स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
30 ग्रन्थ और ग्रन्थकार
परिवर्तन ( relative change ) स्वीकार किया है। १ ग्रीकके महान् विचारक प्लेटोने भी इसी प्रकारके
विचार प्रगट किये है २। पश्चिमके आधुनिक दर्शनमें भी इस प्रकारके समान विचारोंकी कमी नहीं है।
उदाहरणके लिये, जर्मनीके प्रकाण्ड तत्त्ववेत्ता हेगेल ( Hegel ) का कथन है कि विरुद्धधर्मात्मकता ही
संसारका मूल है। किसी वस्तुका यथार्थ वर्णन करनेके लिये हमें उस वस्तु संबंधी संपूर्ण सत्य कहनेके साथ
उस वस्तुके विरुद्ध धर्मोंका किस प्रकार समन्वय हो सकता है, यह प्रतिपादन करना चाहिये ३। नये विज्ञानवाद
( New Idealism ) के प्रतिपादक ब्रैडलेके अनुसार, प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तुओंसे तुलना किये जानेपर
आवश्यक और अनावश्यक दोनों सिद्ध होती है। संसार कोई भी पदार्थ नगण्य अथवा अकिंचित्कर नहीं
कहा जा सकता। अतएव प्रत्येक तुच्छसे तुच्छ विचारमें और छोटीसे छोटी सत्तामें सत्यता विद्यमान हैं ४ ।
आधुनिक दार्शनिक जोअचिम (Joachim) का कहना है कि कोई भी विचार स्वतः ही, दूसरे विचारसे सर्वथा
अनपेक्षित होकर केवल अपनी ही अपेक्षासे सत्य नहीं कहा जा सकता। उदाहरणके लिये, तीनसे तीनको गुणा
करनेपर नौ होता है ( ३ × ३ = ९), यह सिद्धान्त एक बालकके लिये सर्वथा निष्प्रयोजन है, परन्तु इसे पढ़-
कर एक विज्ञानवेत्ताके सामने गणितशास्त्रके विज्ञानका सारा नक्शा सामने आ जाता है ५। मानसशास्त्र
१. There are beings or particles of rerlity that are permanent, original, impe-
rishable, underived, and these can not change into anything else. They are
what they are and must remain so, just as the Eleatic school maintains.
These beings, of particles of realies howeveer, can be combined, and separatu,
that is, form bodies that can again be resolved into their elements. The
original bits of reality can not be created or destroyed or ehange thejr
nature, but they can change their relations in respect to each other. And
that is what we mean by change.
Thilly : History of Philosophy, पृ. ३२ ।
२. When we speak of not being, we speak, I suppose not of something opposed
to being, but only different.—Dialogues of Plato.
३. Reality is now this, now that; in this sense it is full of negations, contradi-
ctions, and oppositons : the plant germinates, blooms, withers and dies;
man is young mature and old. To do a thing justice, we must tell the
whole truth about it, predicate all those contradictions of it, and show how
they are reconciled and preserved in the articulated whole which we call
the life of the thing.
Thilly : History of Philosophy, पृ. ४६७ ।
४. Everything is essentiral and everything worthless in comparison with other.
Now where is there even a slngle fact so fragmentary and so poor that to
the univeres it does not matter. There is truth in every idea however false,
there is reality in every existence however slight.
Appearance and Reality पृ० ४८७ ।
५. No judgment is true in itself and by itself. Every judgment as a piece of
concrete thinking is informed, conditioned to some extent, constituted by
the apperceipient character of the mind. Nature of Truth, अ. ३., पृ. ९२-३ ।
जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 31
वेत्ता प्रो. विलियम जेम्स ( W. James ) ने भी लिखा है, हमारी अनेक दुनिया हैं । साधारण मनुष्य इन
सब दुनियाओंका एक दूसरेसे असम्बद्ध तथा अनपेक्षित रूपसे ज्ञान करता है। पूर्ण तत्त्ववेत्ता वही है, जो
सम्पूर्ण दुनियाओंसे एक दूसरेसे सम्बन्ध और अपेक्षित रूपमें जानता है१। इसी प्रकारके विचार पेरी२
( Perry ), नैयायिक जोसेर्फ ( Joseph ), एड्मन्ड होम्स३ ( Edmund Holms ) प्रभृति विद्वानोंने
प्रकट किये हैं४ ।
स्याद्वाद और समन्वय दृष्टि—स्याद्वाद सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय करता है । जैन दर्शनकारों-
का कथन है कि सम्पूर्ण दर्शन नयवादमें गर्भित हो जाते हैं, अतएव सम्पूर्ण दर्शन नयकी अपेक्षासे सत्य हैं ।
उदाहरणके लिये, ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा बौद्ध, संग्रहनयकी अपेक्षा वेदान्त, नैगमनयकी अपेक्षा न्याय-वैशेषिक,
शब्दनयकी अपेक्षा शब्दब्रह्मवादी, तथा व्यवहारनयकी अपेक्षा चार्वाक दर्शनोंको सत्य कहा जा सकता५ है ।
ये नयरूप समस्त दर्शन परस्पर विरुद्ध होकर भी समुदित होकर सम्यक्त्व रूप कहे जाते हैं। जिस प्रकार भिन्न-
भिन्न
32 ग्रन्थ और ग्रन्थकार
शास्त्रोंके पढ़ जानेसे भी कोई लाभ नहीं।"१ निस्सन्देह सच्चा स्याद्वादी सहिष्णु होता है, वह राग-द्वेषरूप
आत्माके विकारों पर विजय प्राप्त करनेका सतत प्रयत्न करता है। वह दूसरोंके सिद्धांतोंको आदरकी दृष्टिसे
देखता है, और मध्यस्थ भावसे सम्पूर्ण विरोधोंका समन्वय करता है। सिद्धसेन दिवाकरने वेद, सांख्य, न्याय-
वैशेषिक, बौद्ध आदि दर्शनोंपर द्वात्रिंशिकाओंकी रचना करके, और हरिभद्रसूरिने षड्दर्शनसमुच्चयमें छह
दर्शनोंकी निष्पक्ष समालोचना करके इसी उदार वृत्तिका परिचय दिया है। मल्लवादि, हरिभद्रसूरि, 'रत्नशेखर,
पं० आशाधर, उ. यशोविजय आदि अनेक जैन विद्वानोंने वैदिक और बौद्ध ग्रंथोंपर टीकाटिप्पणियां लिखकर अपनी
गुणग्राहिता, समन्वयवृत्ति और हृदयकी विशालताको स्पष्टरूपसे प्रमाणित किया है२ ।
वास्तवमें देखा जाय तो सत्य एक है तथा वैदिक, जैन और बौद्ध दर्शनोंमें कोई परस्पर विरोध नहीं।
प्रत्येक दार्शनिक भिन्न-भिन्न देश और कालकी परिस्थितिके अनुसार सत्यके केवल अंश मात्रको ग्रहण करता
है। वैदिक धर्म व्यवहारप्रधान है, बौद्ध धर्मको श्रवणप्रधान, और जैनधर्मको कर्त्तव्यप्रधान कहा जा सकता
है।३ एक दर्शन कर्म, उपासना और ज्ञानको मोक्षका प्रधान कारण कहता है; दूसरा शील, समाधि और प्रज्ञा-
को; तथा तीसरा सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रको मोक्ष प्रधानका कारण मानता है, परन्तु ध्येय सबका एक
ही है। जिस प्रकार सरल और टेढ़े मार्गसे जानेवाली भिन्न-भिन्न नदियाँ अन्तमें जाकर एक ही समुद्रमें मिलती
हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न रुचियोंके कारण उद्भव होनेवाले समस्त दर्शन एक ही पूर्ण सत्यमें समाविष्ट हो जाते
हैं।४ षड्दर्शनोंको जिनेन्द्रके अंग कहकर परमयोगी आनंदघनजीने आनन्दघनचौवीसीमें इस भावको निम्न
रूप में व्यक्त किया है—
पट्दरसण जिन अंग भणीजे । न्याय पड़ंग जो साधे रे ।
नमिजिनवरना चरण उपासक । पट्दर्शन आराधे रे ॥ १ ॥
जिनसुर पादप पाय बखाणुं । सांख्यजोग दोय भेदें रे ।
आतम सत्ता विवरण करता । ल्हो दुग अंग अखेदें रे ॥ २ ॥
१. यस्य सर्वत्र समता नयेषु तनयेष्विव ।
तस्यानेकान्तवादस्य क्व न्यूनाधिकशेमपी ॥ ६१ ॥
तेन स्याद्वादमालंब्य सर्वदर्शनतुल्यतां ।
मोक्षोद्देशाविशेषेण यः पश्यति सः शास्त्रवित् ॥ ७० ॥
माध्यस्थ्यमेव शास्त्रार्थो येन तच्चारु सिध्यति ।
स एव धर्मवादः स्यादन्यद्बालिशवल्गनम् ॥ ७२ ॥
माध्यस्थ्यसहितं ह्येकपदज्ञानमपि प्रमा ।
शास्त्रकोटिः वृथैवान्या तथा चोक्तं महात्मना ॥ ७३ ॥ अध्यात्मसार ।
२. सुना गया है कि गुजरातमें जैन विद्वानोंकी ओरसे ब्राह्मणोंके वेदको अपनानेका भी प्रयत्न हुआ था ।
३. श्रोतव्यो सौगतो धर्मः कर्तव्यः पुनरार्हतः ।
वैदिको व्यवहर्त्तव्यो ध्यातव्यः परमः शिवः ॥ हरिभद्र ॥
४. त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यात् ऋजुकुटिलनानापथजुषां ।
नृणामेको गम्यत् त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ शिवमहिम्न स्तोत्र ।
जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 33
भेद अभेद सुगत मीमांसक । जिनवर दोय कर भारी रे ।
लोकालोक अवलंबन भजिये । गुरुगमथी अवधारी रे ॥ ३ ॥
लोकायतिक कूख जिनवरनी । अंशविचार जो कीजे ।
तत्त्वविचार सुधारस धारा । गुरुगम विण केम पीजे ॥ ४ ॥
जैन जिनेश्वर उत्तम अंग । अंतरंग बहिरंगे रे ।
अक्षरन्यास घरा आराधक । आराधे घरी संगे रे ॥ ५ ॥
इस प्रकार एकतामें विविधता और विविधतामें एकताका दर्शन कर जैन आचार्योंने भारतीय
संस्कृतिको समुन्नत बनाया है ।
६२ न्यायमञ्जरीपरिशिष्टे
ऽपि नियतं प्रति नश्यति । कल्पते हेतुभावेन यद्वा
॥ १ ॥ वैचित्र्यस्य विनाशस्य । हेतुत्वेऽपि न विस्मयः
। विधिं विधातुमशक्यत्वात् । किञ्चिदेवोपपद्यते
॥ २ ॥ हेतुं प्रति ततो ज्ञानम् । जायते न तु कल्पितम्
। येनैवेह प्रवृत्तस्य । तदेवोपयुज्यते हि
॥ ३ ॥ हेतुं विना न सिद्धिः स्यात् । कल्प्यतेऽतो विचारतः
प्रतिपाद्य विनिर्णयः कृतोऽत्र विद्वद्भिः सम्यक् विचार्यैव यत्नतः
। इति प्रथमः कल्पः समाप्तः
श्रीमद् राजचंद्र ।
जन्म - ववाणीआ देहोत्सर्ग - राजकोट
संवत १९२४ कारतक सुद १५ संवत १९५७ चैत्र वद ५
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...'? No.
