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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

ान का अंग ॥ । २८३
ग ज्ञानं को अंग
३१॥
ष ६८
गढ़ गवत,
नहीं कुलवानो ।
नि दीमन,
से नव नारी ।
अगन्तरि,
मनवारी ।
पें यर,
ती न्यारी ॥१॥
तरि,
ंतवारी ।
च,
यारी ॥
री ।
री ॥२॥
हृदय में ।

५. सवैया, पद संग्रह एवं उपसंहार

२४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्दव छंद
कै यह देह धरौ वन पर्वत,
कै यह देह नदी मैं वहौ जू ।
कै यह देह धरौ धरती महि,
कै यह देह कृसान दहौ जू ॥
कै यह देह निरादर निंदहु,
कै यह देह सराहि कहौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह चलौ कि रहौ जू ॥ ३ ॥
कै यह देह सदा सदा सुख सम्पति,
कै यह देह विपत्ति परौ जू ।
कै यह देह निरोग रहौ नित,
कै यह देह हि रोग चरौ जू ॥
कै यह देह हुताशन पैठहु,
कै यह देह हिमारै गरौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह जिवौ कि मरौ जू ॥४॥
॥ इति निः सशय ज्ञान को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
(३) कृसान-कृशानु, अग्नि। (४) हुताशन-अग्नि।
हिमारै-हिमालय ।

॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ । २०३
अथ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग
॥३१॥
सुन्दर द्रव
प्रीति की रीति नही कछु गनन,
जानि न पानि नही कुलगारो ।
प्रेम के नेम कछु नहिं दीसत,
लाज न कान नग्यो सब खारौ ।
लीन भयी हरि सों अभ्यन्तरि,
आठहू जाम रहै मनवारी ।
सुन्दर कोऊ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥१॥
ज्ञान दियो गुरुदेव कृपा करि,
दूरि कियौ भ्रम खोलि किवारी ।
और क्रिया कहि कौन करै अब,
चित लग्यौ परब्रह्म पियारी ॥
पाव बिना चलिकै तिहि ठाहर,
पंगु भयी मन मीत हमारी ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गाव की पेंडी ही न्यारी ॥२॥
(१) कुलगारो-कुलगोत्र । अभ्यन्तर-भीतर हृदय मे
पेंडो-मार्ग ।

२४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
एक अखंडित ज्यों नभ व्यापक,
बाहिर भीतरि है इकसारौ ।
दृष्टि न मुष्टि न रूप न रेख न,
श्वेत न पीत न रक्त न कारौ ।
चक्रित होइ रहै अनुभै विन,
जौ लगि नाहि न ज्ञान उजारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥३॥
द्वंद्व बिना बिचरै बसुधा पर,
जा घट आतम ज्ञान अपारौ ।
काम न क्रोध न लोभ न मोह न,
राग न द्वेष न म्हारी न थारौ ।
जोग न भोग न त्याग न संग्रह,
देह दशा न ढक्यो न उघारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥४॥
(३) चक्रित-चकित । नभ-आकाश । (४) द्वन्द्व-शीत-
उष्ण, भूख-प्यास सुख-दुख, मान-अपमान, जय-पराजय
आदि । वसुधा-पृथ्वी ।

॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ [२४५
लक्ष अलक्ष न दक्ष अदक्ष न,
पक्ष अपक्ष न तूल न भारो ।
झूठ न साच अवाच न वाच न,
कंचन काच न दीन उदारो ॥
जान अजान न मान अमान न,
ज्ञान गुमान न जीत न हारो ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गौकुल गाव की पैंढो ही न्यारी ॥५॥
५ इति प्रेमपरायण ज्ञान को अंग सम्पूर्ण ॥
(५) लक्ष-लक्ष्य । अलक्ष-अलक्ष्य । दक्ष-निपुण, चतुर,
कुशल । तूल-हल्का । अवाच-अवाच्य, अवर्णनीय । वाच-
वाच्य, वर्णनीय । दीन-गरीब । उदार-दानी ।

