सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
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२४२ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
इन्दव छंद
कै यह देह धरौ वन पर्वत,
कै यह देह नदी मैं वहौ जू ।
कै यह देह धरौ धरती महि,
कै यह देह कृसान दहौ जू ॥
कै यह देह निरादर निंदहु,
कै यह देह सराहि कहौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह चलौ कि रहौ जू ॥ ३ ॥
कै यह देह सदा सदा सुख सम्पति,
कै यह देह विपत्ति परौ जू ।
कै यह देह निरोग रहौ नित,
कै यह देह हि रोग चरौ जू ॥
कै यह देह हुताशन पैठहु,
कै यह देह हिमारै गरौ जू ।
सुन्दर सशय दूरि भयौ सब,
कै यह देह जिवौ कि मरौ जू ॥४॥
॥ इति निः सशय ज्ञान को अङ्ग सम्पूर्ण ॥
(३) कृसान-कृशानु, अग्नि। (४) हुताशन-अग्नि।
हिमारै-हिमालय ।