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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 25, कुल 458 में से

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पृष्ठ 25

टीकाकार मल्लिषेण 21
( ड ) वैदिकसंहिता, स्मृति आदिके वाक्योंमें पूर्वापरविरोध, तथा
( इ ) केवलिसमुद्घात अवस्थामें जैनसिद्धान्तके अनुसार आत्म-व्यापकताकी संगतिका प्ररूपण किया
गया है ।
श्लोक ११-१२
इन श्लोकोंमें पूर्वमीमांसकोंके निम्न सिद्धान्तोंपर विचार किया गया है—
( १ ) वेदोंमें प्रतिपादित हिंसा धर्मका कारण नहीं हो सकती ।
( २ ) श्राद्ध करनेसे पितरोंकी तृप्ति नहीं होती ।
( ३ ) अपौरुषेय वेदको प्रमाण नहीं मान सकते ।
( ४ ) ज्ञानको स्वपरप्रकाशक न माननेसे अनेक दूषण आते हैं, इसलिये ज्ञानको स्व और परका
प्रकाशक मानना चाहिये ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( क ) जिनमंदिरके निर्माण करनेका विधान,
( ख ) सांख्य, वेदान्त और व्यास ऋषि द्वारा याज्ञिक हिंसाका विरोध, तथा
( ग ) ज्ञानको अनुव्यवसायगम्य माननेवाले न्याय-वैशेषिकोंका खंडन किया गया है ।
श्लोक १३
इस श्लोकमें ब्रह्माद्वैतवादियोंके मायावादका खंडन है । यहांपर प्रत्यक्ष प्रमाणको विधि और निषेध
रूप प्रतिपादन किया है ।
श्लोक १४
इस श्लोकमें एकान्त-सामान्य और एकान्त-विशेष वाच्य-वाचक भावका खंडन करते हुए कथंचित्
सामान्य और कथंचित् विशेष वाच्य-वाचक भावका समर्थन किया गया है । इस श्लोकमें निम्न महत्वपूर्ण
विषयों का प्रतिपादन है—
( १ ) केवल द्रव्यास्तिकनय अथवा संग्रहनयको माननेवाले अद्वैतवादी, सांख्य और मीमांसकोंका
सामान्यैकान्तवाद मानना युक्तियुक्त नहीं है ।
( २ ) केवल पर्यायास्तिकनयको माननेवाले बौद्धोंका विशेषैकान्तवाद ठीक नहीं है ।
( ३ ) केवल नैगमनयको स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिकोंका स्वतन्त्र और परस्पर निरपेक्ष
सामान्य-विशेषवाद मानना ठीक नहीं है ।
तथा—
( क ) शब्द आकाशका गुण नहीं है, वह पौद्गलिक है, और सामान्य-विशेष दोनों रूप है ।
( ख ) आत्मा भी कथंचित् पौद्गलिक है ।
( ग ) अपोह, सामान्य अथवा विधिको शब्दार्थ नहीं मान सकते ।
श्लोक १५
इस श्लोकमें सांख्योंकी निम्न मान्यताओंकी समीक्षा की गई है—
( १ ) चित्शक्ति ( पुरुष ) को ज्ञानसे शून्य मानना परस्पर विरुद्ध है ।
( २ ) बुद्धि ( महत् ) का जड़ मानना ठीक नहीं है । अहंकारको भी आत्माका ही गुण मानना
चाहिये, बुद्धिका नहीं ।