२४६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥३२॥
इन्देव छंद (प्रश्नोत्तर)
हौ तुम कौन ? हू ब्रह्म अखंडित,
देह मै क्यो ? नहि देह कै नेरै ।
बोलत केसै कै ? हूं नहि बोलत,
जानिये कैसै ? अज्ञान है तेरै ॥
दूरि करो भ्रम ? निश्चै धारि,
कहौ गुरुदेव ? कहौ नित टेरै ।
हू तुम ऐसे, हि तू पुनि ऐसौ ई,
दोइ भये ? नहिं द्वैत है मेरै ॥१॥
हू कछु और कि तू कछु और कि,
है कछु और कि सो कछु औरै ।
हू अरु तू यह है कछू सौ पुनि,
बुद्धि विलास भयौ झक झौरै ॥
हू नहि तू नहिं है कछु सौ नहि,
बूझि बिना जित ही तित दौरै ।
हू पुनि तू पुनि है कछु सो पुनि,
सुन्दर व्यापि रह्यौ सब ठौरै ॥२॥
उत्तम मद्धिम और शुभाशुभ,
भेद अभेद जहा लग जो है ।

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४७
दीसन भित्त तयो भ्रम दर्पन,
वस्तु दिषावन एकई सो है ॥
जो सुनिये गन दृष्टि परे पुनि,
वा बिन ओर नहीं अब को है ।
सुन्दर सुन्दर व्यापि रह्यो सब,
सुन्दर ही महि सुन्दर सो है ॥३।
ज्यों बन एक अनेक भये द्रुम,
नाम अनंतनि जाति हु न्यारी ।
वापि तडाग रु कूप नदी सब,
है जल एक सो देषौ निहारी ॥
पावक एक प्रकास बहू विधि,
दीप चिराफ़ मसाल हु वारी ।
सुन्दर ब्रह्म विलास अखंडित,
पंडित भेद की बुद्धि सु टारी ॥४॥
एक शरीर मैं अंग भये बहु,
एक धरा पर धाम अनेका ।
एक शिला महिं कोरि किये सब,
चित्र बनाइ घरे ठिकठेका ॥
एक समुद्र तरंग अनेकनि,
कैसे के कीजिये भिन्न विवेका ।
द्वैत कछू नहिं देखिये सुन्दर,
ब्रह्म अखंडित एक की एका ॥५॥

२४८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
ज्यों मृतिका घट नीर तरंग हि,
बादल व्योम सु व्योम जु भूता ॥
वृक्ष सु वीज है वीज सु वृक्ष है,
पूत सु वाप है वाप सु पूता ।
वस्तु विचारत एक हि सुन्दर,
ताने रु बानै तौ देखिये सूता ॥६॥
भूमि हु चेतनि आपु हु चेतनि,
तेज हु चेतनि है जु प्रचंडा ।
वायु हु चेतनि ब्योम हु चेतनि,
शब्द हु चेतनि पिंड ब्रह्माण्डा ॥
है मन चेतनि बुद्धि हु चेतनि,
चित्त हु चेतनि आहि उडंडा ।
जो कछु नाम धरै सौई चेतनि,
चेतनि सुन्दर ब्रह्म अखंडा ॥७॥
एक अखंडित ब्रह्म बिराजत,
नाम जुदौ करि विश्व कहावै ।
एक ई ग्रंथ पुरान बखानत,
एक ई दत्त बसिष्ठ सुनावै ॥
एक ई अर्जुन उद्धव सौ कहि,
कृष्ण कृपा करिकै समुझावै ।
सुन्दर द्वैत कछू मति जानहु,
एक ई ब्यापक बेद बतावै ॥८॥

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २४६
मनहर छंद
सिष्य पूछै गुरुदेव ! गुरु कहैं पूछ सिष्य,
मेरैं एक संशय है ? पूछै क्यों न अब ही ।
तुम कह्यौ एक ब्रह्म, अबहू मैं कहू एक,
एक तौ अनेक क्यौ ? इहै तौ भ्रम सब ही ॥
भ्रम इहै कौन कौ है ? भ्रम ही कौ भ्रम भयौ,
भ्रम ही कौ भ्रम कैसे ? तू न जानै कब ही ।
कैसे करि जा गै प्रभु ? गुरु कहै निश्चै धरि,
निहचै मै धार्यौ अब एक ब्रह्म तब ही ॥६॥
ब्रह्म ठौर कौ है ठौर दूसरौ न कोऊ और,
बस्तु कौ बिचार कियै बस्तु पहिचानिये ।
पंच तत्त तीनि गुन बिस्तरे बिबिध भाति,
नाम रूप जहा लगै मिथ्या माया मानिये ।:
सेषनाग आदि दै कै बैकुण्ठ गोलोक पुनि,
वचन बिलास सब भेद भ्रम भानिये ।
न तो कोऊ उरझ्यौ न सुरझ्यौ कहौ सु कौन,
सुन्दर सकल यह ऊबाबाई जानिये ॥१०॥
(१०) ऊवाबाई-भूल भुलैया ।