It is: 'खद्योतवत्सद्देष्टारो हा द्योतन्ते क्वचित्क्वचित्'
Wait, let me look at line 3 again very carefully:
'ख' - 'द्यो' - 'त' - 'व' - 'त्' - 'स' - 'द्दे' - 'ष्टा' - 'रो'
Yes, that's exactly 9 letters:
ख dyo ta va tsa dde ṣṭā ro!
Wait, is there a halanta under त?
"खद्योतवत्" -> 'त्' has halanta!
Then space?
No, 'सद्देष्टारो' is joined or separate?
Wait, look at: 'खद्योतवत्' then 'स' is right next to it, sharing the shirorekha!
Wait, in Devanagari, 'त्' with halant doesn't join with 'स' into 'त्स'?
Wait, look at the image:
'ख' 'द्यो' 'त' 'व' 'त्' 'स'...
Wait, is that a 'त्' with halant?
Look at the character:
'त' with halanta? No, wait!
Is that 'त' with halant, or is it 'त्' + 'स' = 'त्स'?
Look at line 3:
'ख' (1)
'द्यो' (2)
'त' (3)
'व
[ २ ]
श्मशान भूमिमें जला देवेंगे।' इतना सुनकर राजचन्द्रजी थोड़ी देर तो घरमें इधर-उधर घूमते रहे, बादमें चुपचापं
तालाबके पास गये और वहाँ बबूलके एक वृक्षपर चढ़कर देखा तो सचमुच कुटुम्बके लोग उसके शरीरको
जला रहे हैं। इस प्रकार एक परिचित और सज्जन व्यक्तिको जलाता देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे
विचारने लगे कि यह सब क्या है ! उनके अन्तरमें विचारोंकी तीव्र खलबली-सी मच गई और वे गहन
विचारमें डूब गये। इसी समय अचानक चित्तपरसे भारी आवरण हट गया और उन्हें पूर्व भवोंकी स्मृति हो
आई। बाद में एक बार वे जूनागढ़का किला देखने गये तब पूर्व स्मृतिज्ञानकी विशेष वृद्धि हुई¹। इस पूर्व-
स्मृतिरूप-ज्ञानने उनके जीवनमें प्रेरणाका अपूर्व नवीन-अध्याय जोड़ा। श्रीमद्जीकी पढ़ाई विशेष नहीं हो
पाई थी फिर भी, वे संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओंके ज्ञाता थे एवं जैन आगमोंके असाधारण वेत्ता और मर्मज्ञ
थे। उनको क्षयोपशम-शक्ति इतनी विशाल थी कि जिस काव्य या सूत्रका मर्म बड़े-बड़े विद्वान् लोग नहीं बता
सकते थे उसका यथार्थ विश्लेषण उन्होंने सहजरूपमें किया है²। किसी भी विषयका सांगोपांग विवेचन
करना उनके अधिकारकी बात थी³। उन्हें अल्प-वयमें ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो गई थी, जैसा कि उन्होंने
स्वयं एक काव्यमें लिखा है—
लघुवयथी अद्भुत थयो, तत्त्वज्ञाननो बोध।
एज सूचवे एम के, गति आगति कां शोध ?
जे संस्कार थवा घटे, अति अभ्यासे कांय,
विना परिश्रम ते थयो, भवशंका शी त्यांय ?
—अर्थात् छोटी अवस्थामें मुझे अद्भुत तत्त्वज्ञानका बोध हुआ है, यही सूचित करता है कि अब
पुनर्जन्मके शोधकी क्या आवश्यकता है ? और जो संस्कार अत्यन्त अभ्यासके द्वारा उत्पन्न होते हैं वे मुझे
बिना किसी परिश्रमके ही प्राप्त हो गये हैं, फिर वहाँ भव-शंकाका क्या काम ? ( पूर्वभवके ज्ञानसे आत्माकी
श्रद्धा निश्चल हो गई है।)
अवधान-प्रयोग, स्पर्शनशक्ति
श्रीमद्जीकी स्मरणशक्ति अत्यन्त तीव्र थी। वे जो कुछ भी एक बार पढ़ लेते, उन्हें ज्यों
का त्यों याद रह जाता था। इस स्मरणशक्तिके कारण वे छोटी अवस्थामें ही अवधान-प्रयोग करने लगे थे।
धीरे-धीरे वे सौ अवधान तक पहुँच गये थे। वि० सं० १९४३ में १९ वर्षकी अवस्थामें उन्होंने बम्बईकी
एक सार्वजनिक सभामें डॉ० पिटर्सनके सभापतित्वमें सौ अवधानोंका प्रयोग बताकर बड़े-बड़े लोगोंको
आश्चर्यमें डाल दिया था। उस समय उपस्थित जनताने उन्हें 'सुवर्णचन्द्रक' प्रदान किया, साथही 'साक्षात्
सरस्वती' के पदसे भी विभूषित किया था। ई० सन् १८८६-८७ में 'मुंबई समाचार' 'जामे जमशेद'
'गुजराती' 'पायोनियर' 'इण्डियन स्पॅक्टेटर' 'टाइम्स ऑफ इण्डिया' आदि गुजराती एवं अंग्रेजी पत्रोंमें
श्रीमद्जीकी अद्भुत शक्तियोंके बारेमें भारी प्रशंसात्मक लेख छपे थे। शतावधानमें शतरंज खेलते जाना,
मालाके दाने गिनते जाना, जोड़ बाकी गुणा करते जाना, आठ भिन्न-भिन्न समस्याओंकी पूर्ति करते जाना,
सोलह भाषाओंके भिन्न-भिन्न क्रमसे उलटे-सीधे नम्बरोंके साथ शब्दोंको याद रखकर वाक्य बनाते जाना, दो
कोठोंमें लिखे हुए उलटे-सीधे अक्षरोंसे कविता करते जाना, कितने ही अलंकारोंका विचार करते जाना, इत्यादि
सौ कामोंको एक ही साथ कर सकते थे।
१. इस प्रसंगकी चर्चा कच्छके एक वणिक बंधु पदमशीभाई ठाकरशीके पूछनेपर बम्बईमें भूलेश्वरके दि०
जैन मन्दिरमें सं० १९४२ में श्रीमद्जीने की ।
२. देखिए पं० बनारसीदासजीके 'समता रमता उरधता०' पद्यका विवेचन 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती )
पत्रांक ४३८ ।
३. आनंदघन चौबीसीके कुछ पद्योंका विवेचन उपरोक्त ग्रन्थ में पत्रांक ७५३ ।
[ ३ ]
श्रीमद्जीकी स्पर्शनशक्ति भी अत्यन्त विलक्षण थी । उपरोक्त सभामें ही उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकारके
बारह ग्रन्थ दिये गये और उनके नाम भी उन्हें पढ़कर सुना दिये गये । बादमें उनकी आँखों पर पट्टी बाँध-
कर जो-जो ग्रन्थ उनके हाथ पर रखे गये उन सब ग्रन्थोंके नाम हाथोंसे टटोलकर उन्होंने बता दिये ।
श्रीमद्जीकी इस अद्भुतशक्तिसे प्रभावित होकर उस समयके बम्बई हाईकोर्टके मुख्य न्यायाधीश सर
चार्ल्स सारजंटने उन्हें विलायत चलकर अवधान-प्रयोग दिखानेकी इच्छा प्रगट की थी, परन्तु श्रीमद्जीने इसे
स्वीकार नहीं किया । उन्हें कीर्तिकी इच्छा नहीं थी, बल्कि ऐसी प्रवृत्तियोंको आत्मकल्याणके मार्गमें बाधक
जानकर फिर उन्होंने अवधान-प्रयोग नहीं किये ।
महात्मा गाँधी ने कहा था—
महात्मा गांधीने उनकी स्मरणशक्ति और आत्मज्ञानसे जो अपूर्व प्रेरणा प्राप्त की वह संक्षेपमें
उन्हींके शब्दोंमें—
“रायचन्द्रभाईके साथ मेरी भेंट जुलाई सन् १८९१ में उस दिन हुई जब मैं विलायतसे बम्बई
