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सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary

सन्त सुन्दरदास जी द्वारा

DevanagariHindipublished284 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

२४४ ] ॥ सुन्दर विलास ॥
एक अखंडित ज्यों नभ व्यापक,
बाहिर भीतरि है इकसारौ ।
दृष्टि न मुष्टि न रूप न रेख न,
श्वेत न पीत न रक्त न कारौ ।
चक्रित होइ रहै अनुभै विन,
जौ लगि नाहि न ज्ञान उजारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥३॥
द्वंद्व बिना बिचरै बसुधा पर,
जा घट आतम ज्ञान अपारौ ।
काम न क्रोध न लोभ न मोह न,
राग न द्वेष न म्हारी न थारौ ।
जोग न भोग न त्याग न संग्रह,
देह दशा न ढक्यो न उघारौ ।
सुन्दर कोउ न जानि सकै यह,
गोकुल गावको पेंडौ ही न्यारौ ॥४॥
(३) चक्रित-चकित । नभ-आकाश । (४) द्वन्द्व-शीत-
उष्ण, भूख-प्यास सुख-दुख, मान-अपमान, जय-पराजय
आदि । वसुधा-पृथ्वी ।