२५० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
प्रथम हि देह मैं तै बाहिर कौ चौकि पर्यौ,
इन्द्रिय व्यौपार सुख सत्य करि जान्यौ है ।
कौन ऊ सजोग पाइ सद्‌गुरु सौ भेट भई,
उन उपदेश दे कै भीतर कौं आँन्यौ है ॥
भीतर कै आवत ही बुद्धि कौ प्रकास भयौ,
कौन देह ? कौन मैं ? जगत किन मान्यौ है ?
सुन्दर विचारत यौ ऊपज्यौ अद्वैत ज्ञान,
आप कौ अखड ब्रह्म एक पहिचान्यौ है ॥११॥
हसल छंद
सकल ससार बिस्तार करि बरनियौ,
स्वर्ग पाताल मृति पूरि भ्रम रह्यौ है ।
एक ते गिनत गिनि जाइये सौ लगें,
फेरि करि एक कौ एक ही गह्यौ है ॥
यह नहि यह नहि यह नहि यह नहि,
रहै अवशेष सौ बेद हू कह्यौ है ।
सुन्दर सही यौ बिचार आपुनपौ,
आपुमै आपुकौ आपु ही लह्यौ है ॥१२॥
एक तू दोइ तू तीनि तू चारि तू
पंच तू तत्व मैं जगत कोयौ ।
नाम अरु रूप व्है बहुत बिधि बिस्तर्यौ,
तुम बिना और कोऊ नाहि बीयौ ॥

॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५१
राव तू रक तू दाना तू दीन तू,
दोइ करि मेलि तै दीयौ लियौ ।
सकल यह सृष्टि तुम माहि उपजै खपै,
कहत सुन्दर बडौ बिपुल हीयौ ॥१३।
मनहर छंद
तोही मैं जगत यह तूं ही है जगत माहि,
तो मैं अरु जगत मै भिन्नता कहा रही ।
भूमि ही तै भाजन अनेक भाति नाम रूप,
भाजन बिचारि देखे ऊहै एक है मही ॥
जल तै तरग भई फेन बुद्बुदा अनेक,
सोऊ तौ बिचारै एक वह जल है सही ।
महापुरुष जेते है सबको सिधांत एक,
सुन्दर 'खल्विदं ब्रह्म' अस बेद है कही ॥१४॥
जैसे इक्षु रस की मिठाई भाति भाति भई,
फेरि करि गारै इक्षु रस ही लहतु है ।
जैसे घृत थीजि कै डरा सौ बधि जात पुनि,
फेरि पिघरे ते वह घृत ही रहतु है ।
(१३) बीयो-अन्य, द्वितीय, दूसरा । दाना-धनी, दानी ।
विपुल-विशाल । हीयो-हृदय ।

२५२ ] ।। सुन्दर विलास ।।
जैसे पानी जमिकै पाखान हू सौ देखियत,
सो पखान फेरि करि पानी व्है बहुत है ।
तैसे हि सुन्दर यह जगत है ब्रह्ममय,
ब्रह्म सो जगत मय बेद यौं कहतु है ॥१५॥
जैसे काठ कौरि करि पूतरि बनाइ राखी,
जो बिचार देखिये तौ उहै एक दारु है ।
जैसे माला सूत ही की मनिकाऊ सूत ही के,
भीतरि हू पोयौ पुनि सूत ही कौ तार है ॥
जैसे एक समुद्र के जल ही कौ लौन भयौ,
सोऊ तौ बिचारे पुनि उहै जल खार है ।
तैसे हि सुन्दर यह जगत सु ब्रह्ममय,
ब्रह्म सु जगत मय याहि निरधार है ॥१६॥
जैसे एक लोहके हथ्यार नाना बिधि कीये,
आदि अन्ति मधि एक लोह ई प्रवानिये ।
जैसे एक कंचन के भूषन अनेक भये,
आदि अंत मधि एक कंचन ई जाँनिये ॥
(१५) इक्षु-ईख । थीजिकै-जमकर । पखाण-पाषाण,
पत्थर ।
(१६) दारु-लकडी । लौन-लवण, नमक । निरधार-
निश्चय ।