वापिस लौटा । इन दिनों समुद्रमें तूफान आया करता है इस कारण जहाज रातको देरीसे पहुँचा । मैं डाक्टर
बैरिस्टर और अब रंगूनके प्रख्यात जौहरी प्राणजीवनदास महेताके घर उतरा था । रायचन्द्रभाई उनके बड़े
भाईके जमाई होते थे । डॉक्टर सा० ( प्राणजीवनदास ) ने ही परिचय कराया । उनके दूसरे बड़े भाई
झवेरी रेवाशंकर जगजीवनदासकी पहचान भी उसी दिन हुई । डाक्टर सा० ने रायचन्द्रभाईका 'कवि'
कहकर परिचय कराया और कहा, 'कवि' होते हुए भी आप हमारे साथ व्यापारमें हैं, आप ज्ञानी और
शतावधानी हैं । किसीने सूचना की कि मैं उन्हें कुछ शब्द सुनाऊँ, और वे शब्द चाहे किसी भी भाषाके हों,
जिस क्रमसे मैं बोलूँगा उसी क्रमसे वे दोहरा जावेंगे, मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ । मैं तो उस समय जवान
और विलायतसे लौटा था; मुझे भाषाज्ञानका भी अभिमान था । मुझे विलायतकी हवा भी कम नहीं लगी
थी । उन दिनों विलायतसे आया मानों आकाशसे उतरा था ! मैंने अपना समस्त ज्ञान उलट दिया और अलग-
अलग भाषाओंके शब्द पहले तो मैंने लिख लिये, क्योंकि मुझे वह क्रम कहाँ याद रहने वाला था ? और
बादमें उन शब्दोंको मैं बाँच गया । उसी क्रमसे रायचंदभाईने धीरेसे एकेके बाद एक सब शब्द कह सुनाये ।
मैं राजी हुआ, चकित हुआ और कविकी स्मरणशक्तिके विषयमें मेरा उच्च विचार हुआ । विलायतकी हवाका
असर कम पड़नेके लिए यह सुन्दर अनुभव हुआ कहा जा सकता है ।........कविके साथ यह परिचय बहुत
आगे बढ़ा........कवि संस्कारी ज्ञानी थे ।
मुझपर तीन पुरुषोंने गहरा प्रभाव डाला है—टाल्सटॉय, रस्किन और रायचंदभाई ! टाल्सटॉयने अपनी
पुस्तकों द्वारा और उनके साथ थोडे पत्रव्यवहारसे, रस्किनने अपनी एक ही पुस्तक 'अन्टु दिस लास्ट' से—
जिसका गुजराती नाम मैंने 'सर्वोदय' रखा है, और रायचन्दभाईने अपने गाढ़ परिचयसे । जब मुझे हिन्दूधर्ममें
शंका पैदा हुई उस समय उसके निवारण करनेमें मदद करने वाले रायचन्दभाई थे । सन् १८९३ में दक्षिण
अफ्रीकामें मैं कुछ क्रिश्चियन सज्जनोंके विशेष सम्पर्कमें आया । उनका जीवन स्वच्छ था । वे चुस्त धर्मात्मा
थे । अन्य-धर्मियोंको क्रिश्चियन होनेके लिए समझाना उनका मुख्य व्यवसाय था । यद्यपि मेरा और उनका
सम्बन्ध व्यावहारिक कार्यको लेकर हो हुआ था, तो भी उन्होंने मेरे आत्माके कल्याणके लिये चिन्ता करना
शुरू कर दिया । उस समय मैं अपना एक ही कर्तव्य समझ सका कि जब तक मैं हिन्दूधर्मके रहस्यको पूरी
तौरसे न जान लूँ और उससे मेरे आत्माको असंतोष न हो जाय, तबतक मुझे अपना कुलधर्म कभी नहीं
छोड़ना चाहिये । इसलिये मैंने हिन्दूधर्म और अन्य धर्मोंकी पुस्तकें पढ़ना शुरू कर दीं । क्रिश्चियन और
इस्लामधर्मकी पुस्तकें पढ़ीं । विलायतसे अंग्रेज मित्रोंके साथ पत्रव्यवहार किया । उनके समक्ष अपनी शंकायें
रखीं तथा हिन्दुस्तानमें जिनके ऊपर मुझे कुछ भी श्रद्धा थी उनसे पत्रव्यवहार किया । उनमें रायचन्दभाई
मुख्य थे । उनके साथ तो मेरा अच्छा सम्बन्ध हो चुका था, उनके प्रति मान भी था, इसलिए उनसे जो भी
[ ४ ]
मिल सके उसे लेनेका मैंने विचार किया । उसका फल यह हुआ कि मुझे शान्ति मिली । हिन्दूधर्ममें मुझे जो
चाहिये वह मिल सकता है, ऐसा मनको विश्वास हुआ । मेरी इस स्थितिके जिम्मेदार रायचन्दभाई हुए,
इससे मेरा उनके प्रति कितना अधिक मान होना चाहिये इसका पाठक लोग अनुमान कर सकते हैं ।”
इस प्रकार उसके प्रबल आत्मज्ञानके प्रभावके कारण ही महात्मा गांधीको सन्तोष हुआ और उन्होंने
धर्मपरिवर्तन नहीं किया¹ ।
और भी वर्णन करते हुये गांधीजीने उनके बारेमें लिखा है :
“श्रीमद्राजचन्द्र असाधारण व्यक्ति थे । उनके लेख उनके अनुभवके विन्दु समान हैं । उन्हें पढ़ने-
वाले, विचारनेवाले और उसके अनुसार आचरण करनेवालेको मोक्ष सुलभ होवे । उसकी कषायें मन्द पड़ें,
उसे संसारमें उदासीनता आवे, वह देहका मोह छोड़कर आत्मार्थी बने ।
इस परसे वांचक देखेंगे कि श्रीमद्के लेख अधिकारीके लिए उपयोगी हैं। सभी वांचक उसमें रस
नहीं ले सकते । टीकाकारको उसकी टीकाका कारण मिलेगा परन्तु श्रद्धावान तो उसमें से रस ही लूटेगा ।
उनके लेखोंमें सत् निथर रहा है, ऐसा मुझे हमेशा भास हुआ है । उन्होंने अपना ज्ञान दिखानेके लिये एक
भी अक्षर नहीं लिखा । लिखनेका अभिप्राय वांचकको अपने आत्मानन्दमें भागीदार बनानेका था । जिसे
आत्मक्लेश टालना है, जो अपना कर्तव्य जाननेको उत्सुक है उसे श्रीमद्के लेखोंमेंसे बहुत मिल जायेगा ऐसा
मुझे विश्वास है, फिर भले वह हिन्दू हो या अन्य धर्मी ।
....'जो वैराग्य ( अपूर्व अवसर एवो क्यारे आवशे ? ) इस काव्यकी कड़ियोंमें झलक रहा है वह
मैंने उनके दो वर्षके गाढ़ परिचयमें प्रतिक्षण उनमें देखा था । उनके लेखोंकी एक असाधारणता यह है कि
स्वयं जो अनुभव किया वही लिखा है । उसमें कहीं भी कृत्रिमता नहीं है । दूसरे पर प्रभाव डालनेके लिये
एक पंक्ति भी लिखी हो ऐसा मैंने नहीं देखा'....।
खाते, बैठते, सोते, प्रत्येक क्रिया करते उनमें वैराग्य तो होता ही । किसी समय इस जगत्के किसी
भी वैभवमें उन्हें मोह हुआ हो ऐसा मैंने नहीं देखा ।
उनकी चाल धीमी थी और देखनेवाला भी समझ सकता कि चलते हुये भी ये अपने विचारमें ग्रस्त
हैं । आँखोंमें चमत्कार था अत्यन्त तेजस्वी, विह्वलता जरा भी नहीं थी । दृष्टिमें एकाग्रता थी । चेहरा
गोलाकार, होंठ पतले, नाक नोंकदार भी नहीं चपटी भी नहीं, शरीर इकहरा, कद मध्यम, वर्ण श्याम,
देखाव शांत मूर्तिका-सा था । उनके कण्ठमें इतना अधिक माधुर्य था कि उन्हें सुनते हुए मनुष्य थके नहीं ।
चेहरा हँसमुख और प्रफुल्लित था, जिस पर अन्तरानन्दकी छाया थी । भाषा इतनी परिपूर्ण थी कि उन्हें
