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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 458 में से

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पृष्ठ 26

२४ ग्रंथ और ग्रंथकार
( ३ ) सत्कार्यवाद माननेवाले सांख्य लोगोंका आकाश आदिका पांच तन्मात्राओंसे उत्पत्ति मानना
असंगत है ।
( ४ ) बंध पुरुषके ही मानना चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
( ५ ) वाक्, पाणि आदिको पृथक् इन्द्रिय नहीं कह सकते, इसलिये पांच ही इन्द्रियां माननी चाहिये ।
( ६ ) केवल ज्ञानमात्रसे मोक्ष नहीं हो सकता ।
श्लोक १६-१९
इन श्लोकोंमें बौद्धोंके निम्न मुख्य सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) प्रमाण और प्रमाणके फलको सर्वथा अभिन्न न मानकर कथंचित् भिन्नाभिन्न मानना चाहिये ।
( २ ) सम्पूर्ण पदार्थोंको एकान्त रूपसे क्षणध्वंसी न मानकर उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य सहित स्वी-
कार करना चाहिये ।
( ३ ) पदार्थोंके ज्ञानमें तदुत्पत्ति और तदाकारताको कारण न मानकर क्षयोपशम रूप योग्यताको ही
कारण मानना चाहिये ।
( ४ ) विज्ञानवादी बौद्धोंका विज्ञानाद्वैत मानना ठीक नहीं है ।
( ५ ) प्रमाता, प्रमेय आदि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं, इसलिये माध्यमिक बौद्धोंका शून्य-
वाद युक्तिसंगत नहीं है ।
( ६ ) बौद्धोंके क्षणभंगवादमें अनेक दोष आते हैं, अतः क्षणभंगवादका सिद्धांत दोषपूर्ण है ।
( ७ ) क्षणभंगवादकी सिद्धिके लिये नाना क्षणोंकी परम्परारूप वासना अथवा संतानको मानना भी
ठीक नहीं ।
तथा—
( क ) नैयायिकोंके प्रमाण और प्रमितिमें एकान्त-भेद नहीं बन सकता ।
( ख ) आत्माकी सिद्धि ।
( ग ) सर्वज्ञकी सिद्धि ।
श्लोक २०
इस श्लोकमें चार्वाक मतके सिद्धांतोंका खण्डन किया गया है ।
श्लोक २०-२९
इन श्लोकोंमें स्वपक्षका समर्थन करते हुए स्याद्वादकी सिद्धि की गई है । इन श्लोकोंमें निम्न सिद्धां-
तोंका प्रतिपादन किया गया है—
( १ ) प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है । द्रव्यकी अपेक्षा वस्तुमें ध्रौव्य और पर्यायकी
अपेक्षा सदा उत्पाद और व्यय होता है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर सापेक्ष हैं ।
( २ ) आत्मा, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि सम्पूर्ण द्रव्योंमें नाना अपेक्षाओंसे नाना धर्म रहते
हैं, अतएव प्रत्येक वस्तुको अनन्तधर्मात्मक मानना चाहिये । जो वस्तु अनन्तधर्मात्मक नहीं होती, वह वस्तु
सत् भी नहीं होती ।
( ३ ) प्रमाणवाक्य और नयवाक्यसे वस्तुमें अनन्त धर्मोंकी सिद्धि होती है । प्रमाणवाक्यको सकला-
देश और नयवाक्यको विकलादेश कहते हैं । पदार्थके धर्मोंका काल, आत्मरूप, अर्थ, संबंध, उपकार गुणिदेश,
संसर्ग और शब्दकी अपेक्षा अभेदरूप कथन करना सकलादेश; तथा काल, आत्मरूप आदिकी भेदविवक्षासे
पदार्थोंके धर्मोंका प्रतिपादन करना विकलादेश है । स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्तिअवक्तव्य,