॥ अद्वैत ज्ञान को अग ॥ [२५३]
जैसे एक मैन के सवारे नर हाथी हय,
आदि अन्ति मधि एक मैन ई बखानिये ।
तैसे ही सुन्दर यह जगत सु ब्रह्ममय,
ब्रह्म सु जगत मय निश्चै करि मानिये ॥१७॥
ब्रह्म मैं जगत यह ऐसी विधि देखियत,
जैसी विधि देखियत फूलरो महीर मैं ।
जैसी विधि गिलम दूलीचे मैं अनेक भाति,
जैसी विधि देखियत चूनरी ऊ चोर मैं ॥
जसी विधि कागरे ऊ कोट परि देखियत,
जैसी विधि देखियत वुदबुदा नीर मैं ।
सुन्दर कहत लीक हाथ पर देखियत,
जैसी विधि देखियत शीतलता शरीर मैं ॥१८॥
ब्रह्म अरु माया जैसे शिव अरु शक्ति पुनि,
पुरुष प्रकृति दोऊ कहिकै सुनाये है ।
पति अरु पतनी ईश्वर अरु ईश्वरी ऊ,
नारायन लक्षमी द्वै बचन कहाये हैं ।
जैसे कोऊ अर्धनारी नाटेश्वर रूप धरै,
एक बीज ही तै दोइ दाल नाम पाये हैं ।
तैसे ही सुन्दर बस्तु ज्यो है त्यौ ही एक रस,
उभय प्रकार होई आपु ही दिखाये हैं ॥१६॥
(१७) मैन-मोम । ब्रह्ममय-ब्रह्मस्वरूप ।

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॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५५
कारज देखि भयौ बिचि विभ्रम,
कारन देखि विभ्रम्म विलावै ।
सुंदर या निश्चै अभिन्नतरि,
द्वैत गये फिरि द्वैत न आव ॥२२॥
मनहर छंद
द्वैत करि देखै जब द्वैत ही दिखाई देत,
एक करि देखै तब उहै एक अंग है ।
सूरज कौ देखै जब सूरज प्रकासि रह्यौ,
किरन की देखै तौ किरन नाना रंग है ॥
भ्रम जब भयौ तब माया ऐसो नाम धर्यो,
भ्रम के गये तै एक ब्रह्म सरवग है ।
सुंदर कहत याकी दृष्टि ही कौ फेर भयौ,
ब्रह्म अरु माया कै तौ माथै नही शृङ्ग है । २३।।
श्रोत्र कछु और नाहि नेत्र कछु और नाहि,
नासा कछु और नाहिं रसना न और है ।
त्वक कछु और नाहि वाक कछु और नाहि,
हाथ कछु और नाहि पावन की दौर है ॥
(२३) सरवग-सर्वव्यापक ।

२५६ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
मन कछु और नाहि बुद्धि कछु और नाहि,
चित्त कछु और नाहि अहकार तीर है।
सुदर कहत एक ब्रह्म बिनु और नाहि,
आपु ही मैं आपु व्यापि रह्याँ सब ठौर है ॥२८॥
॥ इति अद्वैत ज्ञान को अग सम्पूर्ण ॥

॥ जगतमिथ्यात्व को अंग ॥ [ २५७
अथ जगत मिथ्यात्व को अंग
॥३३॥
मनहर छंद
कियो न विचार कछु भनक परी है कान,
धार आई मुनि के डरपि त्रिप खायी है ।
जैसे कोऊ अनछतौ ऐसै ही बुलाइयत,
वार बीति गई पर कोऊ नही आगौ है ॥
वेद हु वरनि कै जगत तरु ठाटौ कियौ,
अन्त पुनि वेद जर मूल तें उठायौ है ।
तैसे हि सुन्दर याकौं कोऊ एक पावै भेद,
जगत कौ नाम मुनि जगत भुलायी है ॥१॥
ऐसी ही अज्ञान कोऊ आडकै प्रगट भयी
दिव्य दृष्टि दूर गई देखे चाम दृष्टि कौ ।
जैसे एक आरसी सदा ई हाथ माहि रहे,
साम्हैं ह्वैं न देखे फेरि फेरि देखे पृष्ठि कौ ॥
जैसे एक व्योम पुनि बादर सौ छाइ रह्यौ,
व्योम नहिं देखत देखत बहु वृष्टि कौ ।
तैसे एक ब्रह्म ई विराजमान सुन्दर हैं,
ब्रह्म कौ न देखे कोऊ देखे सब सृष्टि कौ ॥२॥
(१) अनछतो-अनुपस्थित, असत्, सत्तारहित ।
(२) साम्हैं-सीधी तरफ । पृष्ठि-पीछे की तरफ ।