अपने विचार प्रगट करनेके लिये कभी शब्द ढूँढ़ना पड़ा है, ऐसा मुझे याद नहीं । पत्र लिखने बैठें उस समय
कदाचित् ही मैंने उन्हें शब्द बदलते देखा होगा, फिर भी पढ़ने वालेको ऐसा नहीं लगेगा कि कहीं भी विचार
अपूर्ण है या वाक्य-रचना खंडित है, अथवा शब्दोंके चुनावमें कमी है ।
यह वर्णन संयमीमें संभवित है । बाह्याडम्बरसे मनुष्य वीतरागी नहीं हो सकता । वीतरागता आत्मा-
की प्रसादी है । अनेक जन्मके प्रयत्नसे वह प्राप्त होती है और प्रत्येक मनुष्य उसका अनुभव कर सकता है ।
रागभावको दूर करनेका पुरुषार्थ करनेवाला जानता है कि रागरहित होना कितना कठिन है। यह रागरहित
दशा कवि (श्रीमद्) को स्वाभाविक थी, ऐसी मेरे ऊपर छाप पड़ी थी ।
मोक्षकी प्रथम पैड़ी वीतरागता है । जबतक मन जगत्की किसी भी वस्तुमें फँसा हुआ है तबतक उसे
मोक्षकी बात कैसे रुचे ? और यदि रुचे तो वह केवल कानको ही—अर्थात् जैसे हम लोगोंको अर्थ जाने या
१. श्रीमद्जी द्वारा म० गांधीको उनके प्रश्नोंके उत्तरमें लिखे गये कुछ पत्र, क्र० ५३०, ५७०, ७१७
‘श्रीमद् राजचन्द्र'—ग्रंथ ( गुजराती )
[ ५ ]
समझे बिना किसो संगीतका स्वर रुच जाय वैसे । मात्र ऐसी कर्णप्रिय क्रीड़ामेंसे मोक्षका अनुसरण करनेवाले
आचरण तक आनेमें तो बहुत समय निकल जाय । अंतरंग वैराग्यके बिना मोक्षकी लगन नहीं होती ।
वैराग्यका तीव्र भाव कविमें था ।
...."व्यवहारकुशलता और धर्मपरायणताका जितना उत्तम मेल मैंने कविमें देखा उतना किसी
अन्यमें नहीं देखा ।"
गृहस्थाश्रम
सं० १९४४ माघ सुदी १२ को १९ वर्षकी आयुमें उनका पाणिग्रहणसंस्कार, गांधीजीके परममित्र
स्व० रेवाशंकर जगजीवनदास महेताके बड़े भाई पोपटलालकी पुत्री झवकबाईके साथ हुआ था । इसमें
दूसरोंकी 'इच्छा' और 'अत्यन्त आग्रह' ही कारणरूप प्रतीत होते हैं$^१$ । पूर्वोपार्जित कर्मोंका भोग समझकर
ही उन्होंने गृहस्थाश्रममें प्रवेश किया, परन्तु इससे भी दिन-पर-दिन उनकी उदासीनता और वैराग्यका बल
बढ़ता ही गया । आत्मकल्याणके इच्छुक तत्त्वज्ञानी पुरुषके लिए विषम परिस्थितियाँ भी अनुकूल बन जाती
हैं, अर्थात् विषमतामें उनका पुरुषार्थ और भी अधिक निखर उठता है । ऐसे ही महात्मा पुरुष दूसरोंके लिये
भी मार्गप्रकाशक-दीपकका कार्य करते हैं ।
श्रीमद्जी गृहस्थाश्रममें रहते हुए भी अत्यन्त उदासीन थे । उनकी दशा, छहढालाकार पं० दौलत-
रामजी के शब्दोंमें 'गेही पै, गृहमें न रचै ज्यों जलतें भिन्न कमल हैं'--जैसी निर्लेप थी । उनकी इस
अवस्थामें भी यही मान्यता रही कि "कुटुम्बरूपी काजलकी कोठड़ीमें निवास करनेसे संसार बढ़ता है ।
उसका कितना भी सुधार करो तो भी एकान्तवाससे जितना संसारका क्षय हो सकता है उसका शतांश भी
उस काजलकी कोठड़ीमें रहनेसे नहीं हो सकता, क्योंकि वह कपायका निमित्त है और अनादिकालसे मोहके
रहनेका पर्वत है$^२$।" फिर भी इस प्रतिकूलतामें वे अपने परिणामोंकी पूरी संभाल रखकर चले । यहाँ उनके
अन्तरके भाव एक मुमुक्षुको लिखे गये पत्रमें इसप्रकार व्यक्त हुए हैं--'संसार स्पष्ट प्रीतिसे करनेकी इच्छा
होती हो तो उस पुरुषने ज्ञानीके वचन सुने नहीं अथवा ज्ञानीके दर्शन भी उसने किये नहीं ऐसा तीर्थंकर
कहते हैं ।' 'ज्ञानी पुरुषके वचन सुननेके बाद स्त्रीका सजीवन शरीर अजीवनरूप भास्यमान हुए बिना रहे
नहीं$^३$।' इससे स्पष्ट प्रगट होता है कि वे अत्यन्त वैरागी महापुरुष थे ।
सफल व्यापारी
व्यापारिक झंझट और धर्मसाधनाका मेल प्रायः कम बैठता है, परन्तु आपका धर्म-आत्मचिन्तन तो
साथमें ही चलता था । वे कहते थे कि धर्मका पालन कुछ एकादशीके दिन ही, पर्यूषणमें ही अथवा मंदिरोंमें
ही हो और दुकान या दरबारमें न हो ऐसा कोई नियम नहीं, बल्कि ऐसा कहना धर्मतत्त्वको न पहचाननेके
तुल्य है । श्रीमद्जीके पास दुकान पर कोई न कोई धार्मिक पुस्तक और दैनंदिनी (डायरी) अवश्य होती
थी । व्यापारकी बात पूरी होते ही फौरन धार्मिक पुस्तक खुलती या फिर उनकी वह डायरी कि जिसमें कुछ
न कुछ मनके विचार वे लिखते ही रहते थे । उनके लेखोंका जो संग्रह प्रकाशित हुआ है उसका अधिकांश
भाग उनकी नोंधपोथीमेंसे लिया गया है ।
श्रीमद्जी सर्वाधिक विश्वासपात्र व्यापारीके रूपमें प्रसिद्ध थे । वे अपने प्रत्येक व्यवहारमें सम्पूर्ण
प्रामाणिक थे । इतना बड़ा व्यापारिक काम करते हुये भी उसमें उनकी आसक्ति नहीं थी । वे बहुत ही
१. देखिये--'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० ३०
२. 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० १०३,
३. 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती ) पत्र क्र० ४५४
प्रथम भाग: अन्य दार्शनिक मतों (सांख्य, नैयायिक, वैशेषिक) की परीक्षा
[ ६ ]
संतोषी थे। रहन-सहन पहरवेश सादा रखते थे। धनको तो वे 'उच्च प्रकारके कंकर'१ मात्र समझते थे।
एक आरब व्यापारी अपने छोटे भाईके साथ बम्बईमें मोतियोंकी आढ़तका काम करता था। एक दिन
छोटे भाईने सोचा कि मैं भी अपने बड़े भाईकी तरह मोतीका व्यापार करूँ। वह परदेशसे आया हुआ माल
लेकर बाजारमें गया। वहाँ जाने पर एक दलाल उसे श्रीमद्जीकी दुकानपर लेकर पहुँचा। श्रीमद्जीने
माल अच्छी तरह परखकर देखा और उसके कहे अनुसार रकम चुकाकर ज्योंका त्यों माल एक ओर उठाकर
रख दिया। उधर घर पहुँचकर बड़े भाईके आनेपर छोटे भाईने व्यापारकी बात कह सुनाई। अब जिस
व्यापारीका वह माल था उसका पत्र इस आरब व्यापारीके पास उसी दिन आया था कि अमुक भावसे नीचे
माल मत बेचना। जो भाव उसने लिखा था वह चालू बाजार-भावसे बहुत ही ऊँचा था। अब यह व्यापारो
तो घबरा गया क्योंकि इसे इस सौदेमें बहुत अधिक नुकसान् था। वह क्रोधमें आकर बोल उठा—'अरे !
तूने यह क्या किया ? मुझे तो दिवाला ही निकालना पड़ेगा !'
