स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें20 ग्रंथ और ग्रंथकार
मल्लिषेण हरिभद्रसूरिकी कोटिके सरल प्रकृतिके उदार और मध्यस्थ विचारोंके विद्वान थे । सिद्धसेन
आदि जैन विद्वानोंकी तरह मल्लिषेण भी 'सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंके समूहको जैनदर्शन' प्रतिपादित कर 'अन्ध-
गजन्याय' का उपयोग करते हैं । अन्य दर्शनोंके विद्वानोंके लिये पशु, वृषभ आदि असभ्य शब्दोंका प्रयोग न
कर वेदान्तियोंका सम्यग्दृष्टि, व्यासका ऋषि, कपिलका परमर्षि, उदयनका प्रामाणिकप्रकाण्ड रूपसे उल्लेख
करना, तथा श्वेताम्बर परंपराके अनुयायी होते हुए भी समंतभद्र, विद्यानन्द आदि दिगम्बर विद्वानोंके उद्धरण
निःसंकोच भावसे प्रस्तुत करना मल्लिषेणकी धार्मिक सहिष्णुताके साथ उनके समदर्शीपनेको प्रमाणित करता
है । स्याद्वादमंजरीमें सर्वज्ञसिद्धिकी चर्चाके प्रसंगपर भी मल्लिषेण स्त्रीमुक्ति और केवलिमुक्ति जैसे दिगम्बर
और श्वेताम्बर सम्प्रदायके विवादस्थ प्रश्नोंके विषयमें मौन रहते हैं, इससे भी प्रतीत होता है कि अन्य दिग-
म्बर एवं श्वेताम्बर आचार्योंकी तरह मल्लिषेणको साम्प्रदायिक चर्चाओंमें रस नहीं था । अनेक वृक्षोंसे पुष्पों-
को चुनने के समान, अनेक दर्शन संबंधी शास्त्रोंसे प्रमेयोंको चुन-चुनकर, निस्सन्देह मल्लिषेणसूरिने 'अकृत्रिम-
बहुमति' स्याद्वादमंजरी नामकी माला गूंथकर जैनन्यायको समलंकृत किया है ।
स्याद्वादमंजरीका विहंगावलोकन
श्लोक १-३
ये श्लोक स्तुतिरूप हैं । इनमें चार अतिशयों सहित भगवानके यथार्थवादका प्ररूपण करते हुए उनके
शासनको सर्वोत्कृष्टता बताई गई है ।
श्लोक ४-१०
इन छह श्लोकोंमें न्याय-वैशेषिकोंके निम्न सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) सामान्य और विशेष भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।
( २ ) वस्तुको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य मानना न्यायसंगत नहीं है ।
( ३ ) एक, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और नित्य ईश्वर जगतका कर्ता नहीं हो सकता ।
( ४ ) धर्म-धर्मीमें समवाय संबंध नहीं बन सकता ।
( ५ ) सत्ता ( सामान्य ) भिन्न पदार्थ नहीं है ।
( ६ ) ज्ञान आत्मासे भिन्न नहीं है ।
( ७ ) आत्माके बुद्धि आदि गुणोंके नाश होनेको मोक्ष नहीं कह सकते ।
( ८ ) आत्मा सर्वव्यापक नहीं हो सकती ।
( ९ ) छल, जाति, निग्रहस्थान आदि तत्त्व मोक्षके कारण नहीं हो सकते ।
तथा—
( क ) तम ( अंधकार ) अभावरूप नहीं है, वह आकाशकी तरह स्वतंत्र द्रव्य है, और पौद्गलिक है।
( ख ) 'अप्रच्युत, अनुत्पन्न और सदास्थिरत्व' नित्यका लक्षण मानना ठीक नहीं । 'पदार्थके स्वरूप-
का नाश नहीं होना' ही नित्यका लक्षण ठीक हो सकता है ।
( ग ) किरणें गुणरूप नहीं हैं, उन्हें तैजस पुद्गलरूप मानना चाहिये ।
( घ ) नैयायिकोंके प्रमाण, प्रमेय आदिके लक्षण दोषपूर्ण हैं ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( अ ) जैनदृष्टिसे आकाश आदिमें नित्यानित्यत्व,
( ब ) पतंजलि, प्रशस्तकार और बौद्धोंके अनुसार वस्तुओंका नित्यानित्यत्व,
( स ) अनित्यैकान्तवादी बौद्धोंके क्षणिकवादमें दूषण,