सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ प्रेमपरायण ज्ञान को अंग ॥ [२४५
लक्ष अलक्ष न दक्ष अदक्ष न,
पक्ष अपक्ष न तूल न भारो ।
झूठ न साच अवाच न वाच न,
कंचन काच न दीन उदारो ॥
जान अजान न मान अमान न,
ज्ञान गुमान न जीत न हारो ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गौकुल गाव की पैंढो ही न्यारी ॥५॥
५ इति प्रेमपरायण ज्ञान को अंग सम्पूर्ण ॥
(५) लक्ष-लक्ष्य । अलक्ष-अलक्ष्य । दक्ष-निपुण, चतुर,
कुशल । तूल-हल्का । अवाच-अवाच्य, अवर्णनीय । वाच-
वाच्य, वर्णनीय । दीन-गरीब । उदार-दानी ।