आरब-व्यापारी हाँफता हुआ श्रीमद्जीके पास दौड़ा हुआ आया और उस व्यापारीका पत्र पढ़वाकर
कहा—'साहब, मुझ पर दया करो, वरना मैं गरीब आदमी बरबाद हो जाऊँगा।' श्रीमद्जीने एक ओर
ज्यों का त्यों बंधा हुआ माल दिखाकर कहा—'भाई, तुम्हारा माल यह रक्खा है। तुम खुशीसे ले जाओ।'
यों कहकर उस व्यापारीका माल उसे दे दिया और अपने पैसे ले लिये। मानो कोई सौदा किया ही नहीं था,
ऐसा सोचकर हजारोंके लाभकी भी कोई परवाह नहीं की। आरब-व्यापारी उनका उपकार मानता हुआ
अपने घर चला गया। यह आरब व्यापारी श्रीमद्को खुदाके पैगम्बरके समान मानने लगा।
व्यापारिक नियमानुसार सौदा निश्चित हो चुकने पर वह व्यापारी माल वापिस लेनेका अधिकारी
नहीं था, परन्तु श्रीमद्जीका हृदय यह नहीं चाहता था कि किसीको उनके द्वारा हानि हो। सचमुच महा-
त्माओंका जीवन उनकी कृतिमें व्यक्त होता ही है।
इसीप्रकारका एक दूसरा प्रसंग उनके करुणामय और निस्पृही जीवनका ज्वलंत उदाहरण है :
एक बार एक व्यापारीके साथ श्रीमद्जीने हीरोंका सौदा किया। इसमें ऐसा तय हुआ कि अमुक
समयमें निश्चित किये हुये भावसे वह व्यापारी श्रीमद्को अमुक हीरे दे। इस विषयकी चिट्ठी भी व्यापारीने
लिख दी थी। परन्तु हुआ ऐसा कि मुद्दतके समय उन हीरोंकी कीमत बहुत अधिक बढ़ गई। यदि व्यापारी
चिट्ठीके अनुसार श्रीमद्को हीरे दे, तो उस वेचारेको बड़ा भारी नुकसान सहन करना पड़े; अपनी सभी
सम्पत्ति बेच देनी पड़े ! अब क्या हो ?
इधर जिस समय श्रीमद्जीको हीरोंका बाजार-भाव मालूम हुआ, उस समय वे शीघ्र ही उस व्यापारी-
की दुकानपर जा पहुँचे। श्रीमद्जीको अपनी दुकानपर आये देखकर व्यापारी घबराहटमें पड़ गया। वह
गिड़गिड़ाते हुए बोला—'रायचंदभाई, हम लोगोंके बीच हुए सीदेके सम्बन्धमें मैं खूब ही चिन्तामें पड़ गया
हूँ। मेरा जो कुछ होना हो, वह भले हो, परन्तु आप विश्वास रखना कि मैं आपको आजके बाजार-भावसे
सौदा चुका दूँगा। आप जरा भी चिन्ता न करें।'
यह सुनकर राजचन्द्रजी करुणाभरी आवाजमें बोले : "वाह ! भाई, वाह ! मैं चिन्ता क्यों न करूं ?
तुमको सौदेकी चिन्ता होती हो तो मुझे चिन्ता क्यों न होनी चाहिये ? परन्तु हम दोनोंकी चिन्ताका मूल
कारण यह चिट्ठी ही है न ? यदि इसको ही फाड़कर फेंक दें तो हम दोनोंकी चिन्ता मिट जायगी।"
यों कहकर श्रीमद् राजचन्द्रने सहजभावसे वह दस्तावेज फाड़ डाला। तत्पश्चात् श्रीमद्जी बोले :
"भाई, इस चिट्ठीके कारण तुम्हारे हाथपाँव बंधे हुए थे। बाजारभाव बढ़ जानेसे तुमसे मेरे साठ सत्तर हजार
१. 'ऊँची जातना कांकरा'
[ ७ ]
रुपये लेना निकलते हैं, परन्तु मैं तुम्हारी स्थिति समझ सकता हूँ । इतने अधिक रुपये मैं तुमसे लूँ तो तुम्हारी
क्या दशा हो ? परन्तु राजचन्द्र दूध पी सकता है, खून नहीं !"
वह व्यापारी कृतज्ञ-भावसे श्रीमद्की ओर स्तब्ध होकर देखता ही रहा ।
भविष्यवक्ता, निमित्तज्ञानी
श्रीमद्जीका ज्योतिष-सम्बन्धी ज्ञान भी प्रखर था । वे जन्मकुंडली, वर्षफल एवं अन्य चिह्न देखकर
भविष्यकी सूचना कर देते थे । श्रीजूठाभाई ( एक मुमुक्षु ) के मरणके बारेमें उन्होंने २। मास पूर्व स्पष्ट बता
दिया था ¹। एक बार सं० १९५५ की चैत्र वदी ८ को मोरवीमें दोपहरके ४ बजे पूर्वदिशाके आकाशमें
काले बादल देखे और उन्हें दुष्काल पड़नेका निमित्त जानकर उन्होंने कहा कि 'ऋतुको सन्निपात हुआ है।'
इस वर्ष १९५५ का चौमासा कोरा रहा—वर्षा नहीं हुई और १९५६ में भयंकर दुष्काल पड़ा । वे दूसरेके
मनकी बातको भी सरलतासे जान लेते थे । यह सब उनकी निर्मल आत्मशक्तिका प्रभाव था ।
कवि-लेखक
श्रीमद्जीमें, अपने विचारोंकी अभिव्यक्ति पद्यरूपमें करनेकी सहज क्षमता थी । उन्होंने सामाजिक
रचनाओंमें-'स्त्रीनीतिबोधक', 'सद्बोधशतक' 'आर्य प्रजानी पडती' 'हुन्नरकला वधारवा विषे' 'सद्गुण,
सुनीति, सत्य विषे' आदि अनेक रचनाएं केवल ८ वर्षकी वयमें लिखी थीं, जिनका एक संग्रह प्रकाशित हुआ
है । ९ वर्षकी आयुमें उन्होंने रामायण और महाभारतकी भी पद्य-रचना की थी जो प्राप्त नहीं हो सकी ।
इसके अतिरिक्त जो उनका मूल विषय आत्मज्ञान था उसमें उनकी अनेक रचनाएं हैं । प्रमुखरूपसे 'आत्म-
सिद्धि' ( १४२ दोहे ) 'अमूल्य तत्त्वविचार' 'भक्तिना वीस दोहरा' 'ज्ञानमीमांसा' 'परमपदप्राप्तिनी भावना'
( अपूर्व अवसर ) 'मूळमार्ग रहस्य' 'जिनवाणीनी स्तुति' 'वारह भावना' और 'तृष्णानी विचित्रता' हैं ।
अन्य भी बहुत-सी रचनाएं हैं, जो भिन्न-भिन्न वर्षोंमें लिखी हैं ।
'आत्मसिद्धि'-शास्त्रकी रचना तो आपने मात्र डेढ़ घंटेमें, श्री सौभाग्यभाई, डूंगरभाई आदि मुमु-
क्षुओंके हितार्थ नडियादमें आश्विन वदी १ ( गुजराती ) गुरुवार सं० १९५२ को २९वें वर्षमें लिखी थी ।
यह एक, निस्संदेह धर्ममार्गकी प्राप्तिमें प्रकाशरूप अद्भुत रचना है । अंग्रेजीमें भी इसके गद्य-पद्यात्मक अनुवाद
प्रगट हो चुके हैं ² ।
गद्य-लेखनमें श्रीमद्जीने 'पुष्पमाला' 'भावनावोध' और 'मोक्षमाला'की रचना की । यह सभी सामग्री
पठनीय-विचारणीय है । 'मोक्षमाला' उनकी अत्यन्त प्रसिद्ध रचना है, जिसे उन्होंने केवल १६ वर्ष ५ मासकी
आयुमें मात्र ३ दिनमें लिखी थी । इसमें १०८ पाठ हैं । कथनका प्रकार विशाल और तत्त्वपूर्ण है ।
उनकी अर्थ करनेकी शक्ति भी बड़ी गहन थी । भगवत्कुन्दकुन्दाचार्यके 'पंचास्तिकाय'-ग्रन्थकी मूल
गाथाओंका उन्होंने अविकल गुजराती अनुवाद किया है ³ ।
सहिष्णुता
विरोधमें भी सहनशील होना महापुरुषोंका स्वाभाविक गुण है । यह बात यहाँ घटित होती है । जैन
समाजके कुछ लोगोंने उनका प्रवल विरोध किया, निन्दा की, फिर भी वे अटल शांत और मौन रहे । उन्होंने
एक वार कहा था : 'दुनिया तो सदा ऐसी ही है । ज्ञानियोंको, जीवित हों तब कोई पहचानता नहीं, वह यहाँ
१. देखिये-दैनिक नोंधसे लिया गया कथन, पत्र क्र० ११६, ११७ ('श्रीमद्राजचन्द्र' गुजराती)
२. 'आत्मसिद्धि' के अंग्रेजी अनुवादमें Atmasiddhi, Self Realization, और Self Fulfilment
प्रगट हुए हैं । संस्कृत-छाया भी छपी है ।
३. देखिये-'श्रीमद्राजचन्द्र' गुज० पत्रांक ७६६ । उनकी सभी प्रमुख-सामग्रीका संकलन 'श्रीमद्राजचन्द्र'-
ग्रन्थमें किया गया है ।
[ ८ ]
तक कि ज्ञानीके सिर पर लाठियोंकी मार पड़े वह भी कम; और ज्ञानीके मरनेके बाद उसके नामके पत्थरको
भी पूजे !'