२५८ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अनछतौ जगत अज्ञान तै प्रगट भयौ,
जैसे कोऊ बालक बेताल देखि डर्यौ है ।
जैसे कोऊ सुपनै मैं दाव्यौ है अथारै आइ,
मुख तै न आवै बोल ऐसो दुख पर्यौ है ॥
जैसे अंधियारी रैनि जेवरी न जानै ताहि,
आपु ही तै साप मानि भय अति कर्यौ है ।
तैसे ही सुन्दर एक ज्ञान कै प्रकास बिन,
आपु दुख पाइ पाइ आपु पचि मर्यौ है ॥३॥
मृत्तिका समाइ रही भाजन के रूप माहि,
मृत्तिका कौ नाम मिटि भाजन ई गह्यौ है ।
कनक समाय त्यौ ही होइ रह्यौ आभूषण,
कनक न कहै कोऊ आभूषण कह्यौ है ॥
बीज ऊ समाइ करि बृक्ष होई रह्यौ पुनि,
बृक्ष ई कौ देखियत बीज नही लह्यौ है ।
सुन्दर कहत यह यौही करि जानौ सब,
ब्रह्म ई जगत होइ ब्रह्म पूरि रह्यौ है ॥४॥
(३) अनछतो-अस्तित्वहीन । अथारै-छाती पर ।
(४) मृत्तिका-मिट्टी । भाजन-बर्तन । कनक-सुवर्ण,
सोना ।

॥ जगत्मिथ्यात्व को अंग ॥ [२५६
कहत है देह माहि जीव आइ मिलि रह्यो.
कहां देह कहा जीव वृथा चौंक पर्यो है ।
बूटवे के डरतें तिरन को उपाय करै,
ऐसें नहि जानै यहु मृगजरा भयौ है ॥
जेवरी कौं साप जैसे सीपि विषै रूपौ जानि,
और की और ई देखि यां ही भ्रम पर्यो है ।
सुन्दर कहत यह एक ई अखंड ब्रह्म,
ताहि को पलटि के जगत नाम धर्यो है ॥५॥
॥ इति जगन्मिथ्यात्व को अंग सम्पूर्ण ॥

२६० ] ॥ सुन्दर विलास ॥
अथ आश्चर्य को अङ्ग ॥३४॥
मनहर छन्द
बेद कौ बिचार सोई सुनि कै सतनि मुख,
आपु हू विचार करि सोई धारियतु है।
योग की जुगति जानि जग तें उदास होइ,
सुंनि मैं समाधि लाइ मन मारियतु है॥
ऐसैं ऐसैं करत करत केते दिन बीते,
सुन्दर कहत अज हू बिचारियतु है।
कारौ ही न पीरौ न तौ तातौ ही न सीरौ कछु,
हाथ न परत तातै हाथ झारियतु है ॥१॥
मन कौ अगम अति बचन थकित होत,
बुद्धि हू बिचार करि बहु खींडियतु है।
श्रवन न सुनै जाहि नैन हू न देखै ताहि,
रसना कौ रस सरबस छींडियतु है॥
त्वक कौ सपर्स नाहि घ्रान कौ न बिषै होइ,
पगनि हू करि जित तित हींडियतु है।
सुन्दर कहत अति सूक्षिम स्वरूप कछु,
हाथ न परत तातै हाथ मीडियतु है ॥२॥
(१) कारो-काला। पीरो-पीला। तातो-गर्म। सीरो-
ठढा। (२) खींडियतु है-बिखर जाता है। छींडियतु
है-छिटक जाता है। हींडियतु है-भटकता है। मीडियतु
है-मलता है।