणक्यनन्दि सुविख्यात दिगम्बर
विद्वान् हो गये हैं । विद्यानन्द अपने समयके बड़े भारी नैयायिक थे । इन्होंने कुमारिल आदि वैदिक विद्वानोंके
जैनदर्शनपर होनेवाले आक्षेपोंका बड़ी योग्यतासे परिहार किया है । विद्यानन्दने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अष्ट-
सहस्री, आप्तपरीक्षा आदि ग्रन्थोंको लिखकर अनेक प्रकारसे तार्किक शैलीद्वारा स्याद्वादका प्रतिपादन और
समर्थन किया है । माणक्यनन्दिने सर्वप्रथम जैन न्यायको परीक्षामुखके सूत्रोंमें गूंथ अपनी अलौकिक प्रतिभा-
का परिचय देकर जैनन्यायको समुन्नत बनाया है । ईसाकी दसवीं-ग्यारहवी शताब्दीमें होनेवाले प्रभाचन्द्र और
अभयदेव महान तार्किक विद्वान थे । इन विद्वानोंने सन्मतितर्कटीका (वादमहार्णव), प्रमेयकमलमार्तण्ड, न्याय-
कुमुदचन्द्रोदय आदि जैनन्यायके ग्रन्थोंकी रचना कर जैनदर्शनकी महान सेवा की है । इन विद्वानोंने सौत्रां-
तिक, वैभाषिक, विज्ञानवाद, शून्यवाद, ब्रह्माद्वैत, शब्दाद्वैत आदि वादोंका समन्वय करके स्याद्वादका नैयायिक
पद्धतिसे प्रतिपादन किया है । इनके पश्चात् ईसाकी बारहवीं शताब्दीमें वादिदेवसूरि और कलिकालसर्वज्ञ
हेमचन्द्रका नाम आता है । वादिदेव वादशक्तिमें असाधारण माने जाते थे । वादिदेवने स्याद्वादका स्पष्ट विवेचन
करनेके लिए प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार, स्याद्वादरत्नाकर आदि ग्रन्थ लिखे हैं । हेमचन्द्र अपने समयके असा-
धारण पुरुष थे । इन्होंने अन्ययोगव्यवच्छेदिका, अयोगव्यवच्छेदिका, प्रमाणमीमांसा आदि ग्रन्थ लिखकर
अपूर्व ढंगसे स्याद्वादकी सिद्धिकर जैनदर्शनके सिद्धांतोंको पल्लवित किया है । ईसवी सन्की सतरहवीं-अठारहवीं
शताब्दीमें उपाध्याय यशोविजय और पंडित विमलदास जैनदर्शनके अन्तिम विद्वान हो गये हैं । उपाध्याय
यशोविजयजी जैन परम्परामे लोकोत्तर प्रतिभाके धारक असाधारण विद्वान थे । इन्होंने योग, साहित्य, प्राची-
न न्याय आदिका गंभीर पांडित्य प्राप्त करनेके साथ नव्य न्यायका भी पारायण किया था । स्याद्वादके द्वारा
अभूतपूर्व ढंगसे सम्पूर्ण दर्शनोंका समन्वय करके स्याद्वादको 'सार्वतांत्रिक' सिद्ध करना, यह उपाध्याय-
जीकी ही प्रतिभाका सूचक है । २ यशोविजयजीने शास्त्रवार्तासमुच्चयकी स्याद्वादकल्पलताटीका, नयोपदेश,
नयरहस्य, नयप्रदीप, न्यायखंडखाद्य, न्यायालोक, अष्टसहस्रीटीका आदि अनेक ग्रंथोंकी रचना की है ।
पं. विमलदास दिगम्बर विद्वान थे । इन्होंने नव्य न्यायको अनुकरण करनेवाली भाषामें सप्तभंगीतरंगिणी नामक
स्वतंत्र ग्रंथकी संक्षिप्त और सरल भाषामें रचना करके एक महान क्षति की पूर्ति की है ।
स्याद्वादका जैनेतर साहित्यमें स्थान — किसी वस्तुको भिन्न भिन्न अपेक्षाओंसे विविध रूपमें दर्शन
करनेके स्याद्वादसे मिलते जुलते सिद्धांत जैन साहित्यके अतिरिक्त अन्यत्र भी उपलब्ध होते हैं । ऋग्वेदमें कहा
१. देखिये तत्त्वार्थराजवार्तिकमें 'प्रमाणनयैरधिगमः' सूत्रकी व्याख्या, तथा अनेकांतजयपताका ।
२. तुलनीय—ब्रुवाणा भिन्नभिन्नार्थान्नयभेदव्यपेक्षया ।
प्रतिक्षेपैर्यनो वेदाः स्याद्वाद्वं सार्वतांत्रिकम् ।। ५१ ।। अध्यात्मसार ।