स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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तीसरे न्याय-वैशेषिक परिशिष्टमें ईश्वर संबंधी चर्चा विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । चौथे सांख्य-योग परिशिष्टमें
सांख्य, योग, जैन और बौद्ध-दर्शनोंकी तुलना करते समय जो ब्राह्मण और श्रमण संस्कृति संबंधी भेद दिखाया
गया है, वह ऐतिहासिक दृष्टिसे महत्त्वपूर्ण है । पांचवें परिशिष्टमें मीमांसक और जैनोंकी तुलना, छठेमें शंकरके
मायावादकी विज्ञानवाद और शून्यवादसे तुलना, सातवेंमें चार्वाकमत और आनन्दघनजीका उसे जिनभगवानकी
कूख बताना, और आठवें परिशिष्टमें आजीविक सम्प्रदाय—ध्यानपूर्वक पढ़ने योग्य हैं ।
६ अनुक्रमणिका—इस संस्करणमें नीचे लिखी तेरह अनुक्रमणिकायें दी गई हैं—
(१) स्याद्वादमंजरीके अवतरण—इन अवतरणोंमें कई अनुपलब्ध अवतरणोंकी खोज पहली बार की
गई है । अवतरण प्रायः सेठ मोतीलाल लाधाजी और प्रो. ध्रुवकी स्याद्वादमंजरीके आधारसे लिये गये हैं ।
(२) स्याद्वादमंजरीमें निर्दिष्ट ग्रंथ और ग्रंथकार
(३) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के श्लोकोंकी सूची
(४) स्याद्वादमंजरी (अन्ययोगव्यवच्छेदिका) के शब्दोंकी सूची
(५) स्याद्वादमंजरीके न्याय
(६) स्याद्वादमंजरीके श्लोकोंकी सूची
(७) स्याद्वादमंजरीकी संस्कृत, तथा हिन्दी टिप्पणियोंके ग्रंथ और ग्रंथकार
(८) अयोगव्यवच्छेदिकाके श्लोकोंकी सूची
(९) अयोगव्यवच्छेदिकाके शब्दोंकी सूची
(१०) अयोगव्यवच्छेदिकाकी टिप्पणीमें उपयुक्त ग्रंथ
(११) परिशिष्टके शब्दोंकी सूची
(१२) परिशिष्टमें उपयुक्त ग्रंथ
(१३) सम्पादनमें उपयुक्त ग्रंथ
उपसंहार
जिस समय मैं बनारस हिन्दू युनिवर्सिटीमें एम. ए. में आदरणीय प्रो. फणिभूषण अधिकारीसे
स्याद्वादमंजरी पढ़ता था, उस समय मुझे उनके साथ दर्शनशास्त्रके अनेक विषयोंपर चर्चा करनेका अवसर
प्राप्त हुआ था । उसी समयसे मेरी इच्छा थी कि मैं स्याद्वादमंजरीपर कुछ लिखकर जैनदर्शन तथा राष्ट्रभाषा-
की सेवा करूँ । संयोगवश पिछले वर्ष मेरा बम्बईमें आना हुआ, और मैंने रायचन्द्र जैनशास्त्रमालाके व्यवस्था-
पक श्रीयुत मणीलाल रेवाशंकर जगजीवन झवेरीकी स्वीकृतिपूर्वक स्याद्वादमंजरीका काम आरंभ कर दिया ।
इस ग्रंथके आरंभसे इसकी समाप्तिंतक अनेक सज्जनोंने मुझे अनेक प्रकारसे सहयोग दिया है, उसके लिये मैं
उन सबका आभार मानता हूँ । स्नेही श्रीयुत दलसुख डाह्याभाई मालवणियाने स्याद्वादमंजरीके संस्कृत और
उसके अनुवादके बहुतसे प्रूफोंका संशोधन किया है । बंधु साहित्यरत्न पं. दरबारीलालजो न्यायतीर्थने इस
ग्रंथ संबंधी अनेक प्रश्नोंकी चर्चामें रस लेकर अपना बहुमूल्य समय खर्च किया है। स्थानीय बुद्धिस्ट सोसायटी-
के मंत्री के. ए. पाध्ये बी. ए., एलएल. बी., वकील बम्बई हाईकोर्टने स्थानीय एशियाटिक लायब्रेरीमें मुझे
हरेक प्रकारकी सुविधा दिलवाकर, तथा एन. आर. फाटक बी. ए. ने अपनी लायब्रेरीमेंसे बहुतसी पुस्तकें
देकर सहायता की है। रायचन्द्रशास्त्रमालाके मैनेजर श्रीयुत कुन्दनलालजीने आवश्यकीय पुस्तकों आदिका
प्रबन्ध किया है । पं. नाथूरामजी प्रेमी, मुनि हिमांशुविजयजी, मोहनलाल दलीचंद देसाई बी. ए., एलएल.
बी., तथा मोहनलाल भगवानदास झवेरी एम. ए. सोलिसीटर आदि सज्जनोंने भी सहानुभूतिका प्रदर्शन किया
हैं । मेरी पत्नी कमलश्रीने हिन्दीके प्रूफ पढ़वानेमें और अनुक्रमणिका बनानेमें सहायता की है । मैं इन सब
महानुभावोंका हृदयसे आभार मानता हूँ । मुनि मोहनलाल सेंट्रल जैन लायब्रेरी, हीराचन्द गुमानजी जैन
बोर्डिंग लायब्रेरी, ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवन तथा न्यू भारत प्रिंटिंग प्रेसके अध्यक्षोंने अपना पूर्ण सहयोग