एकान्तचर्या
मोहमयी ( बम्बई ) नगरीमें व्यापारिक काम करते हुए भी श्रीमद्जी ज्ञानाराधना तो करते ही रहते
थे । यह उनका प्रमुख और अनिवार्य कार्य था । उद्योग-रत जीवनमें शांत और स्वस्थ चित्तसे चुपचाप आत्म-
साधना करना उनके लिये सहज हो चला था; फिर भी बीच-बीचमें विशेष अवकाश लेकर वे एकान्त स्थान,
जंगल या पर्वतोंमें पहुँच जाते थे । वे किसी भी स्थानपर बहुत गुप्तरूपसे जाते थे । वे नहीं चाहते थे कि
किसीके परिचयमें आया जाय, फिर भी उनकी सुगन्धी छिप नहीं पाती थी । अनेक जिज्ञासु-भ्रमर उनका
उपदेश, धर्मवचन सुननेकी इच्छासे पीछे-पीछे कहीं भी पहुँच ही जाते थे और सत्समागमका लाभ प्राप्त कर
लेते थे । गुजरातके चरोतर, ईडर आदि प्रदेशमें तथा सौराष्ट्र क्षेत्रके अनेक शान्तस्थानोंमें उनका गमन हुआ ।
आपके समागमका विशेष लाभ जिन्हें मिला उनमें मुनिश्री लल्लुजी ( श्रीमद्लघुराजस्वामी ), मुनिश्री देव-
करणजी तथा सायलाके श्री सौभाग्यभाई, अम्बालालभाई ( खंभात ), जूठाभाई ( अमदावाद ) एवं डूंगरभाई
मुख्य थे ।
एक बार श्रीमद्जी सं० १९५५ में जब कुछ दिन ईडरमें रहे तब उन्होंने डॉ० प्राणजीवनदास महेता
( जो उस समय ईडर स्टेटके चीफ मेडिकल ऑफिसर थे और सम्बन्धकी दृष्टिसे उनके श्वसुरके भाई होते थे )
से कह दिया था कि उनके आनेकी किसीको खबर न हो । उस समय वे नगरमें केवल भोजन लेने जितने
समयके लिए ही रुकते, शेष समय ईडरके पहाड़ और जंगलोंमें बिताते ।
मुनिश्री लल्लुजी, श्रीमोहनलालजी तथा श्री नरसीरखको उनके वहाँ पहुँचनेके समाचार मिल गये ।
वे शीघ्रतासे ईडर पहुँचे । श्रीमद्जीको उनके आगमनका समाचार मिला । उन्होंने कहलवा दिया कि मुनिश्री
बाहरसे बाहर जंगलमें पहुँचें—यहाँ न आवें । साधुगण जंगलमें चले गये । बादमें श्रीमद्जी भी वहाँ पहुँचे ।
उन्होंने मुनिश्री लल्लुजीसे एकांतमें अचानक ईडर आनेका कारण पूछा । मुनिश्रीने उत्तर में कहा कि 'हम लोग
अमदावाद या खंभात जानेवाले थे, यहाँ निवृत्ति क्षेत्रमें आपके समागममें विशेष लाभकी इच्छासे इस ओर
चले आये । मुनि देवकरणजी भी पीछे आते हैं ।' इस पर श्रीमद्जीने कहा—'आप लोग कल यहाँसे विहार
कर जावें, देवकरणजीको भी हम समाचार भिजवा देते हैं वे भी अन्यत्र विहार कर जावेंगे । हम यहाँ गुप्त-
रूपसे रहते हैं—किसीके परिचयमें आनेकी इच्छा नहीं है ।'
श्री लल्लुजी मुनिने नम्र-निवेदन किया—'आपकी आज्ञानुसार हम चले जावेंगे परन्तु मोहनलालजी
और नरसीरख मुनियोंको आपके दर्शन नहीं हुये हैं, आप आज्ञा करें तो एक दिन रुककर चले जावें ।'
श्रीमद्जीने इसकी स्वीकृति दी । दूसरे दिन मुनियोंने देखा कि जंगलमें आम्रवृक्षके नीचे श्रीमद्जी प्राकृतभाषाकी
*गाथाओंका तन्मय होकर उच्चारण कर रहे हैं । उनके पहुँचनेपर भी आधा घण्टे तक वे गाथायें बोलते ही
रहे और ध्यानस्थ हो गए । यह वातावरण देखकर मुनिगण आत्मविभोर हो उठे । थोड़ी देर बाद श्रीमद्जी
- १. मा मुज्झह मा रज्जह मा दुस्सह इट्ठणिट्ठअत्थेसु ।
थिरमिच्छह जइ चित्तं विचित्तझाणप्पसिद्धीए ॥४८॥
२. जं किंचि वि चिंतंतो णिरीहवित्ती हवे जदा साहू ।
लद्धूण एयत्तं तदाहु तं णिच्चयं ज्झाणं ॥ ५५ ॥
३. मा चिट्ठह मा जंपह मा चिंतह किं वि जेण होइ थिरो ।
अप्पा अप्पम्मि रओ इणमेव परं हवे ज्झाणं ॥ ५६ ॥
( द्रव्यसंग्रह )
—श्रीमद्जीने यह 'बृहद्द्रव्यसंग्रह'-ग्रन्थ ईडरके दि० जैन शास्त्र भण्डारमेंसे स्वयं निकलवाया था ।
[ ९ ]
ध्यानसे उठे और 'विचारना' इतना कहकर चलते बने । मुनियोंने विचारा कि लघुशंकादि-निवृत्तिके लिए
जाते होंगे परन्तु वे तो निस्पृहरूपसे चले ही गये । थोड़ी देर इधर-उधर ढूंढ़कर मुनिगण उपाश्रयमें आ गये ।
उसी दिन शामको मुनि देवकरणजी भी वहाँ पहुँच गये । सभीको श्रीमद्जीने पहाड़के ऊपर स्थित
दिगम्बर, श्वेताम्बर मन्दिरोंके दर्शन करनेकी आज्ञा दी । वीतराग-जिनप्रतिमाके दर्शनोंसे मुनियोंको परम
उल्लास जाग्रत हुआ । इसके पश्चात् तीन दिन और भी श्रीमद्जीके सत्समागमका लाभ उन्होंने उठाया ।
जिसमें श्रीमद्जीने उन्हें 'द्रव्यसंग्रह' और 'आत्मानुशासन'-ग्रन्थ पूरे पढ़कर स्वाध्यायके रूपमें सुनाये एवं अन्य
भी कल्याणकारी बोध दिया ।
अत्यन्त जाग्रत आत्मा ही परमात्मा बनता है, परम वीतराग-दशाको प्राप्त होता है । इन्हीं अन्तर-
भावोंके साथ आत्मस्वरूपकी ओर लक्ष कराते हुए एक बार श्रीमद्जीने अहमदाबादमें मुनिश्री लल्लुजी (पू०
लघुराजस्वामी ) तथा श्रीदेवकरणजीको कहा था कि 'हममें और वीतरागमें भेद गिनना नहीं' 'हममें और
श्री महावीर भगवानमें कुछ भी अन्तर नहीं, केवल इस कुर्तेका फेर है ।'
मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर
उनका कहना था कि मत-मतान्तरके आग्रहसे दूर रहने पर ही जीवनमें रागद्वेषसे रहित हुआ जा
सकता है । मतोंके आग्रहसे निजस्वभावरूप आत्मधर्मकी प्राप्ति नहीं हो सकती । किसी भी जाति या वेषके
साथ भी धर्मका सम्बन्ध नहीं :
“जाति वेषनो भेद नहि, कह्यो मार्ग जो होय ।
साधे ते मुक्ति लहे, एमां भेद न कोय ॥”
( आत्मसिद्धि १०७ )
—जो मोक्षका मार्ग कहा गया है वह हो तो किसी भी जाति या वेषसे मोक्ष होवे, इसमें कुछ भेद
नहीं है । जो साधना करे वह मुक्तिपद पावे ।
आपने लिखा है—“मूलतत्त्वमें कहीं भी भेद नहीं है । मात्र दृष्टिका भेद है ऐसा मानकर आशय
समझकर पवित्र धर्ममें प्रवृत्ति करना ।” ( पुष्पमाला १४ पृ० ४ )
“तू चाहे जिस धर्मको मानता हो इसका मुझे पक्षपात नहीं, मात्र कहनेका तात्पर्य यहो कि जिस
मार्गसे संसारमलका नाश हो उस भक्ति, उस धर्म और उस सदाचारकातू सेवन कर¹ ।” (पु०मा० १५ पृ०४)
“दुनिया मतभेदके बंधनसे तत्त्व नहीं पा सकी !” ( पत्र क्र० २७ )
उन्होंने प्रीतम, अखा, छोटम, कबीर, सुन्दरदास, सहजानन्द, मुक्तानन्द, नरसिंह महेता आदि सन्तोंकी
वाणीको जहाँ-तहाँ आदर दिया है और उन्हें मार्गानुसारी जीव (तत्त्वप्राप्तिके योग्य आत्मा ) कहा है । इसलिए
एक जगह उन्होंने अत्यन्त मध्यस्थतापूर्वक आध्यात्मिक-दृष्टि प्रगट की है कि 'मैं किसी गच्छमें नहीं, परन्तु
आत्मामें हूँ ।'
एक पत्रमें आपने दर्शाया है—“जब हम जैनशास्त्रोंको पढ़नेके लिए कहें तब जैनी होनेके लिए नहीं
कहते; जब वेदान्तशास्त्र पढ़नेके लिए कहें तो वेदान्ती होनेके लिए नहीं कहते । इसीप्रकार अन्य शास्त्रोंको वांचनेके
लिए कहें तब अन्य होनेके लिए नहीं कहते । जो कहते हैं वह केवल तुम सब लोगोंको उपदेश-ग्रहणके लिए
ही कहते हैं । जैन और वेदान्ती आदिके भेदका त्याग करो । आत्मा वैसा नहीं है² ।”
१. देखिए इसीप्रकारके विचार—
पक्षपातो न मे वीरे न द्वेषः कपिलादिषु ।
युक्तिमद्वचनं यस्य तस्य कार्यः परिग्रहः ॥ ( हरिभद्रसूरि )
२. श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुज० ) पत्र क्र० ३५८
[ १० ]
फिर भी अनुभवपूर्वक उन्होंने निर्ग्रन्थशासनकी उत्कृष्टताको स्वीकार किया है¹। अहो ! सर्वोत्कृष्ट
शांतरासमय सन्मार्ग, अहो ! उस सर्वोत्कृष्ट शांतरसप्रधान मार्गके मूल सर्वज्ञदेव, अहो ! उस सर्वोत्कृष्ट शांत-
रसकी सुप्रतीति करानेवाले परमकृपालु सद्गुरुदेव — इस विश्वमें सर्वकाल तुम जयवंत वर्तो, जयववंत वर्तो² ।'
दिनोंदिन और क्षण-क्षण उनकी वैराग्यवृत्ति वर्धमान हो चली। चैतन्यपुंज निखर उठा। वीतराग-
मार्गकी अविरल उपासना उनका ध्येय बन गई। वे बढ़ते गये और सहजभावसे कहते गये—"जहाँ-तहाँ से
रागद्वेषसे रहित होना ही मेरा धर्म है³ ।"
निर्मल सम्यग्दर्शनकी प्राप्तिमें उनके उद्गार इस प्रकार निकले हैं—
ओगणीससें ने सुडतालीसे,
समकित शुद्ध प्रकाश्युं रे,
श्रुत अनुभव बघती दशा,
निज स्वरूप अवभास्युं रे।
धन्य रे दिवस आ अहो !
