सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ अद्वैत ज्ञान को अंग ॥ [ २५५
कारज देखि भयौ बिचि विभ्रम,
कारन देखि विभ्रम्म विलावै ।
सुंदर या निश्चै अभिन्नतरि,
द्वैत गये फिरि द्वैत न आव ॥२२॥
मनहर छंद
द्वैत करि देखै जब द्वैत ही दिखाई देत,
एक करि देखै तब उहै एक अंग है ।
सूरज कौ देखै जब सूरज प्रकासि रह्यौ,
किरन की देखै तौ किरन नाना रंग है ॥
भ्रम जब भयौ तब माया ऐसो नाम धर्यो,
भ्रम के गये तै एक ब्रह्म सरवग है ।
सुंदर कहत याकी दृष्टि ही कौ फेर भयौ,
ब्रह्म अरु माया कै तौ माथै नही शृङ्ग है । २३।।
श्रोत्र कछु और नाहि नेत्र कछु और नाहि,
नासा कछु और नाहिं रसना न और है ।
त्वक कछु और नाहि वाक कछु और नाहि,
हाथ कछु और नाहि पावन की दौर है ॥
(२३) सरवग-सर्वव्यापक ।