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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 458 में से

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पृष्ठ 20

16 ग्रंथ और ग्रंथकार
देव-देवियोंके निमित्त से की जानेवाली प्राणियोंकी हिंसाको, और, मांस, मद्य, द्यूत, शिकार आदि दुर्व्यसनों-
को रोकनेकी घोषणा कराई, और जैनधर्मके सिद्धांतोंका अधिकाधिक प्रचार किया ।
हेमचन्द्र चारों विद्याओंके समुद्र थे, और अपने असामान्य विद्या-वैभवके कारण कलिकालसर्वज्ञके नाम-
से प्रख्यात थे । मल्लिषेण हेमचन्द्रका पूज्य दृष्टिसे स्मरण करते हैं, और उन्हें चार विद्याओं संबंधी साहित्यके
निर्माण करनेमें साक्षात् ब्रह्माकी उपमा देते हैं । सिद्धहैमशब्दानुशासनके अतिरिक्त हेमचन्द्रने तर्क, साहित्य,
छन्द, योग, नीति, आदि विविध विषयोंपर अनेक ग्रंथोंकी रचना करके जैन साहित्यको पल्लवित बनाया ।
कहा जाता है कि कुल मिलाकर हेमचन्द्रने साढ़े तीन करोड़ श्लोकोंकी रचना की है । हेमचन्द्रके मुख्य ग्रंथ
निम्न प्रकार हैं—
१ सिद्धहैमशब्दानुशासन : ( अ ) प्रथम सात अध्यायों में संस्कृत व्याकरण
( आ ) आठवें अध्यायमें प्राकृत एवं अपभ्रंश व्याकरण
२ द्व्याश्रयमहाकाव्य ( माघकृत भट्टिकाव्य के आदर्श पर )
( अ ) संस्कृत द्व्याश्रय; ( आ ) प्राकृत द्व्याश्रय
३ कोष : ( अ ) अभिधानचिंतामणि-सवृत्ति ( हैमनाममाला ); ( आ ) अनेकार्थसंग्रह; ( इ )
देशोनाममाला-सवृत्ति ( रयणावलि ); ( ई ) निघंटुशेष
४ अलंकार : काव्यानुशासन-सवृत्ति
५ छंद : छंदोनुशासन-सवृत्ति
६ न्याय : ( अ ) प्रमाणमीमांसा [ अपूर्ण ]; ( आ ) अन्ययोगव्यवच्छेदिका ( स्याद्वादमंजरी ); ( इ )
अयोगव्यवच्छेदिका
७ योग : योगशास्त्र-सवृत्ति ( अध्यात्मोपनिषद् )
८ स्तुति : वीतरागस्तोत्र
९ चरित : त्रिषष्टिशलाकापुरुषचरित
इन ग्रंथोंके अतिरिक्त हेमचन्द्रने और भी ग्रंथोंका निर्माण किया है । हेमचन्द्र भारतके एक दैदीप्यमान
रत्न थे; उनके बिना जैन साहित्य ही नहीं, गुजरातका साहित्य शून्य समझा जायेगा । ²

अन्ययोग और अयोगव्यवच्छेद द्वात्रिंशिकायें

दार्शनिक विचारोंको संस्कृत पद्योंमें प्रस्तुत करनेकी पद्धति भारतवर्षमें बहुत समयसे चली जाती है ।
उपलब्ध भारतीय साहित्यमें सर्वप्रथम विज्ञानवादी बौद्ध आचार्य वसुबंधुद्वारा, विज्ञानवादकी सिद्धिके लिये
बीस श्लोकप्रमाण विंशिका. और तीस श्लोकप्रमाण त्रिंशिकाकी रचना देखनेमें आती है । जैन साहित्यमें
सर्वप्रथम सुप्रसिद्ध जैन दार्शनिक सिद्धसेन दिवाकरने द्वात्रिंशद्द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की । हरिभद्रने भी विंश-
तिविंशिकाओंको लिखा है । हेमचन्द्रने सिद्धसेनकी द्वात्रिंशिकाओंके अनुकरण पर सरल और मार्मिक भाषामें
अन्ययोगव्यवच्छेद और अयोगव्यवच्छेद नामकी दो द्वात्रिंशिकाओंकी रचना की है ।
१. एक विद्वान्ने इस व्याकरणकी प्रशंसा निम्न श्लोकसे की थी—
भ्रातः संवृणु पाणिनिप्रलपितं कातन्त्रकंथा वृथा
मा कार्षीः कटुशाकटायनवचः क्षुद्रेण चान्द्रेण किम् ।
किं कंठाभरणादिभिर्व्यथयत्यात्मानमन्यैरपि
श्रूयन्ते यदि तावदर्थमधुराः श्रीसिद्धहेमोक्तयः ।। जैन साहित्यनो इतिहास पृ. २९४ ।
२. विशेषके लिये देखिये प्रकाशन विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित होनेवाली 'भारतके
सांस्कृतिक अग्रदूत' पुस्तकमें लेखक का 'आचार्य हेमचन्द्र' नामक निबंध ।