( हा. नों. ११६३ क्र० ३२ )
सोल्लास उपकार-प्रगटना
"हे सर्वोत्कृष्ट सुखके हेतुभूत सम्यग्दर्शन ! तुझे अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार हो । इस अनादि अनन्त
संसारमें अनन्त अनन्त जीव तेरे आश्रय विना अनन्त अनन्त दुःख अनुभवते हैं । तेरे परमानुग्रहसे स्वस्वरूपमें
रुचि हुई । परमवीतराग स्वभावके प्रति परम निश्चय आया । कृतकृत्य होनेका मार्ग ग्रहण हुआ ।
हे जिन वीतराग ! तुम्हें अत्यन्त भक्तिसे नमस्कार करता हूँ । तुमने इस पामर पर अनंत अनंत
उपकार किया है।
हे कुन्दकुन्दादि आचार्यों ! तुम्हारे वचन भी स्वरूपानुसंधानमें इस पामरको परम उपकारभूत हुए हैं।
इसके लिए मैं तुम्हें अतिशय भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ ।
हे श्री सोभाग ! तेरे सत्समागमके अनुग्रहसे आत्मदशाका स्मरण हुआ । अतः तुझे नमस्कार करता
हूँ।" ( हा. नों. २/४५ क्र० २० )
परमनिवृत्तिरूप कामना / चिंतना—
उनका अन्तरङ्ग, गृहस्थावास-व्यापारादि कार्यसे छूटकर सर्वसंगपरित्याग कर निर्ग्रन्थदशाके लिए
छटपटाने लगा । उनका यह अन्तर-आशय उनकी 'हाथनोंध' परसे स्पष्ट प्रगट होता है:—
"हे जीव ! असारभूत लगनेवाले ऐसे इस व्यवसायसे अब निवृत्त हो, निवृत्त ! उस व्यवसायके
करनेमें चाहे जितना बलवान प्रारब्धोदय दीखता हो तो भी उससे निवृत्त हो, निवृत्त ! जो कि श्रीसर्वज्ञने
कहा है कि चौदहवें गुणस्थानवर्ती जीव भी प्रारब्ध भोगे विना मुक्त नहीं हो सकता, फिर भी तू उस उदयके
आश्रयरूप होनेसे अपना दोष जानकर उसका अत्यन्त तीव्ररूपमें विचारकर उससे निवृत्त हो, निवृत्त ! ( हा०
नो० १।१०१ क्र० ४४ )
"हे जीव ! अब तू संग-निवृत्तिरूप कालकी प्रतिज्ञा कर, प्रतिज्ञा कर ! केवलसंगनिवृत्तिरूप प्रतिज्ञाका विशेष
अवकाश दिखाई न दे तो अंशसंगनिवृत्तिरूप इस व्यवसायका त्याग कर ! जिस ज्ञानदशामें त्यागात्याग कुछ
१. 'श्रीमद्राजचन्द्र' शिक्षापाठ ९५ ( तत्त्वावबोध १४ ) तथा पत्र क्र० ५९६
२. हाथनोंध ५/५२ क्रम २३ 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुज० )
३. पत्र क्र० ३७ 'श्रीमद्राजचन्द्र'
[ ११ ]
सम्भावित नहीं उस ज्ञानदशाकी सिद्धि है जिसमें ऐसा तू, सर्वसंगत्याग दशा अल्पकाल भी भोगेगा तो सम्पूर्ण
जगत प्रसंगमें वर्तते हुए भी तुझे बाधा नहीं होगी, ऐसा होते हुए भी सर्वज्ञने निवृत्तिको ही प्रशस्त कहा है;
कारण कि ऋषभादि सर्व परमपुरुषोंने अन्तमें ऐसा ही किया है।" (हा. नों. १ । १०२ क्र० ४५ )
“राग, द्वेष और अज्ञानका आत्यंतिक अभाव करके जो सहज शुद्ध आत्मस्वरूपमें स्थित हुए वही
स्वरूप हमारे स्मरण, ध्यान और प्राप्त करने योग्य स्थान है।" (हा. नों. २ । ३ क्र० १ )
"सर्व परभाव और विभावसे व्यावृत, निज स्वभावके भान सहित, अवधूतवत् विदेहीवत् जिनकल्पीवत्
विचरते पुरुष भगवानके स्वरूपका ध्यान करते हैं।" (हा. नों. ३।३७ क्र० १४ )
"मैं एक हूँ, असंग हूँ, सर्व परभावसे मुक्त हूँ, असंख्यप्रदेशात्मक निजअवगाहनाप्रमाण हूँ। अजन्म,
अजर, अमर, शाश्वत हूँ। स्वपर्यायपरिणामी समयात्मक हूँ। शुद्ध चैतन्यमात्र निर्विकल्प दृष्टा हूँ। (हा.
नों. ३ । २६ क्र० ११ )
"मैं परमशुद्ध, अखंड चिद्धातु हूँ, अचिद्धातुके संयोगरसका यह आभास तो देखो ! आश्चर्यवत्,
आश्चर्यरूप, घटना है। कुछ भी अन्य विकल्पका अवकाश नहीं, स्थिति भी ऐसी ही है।" (हा. नों.
