सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 458 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 27

टीकाकार मल्लिषेण 23
स्यान्नास्तिअवक्तव्य, और स्यादस्तिनास्तिअवक्तव्यके भेदसे सकलादेश और विकलादेश प्रमाणसप्तभंगी और
नयसप्तभंगीके सात सात भेदोंमें विभक्त है ।
( ४ ) स्याद्वादियोंके मतमें स्व द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा वस्तुमें अस्तित्व और पर द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा नास्तित्व है । जिस अपेक्षासे वस्तुमें अस्तित्व है, उसी अपेक्षासे वस्तुमें
नास्तित्व नहीं है । अतएव सप्तभंगी नयमें विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति
और अभाव नामक दोष नहीं आ सकते ।
( ५ ) द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा वस्तु नित्य, सामान्य, अवाच्य, और सत् है, तथा पर्यायार्थिक नयकी
अपेक्षा अनित्य, विशेष, वाच्य और असत् है । अतएव नित्यानित्यवाद, सामान्यविशेषवाद, अभिलाप्यानभि-
लाप्यवाद तथा सदसद्वाद इन चारों वादोंका स्याद्वादमें समावेश हो जाता है ।
( ६ ) नयरूप समस्त एकांतवादोंका समन्वय करनेवाला स्याद्वादका सिद्धांत ही सर्वमान्य हो सकता है।
( ७ ) भावाभाव, द्वैताद्वैत, नित्यानित्य आदि एकांतवादोंमें सुख-दुख, पुण्य-पाप, बन्ध-मोक्ष आदिकी
व्यवस्था नहीं बनती ।
( ८ ) वस्तुके अनन्त धर्मोंमेंसे एक समयमें किसी एक धर्मकी अपेक्षा लेकर वस्तुके प्रतिपादन करने-
को नय कहते हैं। इसलिये जितने तरहके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं। नयके एकसे लेकर
संख्यात भेद तक हो सकते हैं। सामान्यसे नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये
सात भेद किये जाते हैं। न्याय-वैशेषिक केवल नैगमनयके, अद्वैतवादी और सांख्य केवल संग्रहनयके, चार्वाक
केवल व्यवहारनयके, बौद्ध केवल ऋजुसूत्रनयके, और वैयाकरण केवल शब्दनयके माननेवाले हैं । प्रमाण
सम्पूर्ण नयरूप होता है । नयवाक्योंमें स्यात् शब्द लगाकर बोलनेको प्रमाण कहते हैं । प्रत्यक्ष और परोक्षके
भेदसे प्रमाणके दो भेद होते हैं ।
( ९ ) जितने जीव व्यवहारराशिसे मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि निगोदकी अव्यवहार-
राशिसे निकलकर व्यवहारराशिमें आ जाते हैं, और यह अव्यवहारराशि आदिरहित है, इसलिये जीवोंके
सतत मोक्ष जाते रहनेपर भी संसार जीवोंसे कभी खाली नहीं हो सकता ।
( १० ) पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिमें जीवत्वकी सिद्धि ।
( ११ ) प्रत्येक दर्शन नयवादमें गर्भित होता है । जिस समय नयरूप दर्शन परस्पर निरपेक्ष भावसे
वस्तुका प्रतिपादन करते हैं, उस समय ये दर्शन परसमय कहे जाते हैं। जिस प्रकार सम्पूर्ण नदियां एक समुद्रमें
जाकर मिलती है, उसी तरह अनेकांत दर्शनमें सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय होता है, इसलिये जैनदर्शन
स्वसमय है ।
श्लोक ३०-३२
यहाँ महावीर भगवानकी स्तुतिका उपसंहार करते हुए अनेकांतवादसे ही जगतका उद्धार होनेकी
शक्यताका प्रतिपादन किया गया है ।