२ । ३७ क्र० १७ )
इसप्रकार अपनी आत्मदशाको संभालकर वे बढ़ते रहे। आपने सं० १९५६ में व्यवहार सम्बन्धी
सर्व उपाधिसे निवृत्ति लेकर सर्वसंगपरित्यागरूप दीक्षा धारण करनेकी अपनी माताजीसे आज्ञा भी ले ली
थी। परन्तु उनका शारीरिक स्वास्थ्य दिन-पर-दिन विगड़ता गया। उदय बलवान है। शरीरको रोगने
आ घेरा। अनेक उपचार करनेपर भी स्वास्थ्य ठीक नहीं हुआ। इसी विवशता में उनके हृदयकी गंभीरता
बोल उठी : "अत्यन्त त्वरासे प्रवास पूरा करना था, वहाँ बीचमें सेहराका मरुस्थल आ गया। सिर पर बहुत
बोझ था उसे आत्मवीर्यसे जिसप्रकार अल्पकालमें सहन कर लिया जाय उस प्रकार प्रयत्न करते हुए, पैरोंने
निकाचित उदयरूप थकान ग्रहण की। जो स्वरूप है वह अन्यथा नहीं होता यही अद्भुत आश्चर्य है।
अब्याबाध स्थिरता है१।"
अन्त समय
स्थिति और भी गिरती गई। शरीरका वजन १३२ पौंडसे घटकर मात्र ४३ पौंड रह गया। शायद
उनका अधिक जीवन कालको पसन्द नहीं था। देहत्यागके पहले दिन शामको आपने अपने छोटेभाई मन-
सुखराम आदिसे कहा- "तुम निश्चित रहना, यह आत्मा शाश्वत है। अवश्य विशेष उत्तम गतिको प्राप्त
होगा, तुम शान्ति और समाधिरूपसे प्रवर्तना। जो रत्नमय ज्ञानवाणी इस देहके द्वारा कही जा सकती थी,
वह कहनेका समय नहीं। तुम पुरुषार्थ करना।" रात्रिको २।। बजे वे फिर बोले - 'निश्चित रहना, भाईका
समाधिमरण हैं। और अवसानके दिन प्रातः पौने नौ बजे कहा : 'मनसुख, दुखी न होना, मैं अपने आत्म-
स्वरूपमें लीन होता हूँ।' और अन्तमें उस दिन सं० १९५७ चैत्र वदी ५ (गुज०) मंगलवारको दोपहरके
दो बजे राजकोटमें उनका आत्मा इस नश्वर देहको छोड़कर चला गया। भारतभूमि एक अनुपम तत्त्वज्ञानी-
सन्तको खो बैठी।
उनके देहावसानके समाचार सुनकर मुमुक्षुओंके चित्त उदास हो गये। वसंत मुरझा गया। निस्संदेह
श्रीमद्जी विश्वकी एक महान विभूति थे। उनका वीतरागमार्ग-प्रकाशक अनुपम वचनामृत आज भी जीवनको
अमरत्व प्रदान करनेके लिए विद्यमान है। धर्मजिज्ञासु बन्धु उनके वचनोंका लाभ उठावें।
श्री लघुराजस्वामी ( प्रभुश्री) ने उनके प्रति अपना हृदयोद्गार इन शब्दोंमें प्रगट किया है :
“अपरमार्थमें परमार्थके दृढ़ आग्रहरूप अनेक सूक्ष्म भूलभुलैयाँके प्रसंग दिखाकर इस दासके दोष दूर करनेमें
१. 'श्रीमद् राजचन्द्र' (गुज०) पत्र क्र० १५१।
[ १२ ]
इन आप्त पुरुषका परम सत्संग तथा उत्तम बोध प्रबल उपकारक बने हैं।" "संजीवनी औषध समान मृतको
जीवित करे ऐसे उनके प्रबल पुरुषार्थ जागृत करनेवाले वचनोंका माहात्म्य विशेष विशेष भास्यमान होनेके
साथ ठेठ मोक्षमें ले जाय ऐसी सम्यक् समझ ( दर्शन ) उस पुरुष और उसके बोधकी प्रतीतिसे प्राप्त होती
है; वे इस दुषम कलिकालमें आश्चर्यकारी अवलंबन हैं।" "परम माहात्म्यवंत सद्गुरु श्रीमद् राजचन्द्रदेवके
वचनोंमें तल्लीनता, श्रद्धा जिसे प्राप्त हुई है, या होगी उसका महद् भाग्य है। वह भव्य जीव अल्पकालमें
मोक्ष पाने योग्य है।" १
उनकी स्मृतिमें शास्त्रमालाकी स्थापना
सं० १९५६ में २सत्श्रुतके प्रचार हेतु बम्बईमें श्रीमद्जीने परमश्रुतप्रभावकमण्डलकी स्थापना की थी।
उसीके तत्त्वावधानमें उनकी स्मृतिस्वरूप श्रीरायचन्द्र जैन शास्त्रमालाकी स्थापना हुई। जिसकी ओरसे अब
तक समयसार, प्रवचनसार, गोम्मटसार, स्वामिकार्तिकेयानुप्रेक्षा, परमात्मप्रकाश और योगसार, पुरुषार्थ-
सिद्धयुपाय, इष्टोपदेश, प्रद्युम्नरतिप्रकरण, न्यायावतार, स्याद्वादमंजरी, अष्टप्राभृत, सभाष्यतत्त्वार्थाधिगमसूत्र,
ज्ञानार्णव, वृहद्द्रव्यसंग्रह, पंचास्तिकाय, लब्धिसार-क्षपणासार, द्रव्यानुयोगतर्कणा, सप्तभंगीतरंगिणी, उपदेश-
छाया और आत्मसिद्धि, भावना-बोध, श्रीमद्राजचन्द्र आदि ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमानमें संस्थाके
प्रकाशनका सब काम अगाससे ही होता है। विक्रयकेन्द्र बम्बईमें भी पूर्वस्थानपर ही है। श्रीमद्राजचन्द्र
आश्रम, अगाससे गुजराती भाषामें अन्य भी उपयोगी ग्रन्थ छपे हैं।
वर्तमानमें निम्नलिखित स्थानोंपर श्रीमद्राजचन्द्र आश्रम व मन्दिर आदि संस्थाएँ स्थापित हैं, जहाँ
पर मुमुक्षु-बन्धु मिलकर आत्मकल्याणार्थ वीतराग-तत्त्वज्ञानका लाभ उठाते हैं। वे स्थान हैं—अगास, ववा-
णिया, राजकोट, वड़वा, खंभात, काविठा, सीमरडा, भादरण, नार, सुणाव, नरोड़ा, सडोदरा, धामण,
अहमदाबाद, ईडर, सुरेन्द्रनगर, वसो, वटामण, उत्तरसंडा, बोरसद, आहोर (राज०), हम्पी (दक्षिण भारत),
इन्दौर (म० प्र०) ; बम्बई-घोटकोपर, देवलाली तथा मोम्बासा (आफ्रिका)।
अन्तमें, वीतराग-विज्ञानके निधान तीर्थंकरादि महापुरुषों द्वारा उपदिष्ट सर्वोपरि-आत्मधर्मका अविरल
प्रवाह जन-जनके अन्तरमें प्रवाहित हो, यही भावना है।
श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम }
स्टे० अगास, पो० बोरीया } —बाबूलाल सिद्धसेन जैन
वाया : आणंद ( गुजरात ) }
१. 'श्रीमद्गुरुप्रसाद' पृ० २, ३
२. श्रीमद्जीद्वारा निर्देशित सत्श्रुतरूप ग्रन्थोंकी सूचीके लिये देखिए 'श्रीमद्राजचन्द्र'-ग्रन्थ (गुज०)
उपदेशनोंध क्र० १५।
नमः सर्वज्ञाय
श्रीरायचन्द्रजैनशास्त्रमालायां
श्रीमल्लिषेणसूरिप्रणीता
स्याद्वादमञ्जरी
कलिकालसर्वज्ञश्रीहेमचन्द्राचार्यविरचिता
अन्ययोगव्यवच्छेदद्वात्रिंशिकास्तवनटीका
हिन्दीभाषानुवादसहिता ।
टीकाकारस्य मंगलाचरणम्
यस्य ज्ञानमनन्तवस्तुविषयं यः पूज्यते दैवतै-
र्नित्यं यस्य वचो न दुर्नयकृतैः कोलाहलैर्लुप्यते ।
रागद्वेषमुखद्विषां च परिषत् क्षिप्ता क्षणाद्येन सा
स श्रीवीरविभुर्विधूतकलूषां बुद्धिं विधत्तां मम ॥ १ ॥
निस्सीमप्रतिमैकजीवितधरौ निःशेषभूमिस्पृशां
पुण्यौघेन सरस्वतीसुरगुरू स्वाङ्गैकरूपौ दधत् ।
यः स्याद्वादमसाधयन् निजवपुर्दृष्टान्ततः सोऽस्तु मे
सद्बुद्ध्यम्बुनिधिप्रबोधविधये श्रीहेमचन्द्रः प्रभुः ॥ २ ॥
ये हेमचन्द्रं मुनिमेतदुक्तग्रन्थार्थसेवामिषतः श्रयन्ते ।
संप्राप्य ते गौरवमुज्ज्वलानां पदं कलानामुचितं भवन्ति ॥ ३ ॥
टीकाकारका मंगलाचरण
अर्थ—जो अनन्त वस्तुओंको जानते हैं, देवों द्वारा पूजे जाते हैं, जिनके वचन दुर्नयके कोलाहलसे
लुप्त नहीं होते, तथा जिन्होंने रागद्वेष-प्रधान शत्रुओंकी सभाको क्षण-भरमें परास्त कर दिया है, ऐसे वीरप्रभु
मेरी बुद्धि निर्मल करें ॥ १ ॥
समस्त मध्यलोकवर्ती प्राणियोंके पुण्य-प्रतापसे, असीम प्रतिभारूप प्राणोंके धारक, सरस्वती और
बृहस्पतिको अपने शरीररूपमें धारण करते हुए, जिन्होंने अपने शरीरके दृष्टान्तसे ही स्याद्वादके सिद्धान्तको
सिद्ध कर दिखाया है,–जिन्होंने एक ही शरीरमें परस्पर भिन्न सरस्वती और सुरगुरुके धारण करनेसे,
एक ही पदार्थको परस्पर भिन्न अनेक धर्मोंका धारक सूचित किया है—ऐसे हेमचन्द्रप्रभु मेरे सद्बुद्धिरूपी
समुद्रको अभिवृद्धि करें ॥ २ ॥
जो लोग इस ग्रन्थके अध्ययनके बहाने हेमचन्द्रमुनिका आश्रय लेते हैं, वे उज्ज्वल कलाओंके गौरव-
को प्राप्त करने योग्य पदको प्राप्त करते हैं ॥ ३ ॥